बिजली का आविष्कार किसने किया | Who invented electricity

बिजली का आविष्कार किसने किया

बिजली का आविष्कार किसने किया | Who invented electricity

 आज सम्पूर्ण विश्व विद्युत शक्ति से ही चलता है अर्थात् बिजली शक्ति से। शाम होते ही घरों में रोशनी करने के लिए विद्युत उत्तम साधन है और अब तो शाम हो अथवा दिन, घर-घर में विद्युत का भरपूर उपयोग होता है। पंखे, लाइटें, कूलर, एसी, फ्रीज, मिक्सर-ग्राइण्डर, वॉशिंग मशीन, इंडेक्स चूल्हा आदि सामान विद्युत से ही कार्यान्वित होते हैं। 

इनके अलावा भी सैकड़ों विद्युत चालित ऐसे घरेलू उपकरण हैं, जिनके अभाव में आज का मानव जीवन सहज व सरल नहीं होता। 

घरेलू उपकरण ही क्या, विद्युत का उपयोग तो उद्योग-धंधों, सरकारी संस्थानों, स्कूल-कॉलिजों आदि प्रत्येक जगह हो रहा है। ट्रेनें भी बिजली से चलने लगी हैं। 

बिजली से रोगों का उपचार भी होता है। आज विश्वभर के लिए विद्युत की उपयोगिता इतनी अधिक हो गई है कि बिना उसके मनुष्य का काम नहीं चल सकता। 

बिजली का आविष्कार किसने किया

इस विद्युत अर्थात् बिजली का इतिहास काफी पुराना है। कई सौ वर्ष पूर्व प्राचीन ग्रीक निवासियों को बिजली का ज्ञान था। वे अम्बर या कहकआ नाम की एक पीली चीज को सूखी ऊन अथवा रेशम पर रगड़कर विद्युत उत्पन्न किया करते थे, किन्तु ग्रीक-निवासियों ने इस सम्बन्ध में न तो खोज की और न इससे कोई लाभ ही उठाया। उनके लिए वह मात्र एक साधारण खेल था और उनकी यह विद्या खेल तक ही सीमित रह गई।

 इंग्लैण्ड में एक डॉक्टर ने कुछ ऐसी वस्तुओं की सूची तैयार की, जिन्हें आपस में रगड़ने से एक विचित्र तरह की विद्युत किरणें उत्पन्न होती थीं, यह उन दिनों की बात है, जब इंग्लैण्ड में महारानी एलिजाबेथ राज्य कर रही थीं। उस डॉक्टर का नाम विलियम गिल्वट था। 

सन् 1633 ई. में ड्यूफे नामक एक फ्रांसीसी ने सबसे पहले इस बात का पता लगाया कि बिजली प्रत्येक वस्तु में संचार करती है। उन्होंने इस बात का भी पता लगाया कि बिजली दो प्रकार की होती है। उन्होंने इस बात को भी सिद्ध किया कि बहुत-सी चीजें ऐसी हैं, जिनमें बिजली बड़ी सरलता के साथ द्रुत गति से दौड़ सकती है। इतना ही नहीं, वह उन वस्तुओं के स्पर्श से अधिक तीव्रगामिनी भी बन सकती है। उन वस्तुओं में कुछ के नाम हैं-धातु, जल, नमक, क्षार, पशुओं के शरीर और पृथ्वी। 

बिजली का आविष्कार किसने किया

उन्होंने बताया कि इसके अतिरिक्त कुछ वस्तुएं ऐसी भी हैं, जिनमें बिजली साधारण गति से दौड़ सकती है, जिन वस्तुओं के भीतर बिजली निर्विवाद रूप से चल-फिर सकती है, उन्हें तड़ित-संचालक और जिन वस्तुओं में वह चलने-फिरने में अक्षम है, उन्हें तड़ित रोधक कहते हैं। 

