चन्द्रगुप्त मौर्य की जीवनी और इतिहास |Biography and History of Chandragupta Maurya

चन्द्रगुप्त मौर्य की जीवनी और इतिहास

चन्द्रगुप्त मौर्य की जीवनी और इतिहास |Biography and History of Chandragupta Maurya

मौर्य शासकों के बाद भारत में विदेशी शक-कुषाण राजाओं का शासन रहा, जो हूणों के विशाल आक्रमण के कारण मध्य एशिया से पलायन कर भारत में आ गए थे और अपना राज्य स्थापित कर लिया था। 

शक और कुषाण शासकों में राजा कनिष्क महान् और वीर शासक था। कनिष्क के बाद कोई राजा इतना वीर और शक्तिशाली नहीं हुआ जो साम्राज्य का विस्तार करता या विशाल साम्राज्य को उसी रूप में सुरक्षित रखता। 

फलतः कनिष्क का साम्राज्य छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटा। अनेक छोटे-छोटे राज्य बन गए। 

किसी में राजतंत्र और किसी में जनतंत्र स्थापि हुआ। राजतंत्रों में मथुरा और पद्मावती राज्य के नागवंश विशेष प्रसिद्ध हुए। जनतंत्र शासकों में मौघेद, भद्र, मलय और अजुर्नायन प्रसिद्ध थे।

गुप्त वंश का प्रारम्भ 

गुप्त वंश का प्रारम्भ एक वीर पुरुष श्रीगुप्त ने किया। राजा कनिष्क के बाद स्वतंत्र होने वाले छोटे-छोटे राज्यों में से ही एक राज्य में ही श्रीगुप्त का उदय हुआ था। गुप्त वंश का शासन काल साधारणतः 275 ई० में आरम्भ माना जाता है। 

वंश तालिकाओं के अनुसार गुप्त राजकुल प्रतिष्ठता गुप्त नाम का एक व्यक्ति था, ‘श्री’ उसका सम्मानजनक सम्बोधन था। वह महाराज कहलाता था। वह मगध के एक छोटे प्रदेश माण्डमिक का राजा था। चीनी यात्री इत्सिंग के यात्रा विवरणों से श्रीगुप्त पर प्रकाश पड़ता है। श्रीगुप्त का उत्तराधिकारी महाराज घटोत्कच हुआ।

कुछ मुद्राएं ऐसी प्राप्त हुई हैं जिस पर श्री घटोत्कच चन्द्रगुप्त या केवल ‘घट’ लिखा हुआ है। 

महाराजाधिराज चन्द्रगुप्त 

चन्द्रगुप्त मौर्य की जीवनी और इतिहास

घटोत्कच के बाद महाराजाधिराज चन्द्रगुप्त प्रथम हुआ। गुप्त वंश के पहले दो राजा केवल ‘महाराज’ कहे गए, पर चन्द्रगुप्त को ‘महाराजाधिराज’ कहा गया। 

प्राचीन समय में महाराज विशेषण अधीनस्थ सीमान्त राजाओं के लिए प्रयोग होता था, पर महाराजाधिराज केवल ऐसे ही राजाओं के लिए प्रयुक्त किया जाता था जो पूर्णतयः स्वाधीन और शक्तिशालीन शासक हो। 

सम्राट चन्द्रगुप्त ने अपने पूर्वजों के पूर्वी भारत में स्थित छोटे से राज्य को बहुत बढ़ा लिया था और ‘महाराजाधिराज’ पदवी ग्रहण कर ली थी। निश्चित रूप से पाटलिपुत्र चन्द्रगुप्त के अधिकार में आ गया था।

मगध तथा उत्तर प्रदेश के बहुत से प्रदेशों को जीत लेने के कारण चन्द्रगुप्त के समय में गुप्त साम्राज्य बहुत विस्तृत हो गया था। इन्हीं विजयों और राज्य विस्तार की स्मृति में चन्द्रगुप्त ने नया संवत् चलाया, जो गुप्त संवत के नाम से प्रसिद्ध है। 

चन्द्रगुप्त ने लिच्छवि राजकुमारी कुमार देवी से विवाह किया था इस बात की पुष्टि प्राप्त कुछ स्वर्णमुद्राओं से होती है। 

स्वर्ण मुद्रा में रानी को मुद्रिका प्रदान करते हुए राजा की मूर्ति खुदी हुई है तथा बायीं ओर क्रमशः चन्द्र अथवा चन्द्रगुप्त और कुमारी देवी तथा श्रीकुमार देवी लिखा हुआ है।

पीछे की ओर इन सिक्कों पर ‘लिच्छवत्रः’ लेख और सिंहवाहिनी दुर्गा की आकृति खुदी है। 

इन स्वर्ण मुद्राओं से इस बात का भी प्रमाण सामने आता है कि वह प्रतापी राजा था। 

इतिहासकार एलेन महोदय का विश्वास है कि इन सिक्कों का मुद्रण समुन्द्र गुप्त (चन्द्रगुप्त के पुत्र) ने अपने माता-पिता के स्मरण में कराया था। 

इतिहासकार निन्सेट स्मिथ के मतानुसार इस विवाह के (चन्द्रगुप्त और राजकुमारी कुमारदेवी) फलस्वरूप पाटलिपुत्र पर चन्द्रगुप्त को अधिकार मिल गया। 

चीनी यात्री इत्सिंग के अनुसार पाटलिपुत्र पर चन्द्रगुप्त का अधिकार था। लिच्छवियों से वैवाहिक और मैत्री सम्बन्ध बनाकर चन्द्रगुप्त ने अपनी शक्ति बहुत अधिक बढ़ा ली थी। 

 

उस समय मगध के उत्तर में लिच्छवियों का ही शक्तिशाली गणराज्य था। कुशाण काल के पश्चात् इस प्रदेश में सबसे प्रबल भारतीय शक्ति लिच्छवियों की ही थी। लिच्छवियों का सहयोग प्राप्त किए बिना चन्द्रगुप्त का अपने राज्य का विस्तार कर पाना सम्भव नहीं था।

चन्द्रगुप्त ने लिच्छवी राजकुमारी के अलावा अन्य कई विवाह कर रखे थे। उन रानियों से अनेक पुत्र थे–पर उसने लिच्छवि कुमार देवी से उत्पन्न पुत्र समुद्र गुप्त को ही अपना उत्तराधिकारी नियत किया था।

 कुमारदेवी लिच्छवी राजा की एकलौती पुत्री और उत्तराधिकारी थी। चन्द्रगुप्त से विवाह हो जाने के बाद चूंकि कुमार देवी के ही पुत्र को राजा बनाना था, अतः कुमार समुद्रगुप्त के बचपन से ही, उत्तराधिकारी घोषित होने के बाद, यदि लिच्छवियों ने चन्द्रगुप्त ने राज्य विस्तार में उसकी भरपूर सहायता की थी तो उसका कारण कुमार समुद्रगुप्त का उत्तराधिकारी होना ही था।

 कुछ समय बाद, लिच्छवी गण और चन्द्रगुप्त के गण राज्य मिलाकर एक हो गए थे। चन्द्रगुप्त और श्रीकुमार देवी का सम्मिलित शासन इन प्रदेशों पर माना जाता था।

 महाराजाधिराज चन्द्रगुप्त प्रथम बंगाल से प्रारम्भ कर पश्चिम में अयोध्या और प्रयाग तक के विशाल प्रदेश का स्वामी बन गया था। इस प्रतापी गुप्त सम्राट का शासन काल 315 से 328 ई० तक था।

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