भारतीय समाज में नारी का स्थान पर निबंध |Essay on the place of women in Indian society

Essay on the place of women in Indian society

भारतीय समाज में नारी का स्थान पर निबंध-Essay on the place of women in Indian society

भारत में नारी को जो सम्मानपूर्ण स्थान मिला है, वैसा संसार में अन्यत्र नहीं है. भारत में नारी आरम्भ से ही आदर्श तथा उत्कृष्टता की प्रतिमूर्ति मानी जाती रही है. 

हड़प्पा संस्कृति में नारी की पूजा होती थी. अर्द्धनारीश्वर की कल्पना इसी बात का प्रतीक है कि नारी तथा पुरुष समान हैं. कोई भी धार्मिक अनुष्ठान अथवा सामाजिक दायित्व पत्नी के बिना पूर्ण नहीं हो सकता था. वैदिक युग में न पर्दा था, न सती प्रथा थी. पुत्र के अभाव में पुत्री पिता की सम्पत्ति की उत्तराधिकारिणी होती थी. विधवा को भी सम्पति का अधिकार प्राप्त था. 

भारत में मुसलमानों के आगमन के साथ भारतीय नारी के जीवन की करुण गाथा का इतिहास आरम्भ होने लगता है. यवनों की काम लोलुप दृष्टि से बचाने के लिए भारतीय नारी की रक्षा का उपक्रम होता है. आरम्भ में राजपूत नारियाँ जौहर करके अपने सतीत्व की रक्षा में तत्पर दिखाई देती हैं. तदुपरान्त पुरुष वर्ग नैतिक रूप से नारी की सुरक्षा का उत्तरदायित्व ले लेता है, उसे घर के भीतर पर्दे में रखा जाता है. कन्या के रूप में पिता द्वारा, पत्नी के रूप में पति द्वारा और माता के रूप में पुत्र द्वारा रक्षिता नारी पुरुष पर आश्रित होती चली जाती है. शक्ति की प्रतीक भारतीय नारी अबला हो जाती है. उसकी दशा पर करुणा को भी करुणा आने लगती है. 

अंग्रेजों के आगमन के साथ भारत आधुनिक युग में प्रवेश करता है. जागरण, चेतना और विकास के इस युग में नारी का भाग्य करवट लेता है. बंगाल में राजा राममोहन राय नारी को अभिशाप मुक्त करने के लिए क्राँति का बिगुल बजाते हैं. राजा राममोहन राय तथा अन्य समाज सुधारकों के अथक प्रयासों से सन् 1829 में सती प्रथा, कन्या वध जैसी क्रूर प्रथाओं को गैर-कानूनी घोषित किया गया. 

लम्बे प्रयासों के बाद सन् 1929 में शारदा एक्ट द्वारा, बाल विवाह निरोधक अधिनियम द्वारा बाल विवाह पर प्रतिबन्ध लगा. स्वतन्त्र भारत में संविधान द्वारा लिंग भेद को समाप्त कर दिया गया है. महिलाओं और पुरुषों को समान दर्जा दिया गया है. अधिनियमों द्वारा हिन्दू नारी पर लगे प्रतिबन्ध समाप्त कर दिए गए हैं. अब उसे तलाक का अधिकार भी प्राप्त है. बहुपत्नी प्रथा पर भी अंकुश लगा दिया है, दहेज प्रथा के विरुद्ध भी कठोर कानून बनते जा रहे हैं. 

स्वतन्त्रता संग्राम में योगदान 

भारतीय नारी के उत्थान हेतु समर्पित विदेशी नारियों एनी बीसेण्ट, मेडम कामा, सिस्टर निवेदिता आदि से काफी प्रेरणा मिली. सरोजिनी नायडू, विजयलक्ष्मी पंडित, कमला नेहरू, इन्दिरा गांधी, सुचेता कृपलानी, मणिबेन पटेल, अमृत कौर, हंसा मेहता आदि ने स्वाधीनता संग्राम में उल्लेखनीय योगदान दिया. 