ड्यूफे के इस आविष्कार के कुछ दिनों बाद वैज्ञानिकों ने बिजली के सम्बन्ध में एक और नई बात का पता लगाया। ड्यूफे ने इस बात का पता लगाया था कि बिजली दो प्रकार की होती है और एक प्रकार की बिजली केवल एक ही तरह की वस्तुओं में पायी जाती है, किन्तु कुछ वैज्ञानिकों ने बहुत छानबीन के बाद यह सिद्ध किया कि ड्यूफे की दोनों प्रकार की भिन्न-भिन्न बिजलियां एक ही वस्तु में पायी जाती हैं और रगड़ से अलग भी की जा सकती हैं। 

सन् 1663 ई. में पूर्वी जर्मनी के वैज्ञानिक ओटोवान ग्वेरिके ने एक जेनरेटर का आविष्कार किया, जो स्थिर विद्युत उत्पन्न करता था। यह जेनरेटर गंधक से चलाया जाता था, जो घूमने पर घर्षण द्वारा विद्युत उत्पन्न करता था। सन् 1672 ई. में उन्होंने पता लगाया कि घर्षण से गंधक की गेंद से पैदा होने वाली विद्युत एक चमक उत्पन्न करती है, इस चमक को विद्युत प्रतिदीप्ति का नाम दिया। वे पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने विद्युत प्रतिदीप्ति को देखा था। 

विद्युत के सम्बन्ध में बोस्टन-निवासी बेंजामिन फ्रेंकलिन ने बड़ी उन्नति की। उन्होंने बहुत छानबीन के बाद दोनों प्रकार की बिजलियों के नामकरण किए। उन्होंने एक का नाम धन और दूसरे का नाम ऋण बिजली रखा। सन् 1752 ई. में बेंजामिन ने एक ऐसी बात का पता लगाया कि जिसने विद्युत को अत्यन्त महत्त्वपूर्ण बना दिया। उन्होंने पतंग की मदद से इस बात का पता लगाया कि बादलों की बिजली और रगड़ से पैदा की हुई बिजली में कोई अन्तर नहीं है। 

बेंजामिन फ्रेंकलिन की पतंग कोई आकाश में उड़ने वाली आम कागजी पतंग नहीं थी, बल्कि एक विशेष तरह की पतंग थी। उस पतंग को उन्होंने बड़ी बुद्धिमत्ता के साथ बनाया था।

बिजली का आविष्कार किसने किया

सन् 1772 ई. में बैंजामिन के दिमाग में एक बात आई और वह उसी के अनुसार अपना काम करने लगा। उसने अत्यन्त चतुराई के साथ रेशमी कपड़े की एक पतंग तैयार की। 

पतंग के मस्तक पर उन्होंने एक तार लगा दिया। पतंग को एक बहुत बड़े लम्बे पाट के डोरे में बांध दिया। पाट के डोरे में नीचे की ओर बहुत मजबूती के साथ धातु की बनी हुई एक चाबी भी बांध दी। अब उन्हें बरसात होने का इंतजार था। 

एक दिन अचानक आकाश में बादल घिर आए और बहुत जोर से पानी बरसने लगा। बिजली चमकने लगी और साथ ही हृदय विदारक गर्जना का शब्द भी होने लगा। फ्रेंकलिन अपनी उस अनोखी पतंग को उड़ाने के लिए एक मैदान के किनारे पर खड़े हो गए। पतंग हवा का वेग पाकर हवा से बातें करने लगी।

तभी अचानक ऐसा प्रतीत हुआ, जैसे काले बादल का एक टुकड़ा दौड़कर उनकी पतंग को छूना चाहता हो।

अभी इस घटना को कुछ समय ही गुजरा था कि काले बादल का एक दूसरा टुकड़ा दौड़कर फ्रेंकलिन की पतंग की ओर झुका।

फ्रेंकलिन को यह देखकर बहुत आश्चर्य हुआ कि पतंग की डोरी में एक सनसनाहट पैदा हुई है और डोरी के निचले सिरे में बंधी धातु की चाबी से बिजली के छोटे-छोटे प्रकाश कण भी निकल पड़े।

