राजा बिन्दुसार की जीवनी और इतिहास |Biography and History of King Bindusara

Biography and History of King Bindusara

राजा बिन्दुसार की जीवनी और इतिहास |Biography and History of King Bindusara

बिन्दुसार  : संक्षिप्त परिचय 

मगध का सम्राट बिन्दुसार भारत का यशस्वी सम्राट हुआ है। यह मौर्य साम्राज्य के संस्थापक चन्द्रगुप्त मौर्य का पुत्र था। इसकी माता का नाम दुर्धारा, पत्नी का नाम सुभद्रांगी था। इसने आजीवन, पिता चन्द्रगुप्त के राजपाट त्यागने के बाद 298 ई०पू० से 272 पू० तक, 26 वर्षों तक राज्य किया। 52 वर्ष की आयु में इसका निधन हो गया। उसने सम्राट की उपाधि धारण की। इसके राज्य की सीमा लगभग सम्पूर्ण भारत थी। बिन्दुसार की धार्मिक मान्यता आजीवक और जैन धर्म में थी। इसका पुत्र अशोक, भारत का चक्रवर्ती सम्राट कहलाया।

बिन्दुसार : जीवन परिचय 

चन्द्रगुप्त मौर्य के राजपाट त्यागते समय उसने अपने पुत्र बिन्दुसार को सत्ता सौंप दी थी। बिन्दुसार ने 298 ई.पू. में अपना राज्याभिषेक करा, सम्राट की उपाधि धारण की। 

यूनानी लेखों में बिन्दुसार को ‘अमित्रघाट’, ‘अमित्रोचेट्स’, ‘अमित्रघट’, ‘अमित्रकेटे’ जैसे अलग-अलग नामों से सम्बोधित किया गया है जिसका संस्कृत रूप, अमित्रघाट अर्थरूप में शत्रुओं का नाश करने वाला बनता है।

 तिब्बती लामा तारानाथ तथा जैन अनुश्रुति के अनुसार-आचार्य चाणक्य बिन्दुसार का भी मंत्री रहा। अनुश्रुतियों के अनुसार चाणक्य ने 16 राज्य के राजाओं और सामंतों का नाश किया और बिन्दुसार को पूर्वी समुन्द्र से पश्चिमी समुन्द्र पर्यन्त भू-भाग का राजा बनाया। 

वैसे चन्द्रगुप्त अपने समय में उपरोक्त विशाल क्षेत्र पर शासन कर रहा था। 16 राज्यों का नाश, चाणक्य द्वारा बिन्दुसार के समय में नाश करने की जो बात सामने आती है, उसके संदर्भ में यह बात हो सकती है, चन्द्रगुप्त के बाद 16 राज्यों ने अपनी स्वाधीनता घोषित कर दी हों; जिन्हें कुचलकर चाणक्य ने बिन्दुसार का निष्कंटक राज्य प्रदान किया हो।

उक्त कथन का प्रमाण दिव्यावदान नामक ग्रंथ में मिलता है। इसमें वर्णन है कि उत्तरापथ की राजधानी तक्षशिला में, बिन्दुसार के शासन काल में विद्रोह हुआ था। इस विद्रोह को शान्त करने के लिए बिन्दुसार ने अपने पुत्र अशोक को भेजा था। आगे विवरण है कि तक्षशिला के विद्रोह का दमन कर अशोक खस देश चला गया था। ‘खस’ देश सम्भवतः नेपाल के आसपास के प्रदेश रहे होंगे। 

तारानाथ के अनुसार-खस्या और नेपाल के लोगों ने विद्रोह किया और अशोक ने इन प्रदेशों को जीता।

बिन्दुसार का व्यक्तित्व

अपने पिता चन्द्रगुप्त की भांति बिन्दुसार भी जिज्ञासु शासक था। कला और संस्कृति के प्रति उसकी जिज्ञासा हमेशा प्रबल रहती थी। वह विद्वानों और दार्शनिकों का आदर करता था। एथेनियस के आनुसार बिन्दुसार ने एण्टियोकस (सीरिया के शासक) को एक यूनानी दार्शनिक भेजने के लिए लिखा था। 

दिव्यावदान की एक कथा के अनुसार आजीवन परिव्राजक, बिन्दुसार की सभा को सुशोभित करते थे। इसके साथ ही कुछ ऐसे प्रमाण की मिलते हैं, जो उसे ऐश्वर्य प्रिय जीवन व्यतीत करने वाला शासक बताते हैं। उसने अपने मित्र यूनान के राजा एण्टियांकस से अंजीरों और अंगूर की शराब मंगवायी थी और उसे पीने में बड़ा सुख का अनुभव करता था। सीरिया के सम्राट ने डेइमेकस नामक अपना राजदूत बिन्दुसार के दरबार में भेजा था।

