गौतमीपुत्र सातकर्णी की जीवनी और इतिहास |Biography and History of Gautamiputra Satakarni

गौतमीपुत्र सातकर्णी की जीवनी और इतिहास

गौतमीपुत्र सातकर्णी की जीवनी और इतिहास -Biography and History of Gautamiputra Satakarni

सम्राट गौतमीपुत्र सातकर्णी  सामान्य परिचय 

भारतीय देवकथाओं और प्राचीन साहित्य का शकारि विक्रमादित्य और सातवाहनवंशी प्रतापी राजा गौतमीपुत्र सातकर्णी एक ही थे। इस राजा का शासनकाल 99 ई०पू० से 44 ई०पू० तक था। पुरणों के अनुसार इसने 56 साल और जैन अनुश्रुति के अनुसार 55 साल राज्य किया। 

गौतमी पुत्र सातकर्णी के इतिहास पर प्रकाश डालने वाले अनेक शिलालेख व सिक्के प्राप्त हुए हैं। इस प्रतापी राजा के सम्बन्ध में एक जैन अनुश्रुति भी इस प्रसंग में उपयोगी है। 

जैन ग्रंथ ‘आवश्यक सूत्र’ पर मद्रबाहुस्वामी विरचित नियुक्ति नामक टीका में एक पुरानी कथा दी गयी है। इस कथा के अनुसार मरुकच्छ का राजा नहवाणु कोष का बड़ा धनी था। 

दूसरी ओर राजा सालवहन सेना का धनी था। सालवहन ने नहवाण पर चढ़ाई कर दी। दो वर्ष तक पुरी को घेरे रहने पर सालवाहन, नहवाण को जीत न सका; तब उसने युक्ति से काम लिया। उसने कूटनीति रचकर अपने एक अमात्य मरुकच्छ को निकाल दिया। 

मरुकच्छ जाकर नहवाण से मिल गया। मरुकच्छ को नहवाण ने खूब आदर सत्कार दिया। उसकी सलाह पर बहुत-सा धन देव मंदिर, तालाब, बाबड़ी आदि बनवाने पर खर्च कर दिया। जब उसका कोष खाली हो गया तब मरुकच्छ ने गुप्त संदेश सालवाहन को भेज दिये। 

सालवहन ने पुनः नहवाण पर आक्रमण किया और इस बार रिक्त कोष वाले नहवाण के जीतना आसान रहा। नहवाण के राज्य को जीतकर अपने साम्राज्य में शामिल कर लिया। यह नहवाण नाम से जाना जाता है। सालवाहन राजा कोई और नहीं सातकर्णी ही था। 

सातकर्णी की विजयें 

गौतमीपुत्री सातकर्णी के बारे में कहा गया है कि उसने विशाल साम्राज्य का निर्माण किया। उसके साम्राज्य का प्रधान कारण शक, यवन, पल्हवों की पराजय थी। शक, यवन, पल्हवियों ने भारत के बाहर से आकर अपने अनेक राज्य कायम कर लिये थे। 

सातकर्णी ने उनके साथ घोर युद्ध करके उन्हें भगाया और उनके आधीन क्षेत्रों पर अधिकार करता चला गया। उसने अवन्ति, सौराष्ट्र, अश्मक आदि प्रदेशों पर शकों को पराजित कर अपना आधिपत्य स्थापित किया था। 

शकों की शक्ति क्षीण होने से भारत के प्राचीन गणराज्यों का पुनरुत्थान हुआ। शकों के पराजय का श्रेय मालवगण के योद्धाओं के साथ सातकर्णी को भी है। उनके गण की पुनःस्थिति से एक नये संवत् का प्रारम्भ हुआ। जो बाद में विक्रम संवत् कहलाया। 

भारतीय अनुश्रुति का शकारि या शकनिषूदक राजा सातकर्णी ही था। इसे इसकी विजयों के कारण विक्रमादित्य भी कहा गया। 

राज्य उत्कर्ष 

सातकर्णी का उदय, सातवाहन राज्यों के उत्कर्ष का काल है। राजा सातकर्णी के उत्तराधिकारियों के केवल नाम ही पुराणों द्वारा प्राप्त होते हैं ये नाम पूर्णोत्संग (शासनकाल 18 साल) स्कन्धस्तमिभ (18 वर्ष) मेधस्वाति (18 वर्ष) लम्बोदर (18 वर्ष) है। 