 अचानक वर्षा का प्रकोप बढ़ गया, जैसे-जैसे अधिक वर्षा होने लगी, वैसे-वैसे बिजली के कण धातु की चाबी में स्पष्ट दिखाई देने लगे। फ्रेंकलिन को अपनी इस सफलता पर जितना आनन्द प्राप्त हुआ, उसका कदाचित शब्दों में उल्लेख कर पाना असम्भव है।

इस परीक्षण के आधार पर वह इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि मेघों की विशाल विद्युत को मेघों से धरती पर लाया जा सकता है। इसी आधार पर बैंजामिन ने ऊंची अट्टालिकाओं को मेघों की विद्युत से सुरक्षित करने के लिए तड़ित चालकों का आविष्कार किया। 

जिन दिनों फ्रेंकलिन बैंजामिन इस विद्युत परीक्षण में लगे थे, उन्हीं दिनों प्रोफेसर रिचमैन भी मेघों की तड़ित से सम्बन्धित परीक्षण में जुटे हुए थे। रिचमैन ने भी 

मेघों से प्राप्त विद्युत का अध्ययन करने के लिए एक उपकरण तैयार किया था। जब बिजली कड़कने की सम्भावना थी, उस समय वे इस उपकरण का निरीक्षण करने के लिए गए। 

यह उपकरण उनके सिर से करीब एक फीट ऊपर था। जैसे ही बिजली कड़की, आग का एक नीला गोला उपकरण से निकलकर प्रोफेसर रिचमैन के सिर की ओर लपका। गोले के फूटने से, रिवाल्वर से गोली चलने जैसी ध्वनि निकली और उस उपकरण के टुकड़े-टुकड़े बिखर गए। इतना ही नहीं, जिस कक्ष में वह मौजूद थे, 

उस कक्ष का द्वार भी टूटकर अलग जा गिरा, साथ ही प्रोफेसर रिचमैन भी इस प्रयोग में संसार से कूच कर गए। 

फ्रेंकलिन सौभाग्य से अपने प्रयोग के बीच सुरक्षित बच गए थे। उन्होंने जिस प्रकार बिजली के प्रकाश का पता लगाकर अपना नाम विश्व प्रसिद्ध किया, वैसे ही माइकल फेराडे ने बिजली में लहर उत्पन्न करके विश्व में कीर्ति प्राप्त की। फेराडे इंग्लैण्ड के निवासी थे। उनका जन्म लंदन के एक गरीब लौहार के घर में हुआ था। गरीबी के कारण माइकल ज्यादा पढ़-लिख नहीं सके। वह किताबों पर जिल्द चढ़ाने का काम करते थे, जब भी उनके पास विज्ञान सम्बन्धी कोई पुस्तक जिल्द चढ़ने के लिए आती थी, तो वे उस पुस्तक को बड़ी ही रुचि से पढ़ते थे। अपने काम से छुट्टी पाते ही वह वैज्ञानिक विषयों की छानबीन में जुट जाते थे। 

एक दिन एक व्यक्ति माइकल के पास अपनी एक पुस्तक पर जिल्द चढ़वाने आया। पुस्तक में बिजली से सम्बन्ध रखने वाले कुछ खेलों का वर्णन किया गया था।

 फेराडे को विद्युत पर प्रयोग करने की बड़ी अभिलाषा थी। वह जिल्द बांधते जाते और विद्युत के उन खेलों को ध्यान से पढ़ते जाते थे।

फेराडे की इस तल्लीनता को देखकर उस व्यक्ति को बड़ा आश्चर्य हुआ। जब उसने इस सम्बन्ध में फेराडे से बातचीत की, तब फेराडे ने उसे बताया कि उन्हें विज्ञान से बड़ा प्रेम है। रात को जब वे अपने काम से अवकाश पाते हैं, तो विद्युत सम्बन्धी छानबीन करते हैं।

