राजा जरासंध की जीवनी और इतिहास |Biography and History of King Jarasandha

राजा जरासंध की जीवनी और इतिहास

राजा सम्राट जरासंध की जीवनी और इतिहास |Biography and History of King  Jarasandha

कौरव और पाण्डवों की कथा में मगध के राजा जरासंध का वर्णन आता है। महाभारत के अनुसार जरासंध ने सब क्षत्रिय राजाओं की राज्यश्री का अन्त कर, उसने ‘एकवदा’ उपाधि धारण की थी। एकवदा का आशय संसार में जिसका सर्वत्र साम्राज्य है। 

जरासंध के आधीन राजागण 

जरासंध के अधीन राजागणों की संख्या 86 सामने आती है। कुछ मुख्य राज्यों और राजाओं के नाम इस प्रकार हैं 

1.चेदि राज्य का राजा शिशुपाल ने जरासंध की अधीनता स्वीकार कर रखी थी। उसे मगध साम्राज्य के प्रधान सेनापति का पद प्राप्त था।

2. कारुप देश का राजा वक्र ने जरासंध की शिष्यता प्राप्त कर रखी थी। राजा वक्र बड़ा प्रतापी राजा था तथा माया युद्ध में सिद्धहस्त माना जाता था।

3. करम का राजा मेधावहन भी जरासंध के अधीन था। मेधावहन के बारे में कहा जाता है कि उसके पास एक दिव्य मणि थी, जिसके कारण उसकी ख्याति चारों ओर विख्यात थी।

4. प्राज्योतिष राज्य का राजा भगदत्त जरासंध के आधीन हो गया था। भगदत्त ने गुरु और नटक नामक दो राजाओं को पहले से अपने आधीन कर रखा था। भगदत्त अत्यन्त बलशाली भूपति के रूप में ख्याति प्राप्त था।

5. युधिष्ठिर का मामा प्ररुजित् भी मगधराज जरासंध की आधीनता स्वीकार करता था।

6. वंग, पाण्डु और किरात देशों के राजा वासुदेव भी जरासंध के अधीन थे। इस प्रकार अन्य 80 राजा जरासंध की आधीनता स्वीकार कर चुके थे। 

जरासंध ने एक के बाद एक अनेक राजाओं को पराजित कर उन्हें अपने आधीन कर कैद कर लिया था तथा पकड़कर कारागार में भी डलवा दिया था।

महाभारत की अनुश्रुति के अनुसार-‘जिस प्रकार सिंह छोटे पशुओं को पकड़कर गिरिराज की कन्दरा में बंद कर देता है, उसी प्रकार जरासंध ने राजाओं को परास्त कर गिरिव्रज में कैद कर लिया था। राजाओं के द्वारा यज्ञ करने की इच्छा से (राजाओं का यज्ञ में बलिदान करने की इच्छा से) उस जरासंध ने अत्यन्त कठोर तप करके उमापति महादेव को सन्तुष्ट किया और राजाओं को एक-एक करके परास्त कर लिया। महाभारत के ही अनुसार-पाण्डव तभी राजसूय यज्ञ द्वारा चक्रवर्ती पद प्राप्त कर सकते थे, जब जरासंध उनके मार्ग में बाधक न हो। पाण्डवों की श्रीकृष्ण से रिश्तेदारी भी थी और प्रगाढ़ मैत्री सम्बन्ध भी। श्रीकृष्ण को जरासंध से विरोध व द्वेष था। वे अन्धक वृष्णि-संघ के संघ मुख्य व नेता थे। जरासंध के आक्रमणों से विवश होकर अन्धक वृष्णि संघ को अपने प्रदेश शूरसेन को छोड़कर सुदूर पश्चिम में द्वारिका में जा बसने के लिए विवश होना पड़ा था।

श्रीड्डष्ण द्वारा नेतृत्व 

शूरसेन-प्रदेश में यादव लोगों के दो राज्य–अन्धक और वृष्णि नाम से थे। इसी अन्धक-वृष्णि को मिलाकर अन्धकवृष्णि संघ बना था; जिसका मुखिया श्रीकृष्ण को घोषित किया गया था। 

