राजा चन्द्रगुप्त मौर्य की जीवनी और इतिहास |Biography and History of King Chandragupta Maurya

राजा चन्द्रगुप्त मौर्य की जीवनी और इतिहास

राजा चन्द्रगुप्त मौर्य की जीवनी और इतिहास |Biography and History of King Chandragupta Maurya

सिकंदर के भारत से लौटते ही 323 ई.पू. में भारत के राजनैतिक आकाश में एक नये नक्षत्र का उदय हुआ, जिसने अपने तेज से अन्य सारे नक्षत्रों को अधीन कर दिया। यह प्रकाशमान नक्षत्र चन्द्रगुप्त मौर्य था। 

चन्द्रगुप्त मौर्य का वंश परिचय

 सिकंदर की अधीनता से पश्चिमी और उत्तर-पश्चिमी भारत को मुक्त कर जिस वीर ने मगध साम्राज्य का संगठन किया, उस चन्द्रगुप्त मौर्य के पूर्व वृतान्त के सम्बन्ध में प्राचीन साहित्य में अनेक मत पाये जाते हैं। 

एक मत के अनुसार मगधराज धननन्द की एक पत्नी का नाम मुरा था। वह जाति से शूद्र थी। इसी से चन्द्रगुप्त का जन्म हुआ। मुरा का पुत्र होने के कारण ही वह ‘मौर्य’ कहलाया। 

दूसरा मत कथासाहित्यसागर में उपलब्ध होता है। इसके अनुसार चन्द्रगुप्त नन्द राजा का ही पुत्र था। धननन्द की उसके अलावा कोई और सन्तान नहीं थी। 

चन्द्रगुप्त के विषय में तीसरा मत ‘महावंश’ ग्रंथ में पाया जाता है। इसके अनुसार चन्द्रगुप्त पिप्पलि वन के मोरियागण का कुमार था। नन्द के साथ उसका कोई सम्बन्ध नहीं था। मोरिय गण वज्जि-महाजनपद के पड़ोस में स्थित था। उत्तरी बिहार के सभी गणराज्य कोशल और मगध के साम्राज्यवाद के शिकार हो गए थे और मोरियागण भी मगध की आधीनता में आ गया था। इस गण की एक राजमहिषी पाटलिपुत्र में अज्ञातवास में अपना जीवन व्यतीत कर रही थी। वहीं उसने चन्द्रगुप्त को जन्म दिया। चन्द्रगुप्त कहीं मगध के राजकर्मचारियों के हाथों में न पड़ जाए, इस आशंका से ग्रस्त राजमहिषी ने नवजात शिशु को एक ग्वाले के सुपुर्द कर दिया था। इस प्रकार अन्य ग्वाल बालों के साथ चन्द्रगुप्त का भी पालन-पोषण होने लगा। 

चाणक्य ने चन्द्रगुप्त को धननन्द वंश का समूल नाश करने में साथ दिया था, अथवा चन्द्रगुप्त ने मगध का साम्राज्य प्राप्त करने के लिए चाणक्य का साथ पाया था; यह विषय इतिहास सिद्ध है। चन्द्रगुप्त के मगध के सिंहासन पर आरूढ़ होने के बाद आचार्य चाणक्य ने उसका प्रधानमंत्री बनकर राज्य चलाने में कुछ समय महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, यह भी निर्विवाद रूप से सत्य है। चाणक्य ने चन्द्रगुप्त को सुचारू रूप से राज्य चलाने हेतु ‘कौटिल्य अर्थशास्त्र’ की रचना की थी। 

आचार्य चाणक्य का परिचय 

चन्द्रगुप्त मौर्य के जन्म सम्बन्धी चाहे कितने भी अलग-अलग मत हों, परन्तु आचार्य चाणक्य के सम्बन्ध में लगभग सभी का एक मत है। नन्द वंश को उन्मूलित करने में चन्द्रगुप्त को चाणक्य से पूरी सहायता मिली। चाणक्य की जन्मभूमि तक्षशिला थी और वह जाति से ब्राह्मण था। उसका वास्तविक नाम विष्णु गुप्त था; परन्तु चणक का पुत्र या चणक ग्राम में निवास करने के कारण वह चाणक्य कहलाने लगा था। वह ‘कुटिल गोत्र’ का था अतः उसे कौटिल्य भी कहा जाने लगा। चाणक्य कुरूप तथा उग्र प्रकृति का था। राजनीति का प्रकाण्ड पडित था। उत्तरी पश्चिमी भारत की राजनीतिक दुर्बलता से वह सर्वथा अवगत था और बाह्य आक्रमण की सम्भावनाओं से आशंकित रहता था। 

चन्द्रगुप्त का जन्म और शैशव काल 

चन्द्रगुप्त के जन्म और मौर्य होने के अनेक विवरणों के होते हुए भी यह मानना पड़ेगा कि उसका जन्म 345 ई.पू. मौरिय अथवा मौर्यवंश के क्षत्रिय कुल में हुआ था जो शाक्यों की एक शाखा थी और यह लोग पिप्पलि वन के गणराज्य में शासन करते थे।

‘महावंश’ की टीका से ज्ञात होता है कि चन्द्रगुप्त मौर्य का पिता मौर्यों का प्रधान था और एक शक्तिशाली राजा द्वारा मार डाला गया था। उस समय शक्तिशाली राजा नन्दराज ही था, अतः इस बात को ही मानना पड़ेगा कि मौर्यों के प्रधान, चन्द्रगुप्त के पिता का वध नन्दराज के द्वारा हुआ था। उसका राज्य भी नन्दराज धननन्द ने छीन लिया था। 

जिस समय मौर्य गण मगधराज के हाथों में पहुंचा था उस समय मौर्य गण की रानी गर्भ से थी। उसे अपने स्वजनों और परिजनों सहित अपने गण से निकल जाने में सफलता मिली थी। वह अज्ञात रूप से पाटलीपुत्र में निवास करने लगी थी। अपने राजवंश को छुपाने के लिए मौर्य राजवंश लोग सम्भवतः मयूर पालकों का व्यवसाय करने लगे थे। कहा जाता है कि पहले चन्द्रगुप्त का पालन-पोषण एक ग्वाले द्वारा किया गया, उसके बाद एक शिकारी ने उसका पोषण किया। उस प्रकार चन्द्रगुप्त का शैशव काल मयूर-पालकों, शिकारियों तथा चरवाहों के मध्य व्यतीत हुआ।

चन्द्रगुप्त-चाणक्य सम्पर्क

राजा चन्द्रगुप्त मौर्य की जीवनी और इतिहास

चन्द्रगुप्त का चाणक्य के साथ सम्पर्क कैसे हुआ, इस विषय में भी महावंश टीका में उल्लेखित कथा मिलती है। कथा इस प्रकार है 

एक समय की बात है, चन्द्रगुप्त अपने हम उम्र लड़कों के साथ पशु चरा रहा था। समय निकालकर बच्चे खेल खेलने लगे। चन्द्रगुप्त राजा बना; अन्य बालकों को उपराजा, न्यायाधीश, कर्मचारी, चोर, डाकू आदि बनाया गया। राजा के आसन को ग्रहण कर चन्द्रगुप्त ने अपराधियों को पेश करने की आज्ञा दी। अपराधी पेश हुए। पक्ष-विपक्ष की युक्तियां सुनी गयीं। 