 माइकल की बातें सुनकर वह व्यक्ति बहुत प्रसन्न हुए। वह व्यक्ति रॉयल इंस्टीट्यूट नामक संस्था का अधिकारी था। उस दिन रॉयल इंस्टीट्यूट में सर हम्फ्रीडेवी का व्याख्यान होने वाला था। जब वह व्यक्ति अपनी पुस्तक लेकर जाने लगा, तो उसने फेराडे को इंस्टीट्यूट का प्रवेश-पत्र देकर उसे हम्फ्रीडेवी का व्याख्यान सुनने के लिए निमंत्रण दिया।

उस समय माइकल फेराडे मात्र इक्कीस वर्ष के थे, जब वे हम्फ्रीडेवी के भाषण सुनने के लिए गए। उन्होंने उन भाषणों को ध्यानपूर्वक सुना और साथ ही नोट भी तैयार किए और उन्हें रसायन विज्ञानी हम्फ्रीडेवी के पास भेज दिया। डेवी इन नोट्स को देखकर इतने खुश हुए कि उनको अपनी प्रयोगशाला में सहायक पद पर नियुक्त कर लिया। 

माइकल हम्फ्रीडेवी का काम करने के साथ-साथ मौका मिलते ही प्रयोग भी करते थे। उनकी विद्युत में विशेष रुचि थी। वह इस बात को पहले ही जानते थे कि जब कुछ द्रवों में से विद्युत की धारा गुजारी जाती है, तो जिन पदार्थों से वह द्रव बना होता है, वे पदार्थ अलग-अलग हो जाते हैं। 

उदाहरण के रूप में, जब जल में विद्युत धारा गुजरती है, तो जल हाइड्रोजन और ऑक्सीजन नामक गैसों में बंट जाता है। यह क्रिया ‘विद्युत अपघटन’ कहलाती है। उन्होंने इस क्रिया पर अनेक प्रयोग किए और इस प्रक्रम के लिए एक सूत्र बनाया। सूत्र के अनुसार विद्युत-अपघटन में अपघटित हुए पदार्थ की मात्रा सदैव उपयोग की गई विद्युत की मात्रा के अनुपात में होती है। यह नियम फेराडे के नाम से ही विख्यात हुआ। 

सन् 1821 ई. में माइकल फेराडे ने पहली विद्युत मोटर का आविष्कार किया, जो बहुत ही सरल थी। इस मोटर में केवल तांबे की छड़ थीं, उन्हीं छड़ों में होकर एक बैट्री के माध्यम से विद्युत गुजारी जाती थी तथा विद्युत के सम्पर्क में आने से वह घूमने लगती थी। यद्यपि यह बैट्री छोटी और महत्त्वहीन थी, किन्तु फिर भी इससे फेराडे की बुद्धिमानी को कम करके नहीं आंका जा सकता। भविष्य में विज्ञान के और विकसित होने पर, इस बैट्री ने उन मोटरों का रूप ले लिया, जो हमारी फैक्ट्ररियों में बड़ी-बड़ी मशीनें चलाने में मदद करती हैं। 

माइकल फेराडे ने जिस विधि से विद्युत मोटर तैयार की थी, सन् 1831 ई. में उन्होंने उस विधि को उलट दिया। इस बार उन्होंने विद्युत को गति अथवा यांत्रिक ऊर्जा बनाने के लिए उपयोग नहीं किया, बल्कि गति को विद्युत पैदा करने के लिए उपयोग किया। उन्होंने एक मामूली चुम्बक लिया। यह लौह धातु का ऐसा टुकड़ा होता है, जिसमें दूसरी धातु को अपनी ओर खींचने की शक्ति होती है। 

चुम्बक में स्थित चुम्बकीय बल उसके आस-पास फैला होता है, जो बल का क्षेत्रफल कहलाता है। किन्तु इसे देखा नहीं जा सकता। उन्होंने पाया कि जब वह इस चुम्बकीय क्षेत्र से तार के एक टुकड़े को गुजारते हैं, तो विद्युत उत्पन्न होती है। जब फेराडे को एक बार यह रहस्य पता चल गया, तब उन्होंने चुम्बकीय क्षेत्र में बहुत तेजी से तार गुजारकर सतत् विद्युत धारा को प्राप्त करने में सफलता प्राप्त की।

