अकबर की जीवनी और इतिहास | Biography and History of Akbar

अकबर की जीवनी

अकबर की जीवनी और इतिहास | Biography and History of Akbar

सम्राट अकबर के पूर्व का संक्षिप्त ऐतिहासिक परिचय 

सम्राट हर्षवर्धन के बाद भारत में छोटे-छोटे राज्यों का प्रचलन शुरू हुआ। इन छोटे-छोटे राज्यों के राजा आपस में लड़कर ही अपनी शक्ति का ह्रास करते रहे। ऐसा कोई राजा न हो सका, जो पूरे भारत के एक सूत्र में पिरोकर सम्राट कहलाने का अधिकारी बन सकता।

भारत के एकताविहीन राजाओं की कमजोरी का अध्ययन उस समय खुलकर सामने आया, जबकि देश में अरबों के आक्रमण का दौर आरम्भ हुआ। 1000 ई० से 1027 ई० तक महमूद गजनवी के एक के बाद एक 17 हमले भारत पर होते रहे। बर्बर लुटेरा देश की धन-सम्पदा लूट-लूट कर ले जाकर, गजनी में भरता रहा और भारतीय नरेश एक-दूसरे का मुंह देखते रहे।

आततायी लुटेरे ने हजारों भारतीयों को दास बनाकर ले जाकर गजनी के बाजार में बेचा, किसी भी भारतीय नरेश के खून में उबाल न आया। अनगिनत भारतीय नारियों के स्त्रीत्व से खिलवाड़ किया गया, किसी राजा का क्षत्रित्व इस बात के लिए न जगा कि वह बढ़कर अन्य राजाओं को एकता के सूत्र में बांधने का आह्वान करता और संयुक्त रणभेरी बजाकर महमूद गजनवी को ऐसा जवाब दिया जाता कि उसकी आने वाली पीढ़ियां भी भारत की ओर रुख न करतीं। 

महमूद गजनवी के बाद भारत फिर सम्भला तो लगभग डेढ़ सौ वर्ष बाद मुहम्मद गोरी ने भारत की ओर लूट के इरादे से कूच किया। राजपूत योद्धा, वीर पृथ्वीराज चौहान ने युद्ध भूमि में उसका मुकाबला कर ऐसी चोट लगायी कि युद्ध भूमि में गोरी के सैनिक अपने गाजी बादशाह को अकेला पड़ा, एड़ियां रगड़ते छोड़ भाग खड़े हुए। अपने गुलामों की वफादारी से गोरी को रात के अंधेरे में युद्ध भूमि में खोजकर जीवित बचाकर ले जाया गया जिससे इतिहास ने एक नयी करवट ली। 

एक वर्ष बाद ही मुहम्मद गोरी फिर वीर पृथ्वीराज चौहान से तलवार का जोर अजमाने तराइन के मैदान में उतरा। इस बार उसे कुछ भारतीय नरेशों का नैतिक बल भी प्राप्त हो चुका था। दैवयोग से इस युद्ध में पृथ्वीराज चौहान की हार हुई, उसने वीरगति पायी-पृथ्वीराज चौहान की हार ने सदियों तक भारत के माथे पर गुलामी की मुहर लगा दी।

गोरी ने बढ़कर दिल्ली, ग्वालियर के सिंहासन पर कब्जा कर भारत में सल्तनत वंश की नींव खड़ी कर दी। अपने गुलाम और वफादार सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक को दिल्ली की सल्तनत सौंपी-एकताविहीन आसपास के राज्यों पर आक्रमण कर उन्हें जीता जाता रहा। सल्तनत वंश के शासक राज्य का विस्तार करके रहे।

इतिहास एक नया लेख लिखने के लिए मचल रहा था। 1526 ई० में पानीपत के मैदान में तैमूर और चंगेज के वंश के मिश्रित बाबर ने, इब्राहीम लोदी को पानीपत के मैदान में हराकर, सल्तनत वंश का खात्मा कर, मुगल वंश की नींव डाल दी। उसने इब्राहीम लोदी को हराकर और उसकी हत्या कर तुरन्त दिल्ली और आगरा की गद्दी पर कब्जा कर लिया। 

सन् 1530 ई० में बाबर के निधन के बाद उसका पुत्र हुमायूं द्वितीय मुगल शासक के रूप में सिंहासनारूढ़ हुआ। उस समय तक मुगल साम्राज्य की सीमा सिन्धु देश से ऊपर सुल्तान और अफगानिस्तान, समरकंद तक फैली हुई थी, ये वे हिस्से थे, जिन्हें जीतता हुआ बाबर भारत आया था। 

हुमायूं का शासन लुढ़कता-पुढ़कता चलता रहा। चौसा और कालिंजर युद्ध में शेरशाह के मुकाबले में उसकी हार हुई। चौसा युद्ध के बाद किसी तरह बचकर दिल्ली पहुंचकर हुमायूं अपनी जान और हुकूमत सम्भालने में सफल रहा था; पर कालिंजर युद्ध में पुनः शेरशाह के हाथों हुई हार ने हुमायूं के भाग्य के द्वार पर शनि का प्रकोप लगा दिया। 

सन् 1540 ई० में शेरशाह से कालिंजर में हारकर हुमायूं ने अपनी हुकूमत गवां दी। दिल्ली-आगरा पर शेरशाह का अधिकार हो गया। 1545 में शेरशाह की मृत्यु कालिंजर में हुई, वहां वह युद्ध का संचालन कर रहा था और अपने पक्ष द्वारा नगर द्वार पर गोला बरसाए जाने और गोले के फटकर शेरशाह की ओर आने के कारण उसकी मृत्यु हो गयी। 

शेरशाह की जीवित रहते, हुमायूं ने भारत वापसी की हिम्मत न की। वह ईरान के क्षेत्रों में अपने पिता बाबर के समय के वफादार सेनापति बैरम खां के वनवास के बाद शेरशाह के कमजोर उत्तराधिकारियों से सत्ता वापस लेने के इरादे से हुमायूं भारत लौटा। दिल्ली-आगरा के बलहीन शासक से सत्ता छीनकर एक बार फिर भारत में मुगल सत्ता स्थापित करने का प्रयास किया। सन् 1555 ई० में दिल्ली और आगरा के समीपस्थ प्रदेशों पर अधिकार स्थापित कर लिया था। हुमायूं के नसीब में भारत का शासक अधिक दिन तक बनना बदा न था। सीढ़ियों पर पैर फिसलकर गिरने से उसकी मृत्यु हो गयी। 

हुमायूं के निधन का समाचार जब पंजाब में पहुंचा तो उस समय, गुरदासपुर जिले में स्थित कलानौर के एक बाग में हुमायूं पुत्र अकबर का संरक्षण बैरम खां ने 14 फरवरी, 1556 ई० में उसका राज्याभिषेक कर दिया। उस समय अकबर की उम्र तेरह वर्ष से कुछ माह कम थी। अल्पवयस्क अकबर का संरक्षक बनकर बैरम खां ने सत्ता की बागडोर अपने हाथों में ले ली।

अकबर का जन्म और राज्याभिषेक 

Biography and History of Akbar

अकबर के पिता हुमायूं और पितामह बाबर का संक्षिप्त परिचय देने के बाद अकबर के जन्म विवरण में उसके पिता हुमायूं के बारे में कुछ विवरण और भी लिखना रोचक और समीचीन है। 

इतिहासकार लेनपूल ने हुमायूं के विषय में अच्छी टिप्पणी की है- 

“वह जीवन भर लुढ़कता रहा, लुढ़कर ही उसकी मृत्यु हुई।”

अकबर का प्रारम्भिक जीवन 

अकबर का जन्म 15 अक्टूबर, 1542 ई० में अमरकोट नामक स्थान पर हुमायूं की नवविवाहित पत्नी हमीदाबानू बेग के गर्भ से हुआ था। उस समय हुमायूं शरणार्थी का जीवन व्यतीत कर रहा था। 

उसकी आर्थिक दशा बड़ी दयनीय थी। जब हुमायूं को पुत्र जन्म का समाचार मिला तो उसके पास अपने सैनिकों और साथियों को भेंट-उपहार देने के लिए कुछ भी धन न था। उसके पास एक कस्तूरी थी। कस्तूरी को तोड़कर उसने अपने साथियों में बांटी थी तथा आशा प्रकट की थी कि जिस प्रकार इस कस्तूरी की सुगंध कमरे में फैली है उसी प्रकार उसके पुत्र का यश विश्व में फैले। हुमायूं ने अपने पुत्र का नाम जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर रखा। 