जबकि सातकर्णी का शासनकाल 58 वर्ष है। यह प्रसिद्ध शक महाक्षत्रप नहपान (नहवाण) का समकालीन था और उसने नहपान को अपने आधीन किया था, इसका विवरण पूर्व में दिया जा चुका है। उसने अपने समीपवर्ती प्रदेशों में शक शासन का अंत किया था। 

नासिक जिला के जोगलथम्बी नामक गांव में सन् 1906 ई० में 13,250 सिक्कों का एक ढेर प्राप्त हुआ है, ये सारे सिक्के शक क्षत्रप नहपान के हैं, पर 

इनमें से दो तिहाई सिक्कों पर गौतमीपुत्र नाम भी अंकित है। । इससे यह पता चलता है गौतमीपुत्र सातकर्णी ने नहपान को पराजित किया था, उसको पराजित करने के बाद उसने उसके द्वारा प्रचलित सिक्कों पर अपने नाम की छाप लगवाई थी।

 इससे यह सिद्ध होता है कि गौतमीपुत्र सातकर्णी एक यशस्वी राजा था-उसने अपने वंश की शाक्ति और गौरव को बहुत आगे बढ़ाया था। 

नासिक में त्रिरहिम पर्वत पर एक गुहा की दीवार पर एक प्रशस्ति उत्कीर्ण है। उस प्रशस्ति से यह बात सामने आती है कि सातकर्णी की माता ने इस गुफा का दान किया था। 

उस गुफा का दान करने वाली स्त्री का नाम गौतमी बालश्री था-अपनी माता के नाम को सातकणी ने अपने नाम से पहले लगा रखा था-इसी वजह से वह गौतमी पुत्र सातकर्णी कहलाया।

 गुफा की प्रशस्ति में गौतमी बालश्री ने अपने प्रतापी पुत्र के बारे में बहुत-सी बातें उत्कीर्ण करवायी हैं।

अंकित शब्द इस प्रकार है- “असिक असक मुलक सुरठ कुकुर उपरान्त अनूप विदिय आकर अवन्ति के राजा, बिझ छवत पारिजात सहत्र कण्डगिरी मन्य सिरिख मलय यद्धि सेटगिरी चकोर पर्वतों के पति, जिसके शासन को राजाओं का मण्डल स्वीकार करता था, क्षत्रपों के दर्प और मान का मर्दन करने वाले, शक महल्वो, सात वाहन-कुल के यश के प्रतिष्ठायक, सब मण्डलों से अभिवादित चरण, अनेक क्षमरों में शत्रुसंघ को जीतने वाले, एक शूर एक ब्राह्मण, शत्रुजनों के लिए दुर्घर्ष सुन्दरपुर के स्वामी… ।” 

आदि इस लेख से स्पष्ट है, कि असक (अश्मक) मूलक (मूलक राजधानी प्रतिष्ठान) सुरठ (सौराष्ट्र) कुकुर (काठियावाड के समीप एक प्राचीन गण जनपद), अपरान्त (कोंकण) अनूप (नर्मदा की घाटी का प्रदेश) विदम (विदर्म बरार) आकर (विदिश का प्रदेश) अवन्ति गौतमीपुत्र सातकर्णी के साम्राज्य के अन्तर्गत आते हैं। जिन पर्वतों का वह स्वामी था, वे भी उसके साम्राज्य के विस्तार को सूचित करते हैं। 

विझ (बिन्ध्य) छवत (घूक्षवत या सातपुड़ा), पारिजात (पश्चिमी विध्यांचल), सहत्र (सहत्रादि) कण्हगिरी (कान्हेरी या कृष्णागिरी), सिट्टिन (श्रीपर्वत) मरम (मलयादि), यद्धि (महेन्द्र पर्वत) और चकोर (पुराणों में श्री पर्वत के सामीप की अन्यतम पर्वत माला), उसके राज्य के प्रभाव पर प्रकाश डालती हैं। 

इस प्रशस्ति से यह निश्चित हो जाता है कि गौतमीपुत्र सातकर्णी सच्चे अर्थों में सम्राट था। दक्षिणपत, काठियावाड़, महाराष्ट्र और अवन्ति के प्रदेश उसके मामाज्य के अन्तर्गत थे।

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