न्यायाधीशों के निर्णयानुसार चन्द्रगुप्त ने अपना फैसला सुना दिया। फैसला यह था कि अभियुक्तों के हाथ-पैर काट दिये जाएं। इस पर राजकर्मचारियों ने कहा

 “देव! हमारे पास कुल्हाड़े नहीं हैं।” चन्द्रगुप्त ने आज्ञा दी- “यह राजा चन्द्रगुप्त की आज्ञा है कि इन अपराधियों के हाथ-पैर काट दिये जाएं। यदि तुम्हारे पास कुल्हाड़े नहीं हैं तो लड़की का डंडा बनाओ; और उसके साथ बकरी की सींग बांधकर कुल्हाड़ा बना लो।” 

राजा चन्द्रगुप्त की आज्ञा का पालन किया गया। कुल्हाड़ा बनाया गया और अपराधियों के हाथ-पैर काट देने का अभिनय पूरा किया गया। चन्द्रगुप्त ने फिर आज्ञा दी- “अब हाथ-पैर जोड़ दिये जाएं।” और वे जोड़ दिये गए। 

चन्द्रगुप्त के बच्चों के साथ के इस खेल को चाणक्य देख रहा था। वह चन्द्रगुप्त से इतना प्रभावित हुआ कि उसने उसके संरक्षक ग्वाले से उसे खरीद लिया और अपने साथ तक्षशिला ले जाकर शास्त्र और शस्त्रों की विद्या से पूरी तरह लैस किया।

इस कथा में कहीं-कहीं पर यह कथा भी जुड़ती है कि आचार्य चाणक्य, शकटार के साथ मुरा की खोज में निकला हुआ, पिप्पलि वन तक पहुंचा था। शकटार नंद का सेनापति रह चुका था। अपनी दासी रानी मुरा और शकटार के अवैध सम्बन्धों की जानकारी पाते हुए नन्द (धननन्द) ने मुरा को देश निकाला तथा शकटार को कैदी बना लिया था। सैनिकों का विश्वास प्राप्त कर शकटार कैद से भाग निकला था।

चाणक्य शकटार को ढूंढ निकलने के बाद, मुरा की खोज में निकला था। इस खोज की वजह यह थी कि शकटार ने बताया था कि देश निकला के समय मुरा गर्भ से थी। यदि उसने गर्भकाल पूरा हो जाने के बाद किसी लड़के को जन्म दिया होगा, तो वह भी अब बालक बन चुका होगा।

चाणक्य और शकटार की यह सोच थी कि धननन्द का औरस राजा के गुणों से युक्त होगा; तथा राज्य प्राप्त करने के प्रयास में इस बात की घोषणा कि चन्द्रगुप्त, धननन्द का पुत्र है, मगध जनता का विरोध एकदम कमजोर पड़ जाएगा। 

इस तरह दोनों के प्रयास ने मुरा पुत्र चन्द्रगुप्त को ढूंढ निकाला था। इस कथा के अनुसार चाणक्य, मुरा से चन्द्रगुप्त को उसका अधिकार दिलाने की बात कहकर तक्षशिला में शास्त्र और शास्त्र का ज्ञान दिलाने ले गया था।

चाणक्य का नन्द के विरुद्ध संकल्प का कारण-तक्षशिला का आचार्य चाणक्य को चन्द्रगुप्त की खोज की आवश्यकता क्यों पड़ गयी थी? यह प्रश्न सबसे महत्त्वपूर्ण है। ऐतिहासिक स्रोत तथा उस समय के ग्रंथ इस बाबत स्पष्ट जानकारी देते हैं। उनकी जानकारियों के अनुसार जो विषय निकलकर सामने आता है वह इस प्रकार है 

मगधराज नंद ने अपने पिता के श्राद्ध के अवसर पर ब्राह्मणों को आमंत्रित किया था। ब्राह्मण होने के नाते चाणक्य भी उस भोज में पहुंच गया था। उच्च कुलीन और प्रकाण्ड पण्डित होने के कारण ब्राह्मणों ने उसे अग्रिम पंक्ति में सादर स्थान दिया था। भोग चल रहा था तभी मगधराज नन्द वहां से गुजरा था। उसने अग्रिम पंक्ति में कुरूप, चेचक के दंगों से युक्त चेहरे और काले वर्ण वाले व्यक्ति को भोजन करते देख, समझा था कि कोई अपात्र भोजन करने आ बैठा है।

अहंकारी धननन्द ने चाणक्य को उठा दिया था। चाणक्य के लिए इससे बड़ा अपमान और कोई दूसरा न हो सकता था। उसने गरजते हुए स्वर में धननन्द को अपना परिचय दिया। परिचय पाकर भी जब धननन्द ने सैनिकों को आदेश दिया कि उसे धक्के मारकर राजमहल से बाहर निकाल दिया जाए तब कुपित ब्राह्मण चाणक्य ने अपनी शिखा खोल, भरे दरबार में धननन्द को ललकारा था कि यह शिखा तब ही बंधेगी जब धननन्द और उसके वंश का वह नाश कर देगा।

राजा चन्द्रगुप्त मौर्य की जीवनी और इतिहास

मगध साम्राज्य का प्रथम असफल आक्रमण-नंद वंश का विनाश करने के लिए दृढ़ संकल्प होकर चाणक्य और चन्द्रगुप्त अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए विन्धयांचल के वनों में चले गए। वहां धन एकत्र कर उन्होंने भाड़े की सेना तैयार की। इस सेना के साथ उन्होंने मगध साम्राज्य पर आक्रमण कर दिया। परन्तु धननन्द की शक्ति इतनी प्रबल थी कि उसका बाल भी बांका न हुआ-खुद चन्द्रगुप्त और चाणक्य को बड़ी क्षति उठानी पड़ी। सफल न होने और पराजय मिलने के बाद अब उन्हें मगध की सेना खोजकर तलवार के घाट उतार देगी, इस आशंका के चलते दोनों पलायन कर गए थे। वे अपने प्राण रक्षा के लिए इधर-उधर पर्यटन करने लगे।

सिकंदर से चन्द्रगुप्त की भेंट-जिस समय सिकंदर झेलम तट पर जमा, पोरस से युद्ध के लिए तैयार खड़ा था, उस समय इस बात का भी विवरण मिलता है कि चन्द्रगुप्त, सिकंदर के शिविर में पहुंचकर उससे मिला था। उसे मगध पर आक्रमण के लिए उकसाया था; पर उस समय सिकंदर का मुख्य लक्ष्य, झेलम के उस पार खड़ा उसे ललकार रहा, उसका शत्रु पोरस था। उसने चन्द्रगुप्त के कथन पर कोई ध्यान न दिया था। तब चन्द्रगुप्त ने कुछ ऐसे कथन सिकंदर से कह दिये थे कि सिकंदर क्रुद्ध हो गया था। उसने उसे बंदी बनाने का आदेश दे डाला था, पर चन्द्रगुप्त अपनी युक्ति से, बंदी हुए बगैर सिकंदर के शिविर से बच निकलने में सफल रहा था।

पुरुराज पोरस को हटाकर और मैत्री सम्बन्ध बनाकर जब सिकंदर अन्य राज्यों को विजित करने बढ़ा था (मगध को छोड़कर) तब चाणक्य और चन्द्रगुप्त ने नगर-नगर घूमकर छोटे-छोटे गणराज्यों को एकता के सूत्र में बांधने का प्रयास किया था। कुछ सफलता कुछ असफलता के स्वाद चखते हुए वे अपने उद्देश्य में भटकते फिर रहे थे।

