Best Success tips -व्यापार को महज व्यापार नहीं, जिन्दगी का आधार मानिए

Best Success tips

Best Success tips in hindi- व्यापार को महज व्यापार नहीं, जिन्दगी का आधार मानिए (Think Business To Be The Base Line of Life) 

१.किसी वस्तु अथवा सेवा का आदान-प्रदान ही व्यापार नहीं है, बल्कि जिन्दगी का हर क्षण ही एक व्यापार है. हमें हर श्वास के बदले समाज को कुछ न कुछ चुकाना पड़ता है. हमारा तो अस्तित्व ही किसी न किसी व्यापार पर टिका हुआ है. हर व्यक्ति कहीं न कहीं, किसी न किसी प्रत्युपकार पर बिका हुआ है.

2. सांस्कृतिक बदलाव की शुरूआत व्यापारिक बदलाव से ही होती है. व्यापार कोई यान्त्रिक गतिविधि नहीं, उसमें मानवीय संवेदनाओं की भूमिका भी होती है. व्यापार महज उदरपूर्ति का साधन नहीं, उसमें सामाजिक सम्बन्धों की भूमिका भी होती हैं. इसलिए मानवीय संवेदनाओं एवम् सामाजिक प्रतिबद्धताओं को व्यापार का आधार बनाइए.

3. दुकान, फैक्ट्री, कार्य स्थल एवम् कार्यालय को देवालय मान कर चलें. हर ग्राहक, व्यवहारी एवम् आगन्तुक को महत्वपूर्ण, आत्मीय एवम् अतिथि मानकर चलें, याद रखें, समाज धन पर टिका है, धन व्यापार पर टिका है, व्यापार विश्वास पर टिका है, विश्वास धर्म पर टिका है और धर्म समाज पर टिका है, अर्थात् व्यापार ही समाज का आधार है.

4. आगन्तुक के सुख-दुःख की बात पहले करें. हर ग्राहक की बात गम्भीरता से सुनें. एक अच्छे सलाहकार की भूमिका निभायें. बिक्री के बाद संतोषप्रद सेवायें दें. पुराने ग्राहकों से पूर्व की खरीददारी के सम्बन्ध में अवश्य पूछे. कभी उत्तेजित न हों. कभी क्रोधित न हों. कभी विचलित न हों. दुकानदार का संयम ग्राहक के लिए निर्णायक होता है. खुले मन से ग्राहक का स्वागत करें. चाहे ग्राहक कुछ खरीदे या न खरीदे, किन्तु उसके पधारने का शुक्रिया अवश्य अदा करें. याद रखें, एक नाराज ग्राहक आपके दस ग्राहक तोड़ देगा.

5. हर ग्राहक पैसे कम करवाता है. मोल भाव करना ग्राहक का स्वभाव होता है, इसलिए यदि कीमत कम कर सकते हैं तो पूर्ण औचित्य एवम् तथ्यों के आधार पर कम कर दें. ग्राहक को वस्तु की कम्पनी–दरों, अधिकतम खुदरा मूल्यों, खरीद मूल्यों एवम् अन्य ग्राहकों से वसूल की गई दरों के आधार पर संतुष्ट करें, ताकि आपकी बात पर विश्वास किया जा सके. उस सौदे में आपको क्या मिल रहा है, यह भी ग्राहक के समक्ष स्पष्ट कर दें. दरें इतनी कम भी न करें कि ग्राहक का विश्वास ही उठ जाय, चाहें तो एक दाम भी रख सकते हैं. किन्तु ग्राहक की जेब और वस्तु की गुणवत्ता का सदा ध्यान रखें. ऐसी प्रतियोगी दरें निर्धारित करें, ताकि ग्राहक का विश्वास कायम रह सके. 

6.ग्राहक को उसके बजट के अनुसार ही वस्तुएं दिखायें. हर वस्तु के सम्बन्ध में विस्तार से समझायें. वस्तु पसंद आने पर बिल, गारण्टी कार्ड आदि कागजात तैयार करें. सामान की आकर्षक पैकिंग करें. सामान ग्राहक के वाहन तक अथवा उसके घर तक पहुँचाने में मदद करें, ग्राहक को सदैव सही सलाह दें, भले ही आपका माल न बिके.

