हर्षवर्धन की जीवनी और इतिहास |Biography and History of Harsh Vardhan

हर्षवर्धन की जीवनी और इतिहास

हर्षवर्धन की जीवनी और इतिहास |Biography and History of Harsh Vardhan

हर्षवर्धन  : एक सामान्य परिचय 

सातवीं सदी के आरम्भ में भारतीय रंगमंच पर जिस सम्राट का यश और प्रशस्ति बहुत अधिक फैली वह था हर्षवर्धन। हर्षवर्धन ने सम्राट कहलाने का गौरव प्राप्त किया। उसे सम्राट अशोक और सम्राट चन्द्रगुप्त के व्यक्तित्व का मिश्रण बताया गया है। सम्राट हर्षवर्धन के बारे में कवि बाण द्वारा रचित ‘हर्षचरित्र’ तथा चीनी यात्री युवांग-च्चांग का यात्रा विवरण ‘सी-यू-की’ का भी विवरण प्रस्तुत करते हैं।

हर्षवर्धन या हर्ष ने 606 ई० से 647 ई०, 41 वर्षों तक राज्य किया। यह राज्यवर्धन के बाद थानेश्वर के सिंहासन पर बैठा। अपने शासनकाल में इसने अपने साम्राज्य का विस्तार जालंधर, पंजाब, कश्मीर नेपाल और बल्लमीपुर तक किया। इसने आर्यवर्त को भी अपने अधीन किया। हर्ष बौद्ध धर्म की महायान शाखा का समर्थक होने के साथ-साथ विष्णु, शिव की भी स्तुति करता था। ऐसा माना जाता है कि हर्ष प्रतिदिन 500 ब्राह्मणों एवं 100 बौद्ध भिक्षुकों को भोजन कराता था। उसने 643 ई० में कन्नोज में तथा प्रयाग में आयोजित सभा को ‘मोक्ष परिषद्’ कहा है। उसके दरबार में बाणभट्ट, हरिदत्त एवं जयसेन जैसे कवि एवं लेखक शोभा बढ़ाते थे।

हर्ष स्वयं प्रशासनिक व्यवस्था में व्यक्तिगत रूप से रुचि लेता था। सम्राट की सहायता के लिए एक मंत्रिपरिषद् गठित की गयी थी। बाणभट्ट के अनुसार अवन्ति नामक कवि युद्ध और शान्ति का सर्वोच्च मंत्री था। सिंहनाद हर्ष का महासेनापति का। कुन्तल-अश्वसेना का मुख्य अधिकारी तथा स्कन्दगुप्त हस्ति सेना का मुख्य अधिकारी था।

चीनी यात्री ह्वेनसांग के अनुसार हर्ष की सेना में पहले करीब 5,000 हाथी, 2,000 घुड़सवार तथा 5,000 पैदल सैनिक थे-कालान्तर में यह सैनिक शक्ति बढ़कर 60,000 हाथियों की सेना, घुड़सवारों की एक लाख सेना हो गयी। इसी अनुपात में सैनक सेना भी बढ़ गयी थी।

 हर्ष की सेना के साधारण सैनिक को चार एवं भार, अश्वसेना के अधिकारियों को हदेश्वर, पैदाय सेना के अधिकारियों को बलाधिकृत एव महाबलाधिकृत कहा जाता था।

हर्षवर्धन  के पूर्वज

हर्षचरित्र के अनुसार हर्ष के सारे पूर्वज श्रीकण्ठ (थानेश्वर) के राजा थे। इसमें प्राचीन पूर्वज शिवभक्त पृष्ठभूमि तक की वंश तालिका दी हुई है। हर्ष के अभिलेख उसके चार पूर्वजों का उल्लेख करते हैं। इस राज्य का अधिष्ठाता जरवर्धन पांचवी सदी के अंत में अथवा छठी सदी के आरम्भ में हूण संघर्ष काल में हुआ था। उसका पौत्र आदित्यवर्मन, विशेषकर उत्तराकालीन गुप्त राजा महासेनगुप्त की संभावित भगिनी, महासेनगुप्त के साथ विवादों का कारण प्रसिद्ध हुआ था। 

