राजा अजातशत्रु की जीवनी और इतिहास |Biography and History of King Ajatshatru

राजा अजातशत्रु की जीवनी और इतिहास

राजा अजातशत्रु की जीवनी और इतिहास |Biography and History of King Ajatshatru

अजातशत्रु के मगध पर एक प्रतापी सम्राट बनने का समय 495 ई.पू. लगभग है। वह बिम्बसार का पुत्र था। उसके बचपन का नाम कुसान था। जिसके बारे में कहा गया है कि पिता को कैद कर अथवा हत्या कर वह मगध के राज सिंहासन पर काबिज हुआ था। उसने अंग, लिच्छवी, वज्जी, कोशल तथा वंग जनपदों को अपने राज्य में मिलाकर एक विस्तृत साम्राज्य की स्थापना की।

उस समय भारत में षोडस महाजनपद थे-उपरोक्त लिखित पांच जनपदों को अपने राज्य में मिलाने के कारण मगध सहित वह छः महाजनपदों का सम्राट हो गया था। इस प्रकार उसके अधिकार में भारत का लगभग 40: राज्य आ गया था। पालि ग्रंथों में अजातशत्रु का नाम अनेक स्थानों पर आया है, क्योंकि वह महात्मा गौतम बुद्ध का समकालीन था। गंगा और सोन नदी के संगम पर पाटलिपुत्र की स्थापना उसी ने की। उसका मंत्री वस्सकार कुशल राजनीतिज्ञ था, जिसने लिच्छवियों में फूट डालकर अजातशत्रु के साम्राज्य विस्तार करने में सहायता की थी।

कोशल की जीत

राजा अजातशत्रु की जीवनी और इतिहास

अजातशत्रु का पहला युद्ध कोशल महाजनपद के साथ हुआ। अजातशत्रु के समय कोशल का राजा प्रसेनजित था। वह अजातशत्रु का मामा था। उसके पिता बिम्बसार ने कोशल की राजकुमारी के साथ विवाह किया था। विवाह में उसे दहेज रूप में काशी प्रदेश प्राप्त हुआ।

बिम्बसार के निधन के बाद, उसके वियोग में तथा पुत्र के पितृहन्ता होने के दुःख के कारण उसका भी शीघ्र निधन हो गया था। तत्कालीन कोशल नरेश प्रसेनजित् भी इस बात से बुरी तरह क्षुब्ध था कि उसके बहनोई की हत्या उसके भांजे ने कर राजसत्ता हस्तगत की तथा उसकी बहन का निधन पति वियोग के कारण हुआ। 

इस क्षुब्धता के कारण प्रसेनजित् अब इस बात को नहीं चाहता था कि काशी जनपद का वह प्रदेश, जो उसके पिता द्वारा उसके बहनाई को दहेज के रूप में दिया गया था, अब मगध राज्य में रहने पाए। 

उसने काशी जनपद के उत्तर क्षेत्र को वापस अपने राज्य में मिलाने के लिए सैन्य शक्ति का इस्तेमाल किया-जवाब में अजातशत्रु उक्त क्षेत्र पर मगध का राज्य स्थापित रहने देने के लिए सेना सहित पहुंच गया। मगध और कोशल सेनाओं के बीच युद्ध हुआ।

इस युद्ध में भारी क्षति उठाकर प्रसेनजित् को आभास हो गया कि मगध अत्यन्त शक्तिशाली राज्य है। उसने यही उचित समझा कि अजातशत्रु के साथ संधि कर ली जाए। 

अजातशत्रु ने काशी का उत्तर क्षेत्र अपने कब्जे में रहने के साथ पराजित प्रसेनजित् के सामने यह शर्त भी रखी कि अपनी पुत्र वजिरा का विवाह उसके साथ कर दे। प्रसेनजित को उसका यह प्रस्ताव मानना पड़ा।

