डॉ भीमराव अम्बेडकर पर निबंध | Bhimrao Ambedkar Essay in Hindi

Bhimrao Ambedkar Essay in Hindi

डॉ भीमराव अम्बेडकर पर निबंध Bhimrao Ambedkar Essay in Hindi

राष्ट्र निर्माण में डॉ. भीमराव अंबेदकर की महती भूमिका रही। राष्ट्र निर्माण के साथ-साथ उन्होंने सामाजिक समरसता कायम करने के साथ एक भेदभाव रहित समाज की स्थापना में भी अविस्मरणीय योगदान दिया। जहां देश में दलितों के उद्धारक के रूप में वह ‘दलितों के मसीहा’ कहलाए, वहीं भारतीय संविधान के निर्माण में अपना यथेष्ट योगदान देकर वह भारतीय संविधान के निर्माता कहलाए। वह एक अच्छे राजनीतिक विचारक, दार्शनिक व विज्ञानी तो थे ही, | भारतीय समाज के लिए किसी क्रांति दूत जैसे थे। एक ऐसा क्रांतिदूत, जिसने भारतीय समाज को एक नई दिशा दी, अछूत और अस्पृश्यता जैसे सामाजिक कलंकों को मिटाकर एक समरस समाज की स्थापना की। ऐसा करते हुए उन्होंने अपनी आलोचनाओं तक की, तनिक भी परवाह नहीं की। 

डॉ. अम्बेदकर अग्रदृष्टि के राजनीतिज्ञ थे। अपने निजी जीवन में वह महात्मा फुले, महात्मा गांधी तथा जॉन ड्यूई (अमेरिकी दार्शनिक) के विचारों से खासे प्रभावित रहे। अछूतों को लेकर उनके मन में जो पीड़ा थी, उसे पंडित नेहरू ने बड़े ही कलात्मक ढंग से रेखांकित किया— “डॉ. अम्बेदकर हिन्दू समाज के अत्याचारपूर्ण तत्वों के प्रति विद्रोह के प्रतीक थे।’ संघर्षों के रास्ते पर चलते हुए उन्होंने खुद तो ऊंची तालीम हासिल ही की, दलितों को भी उनके उत्थान के लिए उच्च शिक्षा के लिए प्रेरित किया। यह कहना असंगत न होगा कि उन्होंने अपने प्रेरक व्यक्तित्व के जरिये उच्च शिक्षा के उजाले को दलितों के मध्य फैलाया। वह उन राजनीतिज्ञों में थे, जिन्होंने राष्ट्र और समाज निर्माण के लिए शिक्षा के मर्म को समझा। उन्होंने दलितों को आत्मसुधार के लिए प्रेरित किया और इसके लिए शिक्षा को बेहतर माध्यम माना। 

डॉ. अम्बेदकर ने दलितों को समाज में आगे लाने के लिए दोहरे प्रयास किए। एक तो उन्होंने दलितों के बीच व्याप्त हीन ग्रंथियों को दूर करते हुए यह एहसास जगाया कि वे किसी से कमतर नहीं हैं, दूसरे उन्होंने दलितों को प्रशासनिक इकाइयों में स्थान दिलाने के लिए भी व्यापक संघर्ष किया। उन्होंने दलितों को इस बात के लिए भी प्रेरित किया कि वे अपने हक के प्रति सजग रहें और यदि आवश्यकता पड़े तो न्यायालय का द्वार खटखटाने से भी न हिचकिचाएं। उनके ये प्रयास जागृति लाए, जिनसे बदलाव की प्रक्रिया शुरू हुई। 

डॉ. अम्बेडकर सच्चे अर्थों में दलितों के हितैषी थे, क्योंकि उन्होंने दलितों की थोथी हिमायत ही नहीं की, बल्कि उन्हें उन सामाजिक कुरीतियों से मुक्त होने के लिए ललकारा, जिनके वे शिकार थे और जो उनकी प्रगति में बाधक थी। उन्होंने दलितों को यह मशविरा दिया कि यदि वे समाज में आगे बढ़ना चाहते हैं, तो जुआ, शराब व मांसाहार जैसी आदतों को छोड़ दें। इस तरह दलितों के लिए ही सही, उन्होंने एक निर्मल समाज की स्थापना में सक्रिय भूमिका निभाई। 