माइकल के पहले विद्युत उत्पादक में नाल की आकृति का एक बड़ा चुम्बक तथा उसके दोनों सिरों के बीच में निलम्बित तांबे की एक चक्रिका थी, जिसको घुमाने की शक्ति हाथ चालित केंक से आती थी। चुम्बक के सिरों के मध्य में चक्रिका को तेजी के साथ घुमाने में विद्युत उत्पन्न होती थी तथा वह तांबे के छोटे ब्रुसों से जुड़े तारों द्वारा बाहर आती थी। इसके फलस्वरूप पहला विद्युत डायनेमो बना। जिसके सिद्धान्त पर समस्त जनरेटर कार्य करते हैं। 

विद्युत उत्पादन का यही सिद्धान्त हुवर बांध, नियाग्रा प्रपात तथा अन्य अनेक बड़े बिजलीघरों में उपयोग में लाया गया। उन्होंने और भी बहुत से प्रयोग और अन्वेषण किए। जिनका उपयोग विद्युत से चलने वाले बिजली के उपकरणों में किया जाता रहा है।

इससे पूर्व सन् 1810 ई. में हमफ्रीडेवी ने वोल्टा बैट्री के सिरों पर कार्बन की छड़ें लगाकर, उसमें तेज रोशनी प्राप्त की थी। यह पहला आर्क लैम्प था। इन आर्क लैम्पों में निरन्तर सुधार होते रहे। सन् 1878 ई. में लंदन स्थित ग्रेइटी थियेटर के बाहर छः आर्क लेम्प लगाए गए थे। समय-समय पर इनमें कई तरह के सुधार किए गए और फिर सड़कों पर इनका साम्राज्य हो गया था।

फेराडे की मानिन्द सेन्ड्रे एम्पीयर को भी विद्युत सम्बन्धी अध्ययनों में विशेष रुचि थी। वे अपनी प्रयोगशाला में विद्युत चालक खिलौने पर कोई-न-कोई प्रयोग करते रहते थे। आरम्भ में उन्होंने भी इलैक्ट्रो डायनेमो पर काम किया।

 एम्पीयर ने यह खोजा कि जब दो सामान्तर तारों में विद्युत धारा एक ही दिशा में बहती है, तो उनमें आकर्षण होता है। इसी प्रकार यदि दो सामान्तर तारों में विद्युत धारा विपरीत दिशाओं में बहती है तो इन दोनों तारों के बीच में प्रतिकर्षण होता है। उन्होंने सर्वप्रथम यह भी आविष्कार किया कि यदि किसी कुण्डली से विद्युत धारा गुजारी जाए तो वह कुण्डली चुम्बक बन जाती है। इस प्रकार की कुण्डली को सालीनाइट कहते हैं। 

एम्पीयर के प्रयोगों से यह सिद्ध हो गया कि विद्युत धाराओं का वही प्रभाव होता है जो चुम्बकों का होता है। उन्होंने एस्टेटिक नीडल का आविष्कार किया, जो विद्युत धारा मापने के काम में आती है। एम्पीयर ने बताया कि-पृथ्वी का चुम्बकत्व, पृथ्वी के केन्द्र से बहने वाली विद्युत धाराओं के कारण होता है। उन्हीं के नाम पर विद्युत धारा की इकाई एम्पीयर का आज भी प्रयोग किया जाता है। 

विद्युत प्रकाश की बात करें, तो सबसे पहले थामस एल्वा एडिसन का नाम आता है। यद्यपि उनका विद्युत प्रकाश का विचार नया नहीं था, उनसे पूर्व कई लोगों ने इस पर कार्य किया था और विद्युत प्रकाश के कई रूपों का विकास भी किया था। एडिसन से पूर्व के आविष्कारों में विद्युत द्वारा विश्व को प्रकाशित करने के अपने प्रयास में दो तरह के विद्युत प्रकाश का प्रयोग किया जाता था-विद्युत आर्क लैम्प और तापदीप्त प्रकाश। 