उसने सम्मानजनक रूप से अपनी पुत्र वजिरा का विवाह अजातशत्रु से करते हुए वही प्रदेश उसे पुनः ‘नहान-चुन्न-मूल्य’ दहेज रूप में दे दिया। इस प्रकार अपने पौरुषबल से अजातशत्रु ने, काशी का एक लाख वार्षिक आय वाला वह क्षेत्र मगध साम्राज्य में ही शामिल रखा।

वज्जि संघ पर आक्रमण

 कोशल सेना पर विजय और संधि हो जाने के बाद अजातशत्रु का उत्साह बढ़ा और उसे अपनी सैन्य शक्ति का सही रूप में ज्ञान हो गया था। उसमें राज्य विस्तार की लालसा बढ़ गयी थी।

 अजातशत्रु ने गंगा के उत्तर में विद्यमान वज्जि संघ पर आक्रमण करने का विचार किया; पर वज्जि संघ में आठ गण शामिल थे। उसकी शक्ति काफी बढ़ी हुई थी। यकायक उस पर आक्रमण कर विजय हासिल करना काफी दुष्कर कार्य था। राजा की इच्छा को जानकर, अजातशत्रु का मंत्री वस्सकार, जो कि कुशल राजनीतिज्ञ था-उसने इस बात का जिम्मा लिया कि वज्जि के आठों गणों में विद्रोह, असंतोष बढ़ाकर वह उनकी एकता को छिन्न-भिन्न कर दे।

 मंत्री वस्सकार ने व्यापारियों के वेश में अपने योग्य गुप्तचारों को वज्जी के आठों गण में भेजकर कुछ दिनों में ही उनमें वैमनस्य और असंतोष फैला दिया। वे वज्जी से अलग होकर अपने स्वतंत्र अस्तित्व की मांग करने लगे। आठों गणों के लोगों ने वज्जि से अलग होने की मांग रख दी। 

जाहिर है वज्जि ने उनकी मांग को ठुकराना ही था और उसने मांग ठुकरा दी। अलग होने की कोशिश में लगे गणों के लिए सेनाएं भेज दीं। 

दूसरी ओर पहले से तैयार अजातशत्रु ने गणों की स्वतंत्रता हेतु अपनी सेना उतार दी। दोनों ओर की सेनाएं भिड़ीं। इस युद्ध में अजातशत्रु को, वज्जियों के आपस की फूट के कारण विजय प्राप्त हुई। 

वज्जि के गणों को जीतने के बाद उसने एक अन्य मल्न गण को भी जीता तथा उसे अपने राज्य में मिला लिया। 

अजातशत्रु के कार्य 

अजातशत्रु के समय की सबसे महत्त्वपूर्ण घटना बुद्ध का महापरिनिर्वाण थी। बुद्ध का महापरिनिर्वाण 464 ई.पू. हुआ। इस समय अजातशत्रु ही मगध पर राज्य चला रहा था। बुद्ध के महापरिनिर्वाण पर अजातशत्रु ने भी बुद्ध की अस्थि प्राप्त करने का प्रयास किया। 

प्रयास में सफलता पाकर, बुद्ध की अस्थि को लाकर, उसने राजगृह की पहाड़ी पर, स्मृति में स्तूप का निर्माण कराया। 

आगे चलकर राजगृह में ही वैमर पर्वत की सप्तपर्णी गुहा से बौद्ध संघ की प्रथम बौद्ध संगीति हुई। प्रथम बौद्ध संगीति में सुत्त पिटक और विनय पिटक का सम्पादन हुआ। यह कार्य भी सम्राट अजातशत्रु के समय में सम्पादन हुआ था।

अपने राज्य विस्तार और बौद्ध धर्म को संरक्षण देने के कारण अजातशत्रु ने वीर और प्रतापी राजा के रूप में ख्याति प्राप्त की। 

उस समय की अनुश्रुतियों के अनुसार अजातशत्रु ने लगभग 32 वर्षों तक शासन किया। 463 ई.पू. में अपने पुत्र द्वारा वह मौत के घाट उतार दिया गया। 

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