समसामयिक भारत में महिलाओं की उपलब्धियाँ 

स्वाधीनता के बाद भारतीय महिलाओं ने अपनी छवि बनाए रखी है. सामाजिक व्यवस्था में उन्होंने ऊँचे से ऊँचा स्थान प्राप्त किया है. श्रीमती विजय-लक्ष्मी पंडित विश्व की पहली महिला थीं जो संयुक्त राष्ट्र संघ महासभा की अध्यक्ष बनी थीं.. 

सरोजिनी नायडू स्वतन्त्र भारत में पहली महिला राज्यपाल थीं और वह भी सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की. इसी प्रकार सुचेता कृपलानी प्रथम मुख्यमंत्री हुई और वह भी इसी बड़े राज्य की. इन्दिरा गांधी सबसे प्रमुख राजनीतिक पार्टी कांग्रेस की अध्यक्ष तथा देश की लम्बे समय तक प्रधानमंत्री रहीं. 

इस समय लोक सभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 6.6% है. वर्तमान संयुक्त मोर्चे की सरकार ने लोक सभा, विधान सभाओं और राजकीय सेवाओं में 33% महिलाओं को आरक्षण देने की घोषणा की है. इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए संविधान में आवश्यक संशोधन करने का आश्वासन दे दिया गया है, परन्तु आरक्षण तो वैशाखी के समान धारक को परावलम्बी बनाने वाला है. वास्तविक उन्नति तो तब समझी जाएगी जब महिलाएं स्वतंत्र रूप से चुनाव जीतकर आएंगी. 

भारतीय समाज में महिलाओं में धीरे-धीरे जागृति आ रही है. इस जागृति के कारण महिलाएं जीवन के हर क्षेत्र में आगे आ रही हैं. सामाजिक, राजनीतिक मंचों पर भी वे आगे आ रही हैं. उनमें आगे बढ़ने का उत्साह है. यह सब परिस्थितियों में होने वाले परिवर्तन का नतीजा है. यह मानसिक परिवर्तन उनमें शिक्षा के कारण आया है. 

भारतीय समाज में नारियों की समस्याएं 

कहने को तो हमारे देश में लगभग आधी जनसंख्या महिलाओं की है, लेकिन वास्तविकता यह है कि प्रति एक हजार पुरुषों पर यहाँ महिलाओं की संख्या 929 ही है. इसी से जाहिर होता है कि महिलाओं की जो स्थिति समाज में होनी चाहिए वह नहीं है. महिलाओं की शिक्षा दर भी पुरुषों से कम है. 1991 के आँकड़ों के अनुसार पुरुष महिला साक्षरता का प्रतिशत क्रमशः 64 एवं 39 है. 

आज भारत की अधिकांश महिलाएं अशिक्षा, अंधविश्वास, दरिद्रता तथा रूढियों से ग्रस्त हैं. गाँवों में, पिछड़े इलाकों में तथा समाज के पिछड़े वर्गों में उनकी स्थिति और भी गंभीर है. केवल कुछ महिलाओं द्वारा उच्च पदों की प्राप्ति को सन्तुष्टि का आधार नहीं माना जा सकता. बाल विवाह, दहेज प्रथा, नारी के देह का व्यापार, बलात्कार आदि अनेक बुराइयाँ हैं जिनके उन्मूलन के लिए कानून बनाए गए हैं जिनका कठोरतापूर्वक पालन करने की नितान्त आवश्यकता है. 

यह विचित्र विसंगति है कि जैसे-जैसे महिलाओं की सुरक्षा के लिए कानून बन रहे हैं, प्रशासनिक उपाय किए जा रहे हैं वैसे-वैसे महिलाओं के प्रति किए जाने वाले अपराधों का ग्राफ निरन्तर ऊपर चढ़ता जा रहा है. 

