राजा महापद्मनन्द की जीवनी और इतिहास |Biography and History of King Mahapadmanand

राजा महापद्मनन्द की जीवनी और इतिहास |

राजा महापद्मनन्द की जीवनी और इतिहास |Biography and History of King  Mahapadma nand

सामान्य परिचय 

महापद्मनन्द के विषय में महाकवि बाणभट्ट ने हर्षचरित्र में लिखा है कि वह जाति से शूद्र था और प्रारम्भिक जीवन में बड़ी कठिनता से अपना पेट पालता था। परन्तु देखने में वह अत्यन्त सुंदर था। 

किसी तरह वह मगध के राजा महानन्दी के राजभवन में अपने लिए स्थान बनाने में सफल हुआ था। 

राजा महनन्दी, बिम्बसार, अजातशत्रु, राजा उदायीभद्र, शिशुनाग, नंदीवर्धन के बाद मगध का राजा बना था। शिशुपाल पुत्र महानन्दी को काकर्ण महानन्दी भी कहा गया है। कुछ ग्रन्थों में इसे ‘कालशोक’ नाम भी दिया गया है। 

इसने 28 वर्ष राज्य किया। उसके शासन काल के दसवें वर्ष में महात्मा बुद्ध का निर्वाण हुए 100 वर्ष पूर्ण हो चुके थे। 

इस अवसर पर बौद्ध धर्म की एक महासभा वैशाली में संगठित हुई। राजा महानन्दी इस महासभा का संरक्षक था। इसका आयोजन वैशाली के कुसुमपुरी विहार में किया गया था।

महानन्दी का शासन काल 28 वर्ष लिखा गया है-इस तरह बौद्ध के निर्वाण के 18 वर्ष में उसका वध महापद्म ने कर खुद मगध की सत्ता सम्भाल ली। 

मगध राज महानन्दी की हत्या के सम्बन्ध में विवरण मिलता है कि महापद्म ने, नगर से बाहर, महानन्दी के गले में छुरी घोंपकर उसकी हत्या की। इस हत्या के लिए उसे महानन्दी की रानी का संकेत प्राप्त था।

चूंकि महापद्म को सुंदर बताया जा चुका है तथा राजमहल में किसी तरह अपना स्थान बना लेने की बात भी लिखी जा चुकी है-उससे आगे यह माना जाता है कि वह अपनी सुंदरता के कारण राजा महानन्दी का अत्यन्त कृपापात्र बन गया था। 

पुराणों के अनुसार महापद्म शूद्र से उत्पन्न था। 

जैन ग्रन्थों में उसे नाई का पुत्र और वेश्या से उत्पन्न कहा गया है।

ग्रीक इतिहासकार कार्टियस के अनुसार-वह मगधी, अलेक्जेण्डर का समकालीन, नाई का पुत्र था। इस नाई ने अपनी सुंदरता से रानी को आकर्षित कर लिया था और उसने तत्कालीन राजा कालाशोक अथवा काकवर्ण का बाद में वध कर दिया था।

हर्ष चरित में लिखा है कि इस राजा का वध उसकी राजधानी के समीप ही उसके गले में छुरा घोंपकर किया गया। महापद्म रानी के कहने पर उसके पुत्रों के नाम पर राज्य-कर्म का संचालन स्वयं करने लगा। महानन्दी के दस पुत्र थे।

महापद्म के महानन्दी के पुत्रों के नाम से राज्य-कर्म सम्भालने के विवरण से ज्ञात होता है कि महानन्दी के दसों पुत्र उस समय अल्पायु थे, जब महापद्म ने महानन्दी की हत्या की। ज्यों-ज्यों समय बीतता रहा, महापद्म स्वयं को शक्तिशाली बनाता हुआ रानी के बंधन से निकलता रहा। वह महानन्दी के एक-एक पुत्र की हत्याएं करता हुआ वंश नाश कर, एक दिन स्वयं मगध के सिंहासन पर पूर्ण रूप से आसीन हो गया। भारत के प्राचीन इतिहास में इस महापद्मनंद का अत्यन्त महत्त्व है। सम्राट के रूप में महापद्म-महापद्म अत्यन्त शक्तिशाली, उद्दण्ड और समृद्ध सम्राट के रूप में मशहूर हुआ। पुराणों में उसे ‘सर्वक्षत्रान्तक’ (सब क्षत्रियों का अन्त करने वाला) लिखा गया है। उन राजवंशों का नाम भी दिया गया है जिनका उच्छेद का श्रेय महापद्म को दिया गया है। वे इस प्रकार हैं-पौरव, ऐक्ष्वाकव, पाञ्चाम, कौरव, हैहय, कलिंग, शूरसेन, मैथिक, अश्मक और वीति होत्र। इनमें से अनेक राजवंश महापद्म नंद से पूर्व ही मगध की आधीनता में आ चुके थे। मिथिला और विदेह के राजवंश का अन्त होकर वहां गणराज्य की स्थापना हो चुकी थी तथा इस गणराज्य को भी अजातशत्रु मगध की अधीनता में ले आया था। काशी की स्वतंत्रता कोशल द्वारा नष्ट कर दी गयी थी। उसका एक प्रदेश ‘नहान-चुन्न-मूल्य’ के रूप में बिम्बसार और अजातशत्रु को प्राप्त हुआ था। 

