जैव विविधता पर निबंध | Bio Diversity in Hindi

जैव विविधता पर निबंध

जैव विविधता पर निबंध | Bio Diversity in Hindi अथवा  जैवविविधता (Biodiversity) 

मई 2019 में जैव विविधता तथा पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं के लिए अंतरसरकारी विज्ञान नीति मंच (Intergovernmental Science Policy Platform on Biodiversity and Ecosystem Service : IPBES) द्वारा जैव विविधता के संदर्भ में एक रिपोर्ट जारी की। इस रिपोर्ट के अनुसार धरती भर के लगभग 40% उभयचर तथा 33% जलीय निवास करने वाले स्तनधारी विलुप्ति के कगार पर हैं। इस रिपोर्ट ने दुनियाभर के राजनयिकों के होश उड़ा दिये। सोचने में यह कितना वीभत्स लगता है कि इंसान स्वयं के लिए भी भस्मासुर बन बैठा है। 

ध्यातव्य है कि पर्यावरण के महत्त्वपूर्ण मुद्दों में से जैवविविधता भी एक है। यह एक ऐसी अवधारणा है, जो सभी जीव-जंतुओं तथा वनस्पतियों के मध्य पारस्परिक संबंधों को दर्शाती है। जैव विविधता को उस गतिशील प्रक्रिया के रूप में अभिहित किया जाता है, जो अनुवांशिक तत्वों के बढ़ने से बढ़ती है तथा उनके घटने से घटती है। यह वस्तुतः जैव सम्पदा को अभिव्यक्त करने वाली अवधारणा है। जैवविविधता की सम्पन्नता जीव-जन्तुओं एवं वनस्पतियों की अधिक संख्या पर निर्भर करती है। यानी ये जितने अधिक होंगे, जैवविविधता उतनी ही सम्पन्न होगी। वर्तमान रूप में जैवविविधता (Biodiversity) का प्रयोग सर्वप्रथम वर्ष 1985 में डब्ल्यू.जी.रोसेन (W.GRosen) ने किया था, जबकि वर्ष 1988 में सर्वप्रथम किसी प्रकाशन में इस शब्द का इस्तेमाल सामाजिक जीव-विज्ञानी ई.ओ.विल्सन (E.O.Wilson) ने किया था। जैव सम्पदा को व्यक्त करने का यह एक वृहद आधार वाला शब्द है। 

“पृथ्वी पर उपस्थित जीव-जंतुओं में पाई जाने वाली विभिन्नता, विषमता और पारिस्थितिकी जटिलता जैवविविधता कहलाती है।” 

प्रसंगवश जैवविविधता को परिभाषिक स्तर पर भी समझ लेना उचित रहेगा। वर्ष 1987 में अमेरिका में हुए टेक्नोलॉजी एसेसमेंट (Technology Assesment) के आधार पर जैवविविधता को इस प्रकार परिभाषित किया गया है— “पृथ्वी पर उपस्थित जीव-जंतुओं में पाई जाने वाली विभिन्नता, विषमता और पारिस्थितिकी जटिलता जैवविविधता कहलाती है।” वर्ष 1992 में रियो डी जेनेरियो में हुए पृथ्वी सम्मेलन में जैवविविधता को इस प्रकार परिभाषित किया गया है- “विभिन्न स्रोतों के जीवों में विविधता और जिनके वे भाग हैं, वहां की परिस्थितिकी जटिलता, प्रजातियों में तथा पारिस्थितिकी तंत्र में जो विविधता है, वह जैव विविधता में सम्मिलित होती है।” जैवविविधता की सर्वप्रमुख विशिष्टता यह है कि यह न सिर्फ जीव-जन्तुओं के मध्य पारस्परिक संबंध को दर्शाती है, बल्कि एक-दूसरे को प्रभावित भी करती है। यही कारण है समूचे जीवजगत के लिए इसे अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना जाता है। 

