राजा अशोक महान् की जीवनी और इतिहास |Biography and History of King Ashoka the Great

राजा अशोक महान् की जीवनी

राजा अशोक महान् की जीवनी और इतिहास |Biography and History of King Ashoka the Great
सम्राट अशोक का सामान्य परिचय
सम्राट अशोक का स्थान भारतीय इतिहास में अशोक महान् के रूप में वर्णित है। उसको ‘प्रियदर्शी देवताओं का प्रिय’ अशोक मौर्य ‘देवानामप्रिय’ भी कहा जाता है। उसका जन्म 304 ई०पू० (सम्भावित) पाटलिपुत्र (पटना) में हुआ। उसकी माता का नाम सुभद्रांत्री था, जो दिव्यावदान के अनुसार चम्पा देश की एक परमसुन्दरी ब्रह्मकन्या थी। अशोक की पांच पत्नियां थीं, उनके नाम क्रमशः इस प्रकार हैं
1 देवी (वेदिस-महादेवी शाक्य राजकुमारी) 2. कारूवाकी (द्वितीय देवी तीवल माता) 3. असंधिमित्रा (अग्रमहिषी) 4. पद्मावती 5. तिष्यरक्षिता
पटरानी देवी से पुत्र महेन्द्र, पुत्री संघमित्रा और पुत्री चारुमती का जन्म हुआ था। द्वितीय रानी कारूवाकी से पुत्र तीवर का जन्म हुआ था।

 चौथी रानी पद्मावती से पुत्र कुणाल (धर्म विवर्धन) तथा और भी कई पुत्रोंके जन्म का उल्लेख मिलता है।

अशोक की राज्य सीमा सम्पूर्ण भारत थी। वह 269 ई०पू० में राज्याभिषेक कराकर पिता के सिंहासन पर बैठा।

विशेष-बिन्दुसार का निधन 265 ई०पू० में हो गया था, पर अशोक ने 269 ई०पू० में राज्याभिषेक कराया। चार वर्ष विलम्ब का कारण यह रहा कि राज्य प्राप्त करने के लिए उसे अपने भाईयों से कड़ा संघर्ष करना पड़ा। भाईयों का वध करने के बाद ही उसने राज्याभिषेक कराया।

अशोक की मान्यता हिन्दू बौद्ध धर्म में थी। सम्राट बनने के बाद उसने केवल एक ही युद्ध ‘कलिंग युद्ध’ (262-260 ई०पू०) लड़ा था। कलिंग विजय के बाद वह सम्पूर्ण भारत का चक्रवर्ती सम्राट बन गया था।

राजसत्ता के लिए संघर्ष
बिन्दुसार के निधन के बाद मगध सम्राटों की चली आ रही परम्परा के अनुसार बिन्दुसार के विविध पुत्रों के बीच राजसिंहासन के लिए युद्ध हुए।

महावंश के अनुसार बिन्दुसार की सोलह रानियां थीं। उन रानियों से सौ पुत्र हुए थे। इन पुत्रों में सुमन (दिव्यावदान ग्रंथ के अनुसार सुसीम नाम) सबसे बड़ा और तिष्य सबसे छोटा था।

अशोक ने विमाताओं से उत्पन्न सब भाइयों की हत्या करके स्वयं राजगद्दी पर अधिकार कर लिया। राजसिंहासन के लिए इस भ्रात युद्ध की अवधि चार वर्ष लिखी गयी है।

अशोक के कितने भाई थे, उसने कितनों का घात किया, इस बात को निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता। उसके इतने भाइयों की बात कुछ अतिशयोक्ति पूर्ण प्रतीत होती है। यद्यपि अशोक के शिलालेखों और साहित्य में अनेक भाइयों का उल्लेख आता है-पर निश्चित संख्या अंकित नहीं। शिलालेखों में जो उल्लेख है उसके अनुसार उसके अनेक भाई थे, जिनके साथ वह अच्छा बर्ताव करताथा।

पर चार वर्ष तक गृहकलह और भ्रातृ युद्ध का रहना इस बात को सूचित करता है कि अशोक को राजगद्दी पर अधिकार प्राप्त करने की लिए घोर संघर्ष करना पड़ा था और उसमें उसके अनेक भाईयों की हत्या भी हुई थी।बौद्ध ग्रंथों में अशोक के बारे में जो विवरण आता है उसके अनुसार अशोक अत्यंत क्रूर और अत्याचारी था-पर बाद में बौद्ध धर्म का अनुसरण करने से उसकी वृत्ति बिल्कुल बदल गयी।

इस बात में कोई अतिशयोक्ति नहीं कि बिन्दुसार के पुत्रों में बड़ा सुमन या ससीम था। राजसत्ता पर उसका ही अधिकार था-पर राजसत्ता अशोक ने सम्भाली थी। वह भी चार वर्ष संघर्षरत रहकर, तो उससे स्वयं सिद्ध हो जाता है कि उसने युद्ध द्वारा ही सत्ता प्राप्त की थी।

इतिहासकार डॉ० स्मिथ की धारणा है कि राज-सिंहसन के लिए अशोक को संघर्ष अवश्य करना पड़ा, पर यह संघर्ष उसके बड़े भाई सुसीम से हुआ था।

डॉ० स्मिथ के अनुसार अशोक ने अपने 99 भाइयों की हत्या कर, सत्ता प्राप्त की थी। यह अनुश्रुति ‘सिंहल द्वीप’ की है। यह अनुश्रुति पूर्णतः कपोल कल्पित प्रतीत होती है क्योंकि अशोक के शासन-काल के सत्रहवें और अट्ठारहवें वर्ष भी उसके कई भाई-बहन जीवित थे और अपने परिवार की वह बड़ी चिंता किया करता था।

इतिहासकार डॉ० भण्डारकर भी सिंहली अनुश्रुति पर विश्वास नहीं करते। वे केवल इसे दंतकथा ही कहते हैं। उनके अनुसार यह सम्भव है कि सुसीम को परास्त कर अशोक ने सिंहासन प्राप्त किया है, परन्तु 99 भाइयों के वध की कथा पूर्णतया मनगढंत प्रतीत होती है।

सम्भवतः बौद्धों ने यह प्रदर्शित करने के लिए कि अशोक जैसा निर्दयी व्यक्ति भी बौद्ध धर्म अपनाने के बाद दयावान और चरित्रवान बन गया था, इस कथा को गढ़ दिया है।

लेकिन यह सत्य है कि बिन्दुसार के निधन के बाद तथा अशोक के सिंहासनासीन होने के बीच के चार वर्ष अन्धकारमय हैं। इन चार वर्षों काकोई तथ्य नहीं है, अतः दंत कथाओं पर विचार करना भी व्यर्थ है।

अशोक के शासन पर उसी समय से विचार करने की आवश्यकता है जब वह सिंहासनासीन हुआ। राजसिंहासन पर बैठने के उपरांत अशोक ने ‘देवानाम प्रिय’ की उपाधि ली। वह ‘प्रियदर्शी’ भी कहा जाता है। कहीं-कहीं उसे ‘धर्मलोक’
भी कहा गया है।

अशोक की विजय
अपने शासनकाल के प्रथम तेरह वर्षों में अशोक ने उस नीति का अनुसरण किया, जिसका चन्द्रगुप्त मौर्य ने सेल्युकस से युद्ध करने के उपरांत किया था। विदेशों के साथ मैत्री सम्बन्ध स्थापित करना, कुशल शासन चलाना, साधारण ढंग से राज्य विस्तार करना। जब वह राजकुमार था, तभी उसने अपने बड़े भाई सुसीम की अपेक्षा, बड़े सामान्य ढंग से तक्षशिला के विद्रोह का दमन कर दिया था-यही नीति उसने अपने राज्य का शासन सम्भालने में अपनाई।