7. लेन-देन सम्बन्धी हिसाब-किताब सदैव साफ सुथरा एवम् अपडेट रखें. किसी से उधार मांगना हो तो अकेले में मांगें. दूसरों के सामने कभी उधार न मांगें. इस तरह मांगें कि अगले को बुरा भी न लगे और अहसास भी हो सके. पूछने पर ग्राहक को तत्काल हिसाब दिखा दें, समझा दें. ग्राहक से पारिवारिक सम्बन्ध बनाये रखें. ग्राहक को महज ग्राहक ही नहीं, उसे एक विशिष्ट एवम् महत्वपूर्ण व्यक्ति मानें. ग्राहक को सदा अपने से बड़ा माने. ग्राहक को अक्सर सही ही मानें, याद रखें, चालाकी एवम् बेईमानी अधिक देर तक नहीं चलती. ईमानदारी, गुणवत्ता, संतोषप्रद सेवा एवम् आपकी व्यावहारिक कुशलता ही आपकी असली सफलता है.

8. मूल्य एवम् मर्यादाओं का सदैव ध्यान रखें. अपनी साख के साथ-साथ ग्राहक की साख का भी ध्यान रखें. व्यापार को संस्कार युक्त बनायें. व्यापार को व्यक्ति-परक बनायें. व्यापार में अच्छे संस्कारों का निर्माण करें. केवल एक बार में ही लाभ कमाने की न सोचें, वरना ग्राहक न खुद दुबारा आयेगा और न दूसरों को आने देगा. कमाई के साथ-साथ खर्च भी करें. ग्राहक पर किया गया खर्चा ब्याज सहित वापस आ जाता है.

9. वस्तुतः व्यापार एक साहसिक कार्य है. अपने आप में साहस पैदा करने के लिए-1. सदैव असलियत का सामना करने के लिए तैयार रहें. 2. अपने लागत प्रबन्धन की जाँच करते रहें और प्रबन्धन की शर्तो पर अटल रहें. 3. एक आदर्श चरित्र का निर्माण करें और फिर अपने चरित्र के लिए सदैव सजग एवम् सतर्क रहें. 4. साहस से भरपूर छोटे-छोटे कार्य करने का अभ्यास करते रहें. 5. जोखिम उठाने की आदत डालें और जोखिम से कुछ न कुछ सीखते चलें… प्रगतिशीलता 

आज तो व्यापार-संस्कृति बहुत तेजी से बदल रही है. अब तक ग्राहक को दुकान तक जाना पड़ता था, किन्तु अब दुकान ग्राहक के द्वार पर पहुँचने लगी है. पहले फुटकर दुकानों का चलन था, अब एक ही छत के नीचे आवश्यकता की लगभग सभी वस्तुएं मिलने लगी हैं. पहले रिटेल और हॉल सेल की दरों में एक बड़ा अन्तर रहा करता था, अब यह अन्तर काफी कम होता जा रहा है. पहले उपभोक्ता को खरीददारी में कोई विशेष आनन्द नहीं आता था, अब बड़े शौरूम, मॉल, शोपिंग कॉम्प्लेक्स आदि में जाने पर उपभोक्ता को मनोरंजन, आनन्द, सैर-सपाटे आदि की अनुभूति होती है. इसलिए ही समय के अनुसार अपने व्यापार को बहुआयामी, बहु उपयोगी बनाइए. आधुनिक तकनीक, कम्प्यूटर, इन्टरनेट, सेल्समैन, बच्चों के मनोरंजन, आतिथ्य सत्कार, पुरस्कार आदि नयी-नयी विधियों को अपनाइए और अपने व्यापार को बढ़ाइए. 