सिकंदर की वापसी के बाद चन्द्रगुप्त की आसान राह-चन्द्रगुप्त और चाणक्य उस समय तक अपने उद्देश्य में बड़ी सफलता न हासिल कर सके थे, जब तक सिकंदर की भारत से वापसी न हो गयी। उसके वापस जाते ही उनके पास जो शक्ति एकत्र हो चुकी थी कि उसका उपयोग उन्होंने मगध पर करने के बजाय पंजाब पर किया। पंजाब विजय के सम्बंध में इतिहासकार जस्टिन का कथन है-“सिकंदर की मृत्यु के उपरान्त चन्द्रगुप्त भारत की स्वतंत्रता का निर्माता था।” 

Chandragupta was the founder of India liberty affter Alexander’s death.”  —Justin

चन्द्रगुप्त ने अपनी विजय पंजाब से आरम्भ की। उसने चाणक्य की सहायता से देश की स्वाधीनता के जिन उत्साही युवाओं को जोड़ा था, उनके सहयोग से आगे बढ़कर चन्द्रगुप्त ने यवनों के अधिकार में आये गढ़ों को तोड़ना आरम्भ कर दिया।

पंजाब को अपने अधिकार में करने के बाद सिकंदर भारत से चला गया था। उसकी मृत्यु के उपरान्त भारतीयों ने यवनों के विरुद्ध विप्लव आरम्भ कर दिये थे। 

चन्द्रगुप्त ने क्रान्तिकारियों को यूनानियों के विरुद्ध उत्साहित किया और अपनी राजसत्ता का अनुमोदन करने के लिए उनसे आग्रह किया। उसने विद्रोहियों का नेतृत्व ग्रहण किया और यूनानियों का प्रभुत्व उखाड़कर पंजाब पर अपना आधिपत्य स्थापित किया।

मगध पर विजय-पंजाब पर पूरी तरह से अपनी मजबूती बनाकर चन्द्रगुप्त ने चाणक्य के सहयोग से नन्दों का विनाश कर मगध साम्राज्य पर अपना प्रभुत्व स्थापित करने के लिए पूर्व की ओर प्रस्थान किया। उस समय तक चन्द्रगुप्त के पास अत्यन्त विशाल सुसज्जित सेना थी। कश्मीर का राजा पर्वतक भी चन्द्रगुप्त का मित्र बन गया था और अपनी सेना के साथ चन्द्रगुप्त की सहायता कर रहा था|चन्द्रगुप्त ने पश्चिमी सीमांत की ओर से मगध साम्राज्य पर आक्रमण किया। मगध देश पर भीषण आक्रमण हुआ।

चन्द्रगुप्त की सेना आगे बढ़ती गयी। अंत में वह पाटलिपुत्र के सन्निकट आ गयी और राजधानी पर घेरा डाल दिया।

निःसंदेह उस समय तक मगध की वह जनता जो धननन्द के अत्याचारों से पीड़ित और त्रस्त थी, वह भी चन्द्रगुप्त के साथ आ गयी थी। नन्द के विरुद्ध पूरी तरह से विप्लव हो गया था। नन्दराज धननन्द अपने वंश वालों के साथ युद्ध में मारा गया। इस प्रकार चाणक्य की प्रतिज्ञा पूर्ण हुई। उसने अपनी शिखा बांधी और 321 ई.पू. में चन्द्रगुप्त को मगध के सिंहासन पर बैठा दिया। 

मलयकेतु के विद्रोह का दमन-मगध विजय के समय चन्द्रगुप्त की पर्वतक से मित्रता हो गयी थी-पर्वतक हिमालय पर्वत के कुछ जिलों का शासक था। चन्द्रगुप्त की मगध विजय के कुछ दिन बाद ही पर्वतक की मृत्यु हो गयी। उसके निधन के बाद उसका पुत्र मलयकेतु राजा हुआ। मुद्रा राक्षस नाटक में विवरण है कि मलयकेतु ने नन्द के मंत्री राक्षस तथा अन्य पांच सामन्तों की सहायता से चन्द्रगुप्त के विरुद्ध विद्रोह का झण्डा खड़ा कर दिया था। चाणक्य ने अपनी कूटनीति से उसके सहयोगियों में फूट डलवा दी तथा सैनिक अभियान चलाकर चन्द्रगुप्त ने मलयकेतु को अपनी मगध अधीनता स्वीकार करने को विवश कर दिया था।

चन्द्रगुप्त की दक्षिण विजय-उत्तरी भारत पर विजय प्राप्त करने के उपरान्त चन्द्रगुप्त ने दक्षिणी भारत पर भी अपनी विजय पताका फहराई। महाक्षत्रय रुददामन के जूनागढ़ अभिलेख से पता चलता है कि सौराष्ट्र पर चन्द्रगुप्त का अधिकार था। सम्भवतः 303 ई०पू० में मालवा चन्द्रगुप्त के अधिकार में आया था और पुष्पगुप्त वैश्व की वहां प्रबंध के लिए नियुक्त किया गया था। पुष्पगुप्त वैश्व ने वहां सुदर्शन झील का निर्माण करवाया था। इससे यह बात सामने आती है कि मालवा तथा काठियावाड़ के राजा चन्द्रगुप्त के राज्य के अन्तर्गत थे। यूनानी लेखकों के कथन, तमिल अनुश्रुतियों तथा मैसूर के कुछ लेखों से पता चलता है कि दक्षिण भारत के बहुत बड़े भाग पर चन्द्रगुप्त का प्रभुत्व स्थपित हो गया था।

सेल्यूकस के साथ संघर्ष-चन्दगुप्त के अंतिम संघर्ष का विवरण सिकदर के सेनानी सेल्यूकस के साथ होने का मिलता है। सिकन्दर के निधन के बाद उसका सेनापति सेल्यूकस निकोटर, सिकन्दर के जीते हुए पूर्वी साम्राज्य का अधिकारी हुआ था।

चन्द्रगुप्त ने सिकन्दर के जीते हुए, जिन भागों पर आक्रमण कर जीत लिया था, उन पर अपना अधिकार मानते हुए सेल्यूकस ने विशाल लेना के साथ 305 ई०पू० में आक्रमण कर दिया था।

चन्द्रगुप्त इस बात से बेखबर न था कि उसने जो भी पश्चिमोत्तर राज्य जीत लिये हैं, उन पर अपना दावा पेश करने के लिए सेल्यूकस कभी भी आगे बढ़कर आ सकता है। इस सम्भावना को ध्यान में रखते हुए उसने उन पश्चिमोत्तर क्षेत्रों की पूर्ण सुरक्षा व्यवस्था पर ध्यान दे रखा था। इसकी वजह से जैसे ही सेल्यूकस की सेना पूर्वी साम्राज्य की ओर बढ़कर पश्चिमोत्तर साम्राज्य की ओर आने लगी, चन्द्रगुप्त को समय पर सूचना मिल गयी। उसने आगे बढ़कर सिन्धु के उस पार ही सेल्यूकस को रोका दिया। चन्द्रगुप्त ने सेल्यूकस के आक्रमण को रोकने के लिए पर्याप्त संख्या में हाथी और रथों को सामने रखा था-साथ ही इस बात का भी ध्यान रखा था कि हाथियों और रथों की व्यवस्था ऐसी हो, जिसमें पोरस वाला इतिहास न दोहराने पाये। इसके अलावा उसने किसी भी अन्य राजा से सेल्युकस से मैत्री न होने दी थी।