कश्मीर विजय-कल्हण की राजतरंगिणी से ज्ञात होता है कि अशोक ने सर्वप्रथमकश्मीर पर आक्रमण किया था। कश्मीर के इतिहास में अशोक मौर्य वंश का प्रथम सम्राट माना गया है। इससे यह अनुमान लगाया जाता है कि चन्द्रगुप्त मौर्य और बिन्दुसार के समय में कश्मीर मौर्य साम्राज्य से बाहर था।

कलिंग विजय-अपने शासनकाल के तेरहवें और राज्याभिषेक के नवें वर्ष अशोकने कलिंग राज्य पर आक्रमण कर दिया। कलिंग उस समय एक प्रबल राज्य था। उसके पास एक विशाल सेना थी। इस विशाल राज्य की शक्ति अशोक के लिए असह्य थी; अतएव अशोक ने कलिंग की स्वतंत्रता को समाप्त कर देने का निश्चय किया। अशोक के तेरहवें शिलालेख से ज्ञात होता है कि अशोक ने कलिंग से युद्ध कर अपने साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया। उस युद्ध में हताहतों की संख्या 10000000 से अधिक थी; जिसमें साधारण जनता तथा सैनिक योद्धा दोनों सम्मिलित थे। लगभग डेढ़ लाख व्यक्ति इस युद्ध में कैद किये गये। कलिंग, मगध राज्य का एक अंग बन गया। एक राजकुमार वहां का गवर्नर नियुक्त कर दिया गया।

अशोक के साम्राज्य की सीमा बंगाल की खाड़ी तक विस्तृत हो गयी थी। नेपाल और कश्मीर भी मगध-साम्राज्य के अन्तर्गत थे। दक्षिणी में अशोक के साम्राज्य की सीमा पन्नार नदी तक विस्तृत थी। उत्तर-पश्चिम में उसके राज्य की सीमा ऐण्डियोकस द्वितीय के राज्य की सीमा से मिलती थी, जिसमें अफगानिस्तान और बिलोचिस्तान के प्रान्त सम्मिलित थे। पश्चिम में अशोक
के साम्राज्य की सीमा पश्चिम समुन्द्र तट तक व्याप्त थी।

राजा अशोक महान् की जीवनी

कलिंग युद्ध के बाद अशोक-कलिंग युद्ध का अशोक पर क्या प्रभाव पड़ा,इसे उसने अपने चतुर्दश (चौदहवें) शिलालेख में खुद ही लिखवाया है “राज्याभिषेक के आठ वर्ष बाद नवें वर्ष देवताओं के प्रिय प्रियदर्शी राजा ने कलिंग देश को विजय किया। वहां डेढ लाख मनुष्य कैद किये गये, एक लाख मनुष्य मारे गये, उससे कई गुना आदमी महामारी आदि से मरे। इसके बाद कलिगं देश की विजय होने पर देवताओं के प्रिय का धर्मपालन, धर्म-कर्म और धर्मानुशासन अच्छी तरह से हुआ।

कलिंग को जीतने पर देवताओं के प्रिय को बड़ा पश्चाताप हुआ क्योंकि जिस देश की पहले विजय नहीं हुई है, उसकी विजय होने पर लोगों की हत्याव मृत्यु अवश्य होती है और न जाने कितने आदमी कैद किये जाते हैं। देवताओं के प्रिय को इससे बहुत दुःख और खेद हुआ।

देवताओं के प्रिय को इससे और भी दुःख हुआ कि वहां ब्राह्मण, श्रमण तथा अन्य सम्प्रदायों के मनुष्य और गृहस्थ रहते हैं, जिनमें ब्रह्मणों की सेवा, माता-पिता की सेवा, गुरुओं की सेवा, मित्र, परिचित, सहायक, जाति, दास और सेवकोंके प्रति अच्छा व्यवहार नहीं हुआ है। ऐसे लोगों का युद्ध में वध, विनाश या प्रियजनों से बलात् वियोग होता है…कलिंग देश में उस समय जितने आदमी मारे गये, मरे या कैद हुए, उनके सौवें या हजारवें हिस्से का नाश भी अब देवताओं के प्रिय को बड़े दुःख का कारण होगा।

कलिंग विजय के बाद अशोक ने शस्त्रों द्वारा विजय करना छोड़कर धर्म विजय के लिए उद्योग प्रारम्भ किया।” ।
कलिंग विजय के बाद मगध-साम्राज्य अपने विकास की परम सीमा पर पहुंच गया था और सुदूर दक्षिण के कुछ तमिल प्रदेशों को छोड़कर सम्पूर्ण भारत एक सम्राट की अधीनता में आ गया था।

खून की नदी बहाकर जिस कलिंग पर अशोक ने विजय प्राप्त की थी, उसके सुशासन के लिए अशोक ने कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी। उस प्रदेश को एक नवीन प्रान्त के रूप में परिणित किया गया। इसकी राजधानी तोसली नगरी थी
और इसके शासन के लिए राजघराने के एक ‘कुमार’ को प्रान्तीय शासक के रूप में नियुक्त किया गया।

कलिंग में किस शासन-नीति का अनुसारण किया जा रहा है, इसे स्पष्ट करने के लिए अशोक ने वहां दो विशेष शिलालेख उत्कीर्ण कराये थे। इनमें वे आदेश उल्लिखित कराये गये थे, जिनके अनुसार शासन करने से कलिंग के गहरे घाव भली-भांति भर सकते थे।

 कलिंग युद्ध के बाद, शस्त्र युद्ध से अशोक का मन कितना अधिक ऊब गया था इसका उदाहरण इस बात से सामने आ जाता है-कलिंग के समीप बहुत-सी आटविक जातियां (जंगली जातियाँ) निवास करती थीं; जिन्हें काबू में ला पाना सुगम बात न थी। जब उसके राजकर्मचारियों ने अशोक से पूछा, कि क्या इनका दमन करने के लिए युद्ध किया जाए? तब अशोक ने आदेश दिया कि वनवासिनी जातियों को भी धर्म द्वारा ही वश में लाया जाए।
उसने अपने एक शिलालेख में कहा है-
“कदाचित् आप यह जानना चाहेंगे, कि सीमान्त जातियां नहीं जीती गयीं हैं, उनके सम्बन्ध में हम लोगों के प्रति राजा की क्या आज्ञा है, तो मेरा उत्तर यह है कि राजा चाहते हैं कि सीमान्त जातियां मुझसे न डरें, मुझ पर विश्वास करें और मुझसे ही सुख प्राप्त करें, कभी दुःख न पाएं। वो यह भी विश्वास रखें कि जहां तक क्षमा का व्यवहार हो सकता है वहां तक राजा हम लोगों केसाथ क्षमा का बर्ताव करेगा।

अब इस शिक्षा पर चलते हुए आपको ऐसा काम करना चाहिए कि सीमान्त जतियां मुझ पर भरोसा करें और समझें कि राजा हमारे लिए वैसे ही हैं जैसे कि
पिता।”
अशोक की धर्म के प्रति आस्था
कलिंग विजय से पूर्व, महावंश के अनुसार अशोक प्रतिदिन 600000 ब्राह्मणों को भोजन दिया करता था और अनेक देवी-देवताओं की पूजा किया करता था। कल्हड़ की राजतरंगिणी के अनुसार अशोक के इष्ट देव शिव थे। पशु बलि में उसे कोई हिचक नहीं थी।

