कनिष्क की जीवनी और इतिहास |Biography and History of Kanishka

कनिष्क की जीवनी और इतिहास

कनिष्क की जीवनी और इतिहास |Biography and History of Kanishka

कनिष्क एक परिचय 

सम्राट कनिष्क भारत के कुषाण राजाओं में सबसे शक्तिशाली राजा हुआ है। वह महान् विजयी और बौद्ध धर्म का संरक्षक था। अपने विजेता और बौद्ध धर्म संरक्षक होने के कारण उसे चन्द्रगुप्त मौर्य और अशोक महान् जैसा कहा गया है। उसे कुषाण वंशी बताया गया है। कुषाण कोई एक जाति नहीं बल्कि 25 ई०पू० के एक वीर पुरुष राजा का नाम कुषाण था। इस वीर पुरुष के सम्मान में परावर्ती राजाओं ने अपने नाम के साथ कुषाण लगाना आरम्भ किया। 

25 ई०पू० का कुषाण पांच राज्यों का शासक था। यह युइशि जाति की शाखा से था। युइशि जाति पश्चिम की ओर से उस समय बढ़कर पूर्व की ओर आयी थी, जबकि हूणों ने आक्रमण कर चीन के आसपास के सारे क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया था। 

युइशि जाति ने राज्यों को पराजित कर अपने नये प्रदेश स्थपित किए थे। इस प्रकार पांच राज्यों के स्वामी बन गए थे। पांच राज्यों का उनका राजा कुषाण हुआ था। 

राजा कुषाण के सिक्के भारत के उत्तर-पश्चिमी कोने में अच्छी संख्या में मिले हैं। सम्राट कनिष्क के काल के सिक्के भी पर्याप्त मात्रा में अनेकों स्थानों पर उपलब्ध हैं। सिक्कों के अलावा बनारस, गोरखपुर जिले में गोपालपुर स्तूप से भी कनिष्क के बारे में काफी जानकारी मिलती है।

बौद्ध अनुश्रुति में भी कनिष्क को बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। सिक्के, उत्कीर्ण लेख और बौद्ध साहित्य में आधार पर कनिष्क के विषय में जो बातें ज्ञात होती हैं, वे उसे महान् शासक और महान् सम्राट साबित करती हैं।

कनिष्क के बारे में माना जाता है कि वह कुषाण राजाविम के पश्चात् सिंहासन पर आसीन हुआ। कुषाण राजा विम के बारे में पर्याप्त ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध न होने के कारण राजा विम और सम्राट कनिष्क में सम्बन्ध क्या था, इस बात का पता नहीं चलता। 

प्राप्त राबाटक लेख बताता है कि वह राजा विम का उत्तराधिकारी और कुषाण शासकों में सर्वाधिक योग्य और प्रसिद्ध राजा था। उसका राज्य मध्य एशिया से लेकर भारत के पूर्वी भाग तक था। इस तरह वह एक विशाल साम्राज्य का शक्तिशाली सम्राट था, कनिष्क ने अपने राज्यारोहण के समय (115 ई० के लगभग) से एक नया संवत् प्रारम्भ किया, जो शक संवत् के नाम से जाना जाता 

चीन के अन्तर्गत तुर्किस्तान (तुर्की) पर भी कनिष्क ने आक्रमण किया, जहां उसकी जीत हुई। इस जीत के बाद कनिष्क का राज्य उत्तर में कारागार, मारकंद तथा खोतम तक स्थापित हो गया। 

खोतजी साहित्य तथा चीनी साहित्य में कनिष्क की अनेक विजय यात्राओं 

राज्य विस्तार

कनिष्क ने कुशाण वंश की शक्ति का पुनरुद्धार किया। सातवाहन राजा कुन्तल सातकर्मी (विक्रमादित्य द्वितीय) के प्रयत्नों से कुशाणों (कुषाण) की शक्ति क्षीण हुई, जिसे कनिष्क ने उत्कर्ष किया। उसने उत्तर-दक्षिण, पूर्व-पश्चिम, चारों दिशाओं में अपने राज्य का विस्तार किया। 

उसने सातवाहनों को पंजाब प्रदेश में परास्त कर न केवल पंजाब पर अपना अधिपत्य स्थापित किया, अपितु भारत के मध्य देश को जीतकर मगध से भी सातवाहन वंश के शासक का अन्त किया। 

कुमारताल नामक एक बौद्ध पण्डित ने ‘कल्पना मंडीलिका’ नामक एक पुस्तक लिखी। इस पुस्तक में कनिष्क द्वारा की गयी पूर्वी भारत की विजय का उल्लेख है।

 ‘श्रीधर्मपिटक निदान सूत्र’ नामक एक अन्य बौद्ध ग्रंथ में भी लिखा है कि कनिष्क ने पाटलिपुत्र को जीतकर उसे अपने आधीन किया और वहां से प्रसिद्ध ‘बौद्ध विद्वान अश्वघोष’ और ‘भगवान बुद्ध के कमण्डलु’ को प्राप्त किया। 

