राजा मान्धाता की जीवनी और इतिहास |Biography and History of King Mandhata

राजा मान्धाता की जीवनी और इतिहास

राजा मान्धाता की जीवनी और इतिहास |Biography and History of King Mandhata

सम्राट मान्धाता 

पौराणिक अनुश्रुति के अनुसार भारत के सम्राटों में प्रथम सम्राट मान्धाता प्रसिद्ध है। उसे पुराणों में चक्रवर्ती सम्राट कहा गया है। उसने पड़ोस के अनेक राज्यों को जीतकर दिग्विजय किया। 

सम्राट मान्धाता के सम्बन्ध में पौराणिक अनुश्रुति में कहा गया है कि सूर्य जहां से उगता है और जहां अस्त होता है, वह सम्पूर्ण प्रदेश मान्धाता के शासन में था। 

जिन आर्य राज्यों को जीतकर मान्धाता ने अपने अधीन किया उनमें पौरव, आनव, द्रुहयु और हैह्य राज्यों के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। 

मान्धाता को चक्रवर्ती और सम्राट बताने तथा उसकी विजयों के बारे में आर्य राज्यों को जीतना कारण बताया गया है, जिससे निष्कर्ष निकलता है वह स्वयं भी आर्य था। 

चूंकि भारत का इतिहास आर्यों से ही आरम्भ होता है, इसलिए भारत की सभ्यता का ज्ञान आर्यों के भारत आगमन से ही प्रकाश में आता है इसलिए कहा जा सकता है कि सम्राट मान्धाता का काल 5,000 वर्ष पूर्व रहा है।

मान्धाता के पूर्वज 

पौराणिक अनुश्रुति के अनुसार भारत का पहला आर्य राजा मनु था। मनु को मानववंश का प्रथम पुरुष भी कहा जाता है। मनु का पूरा नाम वैवस्वत मनु के रूप में सामने आता है।

अनुश्रुति के अनुसार मनु से पूर्व इस देश की अराजक दशा थी। अराजक दशा से परेशान होकर लोगों ने मनु को अपना राजा चुना और उसके आदेशों का पालन स्वीकार किया। मनु हर ओर से निश्चित होकर राज्य व्यवस्था में अपना सारा समय लगाने लगे। प्रजा ने पैदावार का छठा हिस्सा स्वेच्छा से राजा को देना स्वीकार किया। 

वैवस्वत मनु के पहला राजा बनने की बात न केवल पुराणों में, अपितु महाभारत, कौटिल्य का अर्थशास्त्र आदि ग्रंथों में भी विद्यमान है। महाभारत धर्मग्रंथ है, उसकी ऐतिहासिक प्रमाणिकता अमान्य हो सकती है, परन्तु कौटिल्य का अर्थशास्त्र ऐतिहासिक प्रमाणिकता है, उसके विवरणों को इतिहास स्वीकार करता है। मनु के प्रथम राजा बनने के बाद उसकी संतानों के राज्य को मानववंश का राज्य कहा गया।

हिन्दू धर्म के अनुसार मनु

हिन्दू धर्म के अनुसार मनु संसार के प्रथम पुरुष थे। उनके साथ प्रथम स्त्री थी शतरूपा। ये पृथ्वी के उत्पन्न होने के बाद प्रथम पुरुष के रूप में सामने आने पर स्वयं-भू कहलाए। 

सभी भाषाओं में मनुष्य शब्द-मैन (Man), मनुज, मानव, आदम, आदमी आदि मनु शब्द से ही प्रभावित हैं। ये समस्त मानव जाति के प्रथम संदेशवाहक 

हिन्दू धर्म में स्वयंभू मनु के कुल में आगे चलकर स्वयंभू मनु सहित क्रमशः 14 मनु हुए। महाभारत में 8 मनुओं का उल्लेख मिलता है। श्वेतवराह कल्प में 14 मनुओं का उल्लेख है। इन चौदह मनुओं को जैन धर्म में कुलकर कहा गया है। चौदह मनुओं के नाम इस प्रकार हैं- 

1.स्वयंभू मनु, 2. स्रोचिष मनु, 3. यौत्तमी मनु, 4. तामस मनु, 5. रैवत मनु, 6. चाक्षुष मनु, 7. श्राद्धदेव मनु, 8. सावर्णि मनु, 9. दक्ष सावर्णि मनु, 10. ब्रह्म सावर्णि मनु, 11. धर्म सावर्णि मनु, 12. रुद्र सावर्णि मनु, 13. देव सावर्णि मनु, 14. इंद्र सावर्णि मनु।