श्रीकृष्ण के अंधकवृष्णि का मुखिया बनने से पूर्व, उनके बाल्यकाल में अंधक के यादवों का मुखिया कंस था। कंस जरासंध का दामाद था। कंस, श्रीकृष्ण का मामा था; पर दैववाणी को सुनकर वह अपने ही भान्जे श्रीकृष्ण का शत्रु बन गया था।

अपने श्वसुर जरासंध से बल पाकर कंस ने अन्य यादव कुलों के मुखियाओं को अपने आधीन करना आरम्भ कर दिया था। इससे यादव कुलों में हलचल मच गयी थी। वृष्णि गण के यादव भी उस समय कंस की बढ़ती शक्ति को लेकर चिंतित हो उठे थे। 

उस समय तक उन्होंने श्री कृष्ण को अपना मुखिया घोषित कर दिया था। श्रीकृष्ण ने कंस का वध कर उसका राज्य हस्तगत कर अंधक वृष्णि संघ बनाकर संघ मुख्य नेता का पद सम्भाल लिया था। 

जरासंध ने जब अपने दामाद कंस के मारे जाने और अंधक राज्य वृष्णि गण के अधीन चले जाने का समाचार सुना, तो उसका कोप श्रीकृष्ण और यादवों पर उमड़ पड़ा। उसने एक-के-बाद-एक उन पर आक्रमण करने आरम्भ किये। यादवों की सम्मिलित शक्ति ने जरासंध का डटकर मुकाबला किया। इन सत्रह हमलों में जरासंध के दो वीर सेनापति हंस और डिम्मक युद्ध में मारे गए। 

अभी तक के सत्रह बार के आक्रमण में किसी की निर्णायक भूमिका सामने न आ सकी थी। दोनों की सेनाएं लड़ते-लड़ते मर-कट जाती थीं या थककर पीछे हट जाती थीं।

 अन्ततः जरासंध ने अट्ठारहवीं बार अपनी पूर्ण शक्ति जुटाकर, स्वयं नेतृत्व करते हुए यादवों पर विशाल आक्रमण किया।

चारों ओर से घिरकर, हार निश्चित जानकर, यादव कुलों को बचाने के उद्देश्य से श्रीकृष्ण ने यादवों के बचाव की बात कही। सभी यादवों ने शूरसेन राज्य को छोड़ दिया। वे द्वारिका जा पहुंचे और वहीं जाकर बस गए।

 द्वारिका मगध से बहुत दूर थी। वहां जरासंध के आक्रमण का कोई भय न था। 

द्वारिका में अपनी स्थिति पूरी तरह से सुदृढ़ करने के बाद दोनों यादव कुलों के नेताओं ने श्रीकृष्ण के सामने विचार रखा कि मगध सम्राट को यूं ही अन्य यादव कुलों पर अत्याचार करने और उन्हें अधीन बनाने के लिए नहीं छोड़ देना चाहिए। जरासंध पर आक्रमण करके उसका विनाश कर देना चाहिए। 

पर, विचार-विमर्श में यह बात भी सामने आयी कि यदि अंधक और वृष्णि संघ की सम्मिलित शक्ति से ही जरासंध का विनाश सम्भव होता, तो उन्हें अपना शूरसेन देश ही छोड़ने की क्या आवश्यकता थी। जाहिर है जरासंध के सामने उनकी शक्ति कमजोर थी। शक्ति बढ़ाने के लिए किसी अन्य शक्तिशाली राजा की मित्रता की आवश्यकता थी। 

श्रीकृष्ण की दृष्टि ‘इंद्रप्रस्थ के पाण्डव राजा युधिष्ठिर पर जाकर टिकी। पाण्डव उनकी रिश्तेदारी में भी थे। श्रीकृष्ण ने इंद्रप्रस्थ जाकर युधिष्ठिर से भेंट की और पाण्डवों के बीच श्रीकृष्ण ने यह बात रखी कि वे बलशाली तभी कहला सकते हैं, जबकि जरासंध का वध किया जा सके। उन्होंने कहा- “इस समय एक महान् सम्राट मगध सम्राट जरासंध है। वह अपने बल-पराक्रम से सम्राट-पद पर पहुंचा हुआ है। 