तिब्बत की बौद्ध अनुश्रुति में भी कनिष्क की साकेत (अयोध्या) विजय का उल्लेख है। इस प्रकार लिखित ग्रंथों के आधार पर भी यह बात ज्ञात होती है कि कनिष्क एक महान् विजेता था और उसने उत्तरी भारत के बड़े भाग को जीतकर अपने अधीन कर लिया था। 

कनिष्क की विजयों के परिणामस्वरूप ही पाटलिपुत्र से सतवाहन वंश के शासक का अन्त हुआ। 

कनिष्क भारत के एक बड़े भू-भाग का स्वामी तो बना ही, भारत के बाहर भी उसने अफगानिस्तान, बौक्टिया तक अपने साम्राज्य की सीमाएं बढ़ायीं।

कनिष्क के शासनकाल के लेख पेशावर, माणिक्याल (रावलपिण्डी) के पास, सुर्द विहार (बहावलपुर), जैदा (उण्ड के समीप), मथुरा, श्रावस्ती, कौशाम्बी, सारनाथ में पाए गए हैं। उसके सिक्के भी सारे भारत में बंगाल और बिहार तक पाये जाते हैं। इस प्रकार इन प्राप्ति स्थलों तथा विजयों की अनुश्रुतियों से विदित होता है कि कनिष्क द्वारा शासित भारतीय प्रान्तों में पंजाब, कश्मीर, सिंध, संयुक्त प्रान्त और आगे की कुछ पूर्व और दक्षिणवर्ती भूमि भी शामिल थी।

उसकी राजधानी पुरुषपुर अथवा पेशावर थी। पेशावर, अफगानिस्तान से सिंधु की घाटी को जाने वाले प्रमुख राजपथ पर अवस्थित था। सरनाथ से प्राप्त 

कनिष्क के लेख से उसके प्रान्तों की क्षत्रप-शासन पद्धति पर प्रकाश पड़ता है। उसका खरपल्लान नामक महाक्षत्रप मथुरा में और क्षत्रप बनष्फर बनारस के समीपस्थ पूर्वी प्रान्तों के शासन के लिए नियुक्त थे। पुराणों में सातवाहन का आंध्रवेश के बाद मगध का शासक बनष्फर को ही लिखा गया है। 

तिब्बति अनुश्रुति के अनुसार खातन के राजा विजयसिंह के पुत्र विजयकीर्ति ने ‘गुजान’ राजा तथा ‘कनिक’ के साथ मिलकर भारत पर आक्रमण किया था और सोकेत (साकेत) नगर जीत लिया था, ‘गुजान’ का अभिप्राण कुशाण से और कनिक का कनिष्क से है। इस अनुश्रुति के आधार पर माना जा सकता है कि सातवाहन वंश की शक्ति को नष्ट करने के लिए कनिष्क को सुदूरवर्ती खोतन-राज्य के राजा की भी सहायता लेनी पड़ी थी।

पेशावर राजधानी होने का कारण 

सम्राट कनिष्क ने पाटलिपुत्र जीतकर अपने आधीन कर लिया था। प्राचीन गौरव और पूरवर्ती परम्परा के अनुसार पाटलिपुत्र को ही कनिष्क की राजधानी होना चाहिए था, परन्तु उसने एक नए कुसुमपुर (पाटलिपुत्र) की स्थापना पुष्पपुर (पेशावर) नाम से की। उसने नयी राजधानी पुष्पपुर बनायी, इसकी वजह, उस समय के विशाल साम्राज्य की उत्तरी सीमा चीन को छूती थी। साम्राज्य की विशालता को ध्यान में रखकर उसने पेशावर को अपनी राजधानी बनाया था। अवश्य ही उस समय पेशावर उसके विशाल साम्राज्य के केन्द्र में था। 

चीन से मैत्री और संघर्ष 

कनिष्क ने मध्य एशिया के क्षेत्र में अपनी शक्ति का विस्तार कर लिया था तथा वह उससे भी आगे बढ़ना चाहता था। इस बात का पूर्व में वर्णन किया जा चुका है कि उसने सातवाहन वंश पर विजय के लिए खोतन राज्य की सहायता ली थी-यह खोतन मध्य एशिया के ही एक भू-भाग पर स्थित था। 

जिस समय कनिष्क अपने साम्राज्य विस्तार में लगा हुआ था, उसी समय चीन भी इस प्रयास में लगा हुआ था कि वह अपनी शक्ति का विस्तार करे। इस उद्देश्य पूर्ति के लिए सन् 73 ई० में चीन के सुप्रसिद्ध सेनापति पान-चाऊ ने दिग्विजय का प्रयास आरम्भ किया। 

कई छोटे-छोटे राज्यों को अपने प्रभाव में लेने के बाद पान-चाऊ की सेनाएं वहां तक आ पहुंची, जहां पर सम्राट कनिष्क के साम्राज्य की सीमा मध्य एशिया में फैली हुई थी। 