प्रभाकरवर्धन हर्ष का पितामह था। प्रभारकरवर्धन का पुत्र राजवर्धन था और राजवर्धन के बाद थानेश्वर का राजमुकुट हर्षवर्धन के सिर पर सजा। 

प्रभाकर वर्धन के समय में शक्ति और सीमा दोनों में ही राज्य का विस्तार हुआ। इस कुल के अभिलेखों में प्रभाकर वर्धन को महाराजाधिराज तथा परमभट्टारक उपाधियां मिलती हैं। हर्षचरित में उसे ‘हूणहरिण केसरी’, ‘सिन्धुराजज्वर’, गुर्जरों एवं गुजरात निंद्रा भंग करने वाला, गंधारराजरूपी गज का रोग, लातों का कूटने वाला तथा मालव लक्ष्मीलता का उच्छेदक परशु कहा गया है। 

युआन-च्चांग के अनुसार थानेश्वर के राज्य की परिधि 1200 मील थी और उत्तर में पहाड़ों द्वारा; पूर्व में इसकी सीमाएं कन्नौज के मौखरि राज्य की सीमा से लगी थीं और पश्चिम तथा दक्षिण में इसका अधिकार पंजाब के कुछ भागों तथा राजपूताना के मरु प्रदेश पर था।

हर्ष ने अपना पैतृक राज्य तो प्राप्त किया ही, इसके अलावा कन्नौज की मौखादि की गद्दी भी मिली।

हर्ष को राज्य प्राप्त 

605 ई० में प्रभाकर वर्धन की मृत्य के बाद थानेश्वर का राजमुकुट राज्यवर्धन को मिला था; पर घटना ऐसी घटी कि राजवर्धन के बाद राजमुकुट हर्षवर्धन के सिर पर आ सजा। इस घटना के सम्बन्ध में मौखरिवंश की ओर ध्यान देना आवश्यक है। मौखरि राजा महासेन गुप्त के दो पुत्र थे-देवगुप्त और माधवगुप्त। पिता के जीवनकाल में देवगुप्त मालवा का शासक था और माधवगुप्त अपने पिता की बहन के साथ स्थाण्वीश्वर में रहता था। महासेन गुप्त के पौत्र राजवर्धन और हर्षवर्धन माधवगुप्त की आयु के थे। उनके साथ उनकी बहुत घनिष्ठ मित्रता थी। 

राजवर्धन और हर्षवर्धन की बहन राज्यश्री थी। उसका विवाह मौखरिवंश के राजा ग्रहवर्मा (अवन्ति वर्मा के उत्तराधिकारी) के साथ हुआ था। इस विवाह के कारण कन्नौज और स्थाण्वीश्वर के राज्यों की घनिष्ठ मैत्री स्थापित हो गयी थी। गुप्त राजा इसे सहन नहीं कर सके। मालवा के शासक देवगुप्त और गौड़ देश के शासक नरेन्द्र गुप्त शशांक ने मिलकर कन्नौज पर आक्रमण कर दिया। 

युद्ध में मौखरि राजा ग्रहवर्मा मारा गया और उसकी पत्नी राज्यश्री को कारागार में डाल दिया गया।

जब यह समाचार स्थाण्वीश्वर पहुंचा, तो राजवर्धन ने तुरन्त एक बड़ी सेना के साथ मालवराज देवगुप्त पर आक्रमण कर दिया। देवगुप्त राजवर्धन की सेना का मुकाबला नहीं कर सका, परास्त हुआ। राज्यश्री को राजवर्धन ने मुक्त कराया। फिर वह शशांक की ओर मुड़ा। शशांक ने अपने ऊपर आक्रमण होता देख कूटनीति और धर्म नीति पर चलते हुए अपनी पुत्री का विवाह राजवर्धन से करने की बात कहकर, युद्ध रोक दिया। 

मैत्री के लिए जब राजवर्धन शशांक के डेरे पर आया तो छलनीति से उस पर घात कर उसका वध कर दिया। 

राज्यश्री को अपने भाई के मारे जाने की सूचना मिली, तो वह अपने सम्मान की रक्षा के लिए जंगलों में भाग गयी। उसने सम्मान के साथ मृत्यु का आलिंगन करना ही श्रेष्ठ समझा था। 