यहां इस बात की भी जानकारी आवश्यक है कि हमीदा बानू बेगम ईरान के, अपने वक्त के सबसे प्रसिद्ध शिया मुस्लिम सम्प्रदाय के धर्मगुरु की पुत्री थी। बाबर का सिपहसालार और हुमायूं का हितैषी बैरम खां भी शिया सम्प्रदाय का था। उसने 1540 ई० में शेरशाह से हारकर भारत से पलायन करने वाले 

हुमायूं का हित साधने के लिए कुशल नीति पर चलते हुए हुमायूं का विवाह शिया सम्प्रदाय के उच्च घराने की युवती से करा दिया था। इस विवाह के परिणामस्वरूप शियाओं के सबसे अधिक बलशाली युवाओं, अब्बासियों को सैनिक शक्ति मिल गयी थी। उन्हीं के बल पर हुमायूं ने भारत की ओर पलटकर आने की हिम्मत संजोयी थी।

अकबर का जन्म, हमीदा बानू बेगम से ब्याह करने के एक वर्ष के अन्दर ही हो गया था। 

अकबर के जन्म के बाद फारस के शासक शाह की सहायता भी हुमायूं को प्राप्त हो गयी थी। फारस का शासक शाह भी शिया सम्प्रदाय का था। 

फारस के शाह की सहायता प्राप्त कर, अपनी सैनिक शक्ति बढ़ा, हुमायूं ने गंधार की ओर प्रस्थान किया। सौभाग्य से उसे हुमायूं को कांधार पर विजय प्राप्त करने में सफलता मिली।

कान्धार विजय के बाद हुमायूं फिर बादशाह हो गया था। उसके पास कान्धार में जमे रहने और अपनी शक्ति बढ़ाने का भरपूर अवसर था। 15 नवम्बर, 1545 ई० में हुमायूं काबुल को भी अपने अधिकार में लेने में सफल रहा। पर काफी समय तक काबुल में उसके भाइयों ने उसे स्थायी रूप से जमने का अवसर न दिया। उसके भाई कामरान और असकरी पहले से ही सत्ता सम्भाले हुए थे। बाबर ने अपने पुत्रों कामरान और असकरी को सिन्धु पार के देशों की हुकूमत सम्भालने की जिम्मेदारी सौंप रखी थी। भला वे कैसे बरदाश्त करते की हुमायूं उनकी बादशाहत छीन लेता।

 हुमायूं जब कान्धार पर आक्रमण कर रहा था तब कामरान ने किसी तरह शिशु अकबर को प्राप्त कर, किले की दीवार के सामने लटका दिया था, ताकि उसकी मौत की आंशका से हुमायूं आक्रमण न कर सके; पर कान्धार पर हमला कर उसे जीतने में हुमायूं सफल रहा, शिशु अकबर का बाल भी बांका न हुआ था। 

काबुल पर अधिकार पाने के बाद हुमायूं की शक्ति दुगुनी हो गयी थी। हुमायूं ने सबसे पहले असकरी और कमरान की बादशाहत पर आक्रमण करने का इरादा इसलिए बनाया था क्योंकि दिल्ली-आगरा की हुकूमत खोने के बाद जब हुमायूं मारा-मारा फिर रहा था, तब उसने अपने भाइयों असकरी और कामरान से सैनिक सहायता की मांग की थी, ताकि पिता की जीती हुकूमत को वह वापस पा सके; पर दोनों ने हुकूमत वापस पाने में सैनिक सहायता देना तो दूर की बात, उसे किसी भी प्रकार की आर्थिक सहायता देने से भी इंकार कर दिया था। यही वजह थी कि हुमायूं जब सैनिक शक्ति से मजबूत हुआ तो सबसे पहले भाइयों से ही निपटने की सोची। वह सफल रहा। 

अकबर की शिक्षा-दीक्षा और गज़नी की सूबेदारी

कान्धार और काबुल का शासक बन जाने के बाद हुमायूं ने अपने पुत्र अकबर को शिक्षित-दीक्षित करने के लिए योग्य शिक्षकों की नियुक्ति की। उस समय अकबर की उम्र पांच वर्ष हो गयी थी। शिक्षकों के काफी प्रयास के बाद भी अकबर का मन पढ़ने-लिखने में न लगा। उसे खेलकूद और शिकार से ही प्रेम था। वह वर्णमाला तक का सही तरह से ज्ञान न कर सका। अलबत्ता घुड़सवारी तलवार चलाना आदि शौर्यपूर्ण कलाओं में शीघ्र दक्ष हो गया। 

सन् 1551 ई० में असकरी का निधन हो गया, तब अल्पायु अकबर को गजनी का सूबेदार नियुक्त कर, वह भारत विजय के लिए आगे बढ़ा। उस समय अकबर की आयु केवल 9 वर्ष थी।

अकबर ने आगे बढ़ते पिता का सहयोग करते हुए ‘सरहिन्द’ के युद्ध में उसकी सहायता की। सरहिन्द की विजय और अकबर के कुशल योद्धा रूप से प्रसन्न होकर हुमायूं ने उसे युवराज घोषित करते हुए लाहौर का सूबेदार नियुक्त कर दिया।

1551 ई० से 1555 ई० के बीच, सिन्ध-पंजाब विजय करते हुए हुमायूं दिल्ली फतह करने में सफल हुआ था।

सन् 1556 में भारत की राजनैतिक स्थिति 

जिस समय हुमायूं के निधन का समाचार मिला, उस समय साढ़े बारह वर्षीय अकबर, अपने सेनापति बैरम खां के साथ पंजाब विजय कर रहा था। 

राज्याभिषेक कराकर अकबर ने दिल्ली आकर, पिता की विरासत रूपी सत्ता सम्भाली। 

उस समय भी बैरम खां उसका संरक्षक था। वह अकबर के लिए अपना विजय अभियान चलाए हुए था, अगले पांच वर्षों तक; जब तक अकबर ने पूर्ण वयस्कता प्राप्त कर, खुद सत्ता की कमान न सम्भाल ली, सारी विजयें बैरम खां ने अकबर के नाम पर करके, उसके राज्य का विस्तार किया। 

पर अल्पवयस्क अकबर के सत्तासीन होने के बाद भी उसका साम्राज्य निष्कंटक रूप से न चल रहा था। उसके सामने अनेक कठिनाइयां थीं-

1.काबुल को अकबर के सौतले भाई मुहम्मद हकीम ने अपने अधिपत्य में कर लिया था। वह पंजाब को अपने अधिकार में करने के लिए प्रयत्नशील था।

2. पंजाब में, शेरशाह का उत्तराधिकारी सिकंदर सूर अपनी सत्ता स्थापित करने के प्रयास में लगा हुआ था।

3. शेरशाह का एक अन्य उत्तराधिकारी इब्राहीम सूर पुनः दिल्ली पर स्थापित होने का सपना संजो रहा था। उसने दिल्ली के पूर्वी क्षेत्र को अधिकार में लेकर ‘विक्रमादित्य’ की उपाधि धारण कर ली थी।

4. बंगाल पर अफगानों का अधिकार था। वह दिल्ली साम्राज्य से पूर्णतः अलग था।

5. राजपूताना में राजपूतों ने शेरशाह की मृत्यु के बाद पुनः अपनी शक्ति की स्थापना का प्रयास कर रहे थे।

6. मालव और गुजरात भी पूर्णतः स्वतंत्र था।

7. मध्य भारत और गौंडवाना भी दिल्ली साम्राज्य से पूरी तरह आजाद थे।

8. दक्षिणी भारत के मुस्लिम राज्यों का दिल्ली से कोई मतलब न था, वे हिन्दू साम्राज्य विजयनगर से संघर्षरत थे।

9. मारवाड़ का राजा मालदेव, राजपूत जाति का प्राचीन गौरव पुनः स्थापित करने के लिए प्रयत्न कर रहा था।

उपरोक्त कारणों के अलावा अकबर के निष्कंटक साम्राज्य में दो बाधाएं और भी उपस्थित थीं-प्रथम समस्या यह थी कि अकबर को राजकोष खाली मिला था, जिसकी वजह से वह शीघ्रता से नये सैनिकों की भर्ती न कर सका था।

दूसरी समस्या यह कि सैनिक वृत्ति अपने वाले अभी असमंजस में थे कि अल्पवयस्क अकबर का राज्य स्थायी रहने वाला है या नहीं। 

इन सभी परिस्थितियों से ऊपर सबसे सौभाग्य की बात अकबर के लिए यह थी कि उसे बैरम खां जैसा सेनापति और संरक्षक मिला हुआ था। बैरम खां की वफादारी हुमायूं के प्रति पूर्ण समर्पित थी। 

उसी समर्पण की भावना से यह अकबर के साम्राज्य को स्थिरता और मजबूती देने के प्रयास में लगा हुआ था। यही वजह थी कि अकबर जब वयस्क हुआ तथा सम्पूर्ण सत्ता अपने हाथ में ली, तब उसका साम्राज्य न केवल उपरोक्त सभी बाधाओं से पार निकल गया, बल्कि साम्राज्य का काफी विस्तार भी हो चुका था। 