मौर्य राज्यसभा में सभी धर्मों के विद्वान भाग लेते थे; जैसे-ब्राह्मण, निग्रंथ, आजीवक, बौद्ध तथा यूनानी दार्शनिक । दीपवंश के अनुसार अशोक अपनी धार्मिक जिज्ञासा शान्त करने के लिए विभिन्न सिद्धांतों के व्याख्याताओं की राज्य सभा के बुलाता था। उन्हें उपहार देकर सम्मानित करता था और साथ ही स्वयं विचारार्थ अनेक प्रश्न प्रस्तावित करता था। वह जानना चाहता था कि धर्म के किन ग्रंथों में सत्य है। उसे अपने सवालों से जो उत्तर मिलते थे उससे वह सन्तुष्ट नहीं हो पाता था।

 कलिंग विजय के बाद, युद्ध भूमि में हताहतों का दारुण दृश्य और जख्मियों की करुण पुकार विधवा स्त्रियों और बेसहारा हुए बच्चों का हृदयबेधी रुदन सुन, अशोक का हृदय हिंसा के प्रति घृणा से भर गया था। उसने अहिंसक रास्ता चुन लिया था। यह अहिंसक मार्ग महात्मा बुद्ध का था। वह बौद्ध धर्म
की शरण में चला गया था।

संसार के इतिहास में अशोक इसलिए भी विख्यात है कि उसने निरन्तर मानव की नैतिक उन्नति के लिए प्रयास किया। जिन सिद्धांताओं से यह नैतिक उत्थान सम्भव था, अशोक के लेखों में उन्हें ‘धम्म’ कहा गया है। दूसरे तथा सातवें स्तम्भ लेखों में अशोक ने धम्म की व्यख्या इस प्रकार की है

“धम्म है साधुता, बहुत से कल्याणकारी अच्छे कार्य करना, पापरहित होना, मृदुता, दूसरे के प्रति व्यावहार में मधुरता, दया-दान तथा शुचिता।” आगे कहा कि- “प्राणियों का वध न करना, जीव हिंसा न करना, माता-पिता तथा बड़ों की आज्ञा मानना, गुरुजनों के प्रति आदर, मित्र, परिचितों, सम्बन्धियों ब्राह्मणों तथा श्रवणों के प्रति उचित व्यवहार।”

कलिंग युद्ध के बाद अशोक बौद्ध धर्म का अनुयायी बन गया था। सभी बौद्ध ग्रंथ अशोक को बौद्ध धर्म का अनुयायी बताते हैं, अशोक के बौद्ध होनेके सबल प्रमाण उसके अभिलेख हैं। एक लघु शिलालेख में अशोक ने अपने को ‘बुद्ध शाक्य’ कहा है। साथ ही यह भी कहा है कि वह ढाई वर्ष तक एक साधारण उपासक रहा।

लघु  शिलालेख में अशोक त्रिरत्न

बुद्ध, धम्म और संघ में विश्वास करने के लिए और भिक्षु तथा भिक्षुणियोंसे कुछ बौद्ध ग्रंथों का अध्ययन तथा श्रवण करने के लिए कहता है।

लघु शिलालेख से यह भी पता चला चलता है कि राज्याभिषेक के दसवें वर्ष में अशोक ने बौद्ध गया की यात्रा की। ___ बारहवें वर्ष वह निगलिसागर गया और कोनगमन बुद्ध के स्तूप के आकार
को दुगुना किया।
महावंश तथा दीपवंश के अनुसार उसने तृतीय बौद्ध संगीति (सभा) बुलाई और मोग्गलिपुत तिस्स की सहायता से संघ में अनुशासन और एकता लाने काप्रयास कियागयुत तिस्स की के अनुसार उस

अशोक कर विदेशों के साथ सम्बधं

अशोक के अपने शिलालेखों में अनेक समकालीन विदेशी राज्यों और राजाओं का उल्लेख किया है। इनके विवरण निम्नवत् हैं अन्तियोक-यह पश्चिम एशिया का सीरियन सम्राट एण्डियोकस द्वितीय थिओसथा, जिसका शासनकाल 261 ई०पू० से 264 ई०पू० तक था। यह सेल्यूकस का पौत्र था और उसी साम्राज्य का अधिपति था, जिसे सेल्युकस ने कायम किया था।

अन्तियोक साम्राज्य की पूर्वी सीमा मगध-साम्राज्य की उत्तरपश्चिमी सीमा को छूती थी। तुरूमय-यह ईजिप्त (मिस्त्र) का अधिपति टाल्मी द्वितीय फिलिडेल्फस (285247 ई०पू०) था। अन्तिकिनि यह मैसीडोनिया का राजा एण्टिगोना (276-239 ई०पू०) था। मक-यह साइरिनि का अधिपति मेगस था, जिसका राज्यकाल (300 से 250ई०पू०) तक था। अलिक सुन्दर-यह करधि का राजा अलेक्जेण्डर (252-244 ई०पू०) था। उन सब विदेशी राजाओं के साथ अशोक और मौर्य के बीच अच्छे सम्बन्ध थे। उनके राज्यों में उसने धर्म विजय (बौद्ध धर्म प्रचार) का प्रयास भी किया था।

सीरिया के राजा के राजदूत चन्द्रगुप्त मौर्य और बिन्दुसार के वक्त में पाटलिपुत्र की राजसभा में रह चुके थे। माना जाता है कि अशोक के समय में भी एक राजा का दूत भारत की राजधानी में रहा है।

इजिप्ट के राजा टाल्मी फिलडेल्फस ने भी एक दूत मण्डल पाटलिपुत्र भेजा था, जिसका नेता डायोनीसियस था। मगध सम्राट के राजदूत भी इन विदेशों में रहते थे।

अशोक ने सुदूर दक्षिण के चोल, पाण्ड्य, केरल, सातिमपुत्र और ताम्रवर्णीय के राज्यों में तथा साम्राज्य की उत्तर-पश्चिम सीमा पर स्थित अन्तियोक आदि द्वारा शासित यवन राज्यों में शस्त्र विजय के स्थान पर धर्म विजय का उपक्रम किया।

उस समय मगध साम्राज्य की जो सैनिक शक्ति थी, उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि अशोक यदि चाहता तो उस सैनिक टुकड़ी के बल पर पड़ोसी राज्यों को जीतकर अपने अधीन कर सकता था; पर कलिंग विजय के बाद जिस भावना का उसने उदय किया था, उसने उसके हृदय को बदल डाला था। उसने अपने महायोद्धाओं को यह आज्ञा दी-“शायद आप लोग यह जानना चाहेंगे कि जो अंत (सीमावर्ती राज्य) अभी तक जीते नहीं गये हैं, उनके सम्बन्ध में राजा की क्या आज्ञा है।।

अन्तों के बारे में मेरी यही इच्छा है कि वे युद्ध से डरें नहीं, और मुझ पर विश्वास करें। वे मुझसे सुख ही पायेंगे, दुःख नहीं। वे यह विश्वास रखें किजहां तक क्षमा का बर्ताव हो सकेगा, राजा हमसे क्षमा का बर्ताव ही करता रहेगा।”
-दूसरा कलिंग लेख