पश्चिमोत्तर भारत के एक महत्त्वपूर्ण राजा शशिगुप्त को चन्द्रगुप्त ने पूरी तरह अपने अंकुश में रखा था जिसकी वजह से सेल्युकस को स्थानीय स्तर पर किसी की सहायता न मिल सकी थी। दोनों ओर की सेना के बीच जमकर युद्ध हुआ। युद्ध का परिणाम चन्द्रगुप्त के पक्ष और सेल्युकस की पराजय के रूप में सामने आया। अन्ततः हार जाने के बाद सेल्युकस को चन्द्रगुप्त से संधि के लिए विवश होना पड़ा। संधि की निम्न लिखित शर्ते सामने आयीं-

1. वर्तमान अफगानिस्तान तथा बिलोचिस्तान का सम्पूर्ण प्रदेश जो खैबर दर्रे से हिंदू कुश पर्वत तक फैला हुआ था, सेल्युकस ने चन्द्रगुप्त को दे दिया।

2. सेल्युकस ने अपनी कन्या का विवाह चन्द्रगुप्त के साथ कर दिया।

3. चन्द्रगुप्त ने 500 हाथी उपहार के रूप में सेल्यूकस को भेंट दिये।

4. दूत विनिमय हुआ, जिसके फलस्वरूप यूनानी राजदूत पाटलीपुत्र आया। चन्द्रगुप्त की इस विजय का अत्यंत महत्त्वपूर्ण परिणाम यह हुआ कि चन्द्रगुप्त के साम्राज्य का विस्तार उत्तर पश्चिम के अब हिन्दुकुश पर्वत तक हो गया था।

चन्द्रगुप्त का साम्राज्य 

चन्द्रगुप्त मौर्य का साम्राज्य पश्चिमोत्तर में हिन्दुकुश से दक्षिण पूर्व में बंगाल की खाड़ी और उत्तर में हिमाचल से लेकर दक्षिण में कृष्णा नदी तक फैला हुआ था। अलबत्ता कलिंग, कश्मीर तथा दक्षिण का कुछ भाग उसके साम्राज्य में सम्मिलित न था। 

चन्द्रगुप्त ने जिन राज्यों पर विजय प्राप्त की थी प्रायः उनके अस्तित्व को समाप्त करके उसने उन्हें अपने राज्य में सम्मिलित कर लिया था। इस तरह उसने एक केन्द्रभूत साम्राज्य की स्थापना की। केन्द्र से नियुक्त शासक प्रांतों पर शासन किया करते थे। साम्राज्य के कुछ ऐसे भाग थे। जिन्हें पर्याप्त आन्तरिक स्वतंत्रता प्राप्त थी।

 मेगास्थनीज नामक विदेशी यात्री ने पाटलिपुत्र का विधिवत् वर्णन किया है उसने लिखा है- “पाटलिपुत्र भारत का सबसे बड़ा नगर है। वह सोन तथा गंगा नदियों के तट पर बसा है। यह नगर साढ़े नौ मील लम्बा तथा पौने दो मील चौड़ा है। नगर के चारों ओर एक खाई सी है; जिसकी चौड़ाई 606 फीट और गहराई 15 गज है। इसके चारों ओर एक दीवार है, जिसमें 64 फाटक और 500 बुर्ज बने हुए हैं। 

पाटलिपुत्र के आलावा और भी बहुत से नगर थे। इनमें तक्षशिला, उज्जैन, तथा कौशाम्बी अधिक प्रसिद्ध थे। जो नगर नदियों तथा समुन्द्र के निकट थे, उनमें भवन निर्माण के लिए काष्ठ (लकड़ी) का प्रयोग होता था, परन्तु जो नगर ऊंचे स्थान पर अथवा नदियों तथा समुन्द्र से दूर स्थित थे, उनके भवन चूने तथा ईंटों से बनाए जाते थे।

मेगस्थनीज द्वारा चन्द्रगुप्त मौर्य के साम्राज्य का अन्य वर्णन-मेगस्थनीज ने चन्द्रगुप्त के राज-प्रसाद का अत्यंत सुन्दर वर्णन किया है। उसने लिखा है-चन्द्रगुप्त के राज-भवन पाटलिपुत्र के नगर में बने हुए थे। सुन्दरता और रमणीयता में वे ईरान के सम्राटों के राज-प्रसादों से भी अधिक सुन्दर थे। राजभवनों के चारों और सुन्दर उद्यान तथा सरोवर थे। राज-प्रसाद के प्रांगण में पालतू मयूर रखे जाते थे। उद्यानों में वृहत् संख्या में शुक (तोते) पाये जाते थे, जो राजा के उद्यान में आने पर, उसके ऊपर मंडराया करते थे। सरोवरों में बड़ी-बड़ी मछलियां रहती थी। मछलियों को पकड़ने की किसी को भी आज्ञा न थी-पर बाल्यावस्था में राज-प्रसाद के राजकुमार अपने आमोद-प्रमोद के लिए उन्हें पकड़ सकते थे और इन सरोवरों में नाव चलाना सीखते थे। 

एक अन्य यूरोपीय इतिहासकार स्टेवो ने लिखा है-सम्राट प्रायः प्रसाद के भीतर ही रहता था और उसकी सुरक्षा के लिए नारी संरक्षिकाएं होती थीं। केवल चार अवसरों पर सम्राट प्रसाद से बाहर निकलता था युद्ध के समय, न्यायाधीश के पद से न्याय करने हेतु, बलि देने के उद्देश्य से, आखेट करने के ध्येय से। 

चन्द्रगुप्त का दरबार बड़ी सज-धज तथा ठाठ-बाट से लगता था। सोने-चांदी के सुन्दर पात्र, जड़ाऊ मेज तथा कुर्सियां, कीमखाब के बारीक वस्त्र देखने वालों की आंखों में चकाचौंध उत्पन्न कर देते थे। 

सम्राट मोती की मालाओं से सुसज्जित पालकी तथा स्वर्ण झूलों से विभूषित हाथी पर बैठकर राज प्रसाद से बाहर निकलता था। राजा को पहलवानों के दंगल, घुड़दौड़, पशुओं के युद्ध आदि देखने का काफी शौक था। वह उन्हें देखकर अपना मनोविनोद करता था।

चन्द्रगुप्त मौर्य की शासन व्यवस्था-मेगस्थनीज ने चन्द्रगुप्त मौर्य की शासन व्यवस्था के बारे में लिखते हुए विवरण दिया है-नगर का प्रबंध तीस सभासदों की एक समिति द्वारा होता था, यह समिति 6 उप-समितियों में विभक्त थी। इस प्रकार प्रत्येक उप-समिति में पांच सदस्य होते हैं। इन समितियों के अलग-अलग कार्य होते थे। पहली समिति कला-कौशल का प्रबध करती थी, दूसरी समिति विदेशियों की देखभाल करती थी, तीसरी समिति जन्म-मरण का हिसाब रखती थी। चौथी व्यापार का प्रबंध करती थी, पांचवी व्यापारियों की वस्तुओं के क्रय-विक्रय का प्रबंध किया करती थी। छठी समिति कर या चुंगी वसूल करती थी। 

यह केन्द्रीय शासन कहलाता था, जो राज्य के केन्द्र अर्थात् राजधनी से संचालित होता था और जिसका संचालन सीधे सम्राट तथा उसके परामर्शदाताओं और मंत्रियों द्वारा होता है। 