आँकड़े बताते हैं कि हमारे देश में हर रोज बलात्कार के लगभग 35 तथा महिलाओं पर विभिन्न तरह की यातनाओं के करीब 220 मामले पुलिस में दर्ज होते हैं. इसमें उत्तर प्रदेश का स्थान सबसे आगे रहता है. यह तो महज सरकारी आँकड़े हैं, हकीकत कुछ और ही अधिक भयावह हो सकती है. 

जनसंख्या को नियंत्रित करने के नाम पर गर्भपात को वैध घोषित कर दिया गया है तथा गर्भपात की सुविधाएं भी उपलब्ध करा दी गई हैं. इसका व्यावहारिक पक्ष यह है कि कन्या भ्रूणों की हत्या सामाजिक शिष्टाचार बन गई है. नारी जाति के इस अपमान में नारियाँ सहर्ष सहभागी बनती हैं. 

दहेज एक ऐसी सामाजिक कुरीति है, जो अनेक कुमारियों को दुल्हन नहीं बनने देती है और बेटी के पिता को कभी चैन की नींद नहीं सोने देती है. कन्यादान जैसी पवित्र रस्म इसी के कारण घटिया व्यापार में परिणत हो गई है.

भारतीय नारियों की समस्या का समाधान 

पश्चिम का अनुकरण करने से काम नहीं चलेगा, भारतीय नारी को भारतीय आदर्श सामने रखकर अपने स्वरूप की प्रतिष्ठा करनी है. लड़कियाँ जिस दिन दहेज माँगने वाले परिवार की बहू बनने से इन्कार करने लगेंगी, उसी दिन दहेज प्रथा अपने अन्त की ओर अग्रसर हो जाएगी. समाज चलाने के लिए पुराने की नहीं नए ढंग के परिवार की परिकल्पना जरूरी है जिसमें स्त्री का शोषण न हो. इसके लिए समाज की भीतरी संरचना अर्थात् परिवार में नारी की जगह बदलनी होगी. इसके लिए नारियों की संगठित ताकत कुछ तात्कालिक तरीकों से हल करने की बात न करके एक नई सामाजिक व्यवस्था का स्वप्न दिखा सकती है. बेरोजगारी, अशिक्षा, भूखमरी जोकि भारतीय नारियों की समस्याओं के समाधान के लिए महिलाएं आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनें. उन्हें एक व्यक्ति के रूप में अपनी प्रतिष्ठा कायम करने की जरूरत है. आर्थिक रूप से सक्षम नारी ही वास्तव में सबल नारी है. पुरुष वर्ग पर निर्भर नारी का शोषण होता है. 

विडम्बना यह है कि हमारी तथाकथित स्वावलम्बी नारियाँ पाश्चात्य संस्कृति की चकाचौंध में अनजाने ही अपने सौन्दर्य का सौदा करने लगी हैं. प्रत्येक प्रकार के विज्ञापन पर अपनी तस्वीर देखकर वह रीझती है. वह भूल जाती है कि उसकी सन्तान उसके इस व्यवहार के आधार पर उसके विषय में क्या धारणा बनाएगी? नारी का अत्यधिक प्रसाधित होना गिद्ध दृष्टि को आमंत्रित करता है. हमारा नारी-वर्ग यदि इस ओर सजग हो जाए, तो नारी उत्थान समाज-कल्याण का पर्यायवाची बन जाएगा. 

स्वामी विवेकानन्द का कहना है कि ‘स्त्रियों की अवस्था में सुधार न होने तक विश्व के कल्याण का कोई मार्ग नहीं है. किसी पक्षी का एक पंख के सहारे उड़ना नितांत असम्भव है. हम याद रखें एक नारी सुयोग्य सन्तान द्वारा पूरे राष्ट्र का निर्माण करने का श्रेय प्राप्त कर सकती है. 

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