The Power of positive thinking-कोई भी सफलता कभी अन्तिम नहीं होती (No Success Can Ever Be the Last) 

The Power of positive thinking

The Power of positive thinking in hindi- कोई भी सफलता कभी अन्तिम नहीं होती (No Success Can Ever Be the Last) 

1.गहराई से देखा जाय तो हर ‘श्वास’ एक सफलता है. एक मिनट में औसतन पन्द्रह बार श्वास लिये जाते हैं, तब किसी एक श्वास को अन्तिम कैसे कहा जा सकता है. अन्तिम श्वास का अर्थ तो बस मृत्यु है. उसी प्रकार किसी सफलता को अन्तिम कैसे कहा जा सकता है. सफलता तो हर क्षण घटने वाली घटना होती है और कोई घटना कभी अन्तिम नहीं होती.

2. कोई भी सफलता आपके सफर का एक पड़ाव हो सकती है, मंजिल नहीं हो सकती. सफलता दर सफलता प्राप्त करते चलो तो कोई भी मंजिल मुश्किल नहीं हो सकती. कोई किसी एक सफलता से कभी संतुष्ट हो भी नहीं सकता, उसे तो हर क्षण, हर बार नयी सफलता, नयी ऊँचाई चाहिए. इसीलिए एक व्यक्ति अपने छोटे से जीवन में बहुत कुछ कर गुजरता है,

3. जीवन में सफलतायें और विफलतायें तो निरन्तर मिलती रहती हैं. इसलिए किसी बड़ी सफलता की प्रतीक्षा किये बगैर छोटी-छोटी सफलताओं और विफलताओं का आनन्द उठाते चलें. याद रखें, छोटी-छोटी सफलताओं-विफलताओं के योग से ही कोई बड़ी सफलता बनती है. छोटी और बड़ी सफलताओं के योग से ही जिन्दगी बनती है.

4. किसी संभावित बड़ी खुशी की आस में हर क्षण मिलने वाली छोटी-छोटी खुशियों को बर्बाद करने में कोई समझदारी नहीं है. कल की बड़ी खुशी का तो पता नहीं, परन्तु आज की छोटी-छोटी खुशियों के जोड़ से ही कोई बड़ी खुशी निकलती है. और यदि आप छोटी-छोटी खुशियों से आनन्दित होने के आदी नहीं है तो फिर किसी बड़ी खुशी को कैसे सहन कर पायेंगे ? फिर बड़ी खुशी भी अचानक नहीं आती. इसलिए हर छोटी बड़ी सफलता का स्वागत करते चलें और अगली सफलता की तैयारी करते रहें.

5. जब आपको कोई बड़ी सफलता मिलती है, तब आपको बहुत खुशी होती है. परन्तु दूसरे ही दिन बड़ी सफलता भी कितनी छोटी हो जाती है, क्योंकि तब तक दुनिया काफी आगे निकल चुकी होती है. यह भी सही है कि हर सफलता विफलता में और हर विफलता, सफलता में बदलती रहती है अर्थात् यहाँ कुछ भी स्थायी नहीं है, न कोई सफलता अन्तिम होती है और न कोई विफलता अन्तिम होती 

6.यह भी सही है कि हर नयी पीढ़ी को पुरानी पीढ़ी से कुछ ज्यादा ही मेहनत करनी पड़ती है. कोई कितना ही छोड़कर जाए, पीछे वालों को उसे संभालने में ही काफी मश्कत करनी पड़ती है. जीवन तो सतत् गति का नाम है, जीवन बस प्रगति का नाम है. जहाँ ठहराव, वहाँ जीवन समाप्त. ठहराव ही अधोगति का नाम है, अर्थात् गति ही जिन्दगी का सार है. जहाँ गति, वहाँ प्रगति और प्रगति कभी अन्तिम नहीं हो सकती. 

7.किसी लक्ष्य को प्राप्त कर लेने पर दूसरा लक्ष्य अपने आप सामने आ जाता है. किसी एक सफलता की प्राप्ति पर दूसरी सफलता की ओर हमारा ध्यान खुद-ब-खुद चला जाता है. हर सफलता से हमें प्रसन्नता मिलती है और विफलता से खिन्नता, न कोई प्रसन्नता अन्तिम होती है और न कोई खिन्नता अन्तिम होती है. गहराई से देखा जाये तो यहाँ अन्तिम कुछ है भी नहीं. प्रत्येक ‘अन्त’ किसी नये शुभारम्भ में परिवर्तित होता रहता है.

8. याद रखें, किसी एक सफलता से दूसरी, दूसरी से तीसरी, और तीसरी से चौथी सफलता खड़ी होती है. हर अगली सफलता, पिछली सफलता से बड़ी होती है, इसलिए बिना रूके, निरन्तर क्रियाशील रहने वाला व्यक्ति ही सफलता दर सफलता प्राप्त करता चलता है. और किसी एक सफलता को ही अन्तिम समझ लेने वाला व्यक्ति प्राप्त सफलता को भी गंवा देता है.