ऐल तथा ऐक्ष्वाकव-वंश की इस समय सौ शाखाएं हैं। जरासंध ने जिन राजाओं को कैद कर रखा है, वे दिल से उसकी कैद और अधीनता में तो हो नहीं सकते। यदि उन्हें जरासंध से मुक्त किया जाए, तो वे न केवल उपकारी होंगे बल्कि अधीनता में आ जाएंगे। ऐसे राजाओं की संख्या 86 है, जिन्हें जरासंध ने कैद कर रखा है। उसने घोषणा की हुई है कि वह सौ कैदी राजाओं की संख्या पूरी होते ही महादेव जी के आगे उनकी बलि चढ़ा देगा। यह विचित्र बात है कि किसी राज्य के विधिपूर्वक बने हुए राजा को कोई सम्राट पकड़कर रखे। क्षत्रिय का धर्म युद्ध में मरना है, पशु के समान यज्ञ में बलि चढ़ना नहीं है। अतएव मगध राज जरासंध का हमें मिलकर मुकाबला करना होगा। इस समय जो जरासंध के मुकाबले में खड़ा होगा, वही उज्जवल कीर्ति प्राप्त कर सकेगा। जो जरासंध को परास्त करेगा, वही इस समय सम्राट पद का अधिकारी होगा।” 

श्रीकृष्ण के उपरोक्त उत्साहवर्द्धक कथन के बाद भी युधिष्ठिर इस बात के संकोच में रहे कि जरासंध से युद्ध छेड़ा जाए। इसकी मुख्य वजह थी, सेना की संख्या बल । जरासंध 86 राजाओं को कैद करके उन राज्यों की सेनाओं को एक किये हुए था। उसकी विशाल सेना के मुकाबले इन्द्रप्रस्थ की ओर उतारकर युद्ध करने का एक ही अर्थ था-पूरी सेना का सफाया करा देना।

 युधिष्ठिर ने अपनी बात जब श्रीकृष्ण के सामने रखी। कूटनीतिज्ञ कृष्ण ने वीरता भरे शरीर में लहू को खौला देना वाला कथन कहा 

“क्या पाण्डवों में ऐसा कोई वीर नहीं, जो जरासंध को हरा सके…?” इस कथन को सुनते ही भीम और अर्जुन एक साथ अपने स्थान से उठ, उत्साहित स्वर में बोले 

“हमारी वीरता पर आंच न आये। अतः हम जरासंध से द्वन्द्व युद्ध के लिए तैयार हैं…।” 

भीम के बारे में मशहूर था कि गदा युद्ध में भीम का कोई मुकाबला करने वाला न था तथा धनुष-बाण युद्ध में अर्जुन का कोई जवाब न था।

“हां, यही उचित होगा…।” कृष्ण ने भीम और अर्जुन पर बारी-बारी से दृष्टिपात करके कहा-“मुझे पूरा विश्वास है कि जरासंध तुम दोनों में से किसी भी एक से द्वन्द्व युद्ध के लिए सामने आता है तो द्वन्द्व युद्ध में उतरते ही मारा जाएगा। यही उचित है-इसी युक्ति से उसकी पूरी सेना से लड़े बगैर उसे युद्ध के लिए ललकारना, मैदान में लाना होगा…।” 

इस तरह युक्तिपूर्ण ढंग से श्रीकृष्ण, भीम और अर्जुन वेश बदलकर मगध की राजधानी गिरिव्रज गए।

जरासंध वध 

राजा जरासंध की जीवनी और इतिहास

बदले हुए वेश में, गिरिव्रज में पहुंचकर, श्रीकृष्ण ने जरासंध को उस समय ललकारा जब वह अपने राजमहल से निकलकर सवारी पर बैठने जा रहा था।

 “ऐ जरासंध, मेरे पास दो वीर योद्धा हैं-सुना है कि तेरी वीरता के डंके चतुर्दिक् (चारों दिशाओं में) बज रहे हैं। विशाल सेना के बल पर तो कायर-से-कायर व्यक्ति भी किसी राज्य पर आक्रमण कर उस पर विजय हासिल कर लेता है; क्योंकि लड़ती तो सेना है-राजा तो पीछे रहकर छत्र-मुकुट धारण किये युद्ध का दृश्य देखता रहता है… । योद्धा तो वह होता है जो किसी योद्धा के ललकारे जाने पर खुद मैदान में उतरकर अपना योद्धा होना सिद्ध करे…।” । 

“कौन हो तुम…?” श्रीकृष्ण का कथन सुनते ही जरासंध कूदकर मैदान में आ जाते हुए चिंघाड़ा था- “इस तरह मेरे सामने आकर ललकारने का उद्देश्य क्या है?”