केन्द्रीय शासन के अन्तर्गत सम्राट उसके मंत्री तथा परामर्शदाता, गुप्तचर विभाग, सेना का प्रबन्ध, न्यायालय आदि आते हैं। इसका विवेचन निन्न प्रकार किया जा सकता है 

सम्राट- केन्द्रीय शासन का प्रधान स्वयं चन्द्रगुप्त मौर्य था और उसी की आज्ञाओं तथा आदेशों के अनुसार सम्पूर्ण देश का शासन चलता था, वह स्वयं कानून का निर्माण करता था। वही नियमों के पालन करवाने की व्यवस्था करता था। वह नियमों का उल्लंघन करने वालों को दण्ड भी देता था। इस प्रकार चन्द्रगुप्त मौर्य स्वयं व्यवस्थापिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका का प्रधान होता था और वही सम्पूर्ण शासन का केन्द्रबिंदु बन गया था।

इतिहासकार स्मिथ (Smith) महोदय ने लिखा है- “चन्द्रगुप्त के शासन से सम्बन्धित विदित तथ्य इस बात को सिद्ध कर देते है कि वह कठोर निरंकुश शासक था।”

सम्राट न केवल प्रशासकीय विभाग का सर्वेसर्वा था वरन् वह सैनिक विभाग का प्रधान था और स्वयं संगठन की व्यवस्था करता था। युद्ध के समय वह स्वयं सेनापति के कार्यों को करता था। 

इससे स्पष्ट है कि राज्य की सारी शक्ति सम्राट के हाथ में थी और उसी की इच्छानुसार पूरे राज्य का शासन संचालित होता था। इस प्रकार चन्द्रगुप्त का शासन, स्वेच्छाचारी तथा निरंकुश था कहना अनुचित न होगा। स्वेच्छाचारी शासन का यह अर्थ कदापि न लेना चाहिए कि सम्राट मनमाना शासन करता था और लोकतंत्र की चिंता नहीं करता था। चन्द्रगुप्त के स्वेच्छाचारी शासन का अर्थ यह है कि सिद्धांततः राजा की शक्ति तथा उसके अधिकारों पर किसी प्रकार का नियंत्रण न था, परन्तु क्रियात्मक रूप से उसे उसे परम्परागत नियमों, अपने परामर्शदाताओं के मशवरों तथा नैतिक नियमों को आदर की दृष्टि से देखना पड़ता था।

कौटिल्य के अर्थशास्त्र‘ से यह बात सामने आती है कि सम्राट अपनी प्रजा का ऋणि समझा जाता था। वह अच्छा शासन करके ही इस प्रजा का ऋण से मुक्त हो सकता था। स्वेच्छाचारी होते हुए भी प्रजा के हित में शासन करना राजा का परम धर्म था। अपनी प्रजा का अधिक-से-अधिक कल्याण करने के लिए और अपने शासन को सुचारू-रीति से संचालित करने के लिए सम्राट मंत्रियों तथा अन्य पदाधिकारियों की नियुक्ति करता था।

मंत्रिपरिषद्-सम्राट चन्द्रगुप्त के शासन में मंत्रिपरिषद् की व्यवस्था थी, ये महत्त्वपूर्ण कार्यों में परामर्श तथा सहायता देने का कार्य करता था। चन्द्रगुप्त के प्रधान परामर्शदाता आचार्य चाणक्य थे। चाणक्य का यह विश्वास था कि शासन की गाड़ी एक पहिये से नहीं चल सकती थी। सम्राट उसका एक पहिया है, और उसका दूसरा पहिया मंत्रीपरिषद् है। इस प्रकार शासन व्यवस्था चलाने के लिए मंत्रिपरिषद् का होना अनिवार्य था। योग्य मंत्रिपरिषद् की वजह से ही चन्द्रगुप्त मौर्य का शासन सुचारू रूप से संचालित होता था। उनके बल पर ही प्रजा का अधिक-से-अधिक कल्याण होता था। मंत्रिपरिषद् के सदस्यों को सम्राट स्वयं नियुक्त करता था और सभी वेतनभोगी होते थे। केवल वही लोग इस पद पर नियुक्त किये जाते थे जो बुद्धिमान, निर्लोभी तथा सच्चरित होते थे।

मंत्रिपरिषद अपना निर्णय बहुमत से देती थी; परन्तु सम्राट सदैव मंत्रिपरिषद के निर्णय को मानने को बाध्य न था। इस तरह वह सत्ता का सर्वोच्च था। यद्यपि वह मंत्रिपरिषद् के अधिकांश फैसलों को स्वीकारता था; परन्तु एकाध मामले में वह उनके सम्मिलित फैसलों को दरकिनार कर अपनी मर्जी से फैसले ले लेता था। 

ऐसा भी प्रतीत होता है कि मंत्रिपरिषद् राज्य के केवल अत्यंत महत्त्वपूर्ण विषयों में अपना परामर्श देने के लिए बुलाई जाती थी। राज्य के दैनिक कार्यों से उसका कोई सम्बन्ध न था। 

सम्राट के शासन का सुचारू रीति से संचालित करने के लिए सम्राट को परामर्श देने और उसकी सहायता के लिए एक दूसरी सभा होती थी, जिसके सदस्य ‘मन्त्रिन्’ कहलाते थे।

मंत्रिन का पद मंत्रिपरिषद् के सदस्यों से अधिक ऊंचा और महत्त्वपूर्ण होता था। सम्राट के मंत्रियों में प्रलोभन का आभाव रहता था-ऐसे लोगों को इस पद पर चुना जाता था, जिनकी पहले ही परीक्षा हो चुकी हो और वे इसमें सफल हो चुके हों। 

कौटिल्य ने ऐसे लोगों की संख्या तीन से चार एक लिखी है जो ‘मंत्रिन्’ होते थे। ये मंत्रिन् सदस्य देश की रक्षा मामले, विदेशी मामले, आकस्मिक आपत्तियों के मामले देखते थे तथा सम्राट के आगे उक्त मामलों की व्यवस्था करते थे; परन्तु उनके मामले में भी सम्राट फैसला बदल सकता था एवं लिए हुए निर्णय पर अपना निर्णय देकर उसे लागू करवा सकता था। इस प्रकार सम्राट अपने ‘मंत्रिन्” के परामर्श को या उन्हें लागू करवाने के लिए बाध्य नहीं था।

विभागीय व्यवस्था-राज्य का दैनिक शासन सम्राट द्वारा लागू व्यवस्था पर ही चलता था। मंत्रिपरिषद् तथा मंत्रिन लोग केवल सम्राट को परामर्श देते थे, राज्य व्यवस्था को संचालित करने के लिए चद्रगुप्त ने विभागीय व्यवस्था का निर्माण किया था। विभागीय व्यवस्था में सम्पूर्ण शासन का कार्य विभिन्न विभागों में विभक्त कर दिया गया था। प्रत्येक विभाग को शासन के एक या दो विषय सौंप दिये जाते थे। जिसके प्रमुख को उस विभाग की पूरी व्यवस्था करनी होती थी।

विभाग का अध्यक्ष या प्रमुख का पद ‘अमात्य’ कहलाता था। सम्राट चन्द्रगुप्त के शासन-काल में अट्ठारह विभाग थे-इन विभागों के कार्य संचालन एवं व्यवस्था हेतु सम्राट ने अट्ठारह अमात्यों की नियुक्ति की थी। इन अमात्यों के अधीन कार्य करने वाले कर्मचारियों की नियुक्ति भी सम्राट द्वारा की जाती थी। इस नियुक्ति के मामले में भी सम्राट उनके चरित्र और बौद्धिक कौशल की परीक्षा लेकर ही कार्य की जिम्मेदारी प्रदान किया करता था। अमात्य के अधीन कार्य करने वाले कर्मचारियों को यह अधिकार था कि वे किसी विशेष जानकारी को, जिसे वे अमात्य को देना आवश्यक न समझें, उसे सीधे सम्राट को दे सकते थे।

