Best Success tips in hindi-अपने आपको पहचानिए 

Best Success tips in hindi

Best Success tips in hindi-अपने आपको पहचानिए (Identify Yourself) 

1.जिस प्रकार परमात्मा को जानने के लिए आत्मा को जानना जरूरी है, उसी प्रकार सफलता को उपलब्ध होने के लिए खुद को जानना जरूरी है. जिस प्रकार आत्मा परमात्मा से अलग नहीं है, उसी प्रकार सफलता भी आपसे अलग नहीं है. जरा मन के दर्पण पर जमी निरर्थक एवम् नकारात्मक विचारों की धूल तो हटाइए. अपने आपको जानना वस्तुतः हर व्यक्ति का जन्म सिद्ध अधिकार है.

2. जिस प्रकार एक छोटे से बीज में बड़ी-बड़ी संभावनायें छिपी होती हैं, उसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ति के अन्दर भी अनन्त संभावनायें विद्यमान होती हैं. बस संकल्प रूपी बीज को आत्म-विश्वास की जमीन में सकारात्मक सोच के साथ रोपते हुए श्रम की बूंदों से सीचने की आवश्यकता होती है. इस प्रकार जो वृक्ष पल्लवित होगा, वह कल्पनातीत होगा. अपनी अभिरूचि एवम् अर्जित जानकारी के आधार पर एकाध संभावना को बाहर निकालिए. भूल जाइए कि आप कम पढ़े-लिखे हैं या तकनीकी शिक्षा प्राप्त नहीं हैं.

3. जरा हिसाब तो लगाइए कि अब तक की जीवन यात्रा में आपने कितनी उपलब्धियाँ अर्जित की हैं. जब आप यहाँ तक आ पहुँचे हैं, तब आगे बढ़ते रहने में कौनसी कठिनाई हैं ? याद रखें, आपकी क्षमताओं का आकलन आपके अलावा कोई दूसरा नहीं कर सकता. इसलिएदूसरों द्वारा किए गए आधे-अधूरे एवम् एकपक्षीय मूल्यांकन पर कभी भरोसा मत कीजिए.

4. स्मरण रहे, सफलता आपके कारण है, सफलता के कारण आप नहीं हैं. अपने आपको जानना, सुनना और मानना ही सबसे बड़ी सफलता है. जब तक अविश्वास और आशंकाएं हैं, तब तक अपने आपको पहचानना जरा कठिन ही है. अपने आन्तरिक संचार-तन्त्र को पहचानिए, सही वक्त पर सही संदेश प्राप्त करने की आदत डालिए और इसके लिए आपको ध्यान के माध्यम से अपने भीतर उतरना होगा.

5. यह किसने कह दिया कि आप एक साधारण व्यक्ति हैं. यहाँ हर व्यक्ति ‘असाधारण’ ही होता है. वस्तुतः मनुष्य-जन्म ही अपने आपमें एक अद्भुत एवम् असाधारण घटना है. किन्तु दुर्भाग्यवश तथाकथित साधु-सन्त और धर्म के ठेकेदार अपने अतिरिक्त अन्य सभी को साधारण श्रेणी में रखते हैं और ‘असाधारण’ होने के लिए अपनी शरण में आने की शर्त रखते हैं. ऐसे चालाक लोगों से अपने आपको बचाइए. याद रखिए, एक मशीन पचास साधारण व्यक्तियों का कार्य कर सकती है, किन्तु पचास मशीनें मिलकर भी एक ‘असाधारण’ व्यक्ति का कार्य नहीं कर सकतीं.

6. जब परमात्मा ने आपको एक परिपूर्ण एवम् सबसे अलग व्यक्तित्व प्रदान किया है, तब दूसरों से तुलना करने का औचित्य ही क्या है ? जब प्रत्येक व्यक्ति की शारीरिक अनुकृति, प्रवृत्ति, अनुभूति, यहाँ तक कि अंगूठे-अंगुलियों की छाप तक एक-दूसरे से अलग एवम् अनूठी होती हैं, तब किन्हीं दो व्यक्तियों की कार्य प्रणाली या कार्य प्रगति एक सी कैसे हो सकती है ? इसलिए अपने अद्वितीय व्यक्तित्व की समुचित पहचान करते हुए अपने तरीके से कार्य करते चलें, सफलतायें तो स्वतः ही मिलती चली जायेंगी. तुलना ही करनी हो तो अपने काम से करिए.