सम्राट कनिष्क के साम्राज्य की विशालता, उसकी सैनिक शक्ति और कनिष्क के योद्धा को देख और सुनकर चीनी सेनापति पान-चाऊ को इस बात को सोचने के लिए मजबूर होना पड़ा कि सम्राट कनिष्क से टकराते ही उसकी सैनिक शक्ति बहुत कुछ नष्ट हो जाने की आशंका है। 

सेनापति पान-चाऊ उस समय इस स्थिति में न था कि किसी विशाल साम्राज्य से टकराए-वह छोटे-छोटे राज्यों को जीतकर अपनी शक्ति बढ़ाना और फिर बड़ी शक्ति से टकराने की योजना बनाए हुए था।

 पर उसकी सेना कनिष्क साम्राज्य की सीमा तक पहुंच चुकी थी। इस स्थिति में उसे कुछ-न-कुछ कदम उठाना था-या तो युद्ध या फिर मैत्री संधि। 

युद्ध की बात उसने टालने की सोच ली थी-अब ऐसी स्थिति में यदि वह अपनी सेना को वापस लौटाता तो इस बात की सम्भावना भी थी कि कनिष्क सेना द्वारा वापस लौटती चीनी सेना पर आक्रमण कर दिया जाता-ऐसा करने का कनिष्क सेना को अधिकार था। 

पान चाऊ इस बात को भी जानता था कि यदि वापस होती उसकी सेना पर आक्रमण किया गया तो बगैर युद्ध के भी बहुत बड़ा सैनिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। इन परिस्थितियों पर विचार करके पान चाऊ ने मैत्री संधि की युक्ति निकाली। उसने अपने कई एक दूत इस बात के लिए तैयार किए कि वे बहुमूल्य उपहारों के साथ सम्राट कनिष्ट से जाकर मिलें और सम्राट के साथ मैत्री संधि पर चर्चा करें। 

पान चाऊ ने उचित समय पर बुद्धिमत्तापूर्ण पग उठा लिया था, क्योंकि तब तक सीमान्त क्षेत्र में कनिष्क की सेनाओं का जमाव होने लगा था। 

सम्राट कनिष्क खुद युद्ध की तैयारी में लग चुका था। उसके सीमान्त क्षेत्र में चीनी सेना आकर ठहर गयी थी; वह अभी इस बात का निर्णय न ले पा रहा था कि चीनी सेना युद्ध के उद्देश्य से वहां आकर ठहरी है या उनका कोई अन्य उद्देश्य है। तभी उसके सैनिकों ने देखा कि विपक्षी सेना की ओर से कुछ घुड़सवार सफेद ध्वज फहराते हुए बढ़कर आगे आ रहे हैं। उनका यह अंदाज मैत्री संदेश से युक्त था। राजा कनिष्क को सूचना भेजी गयी-कनिष्क की ओर से आदेश मिला कि यदि निःशस्त्र होकर लोग आ रहे हैं तो आने दिया जाए। 

वे लोग शस्त्र विहीन ही थे-जो बहुमूल्य उपहारों के साथ श्वेत ध्वज के साथ सम्राट कनिष्क से भेंट करने की इच्छा जता रहे थे। उन्हें आगे बढ़ने की अनुमति मिल गयी थी। 

कनिष्क ने आगे बढ़कर आने वाले चीनी दूतों का स्वागत किया। चीनी दूतों ने बेशकीमती उपहार कनिष्क की सेवा में पेश कर उसे खुश कर दिया। 

उपहार भेंट के बाद कनिष्क ने चीनी सेनापति पान चाऊ से भेंट की। उसकी मैत्री इच्छा को सुनकर कहा- “अच्छी दोस्ती तभी स्थायी रूप से चल सकती है, जब उसे रिश्तेदारी में बदल दिया जाए…।” उसने अपनी बात जारी रखते हुए कहा- “सुना है, चीन सम्राट की एक सुन्दर कन्या है। वह वयस्क है और चीन सम्राट उसके विवाह के लिए उचित वर की खोज कर रहे हैं। यदि चीन राजकुमारी का मुझसे विवाह कर दिया जाए तो कहीं अच्छी बात होगी।” 

सेनापति पान चाऊ को कनिष्क का यह प्रस्ताव असम्मानजनक लगा। उसने उसी क्षण इनकार करते हुए दोस्ती की बात वही तोड़ दी। 

परिणामतः दोनों सेनाएं आमने-सामने आ गयीं। 

उस युद्ध में पान चाऊ की मृत्यु हुई। कनिष्क की सेनाएं बढ़ती चली गयीं। उसकी विजय चीन तक नहीं हुई पर मध्य एशिया का वह भूभाग को उसने अवश्य जीत लिया जो चीनी सेना विजित करती हुई, बढ़कर कनिष्क साम्राज्य की सीमा तक आयी थी। इसी युद्ध में खोतन और मारकंद के प्रदेश कुषाणों के साम्राज्य में सम्मिलित हुए थे। सम्राट कनिष्क के शासनकाल में ही आयुर्वेद का प्रसिद्ध आचार्य चरक पुष्पपुर में निवास करता था। कनिष्क ने 100 ई० के आसपास तक शासन किया।

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