जैवविविधता का हमारे लिए विशेष महत्त्व है। यह इतनी अधिक महत्त्वपूर्ण है कि हम इसे जीवन का पर्याय कह सकते हैं। जैवविविधता का जहां पर्यावरण और पारिस्थितिकी संतुलन की दृष्टि सविशेष महत्त्व है, वहीं मनुष्यों के लिए भी इसका महत्त्व कम नहीं है। हमारे चारों तरफ पाए जाने वाले जीव-जंतु, वृक्ष और लताए, । यहां तक की सूक्ष्मजीव (विषाण व जीवाण) पारिस्थितिकी संतुलन का बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जैवविविधता जितनी अधिक होती है, पारिस्थितिकी तंत्र उतना ही बेहतर और व्यापक आधार वाला होता है। इसका लाभ पर्यावरण को भी मिलता है। जैवविविधता भोजन, दवाओं एवं अन्य उस सामग्री की उपलब्धता को सुनिश्चित करती है, जिसका प्रयोग हम रोजमर्रा की जिन्दगी में करते हैं। यदि यह कहा जाए कि मानव अस्तित्व ही जैवविविधता पर निर्भर है, तो इसमें असंगत कुछ भी न होगा। आहार से लेकर औषधि तक तथा प्रायः जीवन के हर क्षेत्र में हमारी निर्भरता जैवविविधता पर बनी हुई है। इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि जैवविविधता का महत्त्व सिर्फ पारिस्थितिकी और पर्यावरण संतुलन तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह अर्थिक, सामाजिक, व्यावसायिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी हमारे लिए महत्त्वपूर्ण है।

जैवविविधता का हास एक वैश्विक समस्या है, जिससे भारत भी अछूता नहीं है। हालांकि जैवविविधता की दृष्टि से भारत को एक सम्पन्न देश माना जाता है, तथापि यहां भी जैवविविधता पर खतरा मंडरा रहा है। बढ़ती आबादी और विकास की अंधी दौड़ के कारण जैविक और अजैविक दबाव निरंतर बढ़ रहे हैं। फलतः जैवविविधता का हास हो रहा है। 

जैवविविधता हास के प्रमुख कारण हैं, जैवविविधता के प्राकृतिक केंद्र कहे जाने वाले वनों का विनाश, वन्यजीवों के शिकार, प्राकृतिक आवासों का नष्ट होना, जीनांतरित बीजों का विस्तार, अनियत्रित पशुचराई, प्रदूषण, पर्यावरण के परिवर्तन, रोग एवं आक्रमणकारा विदेशी प्रजातियां आदि। इन कारणों से जैवविविधता का ह्रास बढ़ा है, जो कि हमारे लिए खतरे की घंटी जैसा है। 

जब जैवविविधता का हास होता है, तब इसके कई दुष्परिणाम भी सामने आते हैं। भोजन तथा अन्य आवश्यक वस्तुओं की बढ़ती मांग की पूर्ति बाधित होने लगती है तो जैव प्रौद्योगिकी उद्योगों के लिए कच्चे माल की कमी का संकट खड़ा हो जाता है। जैव विविधता हास के कारण प्रत्येक प्रजाति या जीन की कमी हमारे भावी विकास को सीमित करती है। ऐसे अनेक सूक्ष्म जीव हैं, जो भूमि की उर्वरता बढ़ाकर फसल उत्पादन में वृद्धि करते हैं, के नष्ट होने से फसल उत्पादकता प्रभावित होती है। इससे पर्यावरण की भारी क्षति होती है। जैवविविधता हास का सबसे गंभीर रूप प्रजातियों के विलोपन के रूप में सामने आता है। वैश्विक स्तर पर ‘इंटरनेशनल यूनियन फॉर कन्जर्वेशन ऑफ नेचर एंड नेचुरल रिसोर्सेज’ (International Union for Con servation of Nature and Natural Resources-IUCN) TCH THI संगठन है, जिसके द्वारा प्राणियों और पादपों पर ‘रेड डाटा बुक’ (Red Data Book) का प्रकाशन किया जाता है। इसमें उन जंतुओं और पादपों के बारे में सूचनाएं प्रकाशित की जाती हैं, जिनका अस्तित्व वर्तमान में संकट में है अथवा भविष्य में वे संकटग्रस्त हो सकते हैं।