पुलिस प्रबन्ध-दैनिक शासन को सुचारू रीति से संचालित करने के लिए तथा नियम, कानून-व्यवस्था लागू कराने के लिए सम्राट की ओर से पुलिस प्रबन्ध किया गया था। चन्द्रगुप्त के शासन-काल में पुलिस को ‘रक्षिन्’ शब्द से सम्बोधित किया जाता था। रक्षिन् का कार्य सैनिक व्यवस्था से अलग था। सैनिक यदि युद्ध और आन्तरिक विद्रोह को दबाने के कार्य को करते थे, तो रक्षित पूरे राज्य के नागरिकों के मामले को देखते थे। राज्य की कानून-व्यवस्था को सम्भालना, देखना, अपराधी होने पर अपराधी को पकड़ना और उन्हें दण्ड दिलवाना रक्षिन का कार्य होता था। रक्षिन् पद को भी खूब देख-समझकर, चरित्रवान लोगों को प्रदान किया जाता था। ये चरित्रवान लोग नेक, ईमानदार निष्पक्ष और नियमों का पालन करवाने में कठोर हुआ करते थे।

गुप्तचर का प्रबन्ध-सम्राट चन्द्रगुप्त ने सेना और पुलिस (रक्षिन्) से अलग एक गुप्तचर विभाग की व्यवस्था की थी। यह विभाग दो भागों में बंटा था। एक को ‘संस्थान’ और दूसरे को ‘सचरण’ कहते थे। ‘संस्थान’ विभाग के लोग केवल एक स्थान पर (मुख्यालय) पर रहा करते थे। संचरण विभाग के गुप्तचर पूरे राज्य में इधर-उधर संचरण अर्थात घूमते-फिरते रहकर, प्रजा और उनके ऊपर नियुक्त अधिकारियों (आमत्यों) के कार्यों पर नजर रखते थे। इस बात पर विशेष निगाह रखते थे कि सम्राट के प्रति लोगों की धारणा कैसी है। यदि गलत धारणा रखने वाले लोगों की बातों सुनते थे, तो गलत धारणा बनाने (शिकायत) वालों की धारणा के मूल में जाकर देखते थे, रिपोर्ट तैयार करके संस्थान विभाग को सौंपते थे। संस्थान विभाग उस पर विचार और जाँचकर या तो ‘शिकायत’ का निदान खुद कराने का प्रयास करते थे, ऐसा न कर पाने की अवस्था में वे सीधे सम्राट तक सूचना पहुंचाते थे। 

‘संचरण’ और ‘संस्थान’ के लोग अपना कार्य इस रूप से करते थे कि सम्राट और प्रधानमंत्री के अलावा अन्य किसी को उनके बारे में जानकारी न हो पाती थी। चन्द्रगुप्त मौर्य का प्रधानमंत्री चूंकि आचार्य चाणक्य जैसा व्यक्ति (कौटिल्य) था, जिसने उसे मगध के सिंहासन पर आरूढ़ कराने में अपनी पूरी शक्ति लगा दी थी, अतः चन्द्रगुप्त मौर्य के बाद की अनेकों जिम्मेदारियों का निर्वहन करना उसके हाथ में था। सम्राट के बाद के कुछ विशेषाधिकार प्रधानमंत्री के हाथ में थे। इन विशेषाधिकारों के कारण वह कई मामलों में सम्राट की जानकारी में लाए बगैर खुद निर्णय ले लिया करता था, उसके लिए गये निर्णय पर सम्राट स्तब्ध रह जाता था। बाद में उस मामले में स्पष्टीकरण देकर वह सम्राट को सन्तुष्ट कर देता था। 

प्रधानमंत्री चाणक्य के इन विशेषाधिकारों के सम्बन्ध में एक-दो उदाहरण प्रस्तुत कर देने से यह बात अधिक आसानी से तथा तथ्यपूर्ण रूप से समझ में आ जायेगी। 

वर्णित है कि महानन्द की हत्या और मगध की राजसत्ता पर आसीन होने के बाद भी, महानन्द का प्रधान अमात्य (प्रधानमंत्री) राक्षस बच निकला था। वह महानन्द का पूर्ण वफादार था। बच निकलने के बाद वह अज्ञातवास में जाने से पहले अवसर का लाभ उठाकर राज्यकोष का भारी धन अपने साथ ले जाने में सफल हुआ था। उसी धन से वह महानन्द के विश्वस्तों का पोषण कर रहा था तथा उसने चन्द्रगुप्त की हत्या के लिए जासूसों द्वारा षड्यंत्र जारी रखा था। 

सिंहासनासीन होने के बाद चन्द्रगुप्त ने अपने लिए अलग से राजप्रसाद बनवाना आरम्भ किया था। राजप्रसाद बनकर तैयार हो गया था; पर अभी उसमें चन्द्रगुप्त ने प्रवेश न किया था। चन्द्रगुप्त के प्रवेश से पहले चाणक्य राजप्रसाद का निरीक्षण करने गया था। उसने निरीक्षण के दौरान उस कक्ष की दीवारों से चींटियों की शृंखला गुजरती देखी। उसने यह भी देखा कि चींटियाँ अपने स्वाभाव के अनुसार मुंह में खाद्य सामग्रियां उठाए लिये जा रहीं थीं। जिस कक्ष में यह विचित्रता चाणक्य ने देखी, उसे सम्राट के शयन कक्ष के रूप में सजाया-संवारा गया था। 

अभी चाणक्य चींटियों के शृंखला बनाकर निकलने और खाद्य पदार्थ लेकर जाने के विषय पर चिंतन कर ही रहा था कि सम्राट चन्द्रगुप्त खुद भी वहां अपना राजप्रसाद देखने आ गया।

 चन्द्रगुप्त अपने भावी शयन कक्ष की सुन्दरता और सजावट की प्रशंसा कर ही रहा था कि यकायक निर्णय लेते हुए चाणक्य ने कर्मचारियों को आदेश दे दिया 

“इस शयन कक्ष में आग लगा दी जाए।” 

सम्राट चन्द्रगुप्त स्तब्ध रह गया था-नवनिर्मित, सजे-सजाए शयन कक्ष में आग लगा दी गयी। शयन कक्ष धूं-धूं करके जल उठा। 

उसके जल जाने के बाद वहां से मानव देह के जलने की दुर्गन्ध भी सामने आयी। पूरा कक्ष जलकर राख हो जाने के बाद, उसके फर्श को नीचे गुप्त तहखाना देखकर चन्द्रगुप्त के विस्मय की सीमा न रही थी। उस गुप्त तहखाने में दर्जन भर से ज्यादह लोगों की जली हुई लाशें पड़ी थीं।

 चन्द्रगुप्त को आश्चर्य था कि उसने शयन कक्ष के नीचे तहखाना बनवाने का कोई आदेश न दिया था। तहखाना और लोगों की लाशें प्रमाण रूप में सामने आने के बाद चाणक्य ने स्पष्ट किया