9. हमारी सफलता इसमें नहीं है कि हम कभी न गिरें. गिरें, किन्तु हर बार उठ खड़े हो जायें. हर बार उठ खड़े होना ही हमारी सफलता है, गिरना और उठना तो एक निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है, फिर हम किसी एक विफलता को या किसी एक सफलता को अन्तिम कैसे कह सकते हैं देखा जाय तो इस जगत का कोई भी सत्य, कथ्य अथवा तथ्य कभी अन्तिम नहीं हो सकता. जो आज सत्य है, वह कल असत्य हो सकता है और जो आज असत्य है, वह कल सत्य हो सकता है.

दृष्टान्तपहिए, विद्युत, मोटर, टेलीफोन, टी.वी., कम्प्यूटर, रॉकेट आदि के आविष्कारकों को यह पता नहीं था कि उनके आविष्कार एक दिन दुनिया में क्रान्ति ला देंगे. किन्तु किसी भी आविष्कर्ता ने अपनी आविष्कारिक सफलता को कभी भी अन्तिम नहीं माना. बाद वाले वैज्ञानिकों ने इनमें निरन्तर सुधार किया और आविष्कारों को उपयोगी एवम् सुलभ बनाया. और यह प्रक्रिया निरन्तर जारी है. आज जितने साधन और जितनी सुविधायें उपलब्ध हैं, उनकी आदमी ने कभी कल्पना भी नहीं की थी. भविष्य में कितनी सुविधायें उपलब्ध होने वाली हैं, आज हम कल्पना भी नहीं कर सकते. अर्थात् कोई भी विकास कभी अन्तिम नहीं हो सकता, इसलिए अपने कार्यों में लगातार लगे रहें और नित नयी सफलतायें प्राप्त करते रहें. अब तक की तरक्की का यही निचोड़ है. अर्थात् कोई भी सफलता कभी अन्तिम नहीं हो सकती. कोई विफलता भी कभी अन्तिम नहीं हो सकती. देखा जाय तो प्रत्येक विफलता किसी न किसी सफलता की शुरूआत ही होती है. 

सफलता को खरीदा नहीं जा सकता (The Success Can Not Be Purchased) 

1.जिस प्रकार प्रसन्नता को पैसों से खरीदा नहीं जा सकता, उसी प्रकार सफलता को भी खरीदा नहीं जा सकता. जिस प्रकार प्रसन्नता को बाहर खोजा नहीं जा सकता, उसी प्रकार सफलता को भी बाहर नहीं खोजा जा सकता, प्रसन्नता की तरह ही सफलता भी हमारी आन्तरिक शक्तियों पर निर्भर करती है. तो अपनी आन्तरिक शक्तियों को जगायें, मन चाही सफलता पायें.

2. “सफलता’ कोई ‘किन्तु’ ‘परन्तु’ नहीं है. “सफलता’ बाजार में बिकने वाली वस्तु भी नहीं है. “सफलता कोई गणितीय समीकरण भी नहीं है, “सफलता का कोई सरलीकरण भी नहीं है. ‘सफलता’ तो एक ऐसा सवाल है, जिसे किसी सूत्र द्वारा सुलझाया नहीं जा सकता. “सफलता’ तो वस्तुतः एक ऐसा सवाल है, जिसका जवाब भी उसी में छिपा हुआ है. इसलिए अन्तर्निहित उत्तरों को खोजते हुए निरन्तर आगे बढ़ते रहें, सफलतायें तो स्वतः ही मिलती चली जायेंगी.

3. किसी तन्त्र, मन्त्र, या यन्त्र के माध्यम से आप सफल नहीं हो सकते. किसी अस्त्र, शस्त्र या शास्त्र के माध्यम से भी आप सफल नहीं हो सकते. सफलता तो हर व्यक्ति की एक व्यक्तिगत तन्त्रिका है, जिसे सभी के लिए लागू नहीं किया जा सकता. इसलिए अपनी तन्त्रिका जगाइए, विफल होने का डर भगाइए. सफलता को धन बल या भुज-बल से नहीं, आत्मबल से अपना, बनाइए. आत्मबल को बाहर से नहीं, भीतर से ही मजबूत बनाते चलें, सफलता का वरण करते चलें. याद रखें, भीतर तो आपको ही उतरना पड़ेगा.

4. आदमी जितना अधिक परिश्रम करेगा, उतना ही अधिक धन अर्जित करेगा. जितना अधिक धन, उतना ही अधिक परिश्रम. अर्थात् सफलता परिश्रम से आरम्भ होकर परिश्रम पर ही समाप्त हो जाती है. सफलता शाश्वत नहीं है, शाश्वत तो श्रम ही है. सफलता तो श्रम का सह-उत्पाद है. ध्यान रहे, धन को आने में तो देर लगती है, किन्तु जाने में नहीं लगती. यानि धन को रोकने के लिए भी श्रम करना पड़ता है. श्रम और धन एक दूसरे के पूरक हैं. श्रम भी तब ही फलिभूत हो पाता है, जब सकारात्मक सोच के साथ किया जाता है,

5. व्यक्ति को सम्पदा की बजाय सफलता की अधिक चिन्ता