7. यह सही है कि हर व्यक्ति हर कार्य नहीं कर सकता. आयु की अल्पता एवम् संसाधनों की न्यूनता के कारण ऐसा संभव भी नहीं हैं. फिर भी जो कार्य आप कर रहे हैं या करना चाह रहे हैं, उसे पूर्ण सत्यनिष्ठा, कर्तव्यनिष्ठा, प्रतिबद्धता, समय-बद्धता, योजना-बद्धता, सम्पूर्ण क्षमता एवम् भरपूर आस्था के साथ सम्पादित करते चलें, बहुत कुछ संभव हो सकता है.

8. यह भी सही है कि किसी एक व्यक्ति द्वारा किया जाने वाला कार्य दूसरे व्यक्ति द्वारा भी किया जा सकता है. वस्तुतः कोई भी कार्य दुष्कर नहीं है, बशर्ते कि आप अपने अन्दर अन्तर्विष्ट प्रतिभा को जागृत करें और अपेक्षित प्रशिक्षण के माध्यम से उसे विकसित करें, तब अन्य संसाधन तो अपने आप जुटते चले जायेंगे और आप निरन्तर आगे बढ़ते चले जायेंगे. 9. यह भी सही है कि जिसे आप प्राप्त करना चाहते हैं, उसे प्राप्त करने से पूर्व कल्पना के स्तर पर कई बार प्राप्त कर चुके होते हैं. इसलिए जब तक आप अपनी परिकल्पनाओं में अभिवृद्धि करते रहेंगे, तब तक सफलता दर सफलता प्राप्त करते रहेंगे. इसी तरह जहाँ आपको पहुँचना था, वहाँ तो वस्तुतः आप पहले से ही पहुँचे हुए हैं. बस जानने की देर है. पर अफसोस इस देर को आप अंधेर तक खींचे हुए हैं. याद रखें, जब जागें, तब ही सबेरा है.

दृष्टान्त –एक व्यक्ति अपनी व्यावसायिक विफलताओं से हताश होकर किसी मैनेजमेण्ट गुरु के पास पहुँचा. अपनी समस्यायें बताईं. गुरु बोले-(क) ‘आपकी समस्याओं के हल आपके अलावा किसी अन्य के पास नहीं हैं. कम से कम दस मिनट प्रतिदिन ध्यान में उतरो, अपनी चेतना जागृत करो, फिर चेतना के दर्पण में अपने आपको देखो. समाधान दर्पण के पानी में तैरते हुए दृष्टिगत होते चले जायेंगे. (ख) याद रखें, यदि आप चाहते हैं कि लोग आपको सुनें, तो सबसे पहले अपने आपको सुनिए. (ग) यदि आप चाहते हैं कि लोग आपको पहचानने लगें, तो पहले अपने आप को पहचानिए. (घ) यदि आप चाहते हैं कि लोग आपको सम्मान दें, तो अपने आपको सम्मान देते हुए सम्मान योग्य बनाइए. (ङ) यदि आप स्वयं से परिचित होना चाहते हैं तो अपने व्यक्तित्व की गहराई से परख कीजिए. आत्म विश्लेषण करते हुए अपनी अन्तर्निहित क्षमताओं को पहचानिए. अपने व्यवसाय में अपनी क्षमताओं का समुचित रूप से सदुपयोग करते हुए व्यवसाय को व्यवस्थित करिए. तब आपकी दक्षताओं एवम् क्षमताओं में स्वतः ही अभिवृद्धि होने लगेगी और आपको आशातीत सफलतायें प्राप्त होती चली जायेंगी

 Success tips in hindi-अपना रास्ता अलग बनाइए (Make Your Own Way) 

Best Success tips in hindi-

1.वस्तुतः समय बहुत तेज चलता है. समय की इस दौड़ में महज वर्तमान ही हमारे पास बचता है. अब तक जो कुछ हुआ, जो कुछ हो रहा है और जो कुछ होगा, सब वर्तमान में ही हुआ है और वर्तमान में ही होगा. इसलिए यदि वर्तमान में हमारा रास्ता अलग होगा तो हमारे हर कदम में नयापन होगा. यह नयापन ही हमें दूसरों से अलग करेगा. हमारी अलग पहचान ही हमारे जीवन की सार्थकता है.