अशोक के शिलालेख और स्तूप

अशोक के समय में मौर्य साम्राज्य का विस्तार पूर्व में बंगाल तक था। इसकी पुष्टि उसके महास्थान शिलालेख से होती है। यह अभिलेख ब्रह्मी लिपि में है। महावंश के अनुसार अशोक ने अपने पुत्र महेन्द्र को बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार हेतु भारत से बाहर भेजा था। वह उसे विदा करने ताम्रलिप्ति तक आया था।

चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी ताम्रलिप्ति, कर्ण सुवर्ग, समतट, पूर्वी बंगाल का भी विवरण दिया है। उसे पुण्ड्रपर्धन में अशोक के स्तूप देखने को मिले थे। दिव्यावदान में कहा गया है कि अशोक के समय तक बंगाल मगध साम्राज्य का ही एक अंग था। कदाचित आसाम उस समय मौर्य साम्राज्य से बाहर था।

कहा जाता है कि अशोक ने एक हजार स्तूपों का निर्माण कराया था, जिसमें से मिलसा के एक स्तूप को छोड़कर शेष सभी नष्ट हो गये हैं।

उसका राजप्रसाद चौथी शताब्दी तक था, जिसे फाह्यान ने देखकर उसका वर्णन किया है। उसके वर्णन के अनुसार अशोक का राजप्रसाद इतना भव्य था कि इसे देखकर वह समझा था कि उसको अशोक के लिए देवों न तैयार किया होगा।

 उसने लिखा है-उसके प्रस्तर स्तम्भों पर इतनी सुन्दर पॉलिश है कि शताब्दियां बीत जाने पर भी खराब नहीं हुई हैं। ललित कला और स्थापत्य कला के पारखी उसकी बहुत प्रंशसा करते हैं।

दूर-दूर तक फैले ये प्रस्तर स्तम्भ एक ही चट्टान से काटकर बनाये गये थे। ये भारतीय शिला के अनुपम उदाहरण हैं। उनको देखने से मालूम होता कि उस समय पत्थर पर पॉलिश करने की कला अत्यन्त उन्नत थी और आधुनिक युग में यह कला विलुप्त हो गयी है।
सातवीं शताब्दी में जब ह्वेनसांग भारत आया तो अशोक का राजपाट पूरी तरह से नष्ट हो चुका था।
अशोक के लेख शिलाओं, प्रस्तर स्तम्भों और गुफाओं में पाए जाते हैं। उसके लेखों को तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है
1. शिलालेख,
2. स्तम्भ लेख, 3. गुफा लेख!

अशोक के अभिलेख को निम्नलिखित वर्गों में विभाजित किया जा सकता

दो लघु शिलालेख-इसमें दूसरा शिलालेख सिद्धपुर, जटिंग रामेश्वर, ब्रह्म गिरि में पाया गया है। ये तीनों स्थान मैसूर के चीतलदुर्ग जिले में हैं। पहला शिलालेख उन्नत तीनों स्थानों पर तो मिला ही है साथ में यह रूपनाथ (जबलपुर जिला), सहसराम (आरा जिला), वैराट (जबलपुर के समीप),
मास्की, गवीसठ, पल्ली गुण्डू और इरागुड़ी में भी पाया गया है।

भब शिलालेख

चतुर्दश शिलालेख-इनकी संख्या 14 है। ये शिलालेख निम्नलिखित स्थानोंपर मिले हैं-शाहबाज गढ़ी (पेशावर जिला), मंसेहारा (हजारा जिला), गिरनार (चूनागढ़ के पास), सोपारा (थाना जिला), कालसी (देहरादून), धौली (पुरी जिला), जोगढ़ (गंजाम जिला), इरागुड़ी (निजाम की रियासत)।

धौली और जौगढ़-ये दो पृथक अभिलेख हैं। बराबर दरी ग्रह के तीन अभिलेख।सात स्तम्भ अभिलेख-जो निम्नलिखित स्थानों पर मिले हैं-तोपरा दिल्ली, मेरठ, दिल्ली, कौशाम्बी, इलाहाबाद, रामपुखा, लौरियान, अटराज, लौरिया,
नन्दन गढ़। इनमें से अंतिम तीन स्थान बिहार के चम्पारन जिले में हैं। रूम्मन देई और निग्लिव के दो तराई अभिलेख।। सांची, कोशाम्बी-इलाहाबाद और सारनाथ के लघु स्तंभ लेख।

शाहबाज और मन्सेहरा के लेख खरोष्ठी लिपि में खुदे हैं जो अरबी की भांति दाहिनी से बाईं ओर लिखी जाती है। शेष सारे लेख ब्रह्मी लिपि में हैं, जो वर्तमान नागरी लिपि का मूल है और जो बाईं ओर से दाहिनी ओर को लिखी जाती है।

सम्राट अशोक की महानता के कारण
अशोक को महान् सम्राट के रूप में इतिहास में चित्रित किया गया है। उसकी महानता में किसी प्रकार का मतभेद नहीं है।
अशोक की महानता के कारणों में मुख्य कारण तो यह है कि उसने कलिंग पर बड़ी जीत हासिल की तथा आयुपर्यन्त वह किसी से भी न हारा। उसके राज्य का विस्तार हुआ, कोई भी राजा उसके विशाल साम्राज्य की सीमा का उल्लंघन करने का साहस न कर सका।

कलिंग युद्ध के बाद वह बौद्ध धर्म का अनुयायी हो गया था-उसने शस्त्र के बजाय शास्त्र उठा लिया था-उसने युद्ध न करने का प्रण तक ले लिया था-बावजूद इसके उसका साम्राज्य निष्कंटक चलता रहा। उसके युद्ध न करने का प्रण लेने के बाद भी किसी अन्य राजा ने उस पर आक्रमण न किया। विद्रोह न हुए-जिनको दबाने के लिए अशोक को पुनः शस्त्र उठाने पड़ते। यह उसकी महानता का एक अन्य कारण और उदाहरण है।

शस्त्र उठाने की शक्ति और युद्ध कौशल से तो अनेकों राजा अविजय रहे, उनके शासनकाल में न विद्रोह हुआ ना ही कही आक्रमण हुआ; परन्तु शस्त्रविहीन कोई राजा सिंहासन पर बैठा हो और उसके साम्राज्य पर कोई आक्रमण करने की चेष्टा न करे, कोई आन्तरिक विद्रोह न हो, ऐसा सिर्फ अशोक के साम्राज्यऔर शासनकाल में देखने को मिलता है। यह अतुलनीय उदाहरण है। अवश्य ही इसके पीछे सिर्फ एक ही कारण नजर आता है कि अशोक की शासन व्यवस्था सुव्यवस्थित थी।

आन्तरिक विद्रोह या अशान्ति का न होने का कारण शासन के सुव्यवस्थित होने को दिया जा सकता है-पर बाह्य आक्रमण न होना हैरानी भरी बात है। अशोक का शासन जिस काल में चल रहा था, उस समय पौरुष बल ही एकमात्र शासन करने का आधार था। किसी भी देश या राज्य को तनिक भी शिथिल या अपने से कमजोर पाकर, पड़ोस के राज्य उस पर आक्रमण करने, उस परअधिकार करने का अवसर न चूकते थे।

ऐसे काल में, शस्त्र न उठाने का प्रण करने के बाद भी अशोक के साम्राज्य पर कोई आक्रमण न हुआ, यह हैरानी की बात हैं। और इस हैरानी भरी बात का समाधान इस रूप में सामने आता है कि अशोक की सेना काफी विशाल
और शक्तिशाली थी।