बैरम खां की योग्यता, शूरवीरता और दूरदर्शिता 

बैरम खां ने अकबर के संरक्षक के रूप में, उसे दिल्ली सिंहासन पर आसीन कराकर उन सभी आपत्तियों से अकबर को निकालने की चेष्टा की, जो उसके लिए कंटक रूप में विद्यमान थी। उसने सबसे पहले अफगानों की ओर ध्यान दिया, जो साम्राज्य के लिए चुनौती बने हुए थे। 

सर्वप्रथम उसने अफगान सरदार अब्दुल माली के विरोध को दबाकर, उसे पकड़कर बंदीगृह में डाल दिया, ताकि अफगानों का विरोध, अपने सरदार के बंदीगृह में डाल दिये जाने के कारण ढीला पड़ जाए। अब्दुल माली बंदीगृह में था जिससे अफगानों को संदेश जा रहा था कि यदि उन्होंने विरोध या विद्रोह किया तो उनके सरदार का सिर उड़ा दिया जाएगा। 

बैरम खां के इस समझदारी भरे कदम से कुछ समय के लिए अफगान खामोश हो गए, उनकी खामोशी के समय का लाभ उठाकर उसने आदिल शाह की शक्ति से निपटने की योजना बनायी।

हेमू की पराजय

हेमू की पराजय

अकबर को अल्पव्यस्क शासक मानकर, अफगानी नेता आदिलशाह ने अपने योग्य और वीर सेनापति हेमू को दिल्ली-आगरा पर अधिकार के लिए भेजा। उस समय खुद बैरम खां पंजाब विजय में लगा हुआ था। उसने तर्दीबेग नामक सेनापति को दिल्ली-आगरा रक्षा के लिए नियुक्त कर रखा था। हेमू ने ग्वालियर के समस्त क्षेत्र कब्जा कर, आगरा पर आक्रमण कर, उस पर अधिकार कर दिल्ली पर आक्रमण किया। 

हेमू की विशाल सेना के सामने तर्दीबेग खुद को असहाय महसूस कर मैदान छोड़कर पंजाब की ओर भागा। 

बैरम खां सूचना पाते ही पंजाब से पलटकर आया। तर्दीबेग से सामना होते ही, उसकी कायरता के लिए उसे तलवार के घाट उतारकर अपने सैनिकों का उत्साह बढ़ाया। 

अभी हेमू का पूरा अधिकार दिल्ली पर न हो पाया था कि बैरम खां ने पानीपत के मैदान में हेमू से टकराने का निर्णय ले लिया। 

हेमू के पास विशाल सेना थी, जबकि बैरम खां के पास छोटी-सी सेना थी। हेमू के पास तोपखाना भी था, जो पीछे-पीछे चल रहा था। बैरम खां ने कुशल रणनीति के तहत पहले शत्रु के तोपखाने पर आक्रमण करके उस पर कब्जा जमाया। फिर उसी छोटी सेना के बल पर हेमू की विशाल सेना से टकरा गया। इसी पानीपत के युद्ध में इब्राहीम लोदी की विशाल सेना से बाबर टकराया था। इब्राहीम लोदी को पराजित कर दिल्ली-आगरा पर अधिकार किया था, इसी पानीपत के युद्ध में अपने सैनिकों उत्साहित करते हुए, बाबर की वीरगाथा याद दिलाते हुए, सैनिकों को दुश्मन पर तीर वर्षा का आदेश दिया। 

बैरम खां की सेना की तीर वर्षा युद्ध ने बैरम खां के भाग्य का साथ दिया। एक तीर हेमू की आंख में लगा। वह हाथी के हौदे से नीचे आया। सेनापति हेमू के जख्मी होकर गिरते ही आदिलशाह की सेना के पैर उखड़ गए। बैरम खां ने हेमू का सिर काटकर अपनी विजय पताका फहरा दी।

पानीपत के द्वितीय यद्ध में अफगान सेना की हार ने भारत में मुगल साम्राज्य की पुनः स्थापना पर मुहर लगा दी। युद्ध में मुगलों को पर्याप्त युद्ध सामग्री और धन की प्राप्ति हुई। बैरम खां ने आगे बढ़कर शीघ्र ही आगरा और दिल्ली के क्षेत्रों को अपने अधिकार में कर लिया। हेमू की पराजय और उसकी मृत्यु से अकबर के सबसे बड़े प्रतिद्वन्द्वी का अन्त हो गया।

मेवाड़ पर आक्रमण 

दिल्ली-आगरा पर पूरा अधिकार करने के बाद बैरम खां रुका नहीं, उसके हाथ अफगानों की सेना का छोड़ा हुआ अस्त्र-शस्त्र का बहुत बड़ा भण्डार तथा धन लगा था। उसने सेना सुदृढ़ की और मेवात पर आक्रमण कर उसे अपने अधिकार मे लिया। उसे मेवात के राजकोष से भी बहुत बड़ा धन भण्डार मिला।

सिकंदर सूर का दमन 

सन् 1557 ई० में बैरम खां ने सिकंदर सूर पर धावा बोला। उसे पराजित करके आत्म-समर्पण के लिए विवश कर लिया।

ग्वालियर, जौनपुर की विजयें 

1158-60 ई० के बीच बैरम खां ने ग्वालियर तथा जौनपुर के प्रदेश जीतकर मुगल साम्राज्य में शामिल कर लिये।

रणथम्भौर विजय 

रणथम्भौर विजय 

सन् 1559 ई० में बैरम खां ने रणथम्भौर पर आक्रमण कर राजपूतों को पराजित किया। पर वह उसे मुगल साम्राज्य में शामिल कराने की युक्ति में सफल न हो सका। 

बैरम खां की भूमिका और निधन 

बैरम खां 16 वर्ष की आयु में बाबर की सेना में भर्ती हुआ था। वह बाबर के जीवित रहते उसका विश्वस्त रहा। बाबर के निधन के बाद हुमायूं की सेवा में रहा। हुमायूं पर बुरा वक्त आने पर (शेरशाह से हारकर भारत छोड़ने पर) भी वह साये की तरह उसके साथ रहा। उसकी युक्ति से ही हुमायूं शक्तिशाली बना और भारत की सत्ता फिर हासिल की। हुमायूं के समय वह प्रधान सेनापति रहा। हुमायूं के निधन के बाद अकबर का संरक्षक बना, उसे सत्तासीन किया और उसके अल्पयुवावस्था काल में उसके लिए विजयें कीं। 

सन् 1556 ई० से 1560 ई० तक के समय के बारे में कहा जा सकता है, बैरम खां ही अकबर के साम्राज्य का सर्वोपरि रहा। उसका अत्यधिक विश्वस्त होना ही उसके लिए घातक हुआ। 

सन् 1560 ई० में जब अकबर ने, वयस्क व्यवस्था में पहुंचकर साम्राज्य की नकेल पूरी तरह अपने हाथ में ले ली, तो राजमहल की बेगमों को चिन्ता हुई कि कहीं बैरम खां अकबर की सम्पूर्ण सत्ता अपने हाथों में लेने के प्रति विरोध में न खड़ा हो जाए। उन्होंने अकबर के कान भरकर अकबर को सलाह दी कि बैरम खां को ‘हज’ के लिए मक्का-मदीना भेज दिया जाए। अकबर स्वयं भी इस बात को सोच रहा था। वह स्वच्छंद रूप से पूरे साम्राज्य की बागडोर अपने हाथों में लेना उचित मानता था, उसने बैरम खां को हजयात्रा पर जाने का फरमान सुना दिया। 

बैरम खां, पत्नी सलीमा तथा पुत्र अब्दुलर्रहीम के साथ हजयात्रा पर खुशी-खुशी रवाना हुआ। गुजरात के पाटन नामक स्थान पर मुबारक खां नाम एक अफगान युवा ने, 1560 ई० में रात के समय उसके खेमें में घुसकर बैरम खां की हत्या कर दी। दरअसल मुबारक खां ने यह हत्या प्रतिशोध स्वरूप की थी। उसके पिता की मच्छीवाड़ा के युद्ध में बैरम खां के हाथों हत्या हुई थी। तभी से मुबारक खां इस बात की कसम खाये बैठा था कि वह अपने बाप के हत्यारे की हत्या कर प्रतिशोध चुकाएगा। संयोग से यह अवसर उसे बैरम खां के हजयात्रा पर रवाना होने के समय, पाटन नामक स्थान पर सुरक्षा की कमी होने की वजह से मिल गया। 