2. कार्य तो सभी करते हैं, किन्तु जो अलग एवम् अभिनव ढंग अपनाते हैं, वे दूसरों के लिए आदर्श बन जाते हैं. इसलिए ऐसा रास्ता चुनें, जो आपको अलग लगे, सुविधाजनक लगे. दूसरों को भी अलग लगे, चुनौती-पूर्ण लगे. याद रखें, कोई भी रास्ता चुनौती-पूर्ण तब तक ही लगता है, जब तक कि उस पर चलना आरंभ न कर दें. दिन भर में कोई काम ऐसा भी करें, जिसे आप करना नहीं चाहते हैं. यही आदत आपको सबसे अलग बना देगी,

3. जब आप दूसरों के जूते नहीं पहन सकते, दूसरों के कपड़े नहीं पहन सकते, तब आप दूसरों द्वारा उपयुक्त रास्ते पर कैसे चल सकते हैं ? आनन्द और अपनत्व के साथ तो आप अपने ही रास्ते पर चल सकते हैं. चलने से पहले तमाम तथ्य एकत्रित करें, उनका विश्लेषण करें और उन तथ्यों को अपने हिसाब से मौड़ देते हुए आगे बढ़ें. ऐसा रास्ता निश्चित् रूप से अलग ही होगा.

4. आपकी पहचान किसी रास्ते के कारण नहीं, बल्कि रास्ते की पहचान आपके कारण होनी चाहिए. रास्ता कैसा भी हो, कहीं भी हो, पर हर रास्ते पर आपकी दौड़ सकारण होनी चाहिए. याद रखें, अब तक जितने रास्ते बने हैं और जितने बन रहे हैं, वे सब अलग रास्तों पर चलने के इच्छुक व्यक्तियों के कारण ही बने हैं. इसलिए कुछ अपने नियम बनाइए और उन पर पूरी दृढ़ता के साथ चलिए. आपकी पहचान नियमों के कारण नहीं, बल्कि नियमों की पहचान आपके कारण होनी चाहिए.

5. जब प्रकृति ने आपको सबसे अलग एवम् एक स्वतन्त्र व्यक्तित्व प्रदान किया है, तब आपके कार्य करने का ढंग भी सबसे अलग ही होना चाहिए. आपके चेहरे के हाव-भाव, शारीरिक भाषा (Body Language), बोलने का ढंग, पहनावा, चाल-ढाल सब कुछ दूसरों से अलग होने चाहिए. याद रखें, ईश्वर ने आपको सब कुछ देकर ही भेजा है, इसलिए रास्ता कैसा भी चुनें, कोई अड़चन नहीं आयेगी. बस आकांक्षा, आक्रोश, आवेग एवम् स्वाभिमान के साथ अपने तरीके से अपने रास्ते पर बढ़ते रहें, तब हर कदम एक सफल कदम होगा.

6.लीक पर चलना कोई बड़ा काम नहीं है, जो लीक छोड़कर चलता है, वो ही सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित करता है. कहा भी गया है 

लीक-लीक गाड़ी चले, लीकहि चले कपूत। लीक छोड़ तीनूं चले, शायर सिंह-सपूत। 

7.उधार की शान और उधार की पहचान काफी जोखिम भरी होती है. सबसे अलग और दिलचस्प तरीके से काम करने वाले की एक अलग ही पहचान बनती है. याद रखें, अलग पहचान के आधार पर ही सफलता की राह आसान बनती है. बने बनाये रास्ते पर तो डरपोक चलते हैं. जो जानते हैं, कैसे चलना है, वे बीहड़ में भी अपना रास्ता बना लेते हैं.

8. दूसरों द्वारा बताये गये रास्तों पर चलते हुए कब तक दूसरों को दोष देते रहोगे ? स्वाध्याय और स्वानुभव के आधार पर रास्ता न चुनकर कब तक भाग्य को कोसते रहोगे? सफलता के सार्वभौम सिद्धान्तों को पकड़ना तो आसान है, किन्तु उन पर चल कर सफल होना उतना आसान नहीं है. यह भी कतई अपेक्षित नहीं है कि प्रतिपादित सिद्धान्तों पर चलने पर सबको एक से ही परिणाम प्राप्त हों. और यह भी अपेक्षित नहीं है कि एक से परिणाम प्राप्त करने के लिए एक से रास्ते पर चला जाए.

9. याद रखें, भीड़ से अलग दिखने वाला व्यक्ति ही नेतृत्व प्रदान कर सकता है. अपने कदमों के निशान छोड़ते हुए चलने वाला व्यक्ति ही महान बन सकता है. दूसरों की नकल करना उपलब्धि नहीं, मात्र अभिनय है. महान बनने के लिए अलग से प्रयास करने की आवश्यकता नहीं है, बस अपना रास्ता अलग बना लें, उस पर पूर्ण सतर्कता एवम् निरन्तरता के साथ चलते रहें, महानता तो अपने आप उपलब्ध हो जायेगी. अर्थात् भीड़ में रहकर भी भीड़ से अलग नजर आइए.