 अशोक के साम्राज्य पर आक्रमण की बात सोचने वाले इस बात को जानते थे कि बेशक अशोक युद्ध भूमि में खुद न उतरे, पर अपनी विशाल सेना को युद्ध भूमि में उतारना वह अपना राज-कर्त्तव्य समझेगा और उनकी विशाल सेना के सामने आक्रमण की बात सोचने वाले की सैनिक क्षमता काफी कम रही होगी। उपरोत्त तथ्यों के अलावा निम्नलिखित बिन्दु अशोक की महानता को दर्शित करते हैं

महान व्यक्तित्व-अशोक की महानता का महत्त्वपूर्ण पहलू यह भी है कि उसकाव्यक्तित्व अत्यंत महान् था। कलिंग युद्ध के बाद उसने सभी राजसी सुखों तथा विलासों को त्यागकर, एक संत का सादा जीवन अपना लिया था। उसका यह जीवन पवित्र, त्यागमय और करुणामय बन गया था। आत्म-नियंत्रण और आत्म-संयम में वह पूर्ण रूप से सफल रहा था। वह अहिंसा का पुजारी बन गया था, उसने मांस भक्षण भी त्याग दिया था। उसमें उच्चकोटि की कर्त्तव्य परायणता आ गयी थी और वह अपनी प्रजा के हित चिंतन में संलग्न रहने लगा था। अशोक के अभिलेखों तथा उपदेशों से, जो शिलाओं तथा स्तम्भों पर अंकित हैं, यह पता चलता है कि वह अपने युग का भद्रतम तथा श्रेष्ठतम् व्यक्ति
था।

महान धर्मतत्त्व-वेत्ता-अशोक ने बौद्ध धर्म अपनाने के बाद धर्म के तत्त्व कोअच्छी तरह समझा था। वह खुद बौद्ध धर्मावलम्बी बन गया था-पर उसने अन्य मतों को भी पूरी तरह छूट दे रखी थी। धर्म को निज आस्था के रूप में उसने स्वीकार लिया था। उसका धार्मिक दृष्टिकोण अत्यंत व्यापक था।उसने राजसत्ता में, लोगों को बौद्ध धर्म में दीक्षित होने के लिए न कहा-अलबत्ता बौद्ध धर्म प्रचार में जरूर लगा रहा था। वह बौद्ध धर्म का प्रसार तो चहता था मगर इस मूल्य पर नहीं कि कोई दबाव में अपनी धार्मिकआस्था त्याग कर बौद्ध धर्म को अपनाए।

सभी धर्म तथा सभी सम्प्रदाय अशोक की दया तथा कृपा के पात्र थे। उसका धर्म उसका व्यक्तिगत धर्म था-उसे उसने राजधर्म नहीं बनाया था। उसकी विचारधारा लोक कल्याणकारी और प्राणि मात्र का उदाहरण रूप मेंबन गयी थी।

महान धर्म प्रचारक-जैसा कि पूर्व में लिखा जा चुका है; अशोक ने बौद्धधर्म अपना लिया था तथा उसके प्रचार-प्रसार में अपना जीवन लगाने का संकल्प ले लिया था। उसने एक ऐसे धर्म को अपनाया था, जिसका उस समय अस्तित्व प्रान्तीय स्तर पर था; उस प्रान्तीय धर्म को अपने प्रचार-प्रसार माध्यमों से अशोक ने न केवल राष्ट्रीय वरन् अन्तर्राष्ट्रीय धर्म के रूप में
स्थान प्रदान कर दिया था।

इतिहासकार डॉ० भण्डारकर ने लिखा है-अशोक के आदर्श बड़े ऊंचे थेऔर अपनी बुद्धिमत्ता तथा धर्म शक्ति को उसने बौद्ध धर्म को, जो एक संकीर्ण प्रान्तीय सम्प्रदाय था, विश्वव्यापी धर्म बना देने में लगा दिया।” इस सम्बन्ध में महत्त्वपूर्ण बात यह है कि धर्म प्रचार का यह कार्य उसने बाहु-बल से नहीं वरन् आत्म-बल से, शान्तिपूर्वक, प्रेम तथा सद्भावना से किया था।
इतिहासकार के०जे० सौण्डर्स ने अशोक के धर्मप्रचार की महानता पर प्रकाश डालते हुए लिखा है- “विश्व के इतिहास में सम्राट अशोक के धर्म-प्रचारकों द्वारा सभ्यता के प्रचार का बड़ा ही महत्त्वपूर्ण कार्य किया गया, क्योंकि इन लोगों ने ऐसे देशों में प्रवेश किया जो अधिकांशतः बर्बर तथा अन्धविश्वासपूर्ण थे।”

अशोक ने कलिंग युद्ध के बाद भेरि घोष को सदैव के लिए शान्त कर धर्म घोष का मार्ग अपना लिया था। रणक्षेत्र में विजय प्राप्त करने के स्थान पर उसने धर्म क्षेत्र में अपनी विजय पताका फहराने का निश्चय कर लिया था। यह विजय, सरल विजय न थी, क्योंकि उसने यह विजय व्यक्ति या व्यक्तियों के शरीर पर नहीं, बल्कि व्यक्ति या व्यक्तियों की आत्मा पर प्राप्त कर ली थी। यह व्यक्ति या थोड़े व्यक्तियों पर नहीं वरन् प्राणि मात्र पर प्राप्त की थी। यह शान्ति की विजय थी।
अशोक ने धर्माचार्यों तथा धर्म प्रचारकों की एक विशाल सेना संगठित की और उन्हें प्रेमायुद्ध से सुसज्जित किया। सत्य, सत्कर्म, सद्भावना तथा सद्व्यवहार से युक्त यह चतुरंगिणी सेना धर्म विजय के लिए निकल पड़ी थी।

इस सेना के प्रभायुद्ध के सामने न केवल सम्पूर्ण भारत नतमस्तक हो गया, वरन् अशोक की विजय पताका विदेशों में फहरायी। यह विजय अध्यात्मिक तथा सास्कृतिक विजय थी, जो बड़ी स्थायी सिद्ध हुई। अशोक ने जिन देशों पर धर्म विजय प्राप्त की, उन्हें भारत के साथ प्रेम के ऐसे प्रबल बन्धन में बांध दिया, जो सदियों तक अविच्छिन्न रूप से चलता रहा।

यह अशोक की अद्वितीय विजय थी, जिसकी बराबरी संसार का अन्य कोई विजयी सम्राट नहीं कर सका।

महान शासक-अशोक न सिर्फ महान् विजेता ही था, बल्कि महान् शासकभी था।

डॉ० हेमचन्द्र राय चौधरी ने लिखा है-“अपने उत्साह में वह सुदृढ़ औरअपने प्रयासों में वह अथक था। उसने अपनी सारी शक्ति प्रजा की आध्यात्मिक तथा भौतिक उन्नति में लगा दी, जिसे वह अपनी संतान सदृश्य समझताथा।” उसने धर्म यात्राएं आरम्भ करायीं, जिसमें धर्म उपदेश दिये जाते थे, तीर्थ स्थानों के दर्शन किये जाते थे। उसका शासन इतना सुगठित तथा सुव्यवस्थित एवं लोकमंगलकारी था कि उसके शासनकाल में कोई आन्तरिक उपद्रव न हुआ-प्रजा ने अधिक शान्ति तथा सुख का उपभोग किया।

कोरा सिद्धान्तवादी ही न था वरन् अपने आदर्शों को वह सदैव कार्यान्वित करने का प्रमत्न करता था।
धर्म महामात्रों को नियुक्त किया था और सरकारी कर्मचारियों को यह आदेश दिया था कि प्रजा के आचरण का निरीक्षण करें और उसे सदाचारी तथा धर्मपरायणबनाने का प्रयत्न करे।