बिन्दुसार की दिग्विजय की नीति 

बिन्दुसार ने अपने पिता की ही दिग्विजय नीति का अनुसरण किया था। बौद्ध तथा जैन दोनों की ही अनुश्रुतियों से यह ज्ञात होता है कि चन्द्रगुप्त मौर्य के उपरांत, राजसत्ता सम्भालते ही उसके राज्य में विद्रोह होने लगे थे, जिनका चाणक्य ने कुशलतापूर्वक दमन कर दिया था। 

चन्द्रगुप्त को सम्राट बनाने वाला चाणक्य, चन्द्रगुप्त के बाद भी जीवित था, उसने बिन्दुसार के शासन काल में उसका मंत्री पद सम्भाल रखा था।

उत्तरापथ में विद्रोह-बिन्दुसार का ज्येष्ठ पुत्र सुसीम उत्तरापथ में अपने पिता का प्रतिनिधि तथा प्रांतीय शासक था। मौर्य अमात्यों के कठोर शासन से पीड़ित होकर तक्षशिला के प्रजा ने विद्रोह का झण्डा बुलन्द कर दिया था। वह उस विद्रोह का दमन करने में असफल रहा था। पाटलिपुत्र में बिन्दुसार को इस विद्रोह की सूचना मिली, तब उसने उज्जयिनी के शासक अशोक को इस विद्रोह का दमन करने के लिए तक्षशिला भेजा।

जब अशोक तक्षशिला के निकट पहुंचा तब वहां की प्रजा ने उसके पास अपना आवेदन पत्र भेजा। आवेदन पत्र में लिखा था-“हम लोग राजकुमार (सुसीम) के विरोधी नहीं हैं और ना ही महाराज बिन्दुसार के विरोधी हैं। दुष्ट अमात्य हमारा अपमान करते हैं अतएव हम लोगों ने विद्रोह कर दिया है।” वहां पहुंचते ही अशोक ने पता लगाया तो सत्यता सामने आयी कि वहां के अमात्य कड़ी नीतियों का अनुसरण करते हैं। सत्यता जानने के बाद अशोक ने तक्षशिला के लोगों की शिकायतों को दूर कर ऐसी व्यवस्था कर दी थी कि अमात्यों की कड़ी नीतियों का तक्षशिला की जनता पुनः शिकार न होने पाये। 

इस तरह उसकी विद्रोह को दबाने की नीति पूरी तरह से सफल रही। विद्रोह शान्त हो गया था और अशोक वहां से आगे बढ़ गया था।

सम्राट के रूप में बिन्दुसार

सम्राट के रूप में बिन्दुसार का इतिहास कालचक्र के कारण धूमिल है। उससे पूर्व उसके पिता चन्द्रगुप्त ने जितना विस्तृत राज्य स्थापित कर दिया था, उसे सम्भाले रहना ही बिन्दुसार के लिए बहुत बड़ा काम था। विजय करने के लिए उसके सामने नये राज्य कुछ गिने-चुने ही थे। बिन्दुसार ने इनमें से किसे पराजित कर राज्य विस्तार किया था इसका वर्णन धूमिल है। 

बिन्दुसार से पूर्व उसका पिता चन्द्रगुप्त मौर्य और उसका पुत्र अशोक इतिहास के राजनीतिक पटल पर ऐसे प्रकाशवान सम्राट हुए, जिनके तेज के सामने बिन्दुसार की छवि फीकी पड़ गयी। उसने पिता द्वारा प्राप्त सारे राज्य को सुरक्षित रखा, यह उसकी कम विशेषता न थी।

 इतिहासकारों की कलम चन्द्रगुप्त मौर्य और अशोक पर इतनी ज्यादा चली कि वे बिन्दुसार की विजय घटनाओं को शीघ्रता से लांघकर आगे बढ़ अशोक पर जा पहुंचे। अशोक के शिलालेख इस बात को बताते हैं, तथा ऐतिहासिक प्रमाण हैं कि बिन्दुसार ने महत्त्वपूर्ण विजयें की थीं। अशोक ने अपने शिलालेखों में चोल, पाण्डय, केरल और सातिम इन चार सुदूर दक्षिण भारत के राज्य को छोड़कर शेष सारा दक्षिणी भारत का राज्य अपने साम्राज्य में सम्मिलित बताया है। 

दक्षिणी भारत के राज्यों में केवल ‘कलिंग विजय’ ही अशोक की सबसे महत्त्वपूर्ण विजय थी। इसके अलावा दक्षिण में जो राज्य मगध के अधीन थे; उन्हें अवश्य ही बिन्दुसार ने विजित कर मगध के आधीन किया था।

मौर्य साम्रटों की दक्षिण-विजय के कुछ निर्देश प्राचीन तमिल साहित्य से भी उपलब्ध होते हैं। प्राचीन तमिल कवि मायुलनार के अनुसार मौर्यों ने दक्षिण पर अनेक आक्रमण किये थे। 