दृष्टान्त –(क) एक बार एक भारतीय अपने कुछ अमरीकी मित्रों के साथ अमेरिका के किसी रेस्टोरेन्ट में कॉफी पी रहा था. एक-एक कप कॉफी पीने के बाद कुछ ने अपने कप उल्टे कर दिये और कुछ ने सीधे ही रख दिये. किन्तु भारतीय ने अपना कप न उल्टा रखा और न सीधा रखा, बल्कि लेटा कर रख दिया. उल्टे रखे कप वेटर द्वारा तत्काल उठा लिए गये और सीधे रखे कपों में एक बार कॉफी और सर्व करदी गई. किन्तु भारतीय का व्यवहार किसी की समझ में नहीं आया, सब उसकी ओर देखने लगे, वेटर ने उसके पास आकर पूछा-‘महोदय मेरे लिए क्या आदेश हैं ?’ इस पर मुस्कुरा कर भारतीय बोला-‘अगर मनुहार के साथ पिलाओगे तो एक कप और पी लूँगा.’ 

(ख) कुरकुरे बनाने वाली एक कम्पनी ने अपना टी.वी. विज्ञापन कुछ अलग ही ढंग से बनवाया. चम्पक लाल अपने ऑफिस में बैठे-बैठे कुरकुरे खा रहा है. अचानक एक शुभ चिन्तक दौड़ता हुआ दाखिल होता है और बताता है-‘चम्पक भाई, फैक्ट्री में आग लग गई!’ चम्पक भाई-‘मुझे क्या ?’ शुभ चिन्तक-‘अरे, तुम्हारी फैक्ट्री में.’ चम्पक भाई-‘तो तुझे क्या ?’ और उसी सहज भाव से कुरकुरे खाना जारी रखता है. अर्थात् कम्पनी विशेष के कुरकुरों का असर है कि कोई उपभोक्ता इतना निर्लिप्त भी हो सकता है, यहाँ प्रश्न निर्लिप्तता का नहीं है, विज्ञापन की नवीनता का है. यदि आपको अपना उत्पाद बेचना है तो, रास्ता तो दूसरों से अलग ही अपनाना होगा. 

सफलता के टिप्स- सफ़र का भी आनन्द उठाइए (Enjoy Your Journey Also) 

1.आपका प्रत्येक कदम मील का पत्थर हो सकता है, बशर्ते कि हर कदम पूरे होश एवम् जोश के साथ उठाया जाय. आपका हर सफर रोमान्चक एवम् रोचक हो सकता है, बशर्ते कि हर क्षण का आनन्द उठाया जाय. आनन्द को हम-बना लेने पर जिन्दगी का सफर कतई बोझिल नहीं होगा.

2. जिन्दगी एक ऐसा सफर है, जिसमें मौत के अलावा कुछ भी निश्चित नहीं है. निश्चित् मौत भी कब, कहाँ और किस मौड़ पर मिलेगी, यह भी निश्चित नहीं है, जिन्दगी के सफर में कब कौनसी सफलता उपलब्ध होगी, यह भी निश्चित नहीं हैं. अर्थात् अनिश्चित्ता भरे इस सफर में केवल ‘आनन्द’ को ही सुनिश्चित किया जा सकता है, याद रखें, आनन्द ही एक मात्र ऐसा विकल्प है, जिसे बिना किसी प्रतिफल के प्राप्त किया जा सकता है. और हाँ, जहाँ आनन्द होगा, वहाँ सफलता का साम्राज्य अवश्य होगा.

3. जीवन-यात्रा के दौरान् जिन व्यक्तियों, वस्तुओं और स्थानों से होकर आप गुजरते हैं, उन सबको साक्षी भाव से देखते चलें. सबके प्रति सकारात्मक भाव रखते हुए सबका सदुपयोग करते चलें. जब भी चलें, सचेत होकर चलें, सफर के हर लम्हे को भोगते चलें, केवल गन्तव्य पर ही नजर न रखें. ‘आह ! कितना लम्बा सफर करना है.’ ऐसा मन्तव्य भी न रखें.

4. अर्थ भरी यात्रा को व्यर्थ मत बनाइए, सफर के हर क्षण को सार्थक बनाइए. हर ‘आह’ को ‘अहा’ में और ‘अहा’ को ‘वाह’ में बदलते चलें. सफर को अपने नाम और अपने को सफर के नाम करते चलें. सफलता कितनी मिलती है, यह महत्वपूर्ण नहीं है, यात्रा कितनी सफल रहती है, यही महत्वपूर्ण है.