बैरम खां की हत्या का समाचार सुन अकबर को अत्यधिक दुःख हुआ। उसने सेना भेजकर उसकी बेवा सलीमा को तथा पुत्र अब्दुर्रहीम को ससम्मान महल में बुलवाया। बैरम खां की बेवा सलीमा से शादी कर ली। अब्दुर्रहीम को पुत्रवत् शाही महल में परवरिश पाने का इंतजाम किया। 

आगे चलकर अब्दुर्रहीम को ‘खानखाना’ के पद से अकबर ने सम्मानित किया। उसे अपना सेनापति बनाया। अब्दुर्रहीम ने नीतिपरक काव्य साहित्य लिखा-अब्दुर्रहीम का काव्य रचना; हिन्दी साहित्य में महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है। 

अकबर की महत्त्वपूर्ण विजयें 

बैरम खां की हत्या के बाद अकबर पूर्ण रूप से स्वच्छंदता से साम्राज्य की बागडोर हाथ में लेकर खुद को कुशल शासक सिद्ध करना चाहता था। उसके नेतृत्व की प्रमुख विजय में इस प्रकार हैं-

जौनपुर विजय-सेनापति जमाल खां के नेतृत्व में जौनपुर विजय 1560 ई० में सम्पन्न हुई।

चुनार किले की विजय-सेनापति आसफ खां के नेतृत्व में चुनार किले की विजय 1561 ई० में सम्पन्न हुई।

मालवा विजय-मालवा के शासक बाजबहादुर के विरुद्ध 1561 ई० के शुरूआती माह में सेनापति आसफ खां के नेतृत्व में अकबर की सेना रवाना हुई। 29 मार्च, 1561 ई० में मालवा की राजधानी ‘सारापुरा’ पर मुगल सेना ने अधिकार प्राप्त कर लिया। अगली सैनिक टुकड़ी अब्दुल्ला खां उजबेग के नेतृत्व में भेजी। युद्ध में बाज बहादुर की हार हुई। उसने अधीनता स्वीकार कर ली। अकबर ने उसे अपने दरबार में द्विहजारी मनसब का पद प्रदान कर उसे स्वतंत्र शासक होने के प्रभुत्व को खत्म कर दिया।

गोंडवाना विजय-आसफ खां के नेतृत्व में 1564 ई० में अकबर की सेना गोंडवाना के लिए रवाना हुई। वहां की शासिक महोबा की चन्देल राजकुमारी ‘रानी दुर्गावती’ थी, जो अपने अल्पायु पुत्र ‘वीरनारायण’ की संरक्षिका का कार्य कर रही थी। रानी दुर्गावत ने दृढ़ता से युद्ध किया। हार का मुंह देखने के बाद रानी तथा उसका अल्पायु पुत्र दोनों ही मृत्यु हो प्राप्त हुए। इस तरह गोंडवाना मुगल साम्राज्य के अधीन हो गया।

आमेर (जयपुर) के शासक की अधीनता-सन् 1562 ई० में अकबर जब अजमेर के शेख मुईनउद्दीन चिश्ती की दरगाह की ओर बढ़ रहा था, तो आमेरके शासक भारमल ने उससे भेंट कर उसकी अधीनता स्वीकार कर ली। अकबर ने भारल के दत्तक पुत्र भगवान दास और उसके पौत्र मानसिंह को उच्च मनसब प्रदान किया। 

मेड़ता विजय-सन् 1562 में मारवाड़ स्थित मेड़ता पर आक्रमण कर मेड़ता दुर्ग अपने अधिकार में कर लिया। चित्तौड़ विजय-1567 ई० की अकबर की चित्तौड़ विजय अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। चित्तौड़ का शासक उदयसिंह था। उदयसिंह हार के डर से चित्तौड़ दुर्ग छोड़कर जंगलों की ओर चला गया। पर दुर्ग रक्षक जगमल और उसका भाई फतह सिंह उर्फ फत्ता ने 800 राजपूत योद्धाओं के साथ मिलकर जैसा अवर्णनीय युद्ध किया; वह इतिहास में अमर हो गया। दोनों वीरगति प्राप्त होने तक लड़ते रहे। जगमल और फत्ता की शौर्य से अकबर इतना प्रभावित हुआ कि उसने विजय के बाद दुर्ग के द्वार पर दोनों भाइयों की प्रस्तर मूर्तियां लगवाईं।

रणथम्भौर विजय-बैरम खां ने रणथम्भौर पर आक्रमण किया था, पर सफल न हुआ। उसके छोड़े अधूरे कार्य को अकबर ने पूरा किया। उस दुर्ग पर बूंदी के राजपूत राज सुर्जन राय का अधिपत्य था। अकबर ने स्वयं अपनी देखरेख में सुरंगें बिछवायीं। दुर्ग की दीवारें तुड़वायीं, तब सुर्जन राय उसकी संधि और अधीनता में आने को तैयार हुआ।

कालिंजर विजय-उस समय कालिंजर दुर्ग पर रीवा के राजा रामचन्द्र का अधिकार था। अकबर की सेना 1569 में कालिंजर विजय के लिए रवाना हुई। रामचन्द्र ने आत्मसर्पण और संधि की नीति अपनाई। अकबर ने कालिंजर दुर्ग पर अधिकार कर इलाहाबाद के समीप एक इलाके में रामचन्द्र को एक जागीर भेंट कर उसे वहां भेज दिया। मारवाड़ का अधिपत्य-नवम्बर, 1570 ई० में अकबर नागौर गया, जहां बीकानेर और जोधपुर के राजपूत राजाओं ने स्वयं अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली। कुछ समय बाद जैसलमेर के राजा हरिराय ने भी अधीनता स्वीकारी। अकबर ने बीकानेर और जैसलमेर की राजकुमारियों से वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित कर अपनी स्थिति अधिक सुदृढ़ की। इस प्रकार मेवाड़ के अतिरिक्त मारवाड़ के राज्यों पर अकबर का अधिपत्य हो गया। 

अकबर ने आमेर के राजा से भी मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध स्थापित किया, जिसके कारण उसे कछवाहा राजपूतों का सहयोग भी प्राप्त हो गया। उसने चित्तौड़ पर भी आक्रमण कर अधिकार प्राप्त कर लिया, राणा उदयसिंह को अरावली की पहाड़ियों में जाकर शरण लेनी पड़ी थी। इस तरह रणथम्भौर, कालिंजर, जोधपुर और बीकानेर अकबर के साम्राज्य क्षेत्र में आ गए थे। 

गुजरात विजय-राजपूतों के एक बड़े भूभाग पर अपना अधिपत्य स्थापित कर लेने के बाद अकबर ने गुजरात विजय की ओर अपना पूरा ध्यान लगाया। उस समय गुजरात पर मुजफ्फर खां द्वितीय शासन कर रहा था। उसके शासन से खुद उसके निकटस्थ लोग असन्तुष्ट थे, एक दल के सरदार एतमाद खां ने अकबर को गुजरात पर आक्रमण करने के लिए आमंत्रित किया। उसने सेनापति काले खां के नेतृत्व में गुजरात विजय के लिए सेना भेजी। नवम्बर, 1572 ई० में मुगल सेना का अहमदनगर पर अधिकार हो गया। मुजफ्फर खां बंदी बना लिया गया।

अहमदनगर पर अधिकार करने के बाद अकबर की सेना ने खम्भात की ओर प्रस्थान किया। पुर्तगाली व्यापारियों ने सेना का भव्य स्वागत किया। उसके बाद सूरत पर भी अधिकार हो गया।

सेना के वापस आते ही गुजरात में मुगल साम्राज्य के विरुद्ध विद्रोह होना आरम्भ हो गया। जिसे दबाने के लिए खुद अकबर को वहां जाना पड़ा। 600 मील की यात्रा महज 11 दिन में पूरी कर वहां पहुंच जाने वाले अकबर ने विद्रोहियों को कड़ा दण्ड दिया।

विद्रोह पूरी तरह से दबा दिया गया। प्रसिद्ध इतिहासकार विन्सेन्ट स्मिथ ने द्वितीय गुजरात अभियान को इतिहास के द्रुतगामी आक्रमण के नाम से सम्बोधित किया है।

बिहार और बंगाल विजय-हुमायूं के शासनकाल में बिहार और बंगाल पर मुगलों का नाम-मात्र का अधिकार था। सन् 1572 ई० में सुलेमान करानी नामक अधीनस्थ के निधन के बाद उसके पुत्र दाऊद ने खुद को मुगल सत्ता से स्वतंत्र घोषित कर दिया था। अकबर ने स्वयं बिहार-बंगाल अभियान सम्भाला था। उसने जौनपुर के मुगल शासक मुमीम खां को दाऊद को दण्ड देने के लिए भेजा। दाऊद खां के विद्रोह को दबा दिया गया तथा वहां पूर्ण रूप से मुगलों का अधिकार हो गया।