“जिनकी लाशें जल गयी हैं वे मगध के पुराने प्रधान अमात्य के गुप्तचर थे-इन्होंने निर्माणकर्ताओं से षड्यंत्र रचकर गुप्त तहखाना बनवा रखा था। इनका उद्देश्य था जब आप शयनकक्ष में आकर रात्रि विश्राम करें, तो यह तहखाने के गुप्त फर्श से प्रविष्ट होकर आपकी हत्या कर दें।” 

चाणक्य आगे बताता रहा– “इस कक्ष के नीचे तहखाना था, जिसमें कुछ लोग खाने पीने की चीजों के साथ घुसे हुए हैं-इसकी जानकारी मुझे यह देखकर लगी कि चींटियों का झुण्ड, मुंह में खाद्य साम्रगी लिए बाहर आ रहा था।” इस घटना से इस बात का प्रमाण समने आता है कि आचार्य चाणक्य कुछ मामलों में चन्द्रगुप्त से परामर्श लिए बगैर खुद त्वरित निर्णय ले लिया करता था। अवश्य ही ऐसे निर्णयों को लेने का उसे चन्द्रगुप्त की ओर से अधिकार प्राप्त था। 

अन्य घटना को प्रस्तुत करना यहां समीचीन है। विवरण इस प्रकार है- 

चन्द्रगुप्त के समय अधीन राजागण, सामान्त और बड़े व्यापारी चन्द्रगुप्त के सामने उपस्थित होकर बहुमूल्य उपहार भेंट कर रहे थे। राज्याभिषेक के अवसर पर चन्द्रगुप्त ने मित्र और अधीन राजाओं को भी निमंत्रित किया था। मित्र राजाओं में सिन्धुराज पोरस भी आमंत्रित और उपस्थित था। योद्धा राजा, सिन्धुराज पोरस ने वीरतापूर्वक सिकन्दर का सामना किया था। पोरस का सिकन्दर से युद्ध इतिहास प्रसिद्ध घटना है।

भेंट-उपहार देते लोगों में एक धनाड्य व्यापारी बढ़कर सामने आया था। उसने बेहद विनम्र भाव से एक अनिग्ध सुन्दरी को सिकन्दर को भेंट रूप में दिया था। उस सुन्दरी के रूप-लावण्य को देखकर पूरा दरबार और उपस्थित राजागण भी मुग्ध हो उठे थे। खुद चन्द्रगुप्त ने भी उसकी ओर मोहक भाव से देखा था। 

पर, इससे पहले कि इस परम् सुन्दरी को चन्द्रगुप्त बढ़कर अपने लिए स्वीकार करता; अचानक ही चाणक्य ने अपने स्थान से उठकर विस्यमयजनित घोषणा कर दी थी- “इस उत्सव अवसर पर सम्राट चन्द्रगुप्त, इस लावण्यमय सुन्दर युवती को अपने परम् मित्र सिन्धुराज पोरस को अपनी ओर से भेंट करते हैं…।” 

चाणक्य की घोषण सुन दरबार सन्नाटे में आ गया था। खुद चन्द्रगुप्त का चेहरा जैसे गमगीन हो उठा था; पर वह चाणक्य के निर्णय का विरोध न कर सका था। 

कुछ देर के सन्नाटे भरे दरबार के वातावरण के बाद, राज्याभिषेक का कार्यक्रम यथावत् चलने लगा था। 

अगली सुबह! 

सूचना आयी कि सिन्धुराज पोरस का निधन हो गया है। चन्द्रगुप्त को साथ ले चाणक्य, सिन्धुराज के शोकाकुल राज्य में पहुंचे। दोनों सिन्धुराज पोरस के शयन कक्ष में पहुंचे, जहां वे मृत्यु शैय्या पर थे-उनका चेहरा नीला पड़ चुका था। स्पष्ट था कि उनकी मृत्यु का कारण तीक्ष्ण विष बना है। शयन कक्ष के एक कोने में वह सुन्दरी भी बैठी सुबक रही थी। तब चाणक्य ने चन्द्रगुप्त को मुखातिब करते हुए कहा 

“सिन्धुराज पोरस के स्थान पर आप अपने शयन कक्ष में मरे पड़े होते सम्राट चन्द्रगुप्त, यदि मैंने इस सुन्दरी को सिन्धुराज पोरस को भेंट-उपहार स्वरूप में न दिया होता। यह सुन्दरी ‘विषकन्या’ है, जिसे आपकी हत्या के षड्यंत्र हेतु आमात्य राक्षस द्वारा भेजा गया था। इसके साथ संसर्ग करते ही सिंधुराज पोरस को अपने प्राण गंवाने पड़े।” 

निःसन्देह, चन्द्रगुप्त पोरस के स्थान पर अपनी मृत्यु की कल्पना से सिहर उठा था, साथ ही उसके मन में विचार उठा था कि उसे बचाने के लिए आचार्य को सिन्धुराज की मृत्यु का रास्ता दिखाने की आवश्यकता क्यों पड़ी।

चन्द्रगुप्त को सोच-विचार में घिरा पाकर चाणक्य ने समाधान देते हुए कहा- “इसे सिन्धुराज को उपहार में देने की आवश्यकता मैंने इसलिए समझी क्योंकि गुप्तचरों की सूचनानुसार अमात्य राक्षस की, सिन्धुराज से पिछले कुछ समय से मैत्री हो गयी थी। सिन्धुराज ने उसे अपने राज्य में शरण दे देकर मैत्री सम्बन्ध बना लिया था। इस हालत में ‘दुश्मन का दोस्त दुश्मन’ हो जाता है, इस नीति के अन्तर्गत अब सिन्धुराज पोरस का मारा जाना हित में था चन्द्रगुप्त…!” 

चाणक्य के इस रहस्योद्घाटन से चन्द्रगुप्त अवाक रह गया था। 

“एक और बात-सम्राट चन्द्रगुप्त, कि मैंने एक नज़र देखते ही इस बात का कैसे पता लगा लिया था कि भेंट दी जाने वाली सुन्दरी विषकन्या है। इसका सीधा-सा उत्तर है-इसकी आंखों में तैरता हलाहल का नशा मुझे दिख गया था, साथ ही वह व्यापारी भी मुझे कुछ संदिग्ध लगा था। मैंने रक्षकों को संकेत देकर उक्त व्यापारी को भी गिरफ्तार करवा लिया था। उसने स्वीकार कर लिया है कि वह अमात्य राक्षस के आदेश पर विषकन्या का प्रबन्ध कर उसे चन्द्रगुप्त की सेवा में पेश करने के लिए लाया था।” 

अब चन्द्रगुप्त सब कुछ समझ गया था। यह भी कि आचार्य की सजग दृष्टि मात्र आंखों को देखकर सुन्दरी के विषकन्या होने का ज्ञान कर सकती है। आचार्य चाणक्य की खुली दृष्टि चौबीसों घण्टे उसके साम्राज्य और उसकी खुद की रक्षा करने में समर्थ है। 

इन दो घटनाओं से सम्राट चन्द्रगुप्त के प्रधानमंत्री पद की महत्ता और गुप्तचर व्यवस्था पर प्रकाश पड़ता है।

न्याय व्यवस्था-चन्द्रगुप्त मौर्य ने पुलिस और गुप्तचर व्यवस्था के साथ सशक्त न्याय व्यवस्था की थी। उसने न्याय व्यवस्था का जो तान-बाना बुना था, उसकी सार्थकता सदियों तक चलने आने के बाद आज भी कुछ-न-कुछ बदले रूप में विद्यमान है।