 “उद्देश्य है बंदी बनाए 86 राजाओं को या तो मुक्त कर दो या फिर मेरे दोनों योद्धाओं में से किसी के सामने द्वन्द्व युद्ध में उतरकर युद्ध कर अपने चक्रवर्ती सम्राट होना सिद्ध करो…।” कृष्ण ने गरजते स्वर में कहा।

“तुम्हारी मौत तुम्हें मेरे सामने खींच लायी है…। तुम्हें मृत्यु प्रदान करके ही अब मैं यहां से आगे बढुंगा, बताओ किस अस्त्र-शस्त्र से अपनी मृत्यु का स्वाद चखना चाहते हो…?” जरासंध चिंघाड़ा। 

“गदा युद्ध या धनुष-बाण युद्ध में से जिसे चाहो चुन लो…।” 

“गदा युद्ध ही उत्तम रहेगा…धनुष-बाण युद्ध में तो लक्ष्य वेध के चूक जाने का अंदेशा रहता है… । मैं गदा से ही तुम तीनों को मृत्युलोक भेजूंगा…।” कहकर अट्टहास लगाते हुए जरासंध ने सैनिकों को संकेत दे खुद गदा सम्भाल ली।

 अपनी ओर से श्रीकृष्ण ने भीम को गदा सम्भालवायी। जरासंध और भीम में गदा युद्ध आरम्भ हुआ। दोनों के बीच लोमहर्षक गदा युद्ध चला–पर परिणाम जिस रूप में सामने आना था, उसी रूप में सामने आया। गदा युद्ध में भीम अजेय योद्धा था-उसके एक वार को सम्भाल न पाने के कारण जरासंध घायल हुआ। 

जरासंध के घायल होते ही कृष्ण ने शीघ्रता से गिरिव्रज में कैदी बनाकर रखे गए समस्त 87 राजाओं को बंधन मुक्त कर, उन्हें अपना परिचय देकर, एकता का परिचय देने का आह्वान किया। 

जरासंध जिस क्षण प्राण त्याग रहा था, उस क्षण उसके बंदी बनाए सभी 87 राजा उसके समक्ष खड़े अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर रहे थे। ऐसा होने पर प्रत्येक पक्ष के राजा की सेना उसकी ओर सिमटती चली आ रही थी।

मगध सेना की एकता को तोड़ने के लिए श्रीकृष्ण ने यही उचित समझा था कि जरासंध के अंतिम सांस छुटने से पहले उसके बंदी राजाओं को मुक्त कर दिया जाए ताकि पूरी सेना में इस बात का आक्रोश न फैले कि उनके राजा को मार डाला गया है। 

अपने-अपने राजाओं के छत्र के नीचे, 87 राजाओं की सेना आ जाने के बाद, मगध की संयुक्त सेना बंटकर काफी थोड़ी रह गयी थी। 

बंदी जीवन से स्वतंत्र होने वाले राजागण-श्रीकृष्ण, भीम और अर्जुन के प्रति आभार में भरे हुए थे कि उन्होंने उनको बंदी जीवन से मुक्त कराया। अब वे सभी राजागण मिलकर उन तीनों की रक्षा के लिए उद्यत थे।

वे सब गिरिव्रज और मगध सीमा से बाहर आये। तब श्रीकृष्ण ने सभी राजाओं को अपना और भीम व अर्जुन का परिचय दिया। 

वे सभी उनके आभारी हुए। अधीनस्थ राजा फिर से स्वतंत्र होकर अपने-अपने राज्यों को सेना सहित लौट गये।

 जरासंध की मृत्यु के बाद उसका पुत्र सहदेव मगध के राजसिंहासन पर बैठा; पर अपने पिता जैसा वैभव वह प्राप्त न कर सका। वह कठिनता से मगध राज्य को ही सुरक्षित रख सका। 

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