हल्दी घाटी का युद्ध-राजपूताना के अधिकांश क्षेत्र पर अधिकार हो जाने के बाद अभी तक अकबर की मेवाड़ विजय पूरी न हो सकी थी। राजा उदयसिंह की मृत्यु हो गयी थी। उसका योग्य पुत्र देशभक्त राणा प्रताप मेवाड़ का राजा हुआ। पिता के निधन के बाद प्रताप का राज्याभिषेक हुआ था। विसेंट स्मिथ के अनुसार-“प्रताप का देशप्रेम ही अकबर की नजरों में अपराध था।” 

अतः उसने समस्त मेवाड़ को अपने अधिकार में करने तथा राणा प्रताप की स्वतंत्रता का सदा के लिए अन्त करने का संकल्प लिया था। उसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए अकबर ने राणा प्रताप से निर्णायक युद्ध की ठानी। उस युद्ध को रचने के लिए अकबर के राजपूत सेनापति मानसिंह ने खास भूमिका अदा की थी। वह प्रताप से अपमानित होकर लौटा था। अकबर के खूब कान भरे थे।

अकबर ने दो-दो सेनापतियों-मानसिंह तथा आसफ खां की अध्यक्षता में राणा प्रताप पर विजय के लिए सेना भेज दी थी।

अकबर की ओर से सेना चल पड़ने की खबर पाकर राणा प्रताप भी वीर राजपूतों को लेकर हल्दी घाटी के मैदान में आ डटे थे।

हल्दी घाटी के मैदान में राणा प्रताप की सेना और अकबर की सेना के बीच अविस्मरणीय, ऐतिहासिक युद्ध हुआ।

इस युद्ध में राजपूती सेना ने अपने राणा के सम्मान की रक्षा के लिए ऐसा युद्ध किया कि दुश्मनों के छक्के छुड़ा देने की कहावत चरितार्थ हुई, पर विशाल और दो-दो सेनापतियों की अध्यक्षता में आयी मुगल सेना के सामने वीर रणबांकुरों का बलिदान कमजोर साबित हुआ।

राजपूतों की हार देख, राणा के वफादार साथी राणा को युद्धभूमि से बचाकर युद्ध भूमि से बाहर निकाल ले गए। इस युद्ध में राणा का वफादार घोड़ा चेतक बुरी तरह से जख्मी हुआ। राणा के वफादार साथियों ने राणा को युद्ध भूमि में बलिदान देने के बजाय बच निकलने का परामर्श यह कहते हुए दिया कि अगर आप जीवित रहते हैं तो राजपूतों का सम्मान बरकरार रहता है, आपके बाद राजपूतों का मान न रह पाएगा। राणा प्रताप ने हितैषियों का परामर्श मानकर युद्ध भूमि छोड़ दी थी। इस प्रकार हल्दी घाटी के युद्ध में अकबर को विजय मिली। मगर, मानसिंह और अकबर के मन में राणा के जीवित बच निकलने की फांस गड़ गयी। जो राणा के जीवित रहते उन्हें कष्ट देती रही। विजय के बाद भी मेवाड़ पर अकबर का पूर्ण अधिकार न हो सका।

राणा प्रताप ने कुछ समय बाद ही राजपूतों की शक्ति संगठित करके एक के बाद एक दुर्गों पर आक्रमण और अधिकार करना आरम्भ कर दिया। उनकी मृत्यु के समय (15 जनवरी, 1597 ई०) तक अधिकांश मेवाड़ पर कुछ दुर्गों के अतिरिक्त उनका अधिकार था। 

काबुल पर अधिकार-सन् 1580 में अकबर विशाल सेना के साथ दिल्ली से चल पड़ा। सिंध प्रदेश को जीतता हुआ काबुल की ओर बढ़ा। काबुल विजय के बाद उसने मानसिंह को सिंध प्रदेश का अधिकार सौंपा। काबुल का शासक अकबर का सौतेला भाई मिर्जा मुहम्मद हकीम था। हकीम को हराने के बाद अकबर हकीम की बहन को काबुल का शासन सौंप आया था तथा उसे अपने अधीनता में कर लिया था। हकीम की मृत्यु 1585 ई० में हुई। उसके बाद काबुल को पूरी तरह से मुगल साम्राज्य में मिला लिया गया।

कश्मीर विजय-कश्मीर उस समय तक स्वतंत्र राज्य के रूप में था। वहां का शासक यूसुफ खां नामक व्यक्ति था। अकबर ने राजा भगवान दास तथा कासिम खां के नेतृत्व में एक विशाल सेना कश्मीर विजय के लिए भेजी। यूसुफ खां मुगल सेना का मुकाबला नहीं कर सका। उसने अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली।

सिंध विजय-अकबर ने दक्षिणी सिंध को अपने राज्य का हिस्सा बनाने के उद्देश्य से 1590 ई० में बैरम खां के पुत्र अब्दुल रहीम खानखाना के नेतृत्व में एक विशाल सेना भेजी। उस समय दक्षिणी सिंध पर मिर्जा जानी नामक व्यक्ति का कब्जा था। मिर्जा जानी ने मुगल सेना का जमकर मुकाबला किया; परन्तु वह पराजित हुआ। अकबर ने उसके साथ सद्व्यवहार किया, उसे सिंध का सूबेदार बनाया तथा उसको 3,000 का मनसब सरदार नियुक्त किया।

उड़ीसा विजय-उस समय उड़ीसा पर कुतलू खां नूहानी शासन कर रहा था। 

बंगाल के सूबेदार राजा मानसिंह ने अकबर के आदेशानुसार 1590 ई० में उड़ीसा पर आक्रमण किया। उस समय तक नूहानी की मृत्यु हो चुकी थी उसका पुत्र निसार खां सिंहासनासीन हुआ था। आक्रमण होने का समाचार पाकर निसार खां ने अकबर से संधि कर ली। अकबर ने उसे वहां का सूबेदार नियुक्त कर दिया।

बाद में 1592 ई० में उड़ीसा प्रदेश पर पुनः आक्रमण कर उसे जीतकर मानसिंह ने अपने अधिकार में कर लिया।

बिलोचिस्तान विजय-सन् 1595 ई० में अकबर ने सेनापति मीर कासिम के नेतृत्व में बिलोचिस्तान विजय के लिए सेना भेजी। उस समय बिलोचिस्तान पर अफगानों का अधिकार था। मुगल सेना के सामने अफगान सेना ठहर न सकी। वे परास्त हुए, इस प्रकार इस प्रदेश पर अकबर का अधिकार हो गया।

कन्धार विजय-कन्धार पर अकबर के पितामह बाबर का अधिकार हो चुका था। उस समय कन्धार फारस के शाह के अधीन था। काबुल विजय के बाद अकबर, कन्धार विजय को आवश्यक मानता था। उसने कन्धार की ओर अपनी सेना बढ़ाई। काबुल और कन्धार के मध्य युसूफजई कबीले के लोगों का कब्जा था। उनका दमन करके ही आगे बढ़ा जा सकता था। युसूफजइयों का दमन करने के लिए सेना बढ़ी तो उसे राजा बीरबल जैसे इंसान को खोना पड़ा। युसूफजइयों ने घात लगाकर हमला कर राजा बीरबल को मार डाला था। 

बीरबल के मारे जाने की घटना से अकबर को अत्यन्त दुःख हुआ। उसने युसूफजइयों का पूरी तरह से संहार करने का आदेश दिया। युसूफजइयों का दमन करने के बाद मुगल सेना की कंधार विजय आसान रही। आसान इस अर्थ में रही कि उस समय कंधार का शासक अन्य प्रदेशों में फैले उपद्रव को दबाने के लिए कंधार से काफी दूर था। फारस की सेना कंधार की रक्षा नहीं कर सकी। अकबर ने कंधार को अपने अधीनस्थ कर लिया। इन विजयों द्वारा अकबर अपनी उत्तरी-पश्चिमी सीमा को सुरक्षित करने में सफल रहा।

असीरगढ़ विजय-असीगढ़ का दुर्ग खान देश में स्थित था। दक्षिण भारत के मार्ग में पड़ने के कारण वह दक्षिण का फाटक कहलाता था। बिना असीरगढ़ दुर्ग पर विजय के दक्षिण भारत पर विजय करना असम्भव था। 

खानदेश का शासक राजा अली खां था। मुगल सेना के समय उसने युद्ध किया। वह युद्ध जीत न सका। उसने अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली। 

अकबर का साम्राज्य विस्तार 

उपरोक्त विजयों को सम्पन्न करने में अकबर का सम्पूर्ण जीवन व्यतीत हुआ। उसने 1558 ई० में विजय कार्य आरम्भ किया था, सन् 1576 तक उसके अधिकार में समस्त उत्तरी भारतवर्ष आ गया था। 

