बिना गलफेफड़ों के मगरमच्छ पानी में कैसे डूबे रहते हैं? 

बिना गलफेफड़ों के मगरमच्छ पानी में कैसे डूबे रहते हैं? 

बिना गलफेफड़ों के मगरमच्छ पानी में कैसे डूबे रहते हैं? 

आपने मगरमच्छ को पानी के अंदर लंबी डुबकी लगाए देखा होगा। इन्हें देखकर आपको कभी अवश्य ख्याल आया होगा कि मछलियों के समान मगरमच्छ के तो गलफड़े या गिल्स नहीं होते, फिर ये पानी के अंदर सांस कैसे लेते हैं? मगरमच्छों को एक-एक घंटे तक पानी के अंदर रहते देखा गया है। 

वैज्ञानिकों ने इस दिशा में शोध किया तो पता चला कि मगरमच्छ की जाति के प्राणियों की शारीरिक क्रियाएं अति मंद होती है, यानी चयापचय दर बहुत कम होती है-यहां यह बात जानने योग्य है कि किसी भी प्राणी के लिए ऑक्सीजन की जरूरत उसकी चयापचय दर के अनुसार ही हुआ करती है। 

अनेक शीतरक्त वाले प्राणी, जैसे-मेंढक आदि जब सुप्तावस्था में जमीन के अंदर दबे पड़े रहते हैं, तब उनकी शारीरिक क्रियाएं यानि चयापचय क्रियाएं काफी मंद रहती हैं, जिससे उनका ऑक्सीजन उपयोग भी धीमा होता है। 

और यह भी कि मगरमच्छ के शरीर में ऑक्सीजन की आपूर्ति की कमी से निपटने के लिए चयापचय दर को कम करने के साथ-साथ एक अन्य व्यवस्था भी प्रकृति द्वारा की गई है। यह तो हम जानते हैं कि पूरे शरीर में ऑक्सीजन पहुंचाने का कार्य खून के द्वारा होता है। खून में उपस्थित हीमोग्लोबीन वर्णक यह कार्य करता है। फेफड़ों से ऑक्सीजन ले जाकर कोशिका को दे दी जाती है 

और कोशिका द्वारा कार्बनडाई ऑक्साइड खून में घुलकर लौट आती है, लेकिन मगरमच्छ में यही सामान्य क्रिया थोड़ी विशिष्टता लिए हुए है। मगरमच्छ का रक्त वर्णक हीमोग्लोबीन अपनी लाई हुई ऑक्सीजन कोशिका को तभी सौंपता है, जब वह कुछ उपयुक्त संकेत प्रसारित करती है। यानि प्रत्येक कोशिका में चयापचय के कारण जो कार्बनडाई ऑक्साइड बनती है, वह पानी में घुलनशील होने के कारण बाइकार्बोनेट बनाती है। 

मगरमच्छ का हीमोग्लोबीन जब तक बाइकार्बोनेट की निश्चित मात्रा में न हो, तब तक वह अपनी ऑक्सीजन नहीं छोड़ता, यानि ऑक्सीजन मात्र उन्हीं अंगों को मिलेगी जो सक्रिय हैं। इस प्रकार ऑक्सीजन की किफायत से सारा काम चला लिया जाता है। 

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