हर्षवर्धन को अपने भाई के साथ छलघात की तथा कन्नौज से अपनी बहन राज्यश्री के जंगलों में भाग जाने की सूचना मिली तो वह सेना लेकर शशांक से बदला लेने के लिए चल पड़ा। 

उसका भाई राजवर्धन जब युद्ध के लिए रवाना हुआ था तो भाई हर्षवर्धन को शासन कार्य के सारे अधिकार सौंप गया था। भाई राजवर्धन के मारे जाने के बाद हर्षवर्धन के हाथ में सारी सत्ता और अधिकार आ चुका था।

यही वह समय था-जो हर्षवर्धन के भाग्य के लिए निर्णयकारी सिद्ध होने जा रहा था। 

हर्षवर्धन के सामने उस समय दोहरी जिम्मेदारी आ पड़ी थी-बहन की खोज करना तथा राजा शशांक को उसके किये का दण्ड देना। वह अपने ममेरे भाई मंडी को शशांक पर आक्रमण के लिए रवाना कर, खुद बहन की खोज में निकला। 

उसने कन्नौज पहुंचकर राजकर्मचारियों की सहायता और निशानदेही पर वन के उस भाग में प्रवेश किया, जहां राज्यश्री प्रविष्ट हुई थी। उसने बहन को उस समय खोज निकाला, जबकि वह लकड़ियां एकत्र कर चिता जलाकर सती हो जाने का उपक्रम कर रही थी।

 हर्ष ने बढ़कर अपनी बहन को सती होने से रोका। उसे समझाया कि यदि वह पति की हत्या का प्रतिशोध देखना चाहती है तो उसे जीवित रहना चाहिए। उसने यह भी कहा कि जीवित रहकर ही राजशक्ति हाथ में रखी जा सकती है और राजशक्ति के द्वारा ही प्रतिशोध को पूरा किया जा सकता है। 

हर्ष के समझाए जाने पर तथा इस विश्वास के साथ कि शशांक राजा से उसके पति के घात का बदला चुकाना है-उसने जीवित रहना स्वीकार किया। 

वह वापस राज्य कन्नौज में आ गयी। उसने खुद राज्य की बागडोर सम्भाल कर राज्यभार हर्ष के हाथों में सौंप दिया। रानी के निर्णय को कन्नौज की जनता और दरबारियों ने सहर्ष स्वीकार किया। 

कन्नौज का राज्यभार मिलने पर हर्षवर्धन के हाथों में दो राज्यों की शक्ति आ गयी थी। दोनों राज्यों की सम्मिलित शक्ति काफी बढ़ गयी थी। 

हर्ष के ममेरे भाई मंडी ने मालव राज्य पर चढ़ाई करके मालव सेना को परास्त कर वहां के राजा गुप्त की हत्या कर, आधा बदला पूरा कर लिया। निःसंदेह कन्नौज महारानी राज्यश्री को इससे कुछ अवश्य ही संतोष हुआ। 

मालव राज के मारे जाने के बाद शशांक की शक्ति कमजोर हो गयी थी। वह गौड़ देश की ओर प्रस्थान कर गया था। 

उधर, कन्नौज के मंत्रियों और राजनीतिज्ञों ने मिलकर सलाह की थी कि महारानी राज्यश्री, जो वैधव्य दुःख में डूबी तथा बौद्ध धर्म की अनुयायी होने के कारण राज्य की ओर से उन्मुख हो उठी थीं; वे आगे भी राज्य पर ध्यान न दे सकती थीं-ऐसे में हर्षवर्धन ही उपयुक्त पात्र है, जो कन्नौज का राज्य सम्भाल सके। 

पर हर्ष ने कन्नौज राज्य का अभिभावक बनना ही स्वीकार किया। 

काफी समय बाद उसने कन्नौज के मंत्रियों और जनता के आग्रह को मानकर शासन की बागडोर सम्भाली; परन्तु उसने वहां के महाराजा की उपाधि स्वीकार 

न की। केवल ‘कुमार’ की उपाधि धारण करता रहा। बाणभट्ट के अनुसार सम्राट हर्ष ने बड़े भाई की हत्या के बाद, जब शत्रुओं से बदला ले लिया था तो थानेश्वर में आकर राजतिलक करवा वहां का राजा घोषित हो गया था। उसने कन्नौज में केवल शासन का कार्य सुचारू रूप से चलाने का उत्तरदायित्व लिया और वहां उसका पद आभिभावक का था, राजा का न था। 