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जैविक संसाधन ही मानव जीवन का आधार हैं और इनसे परे जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है। ऐसे में हमारा यह नैतिक एवं सामुदायिक दायित्व बनता है कि हम जैवविविधता को संरक्षित रखकर इसके हास को रोकें। चूंकि जैवविविधता हास की समस्या अकेले किसी देश की नहीं है, अतएव वैश्विक समुदाय की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह जैवविविधता संरक्षण की दिशा में प्रयास करें। ये प्रयास होते दिख भी रहे है। सर्वप्रथम वर्ष 1972 में जैवविविधता संरक्षण के लिए ‘संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम’ (UNEP) की स्थापना की गई। इसके साथ ही जैवविविधता संरक्षण के वैश्विक प्रयासों में गति देखने को मिली। इन प्रयासों के तहत वर्ष 1993 से प्रभावी जैवविविधता संधि (Con vention on Biological Diversity), जनवरी, 2000 में परिस में अपनाया गया। कार्टाजेना प्रोटोकाल (Cartagena Protocol), अक्टूबर, 2010 में जापान के नागोया में आयोजित नागोया जैवविविधता सम्मेलन तथा इसके अनुसरण में अपनाए गए एची लक्ष्य (Aichi Target) तथा अक्टूबर, 2012 में ‘प्रकृति रक्षित रक्षिता’ थीम पर आयोजित हैदराबाद जैवविविधता अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। वैश्विक स्तर पर ‘इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर’ (IUCN) तथा विश्व प्राकृतिक निधि (World Wide Fund for Nature) जैवविविधता संरक्षण की दिशा में सराहनीय काम कर रहे हैं। 2011-2020 का जहां संयुक्त राष्ट्र जैवविविधता दशक के रूप में मनाया जा रहा है, वहीं प्रतिवर्ष 24 नवंबर को हम ‘विश्व जैवविविधता संरक्षण दिवस’ के रूप में मनाते हैं। इसी क्रम में हम 22 मई को ‘अंतर्राष्ट्रीय जैवविविधता दिवस’ के रूप में मनाते हैं। 

वैश्विक स्तर पर जैवविविधता संरक्षण के लिए मुख्य रूप से जा दो प्रणालियां अपनाई जाती हैं, वे हैं- स्व-स्थाने संरक्षण (In-situ Conservation) एवं पर-स्थाने संरक्षण (Ex-situ Conservation)। स्व-स्थाने संरक्षण के तहत जीवों और पादपों के संरक्षण के उपाय उनक प्राकृतिक वास स्थानों में ही किए जाते हैं। इसके तहत राष्ट्रीय उद्याना, अभयारण्यों तथा जैव आरक्षित क्षेत्रों की स्थापना कर प्रजातियों को संरक्षित किया जाता है। जीव-जन्तुओं और पादपों के कुदरती वास स्थानो के नष्ट होने या क्षतिग्रस्त होने की स्थिति में संरक्षण की पर-स्थाने (Ex situ) विधि को अपनाया जाता है। इसके तहत पादपों एवं जीव-जन्तुओं की संकटग्रस्त प्रजातियों को बीज बैंकों, वानस्पतिक उद्यानों, चिड़ियाघरों तथा जंतु उद्यानों आदि में रखकर उनके संरक्षण के उपाय सुनिश्चित किए जाते हैं, जो कि मनुष्य की निगरानी में होते हैं। 

“चूंकि जैवविविधता का क्षरण एक वैश्विक समस्या है, अतएव समूचे वैश्विक समुदाय की यह साझा जिम्मोदारी बनती है कि वह मिलकर जैवविविधता संरक्षण की दिशा में काम करे तथा संरक्षण के उपायों को सुदृढ़ बनाए।” 

भारत में भी जैवविविधता संरक्षण की दिशा में प्रयास हो रहे हैं। ध्यातव्य है कि भारत विश्व के 17 वृहद जैवविविधता वाले देशों में एक है। यहां विश्व के मात्र 2.4% भूक्षेत्र पर ज्ञात वैश्विक जैवविविधता का लगभग 8% प्राप्त होता है। यह अच्छी बात है कि भारत में संवैधानिक स्तर पर जैवविविधता संरक्षण के प्रावधान बनाए । 