चन्द्रगुप्त ने न केवल अपराधियों को दण्ड देने के लिए ही वरन् पारस्परिक झगड़ों में न्याय देने तथा फैसलों के लिए समुचित न्याय व्यवस्था स्थापित की थी। उसके द्वारा स्थापित न्याय व्यवस्था में सम्राट स्वयं सबसे बड़ा न्यायाधीश होता था।

राजा के नीचे अन्य न्यायाधीश होते थे। नगरों तथा जनपदों के लिए अलग-अलग न्यायाधीश होते थे। नगरों के न्यायाधीश ‘व्यावहारिक महामात्य’ और जनपदों के न्यायाधीश ‘राजुक’ कहलाते थे। जो न्यायाधीश चार गांवों के लिए होते थे, वे ‘संग्रहक’, जो चार सौ गांवों के लिए होते थे ‘द्रोणमुख’ और आठ सौ गांवों के लिए जो होते थे उन्हें ‘स्थानीय’ कहा जाता था। न्यायाधीशों के लिए ‘धर्मस्थ’ शब्द का प्रयोग किया जाता था। 

जो न्यायाधीश फौजदारी अर्थात् मार-पीट के मुकदमों का निर्णय करते थे उन्हें ‘कंटक शोधन’ कहा जाता था। छोटी अदालतों की अपीलें बड़ी आदालतों में होती थीं तथा उसके बाद सम्राट का निर्णय अन्तिम माना जाता था। 

उसके शासन काल का दण्ड विधान अत्यंत कड़ा माना जाता था। अर्थदण्ड के साथ-साथ अंग-भंग तथा मृत्यु दण्ड का भी विधान था। कठोर दण्ड विधान का परिणाम यह हुआ था कि अपराधों में बड़ी कमी आ गयी और प्रायः लोग अपने घरों में बगैर ताला लगाए ही बाहर चले जाते थे।

राजा की वर्षगांठ, राज्याभिषेक, राजकुमार के जन्म तथा नये प्रदेशों की विजय प्राप्त करने का शुभ अवसर पर कैदियों को मुक्त करने की भी व्यवस्था थी।

लोक कल्याणकारी कार्य-चन्द्रगुप्त के प्रधानमंत्री के अनुसार राजा प्रजा का ऋणि कहलाता है। वह ऋण से इस रूप में मुक्त हो पाता था कि उनके लिए लोक कल्याणकारी कार्य करवाए। चन्द्रगुप्त ने काफी सारे लोक कल्याणकारी कार्य करवाये-उसने आवागमन की समुचित व्यवस्था करा, सड़कों का निर्माण कराया तथा बड़ी-बड़ी सड़कों का निर्माण कराकर एक शहर से दूसरे शहर को मिला दिया। इन सड़कों के किनारे उसने छायादार वृक्ष लगवाये, कुएं खुदवाए, धर्मशालाएं बनवायीं। नदियों को पार करने के लिए उसने पुल बनवाये-सिंचाई की उसने अति उत्तम व्यवस्था करवायी। राज्य की ओर से अनेकों कुएं और तालाब खुदवाये गये। उसके पुष्यगुप्त नामक एक प्रान्तीय शासक ने सौराष्ट्र में सिंचाई के लिए सुदर्शन झील का निर्माण करवाया।

चन्द्रगुप्त का एक और लोक कल्याणकारी कार्य स्वास्थ्य और स्वच्छता की समुचित व्यवस्था करना था। उसने आम जनता के लिए राज्य की ओर से औषधि और योग्य वैध और चिकित्सक रखे। नगरों की स्वच्छता और भोजन सामग्री की शुद्धता के लिए उसने निरीक्षक रखे थे। उसका एक अन्य लोक मंगलकारी कार्य था शिक्षा की समुचित व्यवस्था, शिक्षा का कार्य प्रधानमंत्री अथवा पुरोहित की अध्यक्षता में होता था। उसने शिक्षालयों की व्यवस्था की और उसके खर्च के वहन का जिम्मा राज्य के ऊपर लिया गया।

उपरोक्त लोक कल्याणकारी कार्यों के अतिरिक्त दीन-दुःखियों, असहायों, आकाल पीड़ितों की सहायता के लिए समुचित व्यवस्था चद्रगुप्त द्वारा करायी गयी। इन सब कार्यों का परिणाम यह हुआ कि राज्य की जनता सुख-सम्पन्नता का जीवन व्यतीत करने लगी। 

सेना का प्रबन्ध-चन्द्रगुप्त ने बाह्य आक्रमणों से रक्षा के लिए एक सशक्त 

चतुरंगिणी सेना की व्यवस्था की। उसने चतुरंगिणी सेना में हाथी, घोड़े, रथ तथा पैदल सेना का संगठन किया। सम्राट स्वयं सेना का प्रधान सेनापति होता था तथा युद्ध के समय रणभूमि में स्वयं उपस्थित रहता था। चन्द्रगुप्त ने जलसेना का संगठन किया। सम्पूर्ण सेना के लिए 30 सदस्यों की समिति का गठन किया। सेना का प्रबन्ध 6 भागों में विभक्त था तथा प्रत्येक विभाग का प्रबन्ध 5 सदस्यों के हाथ में होता था। प्रत्येक विभाग का एक अध्यक्ष होता था। पहला विभाग जलसेना का प्रबन्ध करता था, दूसरा विभाग सेना के हर प्रकार की सामग्री एवं रसद भेजने का प्रबन्ध करता था, तीसरा विभाग पैदल सेना, चौथा अश्वरोहियों की सेना का पांचवाँ, हाथियों की सेना का और छठा विभाग रथ सेना का प्रबन्ध करता था। सेना के साथ एक चिकित्सा-विभाग भी होता था, जो घायल तथा रूग्ण सैनिकों की चिकित्सा करता था। चन्द्रगुप्त की सेना स्थायी थी, जिसे राज्य की ओर से वेतन तथा अस्त्र-शस्त्र मिलता था। चन्द्रगुप्त मौर्य की सेना की प्रशंसा करते हुए इतिहासकार स्मिथ ने लिखा- 

“चन्द्रगुप्त मौर्य ने एक विशाल स्थायी सेना की व्यवस्था की थी, जिसे सीधे राजकोष से वेतन दिया जाता था और जो अकबर की सेना से भी अधिक सुयोग्य थी।”

चन्द्रगुप्त मौर्य का निधन 

जैन अनुश्रुतियों के अनुसार चन्द्रगुप्त ने महावीर स्वामी की शिष्यता ग्रहण कर ली थी। माना जाता है कि भारत के इस महान् सेनापति तथा कुशल शासक ने 24 वर्षों तक अत्यन्त सफलतापूर्वक शासन किया। यकायक ही उसमें शासन के प्रति वैराग्य की भावना उत्पन्न हुई, उसने राजवैभव से खुद को अलग करने की घोषणा करते हुए 299 ई०पू० में संन्यास ग्रहण कर किया। उसने खुद को राज्य से अलग करते हुए अपने पुत्र बिन्दुसार को सत्ता सौंप दी। वह जैन आचार्य भद्रबाहु के विशाल दल में शामिल होकर कर्नाटक के लिए प्रस्थान किया। कर्नाटक पहुंचकर देहत्याग के उद्देश्य से वह पर्वतों की ओर चला गया, वहीं एक सच्चे जैन संन्यासी के रूप में अनशन करके उसने प्राण त्याग दिये।  

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

17 − 6 =