सन् 1580 से 1597 ई० तक वह उत्तरी-पश्चिमी सीमा को सुदृढ़ करने में लग गया। उस सुदृढ़ता के कारण उसके साम्राज्य पर बाह्य आक्रमण का खतरा पूरी तरह से खत्म हो गया।

1598 से 1602 ई० तक वह दक्षिण की राजनीति में उलझा रहा। वहां पर उसने अपना प्रभुत्व स्थापित कियाइस प्रकार अकबर का साम्राज्य काबुल से बंगाल तक तथा कश्मीर से बीजापुर, गोलकुण्डा की सीमा तक फैल चुका था। 

उसका साम्राज्य 18 प्रान्तों में विभक्त था, जो इस प्रकार हैं- 1. काबुल, 2. लाहौर, 3. मुल्तान, 4. दिल्ली, 5. आगरा, 6. अवध, 7. इलाहाबाद, 8. अजमेर, 9. गुजरात, 10. मालवा, 11. बिहार, 12. अवध-बंगाल, 13. खानदेश, 14. बरार, 15. अहमद नगर, 16. उड़ीसा, 17. कश्मीर और 18. सिंध। 

अकबर से पहले किसी भी अन्य मुस्लिम शासक ने इतने विस्तृत साम्राज्य को अपने अधिकार में न किया था। उसे अपने जीवन में विजय-पर-विजय मिलती गयी थी, जिसकी वजह से वह महान् तथा इन विस्तृत विजयों की वजह से सम्राट कहलाया।

उसकी महानता केवल विस्तृत भूभाग पर विजयों के कारणा ही नहीं उसके कुशल योद्धा, राजनीतिज्ञ, दूरदर्शी और सौहार्द के साथ शासन करने वाले शासक के रूप से भी है।

अकबर के व्यक्तित्व और कुशल शासन पर प्रकाश डालने से पूर्व उसकी विजयों के कारणों पर भी प्रकाश डाल लेना आवश्यक है। 

अकबर की विजय के कारण 

अकबर ने समस्त उत्तरी भारत तथा दक्षिण के राज्यों पर विजय पताका फहरायी। उसकी विजय के निम्नलिखित कारण हैं-

सैनिक योग्यता-अकबर उच्च कोटि का सैनिक तथा योग्य सेनापति था। 

उसमें वह समस्त गुण मौजूद थे जो एक सैनिक और सेनापति के लिए आवश्यक होते हैं। वह अत्यन्त साहसी और अदम्य उत्साही था। युद्ध की भीषण परिस्थितियों से वह कभी विचलित नहीं होता था। युद्ध भूमि में उसका नेतृत्व सैनिकों का उत्साह बढ़ाने वाला तथा निश्चित विजय होने की भावना से भरा हुआ होता था।

कूटनीतिज्ञ योग्यता-अकबर के कूटनीतिज्ञ होने का प्रमाण असीरगढ़ किले पर अधिकार करने से सामने आता है। असीरगढ़ का किला रजा अली खां के समय में उसके हाथ आ गया था। पर राजा अली खां के निधन के बाद उसका पुत्र मीरन बहादुर ने असीरगढ़ के किले पर पुनः अधिकार कर लिया तो अकबर को पुनः उस पर चढ़ाई करनी पड़ी। मीरन बहादुर बड़ी दृढ़ता से किले की रक्षा करता रहा। छः माह तक मुगल सेना ने किले के चारों ओर घेराबंदी कर रखी, पर मीरन बहादुर ने मुगल सेना को एक इंच भी आगे न बढ़ने दिया। तब अकबर ने अपनी कूटनीति से मीरन बहादुर को अपनी कैद में ले लिया। मीरन बहादुर की सेना इसके बाद भी किले पर उसको कब्जा देने को तैयार न थी। तब अकबर ने किले के द्वार रक्षकों के सामने धन के भण्डार खोल दिये। उन्हें धन देकर अपनी ओर मिलाया और किले का द्वार खुलवाने में सफल रहा। द्वार रक्षकों को खरीदकर ही मुगल सेना किले में घुस जाने में सफल हो पायी। अकबर यदि इस युक्ति को न अपनाता, तो सम्भवतः छः माह और गुजर जाते लेकिन असीरगढ़ का किला अकबर के हाथ न आ पाता।

अकबर का व्यक्तित्व एवं चरित्र 

अकबर की गणना न केवल भारत के इतिहास में, वरन् विश्व के इतिहास में महान् शासकों में की जाती है। वह भारत के मुस्लिम शासकों में सर्वोच्च था। यद्यपि वह इस्लाम धर्म का अनुयायी था, किन्तु वह ऐसा सम्राट था, जो अपनी प्रजा को समान दृष्टि से देखता था और उनके साथ उसका व्यवहार उच्च कोटि का था। 

अकबर ने अपनी नीति से मगध की जनता को अपनी ओर आकृष्ट करने का प्रयत्न किया और इसमें सफल रहा। उसने साम्राज्य को सुदृढ़ करने में, उसे विशाल रूप देने में जितना सहयोग मुसलमानों का उससे किसी भी दशा में कम सहयोग हिन्दुओं का, विशेषकर राजपूतों का, नहीं था। उसके चरित्र की विशेषताएं निम्न हैं- 

शारीरिक गठन-अकबर का शारीरिक गठन बहुत चित्ताकर्षक था। उसकी शारीरिक बनावट बहुत सुंदर थी। उसके अंग-प्रत्यंग से राजा होने का भाव झलकता था। उसका व्यक्तित्व इतना प्रभावशाली था कि उसे बादशाह के रूप में न जानने वाला भी उसे बादशाह समझ लेता था।

अकबर की धार्मिक नीति तथा धार्मिक उदारता-अकबर की धार्मिक नीतियों को तीन कालों में बांटा जा सकता है-

प्रथम काल (1556-1575 ई०)-इस काल में अकबर इस्लाम धर्म का अनुयायी था।

द्वितीय काल (1575-1582 ई०)-यह क्रान्तिकारी काल था। उसने 1575 ई० में फतेहपुर सीकरी में इबादतखाने की स्थापना करायी। फिर एक साल बाद उसने इबादतखाने को ‘धर्म संसद’ में बदल दिया। इस धर्म संसद में वह हर धर्म और मत के मानने वालों को आमंत्रित करता था और उनको अपनी धर्मचर्चा करने का पूरा अवसर प्रदान करता था।

तृतीय काल (1582-1605 ई०)-इस काल में अकबर की इस्लाम धर्म के । प्रतिनिष्ठा कम हो गयी थी। उसने ‘दीन-ए-इलाही’ धर्म चलाया।

इतिहासकार स्मिथ के शब्दों में– “दीन-ए-इलाही अकबर के अहंकार और निरकुंशता की भावना की उपज थी।” दीन-ए-इलाही पर इस्लाम धर्म के बाद सबसे अधिक प्रभाव हिन्दू धर्म का था। 

अकबर जब पूरी तरह इस्लाम धर्म की निष्ठा रखता था, तब भी उसकी धार्मिक उदारता में कोई कमी न थी। उसने सूफी मत में अपनी आस्था रखते हुए चिश्ती सम्प्रदाय को आश्रय दिया। इस्लाम धर्म के अनुयायी के रूप में उसका झुकाव सूफी मत और चिश्ती सम्प्रदाय को आश्रय देने में उदारता के रूप में इस प्रकार देखा जा सकता है कि इस्लाम धर्म का बहुल वर्ग सूफी मत को स्वीकार करता है। 

इस बात को आगे चलकर औरंगजेब के काल में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। औरंगजेब को कट्टर मुस्लिम शासक इसीलिए कहा जाता है क्योंकि उसने सूफी मत का न केवल सख्ती से विरोध किया, बल्कि सूफीवाद मानने वालों पर सख्तियां की, उनकी गरदनें उड़ा दीं, मजारों को उखड़वा दिया, जहां सूफी मतावलम्बी एकत्र होकर अपने मत का प्रचार करते थे। 

अकबर को, इस्लाम धर्म के मतों में उदारता का प्रभाव अवश्य ही अपने पिता हुमायूं की ओर से मिला था। हुमायूं ने शिया मत की स्त्री हमीदा बानो बेगम से विवाह किया था और उसी के गर्भ से अकबर का जन्म हुआ था। अकबर में अन्य धर्म और मतों के प्रति उदारता का प्रभाव इस रूप में मिलता है कि उसने आगरा और लाहौर में ईसाइयों को गिरजाघर बनवाने की अनुमति दे दी थी। उस समय तक यूरोपीय व्यापारी भारत के बंदरगाहों पर व्यापार के लिए आने लगे थे, उन्हें अपनी इबादत के लिए गिरजाघर बनाने की आवश्यकता हुई थी।