अनुच्छेद 48(क) एवं अनुच्छेद 51(क) (छ)।। जैवविविधता हुए विभिन्न संयुक्त राष्ट्र सम्मेलनों का पक्षकार देश होने के नाते भा. की केन्द्र सरकार द्वारा वर्ष 2002 में जैवविविधता अधिनियम पार करवाया गया, जिसके तहत जहां जैव विविधता के संरक्षण एवं उसके पोषणीय उपयोग पर ध्यान केन्द्रित किया गया, वहीं महत्त्व जैवविविधता वाले क्षेत्रों को जैवविविधता धरोहर स्थल घोषित करके उनके संरक्षण और विकास के उपाय सुनिश्चित किए गए। जैवविविधता संरक्षण हेतु प्राथमिकताओं का निर्धारण करने के उद्देश्य से वर्ष 1998 में ‘जैवविविधता संरक्षण प्राथमिकीकरण परियोजना’ का क्रियान्वयन किया गया। भारत के संदर्भ में जो बात सबसे अच्छी है, वह यह है कि भारत की सनातनी संस्कृति एवं भारतीय दर्शन में जैवविविधता संरक्षण को वरीयता प्रदान की गई है। 

चूंकि जैवविविधता का क्षरण एक वैश्विक समस्या है, अतएव समूचे वैश्विक समुदाय की यह साझा जिम्मेदारी बनती है कि वह मिलकर जैवविविधता संरक्षण की दिशा में काम करे तथा संरक्षण के उपायों को सुदृढ़ बनाए। वैश्विक समुदाय को मिलकर प्रकृति संरक्षण की उन लोक परम्पराओं को पुनर्जीवित करना होगा, जो विकास और आधुनिकीकरण के कारण मृतप्राय-सी पड़ चुकी हैं। इस संदर्भ में वैश्विक समुदाय को प्रकृति संरक्षण के भारतीय दर्शन से प्रेरणा लेनी चाहिए, जिसमें प्रकृति को ईश्वर का प्रतिरूप बताया गया है तथा यह भी कहा गया है कि ‘प्रकृति रक्षित रक्षिता’ अर्थात प्रकृति हमारी रक्षा करती है, यदि हम उसकी रक्षा करें। 

जैवविविधता का संरक्षण मानव जीवन और सह-अस्तित्व के लिए आवश्यक है। मनुष्य पारिस्थितिकी तंत्र का प्रमुख हिस्सा है। जिस प्रकार पारिस्थितिकी के लिए जीव-जंतु, वनस्पतियां और कीट पतंगे आवश्यक हैं, ठीक उसी प्रकार मनुष्य भी एक आवश्यक प्राणी है। इस शृंखला में किसी भी पक्ष को नकारा नहीं जा सकता। पर्यावरण में उपस्थित सभी जैविक तत्व हमारी खाद्य, कृषि औषधि, उद्योग, आवास तथा मनोरंजन की आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। पर्यावरणीय संतुलन को कायम रखने में जैवविविधता महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। क्रमिक विकास को जारी रखने में भी इसका विशेष योगदान रहता है। पर्यावरणीय प्रणाली प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रकाश संश्लेषण, परागण, वाष्पोत्सर्जन, रासायनिक-चक्र, आहार चक्र, मृदा के रख-रखाव, जलवायु नियंत्रण, वायु-जल प्रक्रिया प्रबंधन तथा कीट नियंत्रण आदि में सहायक होती है। स्पष्ट है कि पारितंत्र के सतत विकास तथा जैव संसाधनों के अनुकूलतम उपयोग की दृष्टि से जैवविविधता का संरक्षण अनिवार्यता के दायरे में आता है। इस अनिवार्यता को समझते हुए हमें जैवविविधता संरक्षण की कारगर पहले करनी चाहिए। ऐसा कर के ही हम सृष्टि को भी संरक्षित कर पाएंगे, क्योंकि सृष्टि में लंबे समय तक चलने वाली विकास की जैविक प्रक्रियाओं के फलस्वरूप ही जैवविविधता अस्तित्व में आई है। 

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