परन्तु, बाद की घटनाएं इस बात को प्रमाणित करती हैं कि उसने थानेश्वर से हटाकर अपनी राजधानी कन्नौज में स्थापित की थी। इसके लिए माना जा सकता है कि उसका जब कन्नौज का राजा बनने का कोई भी विरोध न रह गया था, हर कोई कन्नौज की सुख-समृद्धि और प्रजा के हित के लिए उसे कन्नौज का महाराजा बनने के लिए जोर डाल रहा था, तब उसने नये राज्य का स्वामी बनना स्वीकार किया था। 

इस प्रकार थानेश्वर और कन्नौज राज्यों का एकीकरण हुआ। इस प्रकार इन दोनों राज्यों के एकीकरण से हर्ष को उत्तर भारत में अपने विरोधियों पर विजय करने और अपनी सत्ता प्रतिष्ठित करने में बड़ी सहायता मिली। 

हर्षवर्धन का राज्य विस्तार 

थानेश्वर (स्थाण्वीश्वर) और कन्नौज राज्यों के एकीकरण के बाद हर्षवर्धन ने अपने शक्ति के विस्तार के लिए युद्ध किये। उसके मुख्य युद्ध निम्न थे|

गौड़ देश के राजा के शशांक के विरुद्ध युद्ध 

हर्षवर्धन ने जब कन्नौज में अपनी बहन राज्यश्री को बचाकर, वहां की राज्य व्यवस्था सम्भालने की ओर पहले ध्यान देने की आश्वयकता समझी थी, तब अवसर अनुकूल पाकर गौड़ देश का राजा अपना बचाव कर सीमा पार कर गौड़ देश पहुंच गया था। शशांक के हाथों ही मौखरि राजा ग्रहवर्मा की हत्या हुई थी। 

अपने बहनोई ग्रहवर्मा की हत्या का बदला लेने के लिए हर्षवर्धन ने एकाधिकृत राजा के रूप में भरपूर तैयारी की। यह तैयारी आवश्यक इसलिए भी थी कि अपने देश की सीमा से बाहर गौड़ देश में जाकर युद्ध करना कोई हंसी-खेल बात न थी। 

राजा शशांक के पास विशाल सेना थी; साथ ही उसके मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध अन्य पड़ोसी राज्यों से थे, जो उस पर युद्ध थोपे जाने पर उसकी सहायता के लिए आगे आ जाते। शशांक की शक्ति और उसकी राजनीति को अच्छी तरह से जानने-समझने और उसी के अनुसार आक्रमण की कार्यवाही में काफी दिन लगे। 

शशांक की, पड़ोसी देशों से संधि के मामले में जबाव देने हेतु हर्षवर्धन ने कामरूप (असम) के राजा भास्कर वर्मा के साथ घनिष्ठ मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध स्थापित किया। शशांक के राज्य पर आक्रमण कर उसे हर्षवर्धन ने काफी नुकसान पहुंचाया–पर अपने बहनोई की मौत का बदला शशांक से उतारने में वह सफल न हो सका।

वलमी के राजा ध्रुवसेन या ध्रुवमट के विरुद्ध युद्ध 

राजा ध्रुवसेन या ध्रुवमट के विरुद्ध युद्ध 

वलमी का राजा ध्रुवसेन द्वितीय के मामले में हर्षवर्धन ने प्रयास किया कि वह उसकी अधीनता स्वीकार करे। 

ध्रुवसेन स्वतंत्र राजा था; उसने हर्षवर्धन की आधीनता स्वीकार न की। उसने वलमी के राजा पर आक्रमण कर उसे पराजित किया। पराजित करने के बाद जैसी कि हर्षवर्धन की इच्छा थी; उसने राज्य को अपने साम्राज्य में शामिल करने का प्रयत्न न किया, बल्कि उसे अपनी अधीनता स्वीकार करा, वलमी पर राज्य करने के लिए जीवित छोड़ दिया। 