उसकी धर्म उदारता हिन्दू जैन मत की इस रूप में सामने आती है क्योंकि उसने जैन धर्माचार्य हरिविजय सूरी को जगत गुरु की उपाधि देकर 200 बीघा जमीन निर्वाह हेतु प्रदान की थी। अकबर पारसी धर्मानुयायियों के प्रति भी उदार था। वह पारसियों के त्योहार ‘नौरोज’ को मनाता था। उसने हिन्दू धर्म के प्रसिद्ध आचार्य वल्लभाचार्य के पुत्र विट्ठलनाथ को गोकुल और जैतपुरा में जागीर प्रदान की थी। उसने गुरु राम दास को 500 बीघा जमीन दी, जिसमें प्राकृतिक तालाब था। बाद में यहीं अमृतसर नगर बसा और स्वर्ण मंदिर का निर्माण हुआ। 

अकबर के समाज सुधार के कार्य 

अकबर ने सती प्रथा पर रोक लगाने का प्रयास किया। विधवा विवाह को प्रोत्साहित किया। यह दोनों प्रथाएं हिन्दुओं में स्वैच्छिक थीं-पर इन पर बाह्याडंबर अधिक बढ़ गया था। हिन्दू धर्म के कुछ धर्माचार्य इसके विरुद्ध आवाज उठा रहे थे। इस स्वैच्छिक क्रिया-कलाप पर जोर-जबरदस्ती होने लगी थी। उसे सामाजिक बुराई मानने के कारण इन दोनों प्रथाओं पर अकबर ने रोक लगाने का प्रयास किया था। 

बाल विवाह को भी सामाजिक बुराई मानते हुए अकबर ने विवाह के लिए लड़कों की न्यूनतम आयु 16 वर्ष तथा लड़कियों की 14 वर्ष निर्धारित कर दी थी। उसने दास प्रथा पर पूर्णतः पाबन्दी लगा दी थी। यह पाबन्दी 1562 ई० में उसने लगायी। ।

इससे पूर्व युद्ध में बंदी बनाए गए व्यक्तियों के परिवारी सदस्यों को दास बना लिये जाने की प्रथा थी। इस प्रथा को महमूद गजनवी तथा मुहम्मद गौरी के आक्रमण के संदर्भ में अधिक स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है। उपरोक्त दोनों ही मुस्लिम आक्रमणकारी पूर्णतः आक्रमणकारी और लुटेरे थे। राजाओं और राज्यों पर आक्रमण कर, उनके पराजित होने पर वे खुलकर राज्य में लूट-पाट करते थे-लूट के लिए मंदिरों को खासतौर पर निशाना बनाते थे। मंदिरों की धन-सम्पदा को लूटकर गजनी ले गए थे। धन की लूट के साथ स्त्रियों की लूट भी करते थे तथा जो भी लोग हाथ लग जाते थे उन्हें पकड़कर गुलाम बना गजनी ले जाते थे। गजनी के गुलाम बाजार में उन्हें बिक्री के लिए प्रस्तुत कर बेचकर धन प्राप्त करते थे।

मुहम्मद गौरी ने भारत में सल्तनत साम्राज्य की नींव जमा ली थी। अपने गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक को दिल्ली के सिंहासन पर बैठा दिया था। मुहम्मद गौरी के गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक के बाद के कुछ उत्तराधिकारी भी गुलाम थे-सल्तनत काल का एक काल गुलाम वंश का काल कहलाया। बाद में कई वंश बदले-लोदी वंश के इब्राहीम लोदी को हराकर मुगल वंश के प्रथम शासक बाबर ने भारत में मुगल सल्तनत की नींव डाली। तीसरा मुगल शासक अकबर था। अकबर ने चूंकि 1562 ई० में दास प्रथा पर रोक लगायी, इससे माना जा सकता है कि उससे पूर्व युद्धबंदी बनाये गये व्यक्ति के परिवारी सदस्यों को गुलाम (दास) बनाने की प्रथा किसी-न-किसी रूप में मौजूद थी।

अकबर की धार्मिक उदारता तथा सुधार के कार्य में तीर्थ यात्रा कर’ को समाप्त करना भी एक महत्त्वपूर्ण कार्य था। उससे पहले हिन्दुओं को तीर्थ यात्रा करने जाने पर ‘कर’ अदा करना पड़ता था। अकबर ने इस कर को सन् 1563 ई० में हटा दिया था। 

सन् 1564 ई० में उसने ‘जजिया कर’ पर भी रोक लगा दी थी। जजिया कर उन लोगों पर लगाया जाता था, जो गैर-मुस्लिम होते थे-अर्थात् इस्लाम धर्म में आस्था नहीं रखते थे। उन सब पर ‘जजिया कर’ लगाया गया था। ‘जजिया कर’ के बारे में कहा जाता था कि उन लोगों की बाह्य आक्रमण से सुरक्षा के लिए; राज्य की सेना पूरी तरह तैयार रहती है, अतः जजिया कर के रूप में लोगों को धन देना पड़ता था।

अकबर के दरबार के नौरत्न 

अकबर ने धार्मिक सहिष्णुता की नीति अपना रखी थी, अपने विशाल साम्राज्य की शोभा के लिए, व्यवस्था और सैनिक मजबूती के लिए दरबार में ‘नौरत्नों’ की व्यवस्था की थी। _उसके नौरत्नों में पांच मुस्लिम और चार हिन्दू थे। पांच मुस्लिम नौ रत्नों में केवल तीन-चार ही इतिहास प्रसिद्ध हुए-जबकि चार हिन्दू नवरत्नों में सबके सब ख्याति प्राप्त हुए। इतिहास में उन्होंने महत्त्वपूर्ण स्थान बनाया तथा दोनों ने सेनापति पद सम्भालते हुए अकबर की सेना की कई-कई युद्धों में अपनी महत्त्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज कराते हुए, युद्ध जीते। आइए अब अकबर के नौरत्नों पर भी प्रकाश डालें। 

1.बीरबल-अकबर के नौरत्नों में सबसे अधिक प्रसिद्ध नाम बीरबल का है। बीरबल का जन्म काल्पी नामक स्थान पर 1528 ई० में ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उसका वास्तविक नाम ‘महेशदास’ था। उसकी छवि अकबर के दरबार में कुशल वक्ता, हास्य-व्यंग्य, कथा-कहानीकार एवं कवि की थी। बीरबल की कुशाग्र बुद्धि और अन्य विशेषताओं से प्रभावित होकर अकबर ने उसे ‘कविराज’ एवं ‘राजा’ की उपाधि प्रदान की थी। उसे 2,000 का मानसबदार बनाया। उसका नाम बीरबल इसलिए पड़ा क्योंकि वह बलवान वीर था। उसमें ‘वीर’ (वीरता) और ‘बल’ का सम्मिश्रण था। वीरबल से बिगड़कर उसका नाम बीरबल हो गया। वह पहला और अंतिम हिन्दू था, जिसने अकबर के ‘दीन-ए-इलाही’ धर्म को स्वीकार किया था। 

अकबर ने बीरबल को नगर कोट, कांगड़ा एवं कालिंजर में जागीरें प्रदान की थीं। सन् 1383 ई० में उसे न्याय विभाग का सर्वोच्च अधिकारी बनाया था। उसने सेनापति पद का निर्वाह किया।

1586 ई० में यूसुफजइयों के विद्रोह को दबाने के लिए बीरबल को भेजा गया था, जहां बीरबल की यूसुफजइयों द्वारा हत्या कर दी गयी। अबुल फजल और बदायूंनी के अनुसार- “अकबर को अपने सभी अमीरों से अधिक बीरबल की मृत्यु पर शोक पहुंचा था।”

2.अबुल फजल-अबुल फजल का जन्म 1550 ई० में हुआ था। ये सूफी संत शेख मुबारक के पुत्र थे। यह दो भाई थे-दूसरे भाई का नाम फैजी था। अपने गुण की वजह से दोनों ही भाई अकबर के नौरत्नों में शामिल हुए थे। अबुल फजल को अकबर की सेना में आने पर शुरू में 20 सवारों का मनसब दिया गया था। अपनी योग्यता से तरक्की करके वे 5,000 सवारों के मनसबदार बन गए थे। अबुल फजल को इतिहास, दर्शन साहित्य तथा अन्य विविध विधानों की अच्छी जानकारी थी। इन्होंने भी अकबर के ‘दीन-ए-इलाही’ धर्म को अपनाया था तथा इन्हें ‘दीन-ए-इलाही’ का प्रमुख धर्म पुरोहित बनाया गया था। 

अबुल फजल की साहित्य विद्वता का प्रमाण इस रूप में मिलता है कि उन्होंने ‘अकबरनामा’ तथा ‘आइना-ए-अकबरी’ जैसे साहित्यिक-ऐतिहासिक ग्रंथों की रचना की थी। 

