भास्करचार्य की जीवनी | Biography of Bhaskaracharya in Hindi

भास्करचार्य की जीवनी

भास्करचार्य की जीवनी | Biography of Bhaskaracharya in Hindi

खगोल जगत् के प्रसद्धि विशेषज्ञ भास्कराचार्य का जन्म सन् 1114 ई० में हुआ था। भास्कर एक मौलिक विचारक थे। पहले ये भास्कर के नाम से ही जाने जाते थे, बाद में जब इनकी विद्वता को लोगों ने समझा तो इन्हें ‘आचार्य’ कहकर सम्बोधित करने लगे। आचार्य का अर्थ गुरु होता है। उन्हें सिर्फ भास्कर न कहकर बाद में लोग भास्कराचार्य कहने लगे। बीजगणित में वे ब्रह्मगुप्त को अपना गुरु मानते थे। खगोलविद् के रूप में विश्व प्रसिद्ध वैज्ञानिक भास्कर ने प्रसिद्ध पुस्तक ‘सिद्धान्त शिरोमणि’ की रचना की। उस पुस्तक का एक अध्याय उनकी बेटी लीलावती के नाम पर था। उस समय भास्कर की आयु तीस वर्ष थी। उनका कहना था कि यदि कोई लीलावती का ठीक ढंग से अध्ययन कर चुका हो, तो वह किसी पेड़ की पत्तियों की संख्या भी बता सकता है। 

भास्कर को डिफरेन्शियल कैलकुलेशन का संस्थापक कहा जा सकता है। खगोलविद् के रूप में वे सारी दुनिया में प्रसिद्ध हुए। उनकी दूसरी पुस्तक ‘करण कौतूहल’ थी। उसे आज भी पंचांग बनाने के लिए प्रयोग किया जाता है। लीलावती के बहुत से प्रश्न आज नौवीं, दसवीं कक्षाओं की गणित की पुस्तकों में दिए जाते हैं। 

भास्कर द्वारा रचित पुस्तक का लीलावती नामक अध्याय मूल रूप से गणित सम्बन्धी है। पुस्तक में बीजगणित (एलजेब्रा) आदि का भी विवरण है। 

भास्कर ने अपनी पुस्तक ‘सिद्धान्त शिरोमणि’ के सब अध्याय का नाम लीलावती क्यों रखा, इसके विषय में एक कथा प्रसिद्ध है 

भास्कर की बेटी लीलावती जब छः वर्ष की थी, तो भास्कर ने उसका विवाह कर दिया। विवाह के पूर्व महान् गणितज्ञ और ज्योतिषज्ञानी भास्कर ने अपनी पुत्री का शुभ मुहूर्त में विवाह करने के लिए एक समय निश्चित किया था। उस समय में किसी प्रकार की त्रुटि न हो इसलिए वे एक जल घड़ी लाए थे, ताकि समय का सही-सही अनुमान लगा सकें। लीलावती को वह जलघड़ी बहुत पसन्द थी, जिस कारण समय मिलते ही वह जलघड़ी को ताकने खड़ी हो जाती। 

विवाह से एक दिन पूर्व लीलावती जब जलघड़ी देख रही थी, तो उसकी नाक की लौंग का नन्हा-सा मोती निकलकर जलघड़ी में गिर गया। भय के मारे उस लड़की ने यह बात किसी को नहीं बतायी। 

अगले दिन लीलावती का विवाह हो गया, मगर एक सप्ताह बाद उसके पति चट्टान से गिरकर मर गए और वह विधवा हो गई। इसका भास्कर को बहुत दुःख हुआ। उनकी गणनाओं के अनुसार लीलावती का विवाह एक निश्चित समय पर होना चाहिए था और इसीलिए वे जलघड़ी लाए थे। मगर उन्हें क्या पता था कि घड़ी में मोती गिरने से उसका समय दर्शन खराब हो गया था। इसी कारण उनकी गणना में गलती हो गई थी जिससे इतनी बड़ी गड़बड़ी हो गई। इस घटना के लिए वे खुद को दोषी मानते थे। उन दिनों विधवा लड़कियों का पुर्निविवाह नहीं होता था, इसीलिए इन्होंने अपनी बेटी की दिलचस्पी गणित में पैदा की। आज करीब एक हजार वर्ष बीत जाने पर भी खगोल शास्त्री के रूप में उन्हें सारी दुनिया याद करती है। 

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