वलमी का राजा ध्रुवसेन हर्षवर्धन का आधीन राजा था, इसका प्रमाण इस रूप में भी सामने आता है कि जब सम्राट हर्षवर्धन ने प्रयाग में महासभा का आयोजन किया था, तब ध्रुवसेन उस महासभा में एक मित्र राजा के रूप में उपस्थित हुआ था, ध्रुवसेन के साथ आगे भी अपनी मैत्री सुदृढ़ करने के लिए हर्षवर्धन ने अपनी पुत्री का विवाह उसके साथ कर दिया था।

चालुक्य कुलकेशी के विरुद्ध अभियान 

जिस प्रकार उत्तरी भारत में हर्षवर्धन का अधिपत्य था, उसी प्रकार दक्षिणा-पथ में उस समय चालुक्य वंशी कुलकेशी की प्रधानता थी। कुलकेशी की प्रशस्ति द्वारा ज्ञात होता है कि हर्ष ने दक्षिणा-पथ को अपने अधिपत्य में लाने का प्रयत्न किया था; पर चूंकि आगे इस बात का विवरण नहीं मिलता कि आक्रमण में किसकी विजय हुई थी-ह्वेनसवांग का यात्रा विवरण भी इस पर कोई प्रभाव नहीं डाल पाता। 

इससे निष्कर्ष निकलता है कि जब किसी की हार-जीत नहीं हुई थी, तो आक्रमणों के बाद, दोनों ही अपना नुकसान बचाने के लिए आक्रमण के बजाय मैत्री सम्बन्ध में बंध गये थे। 

सिन्ध के राजा के विरुद्ध युद्ध 

सिन्ध के राजा के विरुद्ध हर्षवर्धन ने सैनिक अभियान चलाया था-इस बात का प्रमाण मिलता है। हर्ष चरितम् में बाणभट्ट ने, युद्ध में हर्षवर्धन को विजयी बताया है। इस विजय में हर्ष ने अपनी राजसत्ता को अपने अधिकार में न करके उसका राजकोष अपने अधिकार में कर लिया था। इसके बाद सिन्ध का राजा हर्ष को अपना अधिपति मानने लगा था। 

इसमें संदेह नहीं कि हर्षवर्धन के विजय अभियानों से उसके साम्राज्य का क्षेत्र काफी विस्तृत हो गया था। थानेश्वर (स्थाण्वीश्वर) का राज्य उसके पिता से उसके बड़े भाई और फिर उसके पास आया था। हरियाणा और उत्तरी राजपूताना के प्रदेश भी उसके राज्य के अन्तर्गत आ गये थे। कन्नौज के मौखरिवंश का शासन उसकी बहन राज्यश्री की वजह से उसको प्राप्त हुआ था। वर्तमान उत्तरी प्रदेश भी उसकी अधीनता में था। 

बांसखेरा और मधुवन में प्राप्त उत्कीर्ण लेखों से अहिच्छत्र (बरेली) और श्रावस्ती का भी उसके शासन में होना प्रमाणित है। चीनी अनुश्रुति में हर्ष को ‘मगध राज’ कहा गया है; उससे प्रमाणित है कि मगध भी उसके अधिकार में आ गया था। 

गुप्तवंशी मगध राजा माधवगुप्त, हर्ष का बालसखा और परममित्र था। राजसिंहासन पर माधवगुप्त के आरूढ़ हो जाने के बाद भी दोनों की मित्रता में कोई अन्तर न आया था। 

चीनी अनुश्रुति पर विचार करें तो सम्भव है कि माधवगुप्त के मगध राज्य पर किसी राजा ने दृष्टि डाली हो; जिससे रक्षा के लिए माधवगुप्त ने हर्ष की सहायता ली हो। मगध की रक्षा में युद्ध करने और सफल होने के कारण उसे ‘मगधराज’ लिख दिया गया है। 

चीनी अनुश्रुति के अनुसार जयसेन नामक बौद्ध विद्वान को हर्ष ने उड़ीसा के अस्सी नगरों की आमदनी दान रूप में प्रदान की थी। इससे प्रमाण सामने आता है कि उड़ीसा के कलिंग का कुछ प्रदेश हर्ष की अधीनता में पूर्व से चला आ रहा था। 

बाणभट्ट ने हर्षचरितम् में हर्ष को सकलोत्तरा पथनाथ कहा है, तो यह सर्वथा ठीक ही था।