अबुल फजल भी एक योद्धा थे। उन्हें सेनापति बनाया गया था। अकबर के एकलौते पुत्र सलीम (जहांगीर) ने जब अकबर के विरुद्ध बगावत कर दी थी तथा इलाहाबाद में जाकर उसने अपने नाम से सत्ता चलानी शुरू कर दी थी तो उसके विद्रोह को दबाने के लिए अकबर ने अबुल फजल को सेना के साथ भेजा था। सलीम तक पहुंचने से पूर्व ही, मार्ग में, वीरसिंह बुन्देला नामक व्यक्ति ने, सलीम के आदेश पर छापामार युद्ध शैली से अबुल फजल की हत्या कर दी। जिसका समाचार पाकर अकबर को हार्दिक दुःख हुआ था। वह स्वयं सेना सजाकर सलीम के विद्रोह को कुचलने के लिए विशाल सेना लेकर रवाना हुआ था, परन्तु रास्ते में मां के निधन का समाचार पाकर उसे मां के अंतिम-संस्कार में शामिल होने के लिए लौटना पड़ा था। 

दादी के निधन का समाचार पाते ही बागी सलीम भी अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए आगरा आ पहुंचा था।

अंतिम संस्कार की रस्म अदायगी के बाद अकबर ने सलीम को गिरफ्तार कर, किले में नजरबंद कर दिया था, उसे तभी छोड़ा, जब उसने अपने कृत्य का पछतावा किया तथा आइन्दा पितृभक्ति के साथ जीवन गुजारने की प्रतिज्ञा न कर ली। 

पर पिता-पुत्र के इस वैमनस्य के चक्कर में अबुल फजल को अपने प्राण तो गंवाने ही पड़ गए थे। 

3.टोडरमल-टोडरमल का जन्म क्षत्रिय कुल में हुआ था। बीरबल के बाद टोडरमल ने अकबर के नवरत्नों में सबसे अधिक ख्याति प्राप्त की। अकबर ने इन्हें भी ‘राजा’ की उपाधि प्रदान की थी। ये राजा टोडरमल कहलाते है|

अकबर की सेवा में आने से पहले ये शेरशाह सूरी की नौकरी में थे। सन् 1562 ई० में ये अकबर की सेना में आये। इनकी योग्यता और प्रतिभा से प्रभावित होकर अकबर ने इन्हें गुजरात की दीवानी का पद प्रदान किया। सन् 1582 में ये अकबर के प्रधानमंत्री बने। टोडरमल के भूमि सम्बन्धी सुधार प्रशंसनीय हैं। इन्होंने अकबर के साम्राज्य की भूमि की पैमाइश करायी तथा भूमि सुधार-नियम लागू कराए। इन्होंने सैनिक एवं सेनानायक की भूमिका भी अदा की। इनका निधन 1589 ई० में हुआ।

4. तानसेन-तानसेन, टोडरमल के बाद अकबर के दरबार के तीसरे हिन्दू ‘रत्न’ थे। तानसेन सचमुच के रत्न थे। उन्हें गायन और संगीत की कुदरती प्रतिभा प्राप्त थी। इनकी जोड़ का कोई दूसरा संगीतकार और गायन आज तक पैदा नहीं हुआ। इनके नाम पर वर्तमान में मध्य प्रदेश सरकार द्वारा, संगीत एवं गायन क्षेत्र में ‘तानसेन पुरस्कार’ प्रत्येक वर्ष प्रदान किया जाता है। इन्होंने संगीत कला के क्षेत्र में अपनी अद्वितीय प्रतिभा का प्रदर्शन किया। इनका जन्म ग्वालियर में हुआ था। तानसेन ने कई एक नए रागों का निर्माण किया। इनके समय में ध्रुपद गायन शैली का विकास हुआ। इनकी संगीत की प्रमुख कृतियाँ हैं-मियां की ठोड़ी, मियां की मल्हार, मियां की सारंग, दरबारी कन्हाड़ा आदि। 

5.मानसिंह-अकबर के दरबार के नौरत्नों में चौथे हिन्दू नौरत्न मानसिंह थे। इनका जन्म राजपूताना के वीर राजपूत परिवार में हुआ था। आमेर के राजा भारमल ने जब स्वयं से अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली, तो अकबर ने प्रसन्न होकर, उस परिवार से वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित कर भारमल के दत्तक पुत्र भगवान दास तथा भारमल के पौत्र मानसिंह को अपने सेना में महत्त्वपूर्ण सैनिक पद प्रदान किया।

उन्होंने कई बार अकबर की सेना का प्रधान सेनापति पदभार का निर्वाह किया। इन्हें भी अकबर ने जागीरें प्रदान की, ‘राजा’ की पदवी प्रदान की। ये राजा मानसिंह कहलाए।

राजा मानसिंह ने अपने शौर्य बल से अकबर को साम्राज्य विस्तार में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया। काबुल, बिहार-बंगाल आदि प्रदेशों में सैनिक अभियान चलाकर, साम्राज्य विस्तार किया। अकबर के पुत्र सलीम (जहांगीर) के विद्रोह के समय, जहांगीर को राजा मानसिंह का मौन समर्थन प्राप्त होने का विवरण मिलता है। ऐसा इसलिए माना जाता है क्योंकि सलीम (जहांगीर) का यह मामा था। अकबर लगभग आधी सदी तक हुकूमत कर चुका था। वृद्धावस्था को प्राप्त हो गया था। मानसिंह की दिली इच्छा थी कि जहांगीर के लिए राजपाट छोड़कर स्वयं आराम का जीवन गुजारे।

कहा जाता है कि मानसिंह की ओर से जहांगीर के लिए मौन समर्थन की बात जान लिये जाने के बाद भी अकबर को कोई दुःख न हुआ था, क्योंकि वह मानसिंह की वफादारी वली अहद (उत्तराधिकारी) के प्रति पा रहा था। यह एक प्रकार से अकबर के लिए संतोष की बात थी; क्योंकि उसके बाद, उसके पुत्र और मुगलवंश के उत्तराधिकारी जहांगीर के प्रति मानसिंह की वफादारी बनी रहने की आशा थी। यह अवस्था सलीम (जहांगीर) के सामने अपने विद्रोही तेवर अपनाने के तीन वर्ष बाद ही प्राप्त हो गयी जब अकबर का निधन हुआ और 1605 ई० में सलीम शहजादा, मुगल साम्राज्य का चौथा शासक बना।

6.अब्दुर्रहीम ‘खान-खाना’– यह बैरम खां के पुत्र थे। उन्होंने अपने पिता बैरम खां की हत्या के बाद 4 वर्ष की अवस्था से अकबर का संरक्षकत्व प्राप्त किया। ये अकबर के प्रमुख सेनापतियों में से एक थे। ये उच्चकोटि के कवि और दानी कहलाए। इनके नीतिपरक दोहे वर्तमान हिन्दी साहित्य में  प्रमुख स्थान रखते हैं। गुजरात के विरुद्ध युद्ध में इनके नेतृत्व में सैनिक अभियान चला और गुजरात विजय प्राप्त हुई।

7. मुल्ला दो प्याजा-अकबर के नौरत्नों में से एक मुल्ला दो प्याजा था। ‘मुल्ला दो प्याजा’ नाम किसलिए पड़ा, इसका कहीं वर्णन नहीं मिलता। यह हुमायूं के बुरे दिनों का साथी था। इसके वास्तविक नाम का आज तक पता नहीं चलता। सम्भवतः अपने पिता की इच्छा को ध्यान में रखते हुए तथा वफदारी को महत्त्व देते हुए, अकबर ने मुल्ला दो प्याजा को अपने नौरत्नों में शामिल किया था। बीरबल के साथ इनकी अक्सर नोक-झोंक चलती रहती थी। इसका जिक्र अकबर-बीरबल के किस्से-कहानियों में मिल जाता है।

8. हकीम हुकाम-यह अकबर के रसोईघर का प्रधान था। अकबर के लिए स्वादिष्ट और मनपसन्द भोजन बनाने में इसे दक्षता प्राप्त थी। 9. फैजी-यह अबुल फजल का बड़ा भाई था। ‘राज कवि’ के पद पर आसीन था। अकबर के ‘दीन-ए-इलाही’ धर्म को इसने भी स्वीकार किया था।

सम्राट अकबर का निधन

 26 अक्टूबर, 1605 में, 5 दिन के अतिसार का कष्ट झेलने के कारण अकबर का निधन हुआ, उसके निधन के बाद उसके एकमात्र जीवित पुत्र शाहजादा सलीम ने पिता के विशाल साम्राज्य की बागडोर सम्भाली। 

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