सम्भवतः पुराणों में उन जनपदों और राजवंशों का भी उल्लेख कर दिया गया है, जो महापद्म नन्द के आधीन थे। महापद्मनन्द ने अपने साम्राज्य का विस्तार करने के लिए अनेक युद्ध किये। उसकी सेना अत्यन्त शक्तिशाली थी। पुराणों में उसे ‘अतिबल’ कहा गया है। बौद्ध ग्रंथों में उसका ‘उग्रसेन’ नाम से उल्लेख किया गया है। उसने ‘उग्र’ सेना का ही उपयोग करके विशाल राज्य की स्थापना की थी।

प्राचीन अनुश्रुति की सत्यता की पुष्टि अन्य साधनों द्वारा भी होती है। कलिंग (उड़ीसा) के हाथी गुम्फा-शिलालेख द्वारा ज्ञात होता है कि नंद कलिंग को जीतकर एक जैन तीर्थंकर की बहुमूल्य मूर्ति को अपनी राजधानी में उठवाकर ले गया था। 

गोदावरी के तट पर नान्देड़ या नौनन्द देहरा नामक एक बस्ती है, जो सम्भवतः महापद्म नन्द के नाम पर ही स्थापित हुई थी। गोदावरी के दक्षिण में कर्नाटक को भी नंद ने विजित किया था-यह बात भी यहां के मध्यकालीन शिलालेखों द्वारा ज्ञात होती है। 

इस तरह महापद्म नन्द ने कलिंग, कर्नाटक आदि सुदूर प्रदेशों को जीतकर अपने साम्राज्य के आधीन किया था। 

कुरन, पाञ्चाल जैसे पश्चिमी राज्य भी सम्भवतः नंद द्वारा ही पहले-पहल मगध साम्राज्य की आधीनता में आये थे। 

विदेह, ऐक्ष्वाकव आदि जिन राजवंशों के नन्द द्वारा उच्छेद का उल्लेख पुराणों में किया गया है, वे सम्भवतः उससे पूर्व मगध के अधीनस्थ चले आ रहे थे, अपने समय में नंद ने उन्हें पूर्ण रूप से मगध में मिला लिया था। यह निश्चित है कि वह एक अत्यन्त शक्तिशाली और दिग्विजयी सम्राट था। पद्मनन्द के पुत्र-पौराणिक अनुश्रुति के अनुसार महापद्मनन्द के आठ पुत्र थे जिसमें ज्येष्ठ पुत्र का नाम सुमाल्य था। बौद्ध साहित्य में इसी को धननन्द लिखा गया है। 

28 वर्ष राज्य कर चुकने के बाद, जब महापद्म के शासन का अन्त हुआ, तो उसका पुत्र धननन्द मगध साम्राज्य का स्वामी बना।

पुराणों के अनुसार महापद्म नंद और उसके उत्तराधिकारियों ने कुल मिलाकर सौ वर्ष शासन किया। मत्स्यपुराण में अकेले महापद्म नन्द का ही शासन 88 वर्ष लिखा गया है। धननन्द या सुमाल्य नन्द को राजसिंहासन पर आरुढ़ हुए केवल बारह वर्ष ही हुए थे कि आचार्य चाणक्य की सहायता से चन्द्रगुप्त मौर्य ने उसे राज्यच्युत कर दिया और वह स्वयं मगध का सम्राट बन गया। 

चाणक्य और चन्द्रगुप्त का विवरण मगध के नन्दराज से मिल जाने के बाद इस बात की ऐतिहासिक प्रमाणिकता सामने आ जाती है कि चाणक्य के समय मगध में नन्दराज था। मगध एक शक्तिशाली राज्य था। सिकंदर का आक्रमण उस समय सिर पर सवार था। आर्यावर्त के अन्य राजा विश्वविजेता सिकंदर के आक्रमण को लेकर चिंतित थे; जबकि मगधराज निश्चितता के साथ विलासिता में अपना जीवन गुजार रहा था। 

ग्रीक लेखकों के अनुसार मगध के इस सम्राट (धननन्द) की सेना में दो लाख पैदल, बीस हजार घुड़सवर, दो हजार रथ और चार हजार के लगभग हाथी थे। इतनी विशाल सेना को मगध के सम्राट इसी कारण संगठित कर सके थे, क्योंकि उनका साम्राज्य अत्यन्त विस्तृत था। 

यह विशाल राज्य, विशाल सेना धननन्द ने स्वयं अर्जित न की थी, उसे सब कुछ अपने पिता पद्मनन्द से मिला था। जिसे वह बस सम्भाले हुआ था। धननन्द द्वारा किसी विजय का उल्लेख नहीं मिलता है। उसने सिकंदर के आक्रमण के समय मुकाबले के लिए कोई तैयारी न की थी-जिससे उसने सेना की कोई भर्ती न की थी। 

वह पूरी तरह से निश्चित था कि यवन आक्रमणकारी उसके विशाल साम्राज्य और विशाल सेना को देखकर आक्रमण नहीं करेगा। हुआ भी ऐसा ही था, सिकंदर ने पोरस से युद्ध के बाद, अपनी सेना का रुख दूसरी ओर मोड़ दिया था। उसने मगध की ओर देखने की भी चेष्टा न की थी।

 मगध के उस समय के सारे विवरण, चाहे वे सिकंदर के आक्रमण से सम्बन्धित हों; या चाणक्य के नन्द वंश के विनाश से सम्बन्धित प्रतिज्ञा के हों; सब इस बात का विवरण प्रस्तुत करते हैं कि मगध राज्य विशाल बलशाली और सैन्य शक्ति से पूरी तरह सुदृढ़ था। और यह सारी खूबियां धननन्द के पिता महापद्म नन्द ने अर्जित की थीं।

 नन्दवंश का संस्थापक महापद्म नन्द अपने समय का महान् राजा, बलिष्ठ योद्धा और कुशल प्रशासक था। 

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