सदैव आशावादी रहें (Always Be Optimistic) 

१.भाग्य के बारे में एक बात तो तय है कि वह बदलता है. आशावादी होने के लिए बस यही कारण पर्याप्त है. आशा के साथ निरन्तर परिश्रमरत रहना ही सफलता है. आशा का भाव तो ईश्वर की तरह यत्र तत्र सर्वत्र व्याप्त है. आशायुक्त होने के लिए सर्वप्रथम स्वयम् पर विश्वास करें, अपनी परिस्थितियों पर विश्वास करें, वर्तमान पर विश्वास करें और सकारात्मक सोच के साथ अपनी सफलताओं पर विश्वास करें.

2. एक बार विफल हो जाने पर यह नहीं सोचें, कि यहीं पर रुक जाना चाहिए. एक बार सफल हो जाने पर भी यह नहीं सोचें कि बस यहीं पर रुक जाना चाहिए. किसी भी स्थिति में रुकना खतरनाक है. निरन्तर आगे बढ़ते रहना ही जिन्दगी का मकसद होना चाहिए, याद रखें, क्षमतायें तो सभी व्यक्तियों में होती हैं, किन्तु आशावादिता का अभाव व्यक्ति की अधिकांश क्षमताओं पर पानी फेर देता है. इसलिए यदि अपनी क्षमताओं का भरपूर उपयोग करना हो तो सदा आशावादी बने रहें.

3. आशावादी आम के साथ-साथ गुठली को भी देखता है और निराशावादी केवल गुठली को ही देखता है. आशावादी होना कोई विलासिता नहीं, वरन् जीवन दर्शन है. आशावादिता में ही जीवन दर्शन छिपा हुआ है. अगर आप आशावादी हैं तो समस्यायें सुलझाने में संलग्न रहेंगे. अगर आप निराशावादी हैं तो व्यर्थ ही समस्याओं में उलझते रहेंगे. आशावादी के सामने समस्यायें बहुत कम आती हैं, वही निराशावादी तो अपने आप में ही बहुत बड़ी समस्या है. अधिकांश समस्याओं का जन्म निराशावादिता के कारण ही होता है.

4. आशावादी सदा सुखी रहता है और निराशावादी सदा दुःखी रहता है. आशावादी परिस्थितियों को अपने पक्ष में करता रहता है, जबकि निराशावादी सदा अपना दुखड़ा रोता ही रहता है. आशावादी के साथ सब रहना चाहते हैं, जबकि निराशावादी के साथ कोई रहना पसंद नहीं करता. निराशावादी तो खुद भी अपने साथ कहाँ रह पाता है. आशावादी दूसरों पर नहीं, स्वयम् की योग्यता एवम् मेहनत पर विश्वास करता है. याद रखें, जिसे अपने आप पर विश्वास हो, वही दूसरों का विश्वास जीत सकता है.

5. निराशावादी आनन्द के क्षणों में भी बुरा ही सोचता है, पता नहीं, कल क्या हो ? आज तक तो कुछ अच्छा हुआ नहीं, तब जो हो रहा है, उसकी सफलता की भी क्या गारन्टी है ? निराशावादी तो यही सोचता है कि अच्छा भी बुरे के लिए ही होता है. इसलिए वह अच्छे का भी आनन्द नहीं उठा पाता है. व्यर्थ की आशंकाओं में ही अपना जीवन व्यतीत कर देता है. वहीं आशावादी हर बुराई में भी कुछ न कुछ अच्छाई ढूँढ लेता है. जिन्दगी के हर क्षण को आनन्द के साथ जी लेता है.

6. थोड़ा सा गहराई से सोचेंगे तो पता चलेगा कि आपके जीवन में जो कुछ भी अब तक हुआ है, आरम्भ में कोरा सपना ही था. जिस मुकाम पर अभी आप हैं, उसका तो आपने कभी सपना भी नहीं देखा था. अर्थात् जो आज सपना है, वो कल साकार हो सकता है, किन्तु यह सब आपकी प्रबल आस्था और आपके भरपूर विश्वास पर निर्भर करता है.