एक अन्य ग्रंथ के अनुसार मौर्यों की सेनाएं कोंकण से कर्नाटक तट, तुल्यु प्रदेश से होती हुई कोयम्बटूर की तरफ बढ़ीं और वहां से और भी दक्षिण में जाकर मदुरा के नीचे तक पहुंच गयी थीं।

 मौर्य पहाड़ों को काटकर रास्ते बनाते हुए, चट्टानों पर अपने रथ दौड़ते हुए, दूर दक्षिण राज्यों में पहुंचे थे। 

तमिल कवियों के इन वर्णनों से प्रतीत होता है। कि चोल और पाण्ड्य राज्यों के कुछ भाग बिन्दुसार मौर्य की सेनाओं ने अपने अधीन किये थे। बाद में उन तमिल राज्यों ने आपस में मिलकर एक ‘संघात’ (संघ) बना लिया था और मौर्यों की अधीनता से स्वतंत्रता प्राप्त कर ली थी। अशोक के समय में तमिल राज्य उसके धर्म विजय के प्रभाव में तो थे, पर राजनीतिक दृष्टि से वे मगध-साम्राज्य की अधीनता में नहीं थे। 

मौर्य वंश के पतन के बाद कलिंगराज खारवेल ने अपने शिलालेख में तमिल देशों के इस ‘संघात’ का उल्लेख किया है। इस ‘संघात’ को 118 वर्ष पुराना बताया है। यह संघात सम्राट बिन्दुसार के समय में ही बना था।

विदेश के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध-सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य के समान सम्राट बिन्दुसार के समय में भी भारत का विदेशों के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध था। उसके समय में सीरिया साम्राज्य का स्वामी एण्डियोकस सोटर था, जो सेल्युकस का उत्तराधिकारी था। उसने मेगस्थनीज के स्थान पर डायमेचस को अपना राजदूत बनाकर पाटलिपुत्र भेजा था। प्राचीन यूननी लेखकों ने एण्डियोकस और बिन्दुसार के सम्बन्ध में अनेक कथाएं लिखी हैं। एक यूनानी कथा में लिखा हुआ है कि सम्राट बिन्दुसार ने एण्डियोकस के पास पत्र लिखकर दूत के हाथ भेजा था कि एण्डियोकस सम्राट उसके लिए कुछ अंजीर, कुछ अंगूरी शराब और एक यूनानी अध्यापक को खरीदकर भेज दीजिए। एण्डियोकस ने जवाब में लिखा था-“अंजीर और अंगूरी शराब भेजी जा रही है, परन्तु यूनानी प्रथा के अनुसार किसी 

यूनानी अध्यापक को खरीदकर भेजा जाना सम्भव नहीं। इसकी वजह यह है कि यूनान में किसी अध्यापक का क्रय-विक्रय नहीं हो सकता।” 

उपरोक्त कथन में एण्डियोकस द्वारा हास्य-परिहास का भी थोड़ा-सा पुट मिलता है; जो साबित करता है कि दोनों के बीच गहरी मित्रता थी कि हास्य-परिहास भी चल जाता था। 

बिन्दुसार ने यूनानी अध्यापक की मांग इसलिए की थी ताकि वह उससे यूनानी भाषा सीख सके-पर अंजीर और अंगूर की शराब की खरीद के साथ यूनानी अध्यापक की बात भी लिख दी थी। बिन्दुसार का मूल भाव समझकर एण्डियोकस ने परिहास भाव में यूनानी अध्यापक के क्रय-विक्रय न होने की बात लिख दी थी। 

बिन्दुसार के समय में मिस्त्र का राजा टाम्मी फिले डेल्फस था। उसने डायोनीसियस नामक राजदूत पाटलिपुत्र की राजसभा में भेजा था। डायोनीसियस द्वारा लिखित विवरणों को उदाहरण रूप में इतिहासकार प्लिनी ने अपने ग्रंथ में दिया है। प्लिनी के समय तक डायोनीसियस की लिखी पुस्तक अवश्य उपलब्ध थी; उसके बाद उसका कुछ पता नहीं।

बिन्दुसार के बाद मगध 

सम्राट बिन्दुसार का निधन कहीं 273 और कहीं 273 ई०पू० लिखा गया है। उसकी मृत्यु से पूर्व और मृत्यु के बाद उसका प्रधानमंत्री खल्लाटक नामक व्यक्ति था। खल्लाटक को चाणक्य ने ही प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त किया था तथा स्वयं जीवन का अंतिम भाग तपोवन में बिताने चला गया था। 

बिन्दुसार की मृत्यु के बाद उसके पुत्रों में राज सिंहासन के लिए गृहयुद्ध आरम्भ हुआ तब खल्त्नाटक ने अशोक की सहायता की  थी। 

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