 ह्वेनसांग के अनुसार उसकी सेना में 60 हजार हाथी और 1 लाख अश्वारोही सैनिक होने की बात कही है। इन दो की संख्या देखने के बाद स्वतः ही अनुमान लगाया जा सकता है पैदल सेना दो-ढाई लाख से कम न रही है। इतनी बड़ी सैन्य सेना रखने वाला शासक चक्रवर्ती और विशाल साम्राज्य का स्वामी ही हो सकता है।

हर्षवर्धन का धर्म और धार्मिक उदारता

ह्वेनसांग ने जब हर्षवर्धन का वर्णन किया है तब उसकी राजधानी कन्नौज में होना लिखा है। 

उसने हर्षवर्धन के धर्म की उदारता का वर्णन करते हुए लिखा है कि इस नगर में हीनयान और महायान दोनों बौद्ध सम्प्रदायों के एक सौ विहार थे। इन विहारों में दस हजार भिक्षु निवास करते थे। बौद्ध धर्म के साथ-साथ पौराणिक हिन्दू धर्म का भी कन्नौज में प्रचार था।

ह्वेनसांग के अनुसार इस धर्म (पौराणिक हिन्दू) के मंदिरों की संख्या दो सौ थी। इस विवरण से ज्ञात होता है कि बौद्ध धर्म और पौराणिक हिन्दू धर्म के लोग हर्ष के राज्य में मिलकर साथ निवास करते थे, उनमें कोई विरोध भावना नहीं थी। हर्षवर्धन दोनों धर्मों का आदर करता था। वह दोनों ही धर्म के भिक्षुओं और पण्डितों, विहारों और मंदिरों को दान द्वारा अपने राजा होने के कर्तव्य का निर्वहन करता था।

परन्तु इससे यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि हर्षकालीन साम्राज्य में धर्म का विद्वेष समाप्त हो गया था तथा दोनों धर्म निरपेक्षता की भावना को अपनाते थे। उनमें विद्वेष का उदाहरण इस रूप में मिलता है कि जिस समय हर्ष ने कन्नौज में एक बौद्ध महासभा का आयोजन किया तो अनेक बौद्ध विद्वेषी लोगों ने उनके विरुद्ध षड्यंत्र किया, विवश होकर राजा को 500 ब्राह्मणों को बन्दी बना उन्हें निर्वासन का आदेश देना पड़ा। उसने न सिर्फ निर्वासन का आदेश दिया बल्कि उन्हें बाकायदा राज्य से निर्वासित कराया। 

ह्वेनसांग के अनुसार कन्नौज नगर पांच मील लम्बे और सवा मील चौड़े क्षेत्र में बसा हुआ था। उसके भवन स्वच्छ और सुन्दर थे। नागरिक लोग चिकने और रेशमी वस्त्र धारण करते थे। उनकी भाषा मधुर और परिमार्जित थी।

हर्षवर्धन का बौद्ध धर्म प्रेम 

ह्वेनसांग के विवरण के अनुसार हर्षवर्धन बौद्ध धर्म का अनुयायी था। उसने महात्मा बुद्ध के एक दांत को कश्मीर से लाकर कन्नौज के एक ‘संघाराम’ प्रतिष्ठित किया था। 

उसने बहुत से स्तूपों और विहारों का भी निर्माण कराया। पशुहत्या और मांस भक्षण का उसने निषेध किया था। अपराधियों के लिए उसने व्यवस्था की थी कि उन्हें दण्ड दिया जाए। बौद्ध सिद्धांतों के प्रसार के ध्येय से उसने अनेक महासभाओं का आयोजन किया।

पर वह बौद्ध अनुयायी होने पर भी वैदिक धर्म का शत्रु था, ऐसा विवरण कहीं नहीं मिलता। बाणभट्ट के हर्षचरितम् के अनुसार तथा बांसखोरा और मधुबन के उत्कीर्ण लेखों में उसके नाम के साथ ‘परम-महेश्वर’ विशेषण का प्रयोग किया गया है-जो इस युग में शैवधर्म के अनुयायियों के लिए प्रयुक्त होता था। 