शासक के रूप में अशोक की महानता इस रूप में पायी जाती है कि देश के राजनीतिक जीवन में उसने आदर्शवादिता, पवित्रता तथा कर्तव्य परायणता का समावेश किया। एक भिक्षु-सा सादा जीवन व्यतीत कर और राज्य सुलभ सभी सुखों का त्याग कर और प्रजा के इहलोक तथा पारलौकिक हित-चिन्तन में संलग्न रहकर अशोक ने विश्व के सम्राटों के समक्ष ऐसा उदाहरण उपस्थित किया जो सर्वअनुकरणीय है।

एच०जी० वेल्स के अनुसार– “प्रत्येक युग और प्रत्येक राज इस प्रकार केसम्राट को नहीं उत्पन्न कर सकता। अशोक अब भी विश्व के इतिहास मेंआद्वितीय है। महान राष्ट्र निर्माता-अशोक के महान् राष्ट्र निर्माता होने का प्रमाण इस रूप
में मिलता है कि उसने सम्पूर्ण राष्ट्र में एक राष्ट्र भाषा का प्रयोग किया था। इस तथ्य की पुष्टि उसके अभिलेखों में प्रयुक्त पाली भाषा से होती है। उसने अपने साम्राज्य के अधिकांश भाग में ब्रह्मी लिपि का प्रयोग कराया था-केवल पश्चिमोत्तर प्रदेश में खरोष्ठी लिपि का प्रयोग किया जाता था। इस प्रकार भाषा तथा लिपि की एकता ने राजनीतिक एकता को सजीव बना दियाथा।

अशोक ने शिल्प तथा स्थापत्य कला के विकास में बड़ा योगदान किया। उसके काल के बने स्तम्भ आज भी भारतीय कला में उच्च स्थान रखते हैं।

महान् आदर्शवादी-अशोक में महानता का एक यह गुण भी था कि वह महान्आदर्शवादी था। राजनीतिक क्षेत्र में उसके आदर्श थे-युद्ध विराम तथा शान्ति एवं सद्भावना की स्थापना, पड़ोसियों के साथ मैत्री तथा सहयोग स्थापित करना। विदेशों में युद्ध के संदेश के बजाय शांति तथा सद्भावना के संदेश भेजना। प्रजा के हित-चिन्तन में दिन-रात लगे रहना और अपने सम्पूर्ण आमोद-प्रमोद तथा सुखों को प्रजा के हित के लिए त्याग देना। अपनी प्रजा का सच्चा सेवक बनना आदि। सामाजिक क्षेत्र में अशोक लोकतंत्रवादी था।

‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ अर्थात् सम्पूर्ण पृथ्वी ही परिवार था-इस सिद्धान्त को उसने अपनाया और अन्य लोगों को इस पर चलने का मार्ग दिखाया। समानता, स्वतंत्रता तथा बन्धुत्व उसके सामाजिक जीवन की आधार शिलाएं थीं। लोक कल्याण के प्रधान लक्ष्य में और इन्हीं की पूर्ति का उसने जीवनभर प्रयास किया। \

एच०जी० वेलन के अनुसार– “सहस्र सम्राटों के नामों के मध्य जो इतिहासके पन्ने मिले हैं, उसमें अशोक का नाम एक सितारे के भाति प्रकाशमान हैं|

डॉ० हेमचन्द राय चौधरी के मतानुसार-“अशोक में चन्द्रगुप्त की सी शक्ति, समुद्रगुप्त की सी विलक्षण प्रतिभा और अकबर की सी व्यापक उदारता थी।

अशोक का निधन

अशोक के बारे में विवरण मिलता है कि 40 वर्ष तक राज्य करने के बाद लगभग 232 ई०पू० में अशोक की मृत्यु हुई। इस बात का विवरण नहीं मिलता कि अशोक के कर्भठ जीवन का अंत कैसे हुआ। तिब्बती परम्परा के अनुसार उसका देहावसान तक्षशिला में हुआ। उसके एक शिलालेख के अनुसार अशोक का अंतिम कार्य भिक्षु संघ में फूट डालने की निन्दा करना था। सम्भवतः यह घटना बौद्धों की तीसरी संगीति के बाद की है। सिंहली इतिहास ग्रंथों के अनुसार तीसरी संगीति अशोक के राज्यकाल में पाटलीपुत्र में हुई थी।

अशोक के उत्तराधिकारी
अशोक के निधन के बाद 50 वर्ष तक उसके अनेक उत्तराधिकारियों ने शासन किया। परन्तु इन मौर्य शासकों के सम्बन्ध में विवरण अपर्याप्त और अनिश्चित है। पुराणों, बौद्ध जैन अनुश्रुतियों में इन उत्तराधिकारियों के नामों की जो सूचियां दी गयी हैं वे एक-दूसरे से मेल नहीं खाती।

वायु पुराण के अनुसार अशोक के बाद उसके पुत्र कुणाल ने राज्य किया। इसी का उपनाम सुयश था। तिष्यरक्षिता के कण्टलेख के अनुसार कुणाल अशोककी दन्तमुद्रा से अंकित राजाज्ञा से वह अंधा कर दिया गया था इसलिए युवराज के पद पर कुणाल का पुत्र सम्प्रति (संपदि) नियुक्त था और वही शासन कार्य सम्भालता था। यही कारण है कि कुछ ग्रंथों में अशोक के बाद सम्प्रति को ही मौर्य सम्राट लिखा गया है। विष्णु पुराण तथा गार्गी संहिता में सम्प्रति तथा दशरथ (अशोक का दूसरा पुत्र) के बाद मौर्य शासक शलिशुक था। अंतिम सम्राट का नाम वृहद्रथ हर्षचरित में लिखा गया है; जिसकी हत्या वृहद्रथ के सेनापति पुष्यमित्र ने कर स्वयं सत्ता सम्भाल ली और नए राजवंश का उदय हुआ।

मौर्य साम्राज्य में पतन के कारण
सम्राट अशोक ने विशाल एवं आदर्शमय साम्राज्य को अपने जीवित रहते सम्भाले रखा था-पर उसके निधन के बाद, उत्तराधिकार का मामला षड़यंत्र में उलझा, जिसकी वजह से जो वास्तविक उत्तराधिकारी था, उसे उत्तराधिकार से एक किनारे कर दिया। बाद के उत्तराधिकारियों में भी आपसी एकता न बन सकी; परिणामतः साम्राज्य की शक्ति क्षीण होती चली गयी।

उसके उत्तराधिकारियों में एक भी इतना योग्य न था, जो उसके विशाल केन्द्रीय-भूत शासन के सम्भाल सकता। केन्द्रीय शक्ति के निर्णय होते ही, राज्यके सुदूर भागों में सेनापतियों ने विद्रोह का झण्डा बुलन्द कर दिया और अपने को स्वतंत्र घोषित कर दिया।

अशोक के कई पुत्र थे, जिनमें उत्तराधिकार के प्रति संघर्ष काफी समय तक चलता रहा। अशोक के उत्तराधिकारी अपनी सैनिक शक्ति बढ़ाने में सफल न हो सके। उत्तराधिकार के लिए संघर्ष के अलावा भी साम्राज्य पतन के निम्नलिखित कारण थे|