सावर्णि मनु के बारे में वर्णन मिलता है कि इनका आविर्भाव विक्रमी संवत् प्रारम्भ होने से 5680 वर्ष पूर्व हुआ था। कामायनी में मनु-जयशंकर प्रसाद’ का महाकाव्य कामायनी है। कामायनी के मनु के सम्बन्ध में कहा जाता है कि प्रलय आने से पृथ्वी बाढ़ग्रस्त हो गयी थी। कामायनी की शुरूआत इन पंक्तियों से होती है- 

हिमगिरी के उतुंग शिखर पर, बैठ शिला की शीतल छांव।

एक पुरुष देख रहा था, भीगे नयनों से प्रलय प्रवाह ॥ 

मनुस्मृति के अनुसार-महाभारत में 8 मनुओं का उल्लेख है।

शतपथ ब्राह्मण में मनु को श्रद्धादेव कहकर सम्बोधित किया गया है। श्रीमद् भागवत में उन्हें वैवस्व मनु और श्रद्धा (स्त्री पत्नी) से सृष्टि का प्रारम्भ माना गया है। उन्हीं मनु ने मनुस्मृति नामक ग्रंथ की रचना की, जो मूलरूप से उपलब्ध नहीं है।

मनु के बारे में अन्य प्रसंग-आदि पुरुष मनु के समय में प्रलय की घटना का जो विवरण है, ठीक वैसी ही घटना का विवरण हज़रत नूह को लेकर भी है। हजरत नूह-यहूदी, ईसाई और इस्लाम धर्म के पैगम्बर हैं। उस वक्त हजरत नूह की उम्र छः सौ वर्ष थी जबकि यहोवा (ईश्वर) ने उनसे कहा-“तू एक-एक जोड़ी सभी तरह के प्राणी समेत अपने सारे घराने को लेकर कश्ती पर सवार हो जा, क्योंकि मैं पृथ्वी पर जल प्रलय लाने वाला हूं।” सात दिन बाद प्रलय का जल पृथ्वी को डुबाने लगा। हजरत नूह के साथ किश्ती में जो लोग थे वे बच गए। शेष सब डूब गए। धीरे-धीरे जल उतरा, तब पुनः पृथ्वी प्रकट हुई और किश्ती में जो बचे थे, उन्हीं से दुनिया पुनः आबाद 

मनु और हजरत नूह की कहानी में तारतम्य-वैवस्वत मनु के समक्ष भगवान विष्णु द्वारा मत्स्य रूप में प्रकट होकर नौका बनवा लेने, सात दिन बाद प्रलय होने और नौका से बच जाने का वर्णन सामने आता है। 

नोट-मनु के बारे में उपरोक्त विवरण सम्राट मान्धाता के पूर्वज का परिचय देने के उद्देश्य से प्रस्तुत करने के साथ, इस दृष्टि से भी प्रस्तुत किया गया है, ताकि पाठक इस बात का ज्ञान प्राप्त कर लें कि भारतवर्ष की सभ्य दुनिया का प्रथम पुरुष और प्रथम राजा कौन था। 

मानव वंश का विस्तार 

मनु, आर्यों के पहला राजा बने। पौराणिक अनुश्रुति के अनुसार मनु की संतानों में सबसे बड़ी सन्तान आगे चलकर इक्ष्वाकु कहलायी। इक्ष्वाकु मध्य देश के राजा बने। उनकी राजधानी अयोध्या थी। इक्ष्वाकु द्वारा जो राजवंश चला, उसे भारतीय इतिहास में सूर्यवंश नाम से जाना गया। इसी वंश में आगे चलकर राजा दिलीप, राजा रघु, राजा दशरथ और राजा राम हुए। 

मनु के एक अन्य पुत्र को नेदिष्ट के नाम से जाना गया। उसे पूर्व की ओर तिरहुत का राज्य मिला। इस वंश में आगे चलकर राजा विशाल हुआ। इसने वैशाली नाम की नगरी बसाई। बौद्ध-युग में इस नगरी को बहुत प्रसिद्धि मिली। यह लिच्छवि नाम के प्रसिद्ध क्षत्रियों की राजधानी बनी। इस नगरी के अवशेष उत्तरी बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के बसाढ़ नामक ग्राम में पाए गए हैं। 

मनु के एक अन्य पुत्र कारुष ने कारुष राज्य की स्थापना की, जो उस समय के बघेल खण्ड क्षेत्र में विद्यमान था। मनु पुत्र शांति ने दक्षिण में आधुनिक गुजरात की ओर अपने राज्य की स्थापना की। शर्याति के एक पुत्र का नाम आनर्त था। वह प्रतापी राजा हुआ। इसी के नाम पर आनर्त देश का नाम पड़ा। आनर्त देश की राजधानी कुश स्थली या द्वारिका थी। इस तरह मनु के चारों पुत्र-इक्ष्वाकु, नेदिष्ट, शर्याति और कारुष चार बड़े और शक्तिशाली राज्यों के संस्थापक हुए। मनु के अन्य चार पुत्रों ने भी राज्य स्थापित किए, मगर वे अधिक प्रसिद्ध नहीं हुए। 