5. जीवन का प्रत्येक क्षण वस्तुतः कितना अद्भुत, आनन्ददायक एवम् महत्वपूर्ण है. हर क्षण कितना अनमोल, अद्वितीय एवम् अपने आप में परिपूर्ण है. यहाँ सब कुछ कितने आनन्द से भरा हुआ है, बस आपके देखने की देर है. इसलिए अपने आप को देखो, अपने आस-पास की रंगीन दुनिया को देखो, ईश्वरीय सम्पदा को देखो, आँखों से ही नहीं, कानों से भी देखो. कानों से ही नहीं, आँखों से भी सुनो. देखने और सुनने से पहले जरा आनन्द से भरो. तब आपके सफर में आनन्द ही आनन्द होगा.

6. दूर अंधेरे में देखने की बजाय अपने आस-पास देखें. वर्तमान को वर्तमान में ही देखें. यही शाश्वत है, यही सत्य है, यही नित्य है. जीवन कोई दर्दनाक अथवा खतरनाक अभियान नहीं होता, जीवन तो हर पल जीने के लिए होता है. उदास या नाराज व्यक्ति का कोई हम सफर नहीं होता, वह तो सदा जहर से भरा होता है. इसलिए सफर तब ही सार्थक होगा, जब उत्साह, उमंग और उत्सव से भरा होगा. 

7.जिस प्रकार आप नदी के प्रवाहित जल में दुबारा स्नान नहीं कर सकते, उसी प्रकार आप एक रास्ते से दुबारा नहीं गुजर सकते. ध्यान रहे, समय भी जल के समान निरन्तर बहता रहता है, अर्थात् हर सफर एक नया सफर होता है, भले ही एक ही रास्ते से रोजाना आना-जाना पड़ता हो. निरन्तर परिवर्तन एवम् समय के प्रवाह को यदि हम आत्मसात् कर लें तो फिर हमें हर सफर नया सफर ही प्रतीत होगा.

8. व्यक्ति सदैव भय एवम् आशंकाओं से घिरा रहता है, इसीलिए सफर का आनन्द नहीं उठा पाता है. अफसोस कि वह जिन्दगी में कुछ भी नहीं पकड़ पाता है और इसी आपाधापी में अचानक अन्तिम पड़ाव आ जाता है. याद रखें, आनन्द को पकड़ने के लिए भय और आशंकाओं से ऊपर उठना होगा. भय और आशंकाओं से ऊपर उठने के लिए अपने सफर से जुड़ना होगा.

9. यदि हम केवल गन्तव्य के विषय में ही सोचते रहेंगे तो सफर का आनन्द नहीं उठा पायेंगे. और तब समूचा जीवन ही हमारे लिए अर्थहीन हो जायेगा. गन्तव्य तो आयेगा ही, किन्तु कभी अचानक नहीं आयेगा. उसके लिए हमें कदम दर कदम चलना होगा. हर कदम को गन्तव्य समझना होगा. हमें यह तो पता नहीं है कि गन्तव्य कब, कहाँ और किस रूप में आयेगा ? किन्तु हमें यह अवश्य पता होना चाहिए कि गन्तव्य हमारे चलने पर ही आयेगा. इसलिए जरूरी है, होशपूर्वक चलें, सफर के हर क्षण को महत्वपूर्ण समझें.

दृष्टान्त- रेगिस्तानी स्टेशन से एक सज्जन ट्रेन में चढ़े और चढ़ते ही अपने ऊपर के कपड़े उतार दिये. इस पर एक प्रबुद्ध सहयात्री ने पूछ लिया-‘जनाब, कपड़े क्यों उतार दिये ?’ सज्जन बोले-‘आपको शायद पता नहीं है, मैं मुम्बई जा रहा हूँ.’ सहयात्री-‘तो क्या हुआ, हम भी तो वहीं जा रहे हैं ?’ सज्जन-‘ठीक है, पर सुना है, वहाँ बहुत बड़ा समुद्र है.’ सहयात्री-‘हाँ, समुद्र तो है पर …….. ?’ सज्जन–’मुझे वहाँ पहुँचते ही समुद्र में नहाना है.’ इस पर आस-पास बैठे सभी यात्री जोर-जोर से हँसने लगे और कहने लगे-‘ठीक है, पहुँचने पर नहा लेना, लेकिन अभी तो कम से कम सौलह घण्टे लगेंगे.’ सज्जन-‘वो तो ठीक है, पर पहले से ही तैयार रहो तो क्या हर्ज है?’ तो ऐसी तैयारी से बचें. इस तरह तो पूरा सफर ही कितना नीरस एवम असुविधाजनक हो जायेगा. फिर यह भी कहाँ तय है कि आप समुद्र तक पहुँच ही जायेंगे. इसलिए जरूरी है कि सफर का पूरा आनन्द उठाया जाय. 

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