ब्राह्मणों की प्रतिक्रिया-मौर्य साम्राज्य में अशोक से पूर्व और अशोक के बादके राजागण बौद्ध या जैन सम्प्रदाय को अपनाने वाले हुए। तब इन्हीं दोनों धर्मों का राज्य पराश्रय प्राप्त हुआ था; पर मौर्य साम्राज्य में कमजोरी आते देख बरसों बरस से दबा-कुचला ब्राह्मण धर्म उभर पड़ा। ब्राह्मण धर्म के मतावलंबियों ने अपनी शक्ति एकत्र कर, उन लोगों को सहयोग देना शुरू कर दिया, जो जैन और बौद्ध धर्म के अनुयायी मौर्य साम्राज्य के कमजोर
शासकों को हरा सकने में सक्षम थे।

यवनों का आक्रमण-मौर्य साम्राज्य की शक्ति क्षीण होते देख, बैक्ट्रिया केयवनों ने भी मगध राज्य के पश्चिमोत्तर प्रदेश पर आक्रमण करना आरम्भकर दिया।

अन्तःपुर तथा दरबार के षड्यंत्र-सम्राट अशोक की अनेक रानियां थीं।उनसे कई एक पुत्र थे। अशोक के निधन के बाद रानियों में इस बात की स्पर्धा उमड़ पड़ी थी कि उसका पुत्र मगध का राजा बने। इस स्पर्धा के फलस्वरूप राजदरबारियों का रुख, जिधर लाभ नजर आता था, उधर झुक जाते थे। इस स्पर्धा के चक्कर में एक दल दरबारियों का बन गया था तो दूसरा सेनापतियों का। यह षड्यन्त्र और दलबंदी साम्राज्य के लिए सबसे घातक सिद्ध हुई।

इसी के परिणामस्वरूप मौर्य साम्राज्य के अंतिम शासक बृहद्रथ की हत्या कर पुष्यमित्र शुंग ने स्वयं सत्ता सम्भाल ली थी। उसके सिंहासनासीन होने के बाद मौर्य वंश का पूरी तरह पतन हो गया तथा एक नये राजवंश का उदय हुआ जो शुंग वंश कहलाया। बृहद्रथ की हत्या का अवसर पुष्यमित्र शुंग को इसलिए मिला क्योंकि प्रधान सेनापति के रूप में पूरी सेना का नियंत्रण उसके हाथ मेंआ गया था; दरबारी कमजोर पड़ गये थे-पुष्पमित्र शुंग की शक्ति इतनी बढ़ गयी थी कि कोई भी दरबारी हत्या का विरोध तथा पुष्यमित्र शुंग के सिंहासन पर कब्जा जमाने के अधिकार को चुनौती देने के लिए सिर न उभार सका।

प्रत्येक को इस बात का भय था कि तनिक भी विरोध में आवाज उठाते ही उसका सिर धड़ से अलग कर दिया जाएगा। इस तरह से पुष्यमित्र शुंग के सत्तासीन होने के समय दरबारियों ने मौन रहकर उसके लिए नया राजवंश चलाने का समर्थन कर दिया था। इस संदर्भ में अशोक के उत्तराधिकारियों का संक्षेप में वर्णन करना आवश्यक हो जाता है, जिनके निकम्मेपन के कारण अशोक महान् का एक विस्तृत साम्राज्य धीरे-धीरे पतन की ओर जाता हुआ, अन्ततः पूरी तरह से नष्ट होकर एक नये राजवंश को सत्तासीन होने का मार्ग प्रशस्त करने में सहायकसिद्ध हुआ।

राजा सुयश या कुणाल-सम्राट अशोक का सबसे बड़ा पुत्र कुणाल या सुयशथा। वह महेन्द्र रानी असंधिमित्रा का पुत्र था। अशोक के बाद कुशाल ही उत्तराधिकारी के रूप में घोषित था-पर उसे अशोक की एक अन्य रानी तिष्यरक्षिता की ईर्ष्या का शिकार होना पड़ा।

वायु पुराण के अनुसार अशोक के जीवित रहते ही रानी तिष्यरक्षिता के कपट लेख पर आश्रित व अशोक की दंतमुद्रा से अंकित राजाज्ञा से वह अंधा होने के कारण वह राजकार्य स्वयं नहीं कर सकता था। अतः उसका पुत्र सम्प्रति (संपदि) उसकी कार्य को सम्भालने के लिए नियुक्त था। इस तरह शासन की बागडोर पूरी तरह सम्प्रति के हाथ में रही-कुणाल सिर्फ नाम का राजा था।ऊपर रानी तिष्यरक्षिता के ‘कपट लेख’ का जिक्र किया गया है। इसका स्पष्टीकरण इस रूप में है कि रानी तिष्यरक्षिता ने अशोक से धोखे से कुणाल के सम्बन्ध में एक आदेश लिखा लिया था।

 बाद में उसने उस लेख को बदला तथा उस पर अशोक की दंतमुद्रा अंकित कर उसे कुणाल के पास भिजवा दिया था। दंतमुद्रा के सम्बन्ध में माना जाता है कि कोई ऐसी विशेष चिह्नों वाली मुद्रा थी, जो अशोक के आवश्यक आदेश पर ही अंकित की जाती है। दंत मुद्रा सहित आदेश को हर सूरत में मानना आवश्यक होता था। वह अपरिवर्तनीय और अंतिम होती थी। कुणाल के पास दंत मुद्रा से अंकित, जब राजाज्ञा पहुंची, तो उसमें लिखा था-राजकुमार कुणाल
की आंखें निकाल ली जाएं।

कुणाल ने राजाज्ञा को देखते ही पितृभक्ति का परिचय देते हुए अपनी आंखें निकालकर राजाज्ञा लाने वाले को दे दी थीं। इस प्रकार उसने खुद ही खुद कोअंधा कर लिया था।
 

वायु पुराण में बस इतना ही विवरण मिलता है; पर यह विवरण विश्वसनीय नहीं। विश्वसनीय इसलिए नहीं क्योंकि आगे इस बात का जिक्र नहीं कि अशोक ने अपने पुत्र के अंधे होने का समाचार पाने के बाद उसके साथ षड्यंत्र करने वाली रानी तिष्यरक्षिता के साथ कैसा बर्ताव किया था।

संदेश वाहक को क्या दण्ड दिया था? यदि तिष्यरक्षिता ने अपने पुत्र के हित के लिए षड्यंत्र किया था तो उसने अशोक के निधन के बाद अपने पुत्र को सिंहासनासीन करने की चेष्टा क्यों नहीं की? उसके पुत्र का नाम भी स्पष्ट नहीं।

 अंधे कुणाल के राजा बनने तथा सम्प्रति के हाथों सत्ता चलाने का परिणाम यह हुआ कि साम्राज्य दो शासकों के बीच बिखरने लगा। कश्मीर पाटलिपुत्र की आधीनता से गिने-चुने दिनों में ही से मुक्त हो गया और वहां अशोक के एक अन्य पुत्र जालौक ने अपना पृथक राज्य स्थापित कर लिया।

जालौक ऐसा करने में सफल क्योंकर हुआ-इसका विवरण स्पष्ट मिलता है। विवरण के अनुसार अशोक के समय में ही (अंतिम वर्षों में) यवनों ने अशोक साम्राज्य की सीमाओं में अतिक्रमण करना आरम्भ कर दिया था।

अशोक ने विशाल सेना के साथ जालौक को यवनों व अन्य आक्रमणकारियों को भगाने तथा उनका दमन करने के उद्देश्य से भेजा था। जालौक यवनों का दमन करने में सफल हो गया था। तब अशोक ने इसे कश्मीर में ही रहकर उसे सम्भालने का आदेश दे दिया था।

