राजा बिम्बसार की जीवनी और इतिहास |Biography and History of King Bimbasar

राजा बिम्बसार  की जीवनी और इतिहास

राजा बिम्बसार  की जीवनी और इतिहास |Biography and History of King Bimbasar

सम्राट बिम्बसार 

603-551 ई०पू० में भारत के मगध देश में एक यशस्वी राजा का उदय हुआ, जिसे इतिहास में बिम्बसार नाम से जाना गया। सम्राट बिम्बसार महात्मा गौतम बुद्ध के समकालीन थे।

 प्रचीन भारत में उस समय बहुत से छोटे-छोटे राज्य थे, उन्हें जनपद कहते थे। बौद्ध साहित्य में जगह-जगह सोलह या ‘षोड्स जनपदों’ का उल्लेख आता है। ये सोलह जनपद थे 

1.अंग,2. मगध, 3.काशी, 4.कोशल, 5. वृजि या वज्जि, 6. मल्ल, 7. वत्स, 8. चेदि, 9. पंचाल, 10. कुरू, 11. मत्स्य, 12. शूरसेन 13. अश्मक, 14. अवन्ति, 15. गंधार 16. कम्बोज।

 इन्हीं सोलह जनपदों में से एक मगध जनपद की राजा बिम्बसार था। मगध की राजधानी गिरिव्रज या राजगृह थी। ब्रह्मद्रथ के वंश का अन्त होने के बाद बुद्ध के समय में बिम्बसार का उदय हुआ था। 

बिम्बसार के उदय के बारे में महाकवि बालभट्ट के हर्षचरित से काफी विवरण सामने आता है। इन विवरणों के अनुसार श्रेणिबल के सेनानी अदित्य ने राजा बलक के विरुद्ध षड्यंत्र कर उसे मार डाला और अपने पुत्र बिम्बसार को मगध की राजगद्दी पर बिठाया। राजा बलक को राजा बालक भी लिखा गया है। उसका एक अन्य नाम कुमार सेन भी था। हर्षचरित के अनुसार महाकाल के मेले में महामांस की बिक्री के कारण आदित्य की प्रेरणा से वेताल जन्मा, इस वेताल सैनिक ने राजा कुमारसेन पर अचानक हमला कर दिया और उसे मौत के घाट उतार दिया। 

बिम्बसार को ‘श्रेणिक’ कहा गया है; क्योंकि उसका पिता श्रेणिक या श्रेणिक भट्टिय था। 

राज्य विस्तार और शासन 

बिम्बसार ने अपनी विजयों और वैवाहिक सम्बन्धों के द्वारा मगध का राज्य विस्तार किया। 

बिम्बसार अत्यन्त शक्तिशाली और महत्वाकांक्षी राजा था। अपनी महत्त्वाकांक्षा और राज्य विस्तार के कारण उसने सम्राट का स्थान प्राप्त किया। उसका विवाह कोशल देश की राजकुमारी कोशलदेवी के साथ हुआ था। इस विवाह में दहेज (नहान चुन्न मूल्य) के रूप में काशी जनपद का प्रदेश मिला था, जिसकी आमदनी एक लाख वार्षिक थी। 

कोशल के साथ वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित कर लेने के बाद सम्राट बिम्बसार इस बात से निश्चित हो गये थे कि अब मगध के पश्चिम में स्थित एक शक्तिशाली राज्य से कोई भय नहीं रहा है। उसके बाद उसने साम्राज्य विस्तार का प्रयत्न किया। 

उसने अंग महाजनपद के राजा ब्रह्मदत्त पर आक्रमण कर उसे पराजित किया तथा अंग को जीतकर अपने राज्य के अधीन कर लिया। अंग राज्य के शक्तिशाली होने का प्रमाण इस बात से मिल जाता है कि बिम्बसार से पूर्व वत्स महाजनपद के राजा शतानीक ने अंग देश पर आक्रमण कर उसे अपने अधीन कर लिया था, पर अधिक समय तक अंग वत्स राज्य के अधीन न रहा, उसने खुद को आजाद कर लिया था; पर मगधराज की अधीनता से वह खुद को मुक्त न करा सका। 

राजा बिम्बसार अंगराज से अधीनता स्वीकार कराकर ही सन्तुष्ट न हो सका, बल्कि उसने वहां के राजा ब्रह्मदत्त की हत्या कर, अंग को पूर्णतः मगध साम्राज्य के अन्तर्गत कर लिया।

एक अविजित शासक के रूप में भी बिम्बसार ने काफी प्रतिष्ठा पायी। मगध की पुरानी राजधानी गिरिव्रज थी। यह नगर गंगा के उत्तर में विद्यमान वज्जिसंघ के आक्रमणों से सुरक्षित नहीं था। 

इस पर वज्जियों के आक्रमण होते रहते थे। वज्जियों के आक्रमण से एक बार गिरिव्रज में भयंकर आग लग गयी थी। बिम्बसार जब सत्तासीन हुआ, तो उसने गिरिव्रज के उत्तर में एक नए नगर की स्थापना की, जिसका नाम राजगृह रखा। उसे एक दुर्ग के रूप में निर्मित किया गया था, ताकि वज्जियों के आक्रमण से भली-भाति मुकाबला किया जा सके। 