एक विद्युत आर्क लैम्प में जब दो इलेक्ट्रोडों के बीच आयनित गैस के माध्यम से धारा प्रवाहित होती है, तो एक चाप अर्थात् आर्क द्वारा प्रकाश उत्पन्न होता है। तापदीप्त लैम्प एक विद्युत लैम्प होता है, जिसमें निर्वात में स्थित एक तन्तु को जब विद्युत धारा प्रवाहित करके गर्म किया जाता है, तो तन्तु प्रकाश उत्पन्न करते हैं। इस तापदीप्त का आविष्कार एडिसन ने ही किया था। किन्तु अभी तक ऐसे विद्युत बल्बों का आविष्कार नहीं हुआ था, जिनकी आयु लम्बी हो। 

एडिसन को ऐसे तार अथवा तन्तु की खोज थी, जो स्थायी हो और उसमें विद्युत धारा प्रवाहित करने पर अच्छा प्रकाश दे। इसके लिए उन्होंने अपने साथियों को अमेजन व जापान के जंगलों में भेजा। उन्होंने छः हजार से अधिक वृक्षों जैसे बेवुड, बॉक्स वुड, देवदार, हिकरी फ्लैक्स, बांस आदि के तन्तु पदार्थों के रूप में परीक्षण किये। चालीस हजार अमेरिकी डॉलर खर्च करने और बारह सौ से अधिक प्रयोग करने के बाद एडिसन ने सन् 1879 ई. में सफलता प्राप्त की।

 एडिसन ने कार्बनीकृत धागे से तंतु युक्त एक तापदीप्ति लैम्प तैयार किया, जो प्रयोगिक आकलन की तुलना में लम्बे समय तक जलता था। उन्होंने न केवल एक प्रयोगिक तापदीप्ति लैम्प विकसित किया, बल्कि उन्होंने एक विद्युत प्रणाली भी विकसित की, जिसमें सभी आवश्यक घटक थे, जैसे-विद्युत बनाने के लिए डायनेमो, तार, फ्यूज, विद्युत मीटर, प्रकाश को ऑन-ऑफ करने के लिए स्विच आदि और शीघ्र ही तापदीप्ति प्रकाश को व्यवहारिक सुरक्षित और व्यावसायिक रूप से उपयोगी बनाया।

 एडिसन ने तापदीप्त प्रकाश प्रणाली का पहला सार्वजनिक प्रदर्शन दिसम्बर, माह 1879 ई. में किया, जब मेनलो पार्क प्रयोगशाला परिसर को विद्युत के द्वारा प्रकाशित किया गया। इस कार्य को निष्पादित करने के बाद एडिसन ने विद्युत के निर्माण का प्रयास किया। 

सन् 1880 ई. में एडिसन ने वॉल स्ट्रीट, न्यूयॉर्क के एक मालगोदाम में दुनिया की प्रथम विद्युत-शक्ति कम्पनी स्थापित की। निचले मैन हट्टन के पर्ल स्ट्रीट में स्थित विद्युत केन्द्र ने 6 सितम्बर, सन् 1882 ई. से कार्य शुरू किया और इससे पहली बार जे.पी. मार्गन और न्यूयॉर्क टाइम्स के कार्यालयों को बिजली प्रदान की गई, जिन्हें भूमिगत तारों से जोड़ा गया था। इस प्रकार उन्होंने विद्युत-शक्ति प्रणाली का आविष्कार किया। 

धीरे-धीरे, विद्युत उपयोग में आने लगी। उन्हीं दिनों बल्बों में एक और सुधार हुआ। विलियम ने कार्लनीकृत धागे के स्थान पर टंगस्टन का प्रयोगकर बल्ब का प्रकाश तीन गुना बढ़ा दिया। सन् 1935 ई. में संयुक्त राज्य अमेरिका में तापदीप्त ट्यूबलाइट बनी। धीरे-धीरे सम्पूर्ण विश्व में विद्युत का एकछत्र राज्य स्थापित होने लगा। 

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