7. जीवन को देखने के दो तरीके हैं-एक ‘पदार्थगत’ और दूसरा ‘आत्मगत’. ‘आत्मगत’ देखने वाला ही आशावादी होता है. जिसमें खुद से बतियाने का साहस नहीं होता, जिसमें आलस्य से ऊपर उठने का साहस नहीं होता, वह घोर निराशावादी होता है, जो निराशाओं में भी आशायें ढूँढ लेता है, वही सफल हो पाता है. ध्यान से देखें, ‘निराशा’ में भी ‘आशा’ तो विद्यमान है ही.

8. आशावादी अक्सर भविष्यगामी होता है और निराशावादी अतीतगामी. भविष्यगामी के लिए वर्तमान का हर क्षण आशा से भरा होता है और अतीतगामी के लिए वर्तमान निराशा से भरा होता है. निराशावादी हर अवसर में कठिनाइयाँ ढूँढ़ लेता है और आशावादी हर कठिनाई में सुविधायें ढूँढ लेता है.

9. व्यक्ति का जीवन ऐसी दुर्घटनाओं से भरा होता है, जो केवल कल्पनाओं में घटती रहती हैं. और आशंकायें उसके अवचेतन में सदैव बनी रहती हैं. याद रखें, जिनकी आंशकायें होती हैं, उनमें से कुछ घटनायें तो घट कर ही रहती हैं. ऐसी आधारहीन आंशकाओं से मुक्ति का एक ही उपाय है कि सदैव आशावाही रहा जाय.

दृष्टान्त- एक बार एक राजा ने अपने पड़ौसी छोटे राज्य पर आक्रमण कर दिया, छोटे राज्य के राजा ने अपने राजगुरु के सामने समस्या रखी कि आक्रामक राज्य के पास दस गुना अधिक सैन्य बल है, ऐसी स्थिति में क्या किया जाना चाहिए ? इस पर राजगुरु ने कहा कि समस्या का समाधान पूरी फौज की मौजूदगी में किया जा सकता है. राजा ने पूरी फौज को एक स्थान पर एकत्रित किया. राजगुरु ने सेना के सामने खड़े होकर एक प्रस्ताव रखा-‘मैं एक सिक्का उछालूँगा, यदि ‘पट्ट’ गिरा तो पड़ोसी सेना का मुकाबला करेंगे और यदि ‘चित’ पड़ा तो समर्पण कर देंगे.’ प्रस्ताव के समर्थन में सभी ने सहमति व्यक्त कर दी. इस पर राजगुरु ने अपनी जेब से एक सिक्का निकालकर उछाला. जमीन पर गिरने पर ‘पट’ ऊपर की ओर था. राजगुरु ने साफ कहा-‘अब तो मुकाबला करना ही पड़ेगा. मैं भी तुम्हारे साथ रहूँगा. और हम अवश्य जीतेंगे.’ जयघोष के साथ सेना चल पड़ी. पूरे होश और जोश के साथ पड़ौसी सेना का मुकाबला किया गया और आक्रामक सेना को सीमा से बाहर खदेड़ दिया. आत्मविश्वास एवम् आशा की जीत हुई. विजय का उत्सव मनाया गया. राजगुरु का सम्मान किया गया. राजा ने पूछा-‘महाराज यह करिश्मा कैसे हो गया ?’ राजगुरु ने जवाब दिया-‘राजन् कभी अकेले मेरे आश्रम पर आना.’ दूसरे ही दिन राजा आश्रम पर पहुँच गया. राजगुरु ने स्पष्ट किया-‘राजन् मैनें कुछ नहीं किया, जो कुछ किया, इस सिक्के ने किया.’ गुरुजी ने अपनी जेब से वही सिक्का निकाला और राजा के हाथ में रख दिया. राजा को यह जानकर आश्चर्य हुआ कि सिक्के के दोनों तरफ ‘पट्ट’ ही अंकित था. गुरु ने रहस्योद्घाटन किया कि इस अद्भुत सिक्के के कारण ही हमें आशातीत सफलता मिली है.’ राजा गद्गद् हो गया और गुरु के चरणों में गिर पड़ा. 

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