सूर्यवंश के संस्थापक इक्ष्वाकु के भी अनेक पुत्र थे। उन्होंने अपने पृथक राज्य स्थापित किए। उसका बड़ा बेटा विपक्षि अयोध्या की राजगद्दी पर बैठा। इक्ष्वाकु के छोटे पुत्र निमि ने अयोध्या और वैशाली के बीच एक अन्य राज्य की स्थापना की, जिसकी राजधानी मिथिला थी। आगे चलकर इसी वंश के राजा जनक हुए। जिनकी पुत्री सीता थी। 

वैवस्वत मनु के वंशज इक्ष्वाकु के अयोध्या में राज्य स्थापित करने के उन्नीस पीढ़ी के बाद इस वंश का अत्यन्त प्रतापी सम्राट मान्धाता हुआ। उसने पड़ोस के अन्य आर्य राज्यों को जीतकर दिग्विजय किया।

सम्राट मान्धाता द्वारा विजित राज्य 

जिन राज्यों में सम्राट मान्धाता ने दिग्विजय की उसमें प्रमुख नाम है-पौरव, आनव, दुहयु और हैह्य। ये अपने समय के बड़े राज्य थे। जिन्हें जीतकर मान्धाता ने अपने आधीन किया। इनके अलावा अन्य स्थानों पर अपने राज्य का विस्तार किया।

सम्राट मान्धाता की पीढ़ी-सम्राट मान्धाता की बारह पीढ़ी के बाद राजा हरिशचन्द्र अयोध्या की राजगद्दी पर बैठे। राजा हरिशचन्द्र की सत्यवादी और दानी रूप की कथा भारत में अत्यन्त लोकप्रिय है। अपना सर्वस्व दान करके वह एक चण्डाल के घर पर दास बनकर रहे। आगे चलकर इक्ष्वाकु वंश के अयोध्या के राजा दिलीप और भागीरथ हुए। वे भी मान्धाता के समान ही यशस्वी थे। गंगा नदी के हिमालय से उतारकर मैदान में लाने का श्रेय राजा भगीरथ को ही दिया जाता है। उन्हीं के नाम पर गंगा की एक शाखा भागीरथी कहलाती है। 

दिलीप का पौत्र रघु भी प्रतापी राजा हुआ। उसके दिग्विजय का वर्णन महाकवि कालीदास ने अपने ग्रंथ ‘रघुवंश’ में किया है। रघु का पुत्र अज था और अज के पुत्र दशरथ । दशरथ के पुत्र राम की कथा भारत के घर-घर में प्रसिद्ध है। वे आराध्य देव के रूप में पूज्य हैं। राजा रामचन्द्र, इक्ष्वाक, वंश की 65वीं पीढ़ी में हुए।

सम्राट मान्धाता की विजयों के परिणाम अन्य राज्यों का फैलाव-राजा अनु और राजा दक्ष्यु जिन पर सम्राट मान्धाता ने विजय प्राप्त की थी। वो अयोध्या के पश्चिम से शुरू करके सरस्वती नदी के प्रदेशों पर शासन करते थे। सम्राट मान्धाता से पराजित होने के बाद वो और अधिक पश्चिम की 

ओर चले गए जिसकी वजह से राज्य विस्तार हुआ। राजा द्रहयु ने पराजित होने के बाद उत्तर-पश्चिमी पंजाब में (रावलपिण्डी से भी आगे) जाकर अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित किया। मनु लोगों से हारने के बाद पराजित राजाओं ने पंजाब में-मौधेय, केकय, शिवि, मद्र, अम्बष्ठ और सौवीर राज्य स्थापित किए। 

सम्राट मान्धाता से परास्त होने के बाद आनव (ऐल वंश की एक शाखा के लोग) ने पंजाब की ओर जाकर कई राज्य स्थापित किये। आनवों की एक शाखा सुदूर-पूर्व की ओर गयी। उनका नेता तितिक्षु था। इसने पूर्व की ओर जाकर वर्तमान समय के बिहार में अपना राज्य स्थापित किया। 

चक्रवर्ती सम्राट मान्धाता ने अनेकानेक राज्यों पर दिग्विजय की। परन्तु पराजित राजा तथा उसके वंश के लोगों का वध नहीं किया। उनकी अधीनता मात्र से या तो सन्तुष्ट हो गए या फिर उनको सपरिवार, सकुटुम्ब राज्य से निकालकर अपना राज्य स्थापित किया। 

सम्राट मान्धाता के काल में पौरव वंश, कान्यकुब्ज वंश और ऐल वंश शक्तिशाली राजवंश के रूप में विकसित हुए। 

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