बिम्बसार ने जिस उद्देश्य से राजगृह की स्थापना की थी, उसमें उसे पूर्ण सफलता मिली। दुर्ग रूपी राजधानी पर वज्जि राज्य आक्रमण करने का साहस न कर सका। अपनी राजधानी को सुरक्षित कर लेने के बाद बिम्बसार ने कुशल नीति निर्धारक शासक का परिचय देते हुए; शक्तिशाली वज्जि राज्य से मैत्री सम्बन्ध स्थापित करने के प्रयास शुरू कर दिये। 

वज्जी को भी इस बात का पता चल चुका था कि मगध अत्यंत शक्तिशाली राज्य बन चुका है। इस प्रकार खुद को बराबरी पर पाने के बाद वज्जियों ने मगध के मैत्री सम्बन्ध को स्वीकार किया। 

मैत्री सम्बन्ध को पुख्ता बनाने के लिए वैवाहिक सम्बन्ध बनाने पर विचार किया गया। वज्जिकुमारी चेलना का विवाह बिम्बसार के साथ वज्जियों ने कर दिया। 

बौद्ध-ग्रन्थ ‘महावग्ग’ में लिखा है कि बिम्बसार की अधीनता में 80ए000 गांव थे, जो इस समय के सभी राज्यों की तुलना में सर्वाधिक थे। महात्मा गौतम बुद्ध बिम्बसार के समकालीन थे। अपने धर्मचक्र का प्रवर्तन (बौद्ध धर्म का प्रचार) करते हुए महात्मा बुद्ध कई बार मगध आये और बिम्बसार से उनकी भेंट हुई।

महात्मा बुद्ध के लिए बिम्बसार के हृदय में बहुत आदर था। प्रसिद्ध चिकित्सक जीवक भी बिम्बसार का समकालीन था। जीवक शालवती नामक वेश्या का पुत्र था। उसके जन्म लेते ही माता ने उसका परित्याग कर दिया था। कुमार अयत्र (बिम्बसार के एक पुत्र) ने उसे अपनाकर, पाल-पोसकर बड़ा किया था। जीवक को अत्यन्त उच्च शिक्षा दिलायी गयी। उसे पढ़ने के लिए तक्षशिला भेजा गया।

तक्षशिला में जीवक ने आयुर्वेद शास्त्र की कौमारमृत्यु शाखा में विशेष निपुणता प्राप्त की। विद्याध्ययन कर जीवक मगध लौटा और प्रसिद्ध वैद्य बना। जीवक के चिकित्सा सम्बन्धी चमत्कारों का उल्लेख बौद्ध साहित्य में अनेक स्थानों पर किया गया है। 

बिम्बसार को जब उसके पिता ने सिंहासन पर बिठाया था तो उसकी उम्र 15 वर्ष थी। उसने 52 वर्ष तक राज्य किया। इस तरह वह 67 वर्ष की आयु तक जिया। 

राजा पसेनदी की बहन कोशल की राजकुमारी, अजातशत्रु की माता भी बिम्बसार की पत्नियों में से एक थी। रवेया, सीलव और जयसेना नामक बिम्बसार की अन्य पत्नियां थीं। 

विख्यात वारांगना (नर्तकी) अम्बापालि से भी बिम्बसार का विवाह हुआ, जिससे विमरम कोन्दन्न नामक पुत्र हुआ। 

बिम्बसार ने हर्यक वंश की स्थापना 544 ई.पू. में की। इनके शासन काल में ही बिहार का राजनीतिक रूप में सर्वप्रथम उदय हुआ। इसी के साथ बिम्बसार को मगध साम्राज्य का संस्थापक भी माना गया। 

सुतानिपात अट्ठकथा के अनुसार बिम्बसार ने संन्यासी गौतम का प्रथम दर्शन पाण्डव पर्वत के नीचे अपने राजभवन से किया था। इस दर्शन के साथ ही वे बेचैन होकर उनके पीछे गये और उन्हें अपने राजभवन में आमंत्रित किया। गौतम ने इनका निमंत्रण अस्वीकार कर लिया, तब इन्होंने गौतम को उनके उद्देश्यपूर्ति हेतु शुभकामनाएं दीं और ब्रह्मत्व प्राप्ति के उपरान्त उन्हें फिर से राजगीर आने का निमंत्रण दिया। 

आने वाले समय में गौतम ने इस बात को याद रखा-गौतम बुद्ध कहलाने के बाद वे राजगीर आये और अपना वचन पूरा किया। वे अपने अनुयाइयों के साथ राजगीर आये। बिम्बसार ने बुद्ध और उनके अनुयाइयों को वेलुवन उद्यान दान में देना स्वीकार किया। अपने प्रण पूर्ति को दर्शाने के लिए बिम्बसार ने बुद्ध के हाथ, स्वर्ण कलश के जल से धुलवाए। 

आगामी तीस वर्षों तक बिम्बसार बौद्ध धर्म के विकास में सहायक रहे। 

अंतिम समय-बिम्बसार 52 वर्ष तक राज्य कर चुका था। वह 67 वर्ष का हो चुका था। उसका पुत्र अजाशत्रु राज्य प्राप्ति की प्रतीक्षा करते-करते थक चुका था। उसने एक दिन पिता के विरुद्ध विद्रोह कर उसे बंदी बना लिया। बंदी बनाने के बाद उसे कारागार में डाल दिया था। कुछ लोगों के अनुसार अजातशत्रु ने पिता बिम्बसार को बंदी बनाने के बाद हत्या कर दी थी; तो कुछ स्रोतों के अनुसार बिम्बसार भूख-प्यास से तड़प-तड़पकर मृत्यु को प्राप्त हुआ। 

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