प्रयाग में जब उसने बहुत बड़े रूप में धार्मिक आयोजन किया, तो बौद्ध देवी-देवताओं के साथ-साथ सूर्य एवं शिव की मूर्तियों की भी पूजा की; तथा ब्राह्मण पण्डितों को भी दान-दक्षिणा दी। वह अशोक महान् और कनिष्ठ की तरह बौद्ध धर्म का अनुयायी न होकर सब धर्मों का आदर करता है।

सम्राट हर्ष का व्यक्तित्व 

हर्षवर्धन न केवल विद्वानों का आदर करता था। अपितु स्वयं भी सुकवि था। उसने ‘प्रियदर्शिका’, ‘रत्नावाली’ और ‘नागानन्द’ नाम के तीन नाटकों की रचना की। उसके दरबार में बाणभट्ट जैसा महाकवि रहता था, जिसने ‘हर्षचरित्र’, ‘कादम्बरी’ और ‘चण्डीशतक’ जैसी कृतियों की रचना की। उसके दरबार में मयूर कवि भी था जिसने ‘सूर्यशतक’ की रचना की। 

सम्राट हर्ष ने ज्ञान और विद्या के लिए अनेक प्रयास किय। ह्वेनसांग के अनुसार वह राजकीय भूमि की आय का चतुर्थांश विद्वानों को पुरस्कृत करने में काम करता था।

हर्ष शासक विजेता के रूप में तो महान् था ही, शान्ति के निर्माता के रूप में भी वह महान् से भी महान् था। शांतिकाल में उसके कृत्यों में एक महत्त्वपूर्ण समारोह कन्नौज का अधिवेशन था। जिसे उसने महायान के सिद्धांतों के प्रचार हेतु बुलया था। पुस्तक-Life के पृष्ठ 177 के अनुसार- 

“हर्ष अपने शिविर से बड़ी तड़क-भड़क के साथ कन्नौज से चला। गंगा के दक्षिण तट पर चलता हुआ, ह्वेनसांग और कामरूप के राजा भास्कर वर्मन के साथ 90 दिनों में वह कन्नौज पहुंचा। 

वहां 18 देशों के नरेशों और पांचों भारतों के नृपतियों तथा विभिन्न सम्प्रदायों के हजारों पुरोहितों ने उसका स्वागत किया। ये लोग हर्ष के नियन्त्रण पर अधिवेशन में भाग लेने के लिए आये हुए थे। हर्ष ने फूस के दो हॉल बनाने की आज्ञा पहले ही दे रखी थी, जो अब निर्मित खड़े थे। इनमें से प्रत्येक में 1,000 व्यक्ति बैठ सकते थे। बीच में एक ऊंचा बुर्ज था जिसके नीचे ‘राजा के आकार की’ बुद्ध की स्वर्ण प्रतिमा स्थापित की गयी थी। एक जुलूस के बाद अधिवेशन का कार्य आरम्भ हुआ…

प्रयाग के पंचर्षीय दान विवरण 

कन्नौज के अधिवेशन के बाद हर्ष ने प्रयाग में गंगा-यमुना के संगम पर अपना छठा पंचवर्षीय अधिवेशन किया। इसमें दान-वितरण (महामोक्ष परिषद्) देखने के लिए ह्वेनसांग को निमंत्रित किया गया। यह असाधारण अधिवेशन देखने के लिए उसने अपनी गृहयात्रा स्थगित कर दी। इस परिषद् में दक्षिण भारत का राजा ‘ध्रुवमट’ और आसाम का ‘कुमार राज’ (भास्कार वर्मन) भी शामिल हुए थे।

 महीना भर दरिद्रों और अनाथों को दान मिलता रहा। जब तक धन का विस्तृत कोष समाप्त हो चुका था। तब हर्ष ने अपना व्यक्तिगत ‘रत्न तथा वस्तुएं’ भी दान में दे डालीं।

हर्ष की मृत्यु-40 वर्षों के शासन के पश्चात् 647 अथवा 648 ई० में हर्ष का निधन हुआ। उसके दान-पुण्य में राजकोष लुटा देने के कारण व उसके शक्तिमान व्यक्ति के हट जाने के बाद राज्य में सर्वथा अराजकता फैल गयी। उसके मंत्री अरुणाश्व अर्जुन ने उसकी गद्दी हथिया ली। 

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

4 + two =