अशोक के निधन के बाद जालौक काफी शक्तिशाली हो गया, उसके पास एक विशाल सेना थी; सत्ता के केन्द्र में कुणाल और सम्प्रति के रूप में दो राजा की बिसात बिछी हुई थी।

इस स्थिति में जालौक के साम्राज्य को पश्चिमोत्तर प्रदेश में खुद को अलग कर लेने में कोई असुविधा का सामना नहीं करना पड़ा।

जालौक के अलग राजा घोषित होने को ना तो कुणाल चुनौती दे सका ना ही सम्प्रति।

पश्चिमोत्तर प्रदेश की तरह आंध्र प्रदेश भी कुणाल के शासनकाल में स्वाधीन हो गया। आन्ध्र को बिन्दुसार ने अपने आधीन राज्य बनाया था। अशोक के समय आन्ध्र ने पराधीनता से निकलने की कोई भी चेष्टा न की; परन्तु कुणाल जैसे शक्तिहीन राजा के राज्य में आन्ध्र ने खुद को स्वतंत्र घोषित कर दिया। वहां कोई चुनौती देने न पहुंच सका।

राजा बंधुपालित दशरथ-बन्धुपालित दशरथ या दशरथ, कुणाल का बड़ा पुत्र था। 232 ई०पू० से 224 ई०पू० आठ वर्ष कुणाल ने शासन किया। उसके निधन के बाद उसका बड़ा पुत्र दशरथ गद्दी पर बैठा। उसके शासनासीन होने पर भी राज्य की बागडोर सम्प्रति के हाथ में रही। सम्प्रति और दशरथ भाई-भाई थे। दशरथ के समय में भी मगध का पतन जारी रहा। कलिंग, दशरथ के शासन का तीसरा राजा था। वह 173 ई०पू० में कलिंग के राजसिंहासन पर आसीन हुआ था। उससे पूर्व कलिंग के दो अन्य स्वतंत्र राजा हो चुके थे। कलिंग को फिर से स्वतंत्र कराने वाले वीर पुरुष का नाम चैत्रराज था। वह ऐलवंश का था।

राजा सम्प्रति (चन्द्रगुप्त मौर्य द्वितीय)-216 ई०पू० में दशरथ के बाद सम्प्रति राजा बना। वह जैन धर्म का अनुयायी था और उसने जैन धर्म के प्रसार के लिए बहुत अधिक उद्योग किया था। उसने आन्ध्र, द्रविड़, महाराष्ट्र, कुडुक्क आदि राज्यों में जैन साधुओं को, जैन धर्म के प्रचार-प्रसार हेतु भेजा था।
सम्प्रति अशोक का पौत्र था-जैन ग्रंथों में सम्प्रति को ग्रंथों के अनुसार चन्द्रगुप्त मौर्य द्वितीय सम्प्रति के शासन काल में राज्य को दुर्भिक्ष का सामना करना पड़ा। यह दुर्भिक्ष पड़ने का दोषी स्वयं को मानते हुए राजा सम्प्रति ने राज्य छोड़कर मुनिव्रत ले लिया था और दक्षिण में जाकर उसने उपवास द्वारा प्राण त्याग दिया।

राजा शालिशुक-207 ई०पू० में राजा सम्प्रति के राज्यत्याग के बाद उसका पुत्र शालिशुक पाटलिपुत्र का राजा बना। उसने सिर्फ एक वर्ष राज्य किया; परन्तु इस एक वर्ष में ही मौर्य साम्राज्य का सबसे अधिक ह्रास हुआ। एक तो बारह वर्ष के दुर्मिक्ष के कारण साम्राज्य की अवस्था वैसे भी जर्जरित थी-गृह कलह ने साम्राज्य को दुर्दशा में पहुंचाने के मामले में आग में घी का काम किया।

सिन्धु नदी से पार के प्रदेश-अफगानिस्तान, गंधार और हीरात में वृषसेन ने अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिया। वृषसेन भी मौर्यवंश का ही था। उसे सम्प्रति का एक अन्य पुत्र बताया गया। वह पहले उस प्रदेश का कुमार (प्रान्तीय शासक) नियुक्त था।

पाटलिपुत्र में शालिशुक राजा बना रहा; पर वह निष्प्रभावी राजा साबित होता रहा। गार्गी संहिता शालिशुक को ‘धर्म का ढोंग करने वाला’ और ‘अधार्मिक’ कहा गया है।

इसी शालिशुक के एक साल के शासन काल में यवनों ने फिर पश्चिम भारत पर आक्रमण आरम्भ कर दिये।
गार्गी संहिता के अनुसार उस समय भारत में सात राजा राज्य करने लगे थे-गांधार, कश्मीर, कलिंग और आन्ध्र मगध के साम्राज्य से पृथक हुए राज्य थे-दो राज्य उत्तरापथ में स्थापित हुए थे तथा सातवां पाटलिपुत्र में स्वयं शालिशुक राजा था।

पांचवां राजा-देववर्मा पाटलीपुत्र के सिंहासन पर बैठा। उसने 205 ई०पू०से 199 ई०पू० तक राज्य किया।

छठा राजा-देववर्मा का पुत्र शतधनुष बना। इसका शासनकाल 199 ई०पू० से 191 ई०पू० तक था।

सातवां राजा-191 ई०पू० में वृहद्रथ मगध का राजा बना। यह शतधनुष का भाई था। इसके शासन काल के मगध में राजक्रांति हुई। वृहद्रथ का प्रधान सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने वृहद्रथ की हत्या करके पाटलिपुत्र के राजसिंहासन पर स्वयं 184 ई०पू० में अधिकार कर लिया। 

मौर्य साम्राज्य के परवर्ती राजा, अशोक के समान ना तो शक्तिशाली थे, ना ही प्रभावशाली। अच्छा होता कि उन्होंने अशोक के समान धर्म विजय की नीति न अपनाकर, शस्त्र विजय की नीति अपनायी होती; तो मौर्य साम्राज्य का इतनी जल्दी पतन न होता।

उसके परवर्ती राजाओं ने बौद्ध धर्म के सिद्धान्तों को न पकड़ रखा था-वे जैन धर्म को अपनाकर उसका प्रचार-प्रसार करने लगे थे। ऐसा करने से अशोक के समय के राजदरबारियों, मंत्रियों और सैन्य अधिकारियों ने जिन्होंने बौद्ध धर्म को अपना लिया था-उनकी आस्था को धक्का लगा। वे राज्य सुविधा के लिए सम्प्रदाय से तो जुड़े थे; परन्तु मन से वे राजा का साथ न दे रहे थे, फलतः आपसी मनमुटाव का दौर चल पड़ा था। शासन की व्यवस्था सम्मालने वाले दो वर्गों में बंट गये थे-एक तो वे थे, जो राजा के धर्म, नियम और सिद्धांतों से जुड़कर उसे अधिक-से-अधिक खुश करने के प्रयत्न में लग गये थे, दूसरे वे थे जो राजा के साथ आंख मूंदकर कार्य करते थे।

इसी द्वेषभाव का परिणाम था कि सैनिक शक्ति, राजशक्ति से प्रबल हो गयी। इसी प्रबलता के कारण पुष्यमित्र शुंग जब राजा की हत्या कर खुद सिंहासनासीन हुआ तो राजसत्ता का कोई भी व्यक्ति विरोध के लिए सामने न
आ सका।

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

16 − 16 =