हिन्दू वर्ण व्यवस्था में दलितों की दयनीय दशा ने अम्बेदकर को इस हद तक उद्वेलित किया कि उन्होंने यह आह्वान किया कि यदि हिन्दू धर्म में मान-सम्मान न मिले तो माथे से अछूत का कलंक मिटाने के लिए बौद्ध धर्म को स्वीकार कर लेने में कोई बुराई नहीं है। कहा जाता है कि जीवन के अंतिम काल में हिन्दू धर्म के प्रति हुई वितृष्णा के कारण उन्होंने बौद्ध धर्म अंगीकार भी कर लिया था। वह सदैव सवर्णों व निम्न जातियों के मध्य समानता लाने के लिए आंदोलित व उद्वेलित रहे। 

डॉ. अम्बेदकर लोकतंत्र के सच्चे पक्षधर थे। उन्होंने लोकतंत्र में भी संसदीय लोकतंत्र को वरीयता दी। उनका मानना था कि संसदीय लोकतंत्र ही वह प्रणाली है, जिसमें स्वतंत्र चर्चा के अवसर निहित होते हैं और जो सामाजिक व सार्वजनिक हित के लिए आवश्यक भी है। वह संसदीय लोकतंत्र को आर्थिक व सामाजिक विषमताएं दूर करने की कारगर प्रणाली मानते थे। उन्होंने इसके लिए प्रयास भी किया तथा जातिप्रथा को लोकतंत्र के लिए बाधक मानते हुए इसे दूर करने के प्रयास भी किए। इस बाबत उनका नजरिया अत्यंत स्पष्ट था। वह कहा करते थे कि राजनीतिक लोकतंत्र तभी कायम हो सकता है, जब हम समाजिक लोकतंत्र को देश में सफलतापूर्वक स्थापित कर लें। 

वह लोकतंत्र के लिए सांविधानिक विधि को जरूरी मानते थे। उनका मानना था कि इस विधि से ही सामाजिक व आर्थिक हितों को पूरा किया जा सकता है। इसे वह सामाजिक लोकतंत्र के लिए भी आवश्यक मानते थे और ऐसा कहते हुए वह व्यक्ति के अधिकारों पर विशेष बल देते थे। डॉ. अम्बेदकर महात्मा गांधी से प्रभावित अवश्य थे, किंतु कहीं-कहीं दोनों में मतैक्य नहीं दिखता है। मसलन, व्यक्ति के अधिकारों के संदर्भ में ही दोनों के विचारों में साम्य नहीं दिखता। जैसे, गांधीजी का यह विचार था कि हमारे गांव शासन की इकाई होने चाहिए, जबकि अम्बेदकर का यह मानना था कि ऐसा होने पर व्यक्ति का अस्तित्व बौना हो जाएगा। भारत के गांवों के वातावरण को वह बहुत अच्छा नहीं मानते थे। 

डॉ. अम्बेदकर ने एक ऐसे सामाजिक लोकतंत्र की परिकल्पना की थी, जिसमें बंधुत्व, समता और स्वतंत्रता जैसे परमतत्व निहित हों। देश में समता के अभाव को लेकर जहां वे क्षुब्ध रहते थे, वहीं समता कायम करने के लिए वह निरंतर संघर्षरत भी रहते थे। अवसरों के द्वार सभी के लिए समान रूप से खुले रहें, उन्होंने सदैव इस बात की वकालत की और शायद इसीलिए वह भारत में वीरपूजा की परंपरा के विरोधी भी थे। उन्होंने यह कभी नहीं चाहा कि नेतृत्व आवाम को पशुओं की तरह हांके। यानी वे लोकतंत्र की भेंड़ चाल के समर्थक नहीं थे। उनका मानना था कि इन स्थितियों में विधि के शासन व लोकतंत्रीय प्रक्रिया की अपेक्षा नहीं की जा सकती। 

डॉ. अम्बेदकर विधि मर्मज्ञ थे, अतएव उन्हें भारतीय संविधान के निर्माण की महती जिम्मेदारी सौंपी गई। तत्कालीन परिस्थितियों में यह कोई आसान काम न था, किंतु उन्होंने इसे बखूबी कर दिखाया। यहां भी उनकी साफगोई देखते ही बनती है। जब उन्होंने भारतीय संविधान का प्रारूप प्रस्तुत किया, तब बड़ी बेबाकी से यह टिप्पणी भी कि थी— “इस संविधान को अपनाकर हम विरोधाभासों से भरे जीवन में प्रवेश करने जा रहे हैं। इससे राजनीतिक जीवन में तो हमें समानता प्राप्त हो जाएगी, किन्तु सामाजिक और आर्थिक जीवन में विषमता बनी रहेगी। राजनीतिक क्षेत्र में तो हम ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य’ (One man, One Vote, One Value) के सिद्धांत को तो मान्यता प्रदान कर देंगे, परंतु हमारा सामाजिक और आर्थिक ढांचा इस ढंग से नहीं बदल जाएगा, जिससे एक व्यक्ति, एक मूल्य के सिद्धांत को सार्थक किया जा सके।” डॉ. अम्बेदकर की यह टिप्पणी आजादी के आज इतने वर्षों बाद भी प्रासंगिक है। विरोधाभास भी कायम है तथा सामाजिक और आर्थिक ढांचे में अपेक्षित बदलाव भी नहीं आया है। एक मूल्य, एक व्यक्ति के सिद्धांत को हम अभी स्थापित नहीं कर पाए हैं। 

आज गणतंत्र के छह दशक से भी ज्यादा का सफर हम तय कर चुके हैं। ऐसे में यह सवाल अहम है कि क्या इतना समय गुजर जाने के बाद भी हम समान नैतिक मूल्यवत्ता (Equal Moralworth) के स्तर पर पहुंच पाए हैं? जवाब शायद नहीं है। हम इसको अभी तक न तो आत्मसात कर पाए हैं और नहीं सार्थकता का जामा ही पहना पाए हैं। यहीं आकर ऐसा महसूस होता है कि अभी डॉ. अम्बेदकर के सपनों का भारत अधूरा है। वह कहा भी करते थे कि जब तक आप अपनी समाज व्यवस्था को नहीं बदलेंगे, तब तक कोई भी प्रगति निष्फल होगी। हमें ऐसी स्थितियां कुछ सुधार के साथ आज भी देखने को मिल रही हैं। 

डॉ. अम्बेदकर का जीवन उपलब्धियों से भरपूर रहा। एक दलित परिवार में जन्म लेने के बावजूद उन्होंने फर्श से अर्श तक का सफर बखूबी तय किया। वह वर्ष 1942 से 46 तक वायसराय की एक्जिीक्यूटिव काउंसिल के सदस्य रहे। वर्ष 1947 से 51 तक भारत सरकार के विधि मंत्री रहे। वह एक अच्छे रचनाकार भी थे। 

उनकी प्रसिद्ध पुस्तकें हैं— “द प्रॉब्लम ऑफ रूपीज’ तथा ‘रिडल्स ऑन हिन्दूइज्म’। उन्होंने अपनी चर्चित कृति-‘एनीहिलेशन ऑफ कॉस्ट’ में जहां हिन्दू वर्ण व्यवस्था का व्यापक विश्लेषण प्रस्तुत किया है, वहीं हिन्दू समाज में व्याप्त उन अत्याचारपूर्ण तत्वों का विरोध किया है, जो सामाजिक समानता में बाधक रहे और जिन्होंने समाज के एक वर्ग को अस्पृश्यता और अछूतता का दंश झेलने को विवश किया। उनकी यह पुस्तक जाति प्रथा के उन्मूलन पर केन्द्रित है, जो उन्हें दलितों का मसीहा साबित करती है। संविधान निर्माता के रूप में | उन्होंने राष्ट्र को जो योगदान दिया वह अविस्मरणीय है। भारत के इस महान विचारक व समाज उद्धारक का निधन वर्ष 1956 में हुआ। मरणोपरांत उन्हें वर्ष 1990 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया। | भारत को लेकर आज भी उनका जो सपना अधरा है, उसे परा कर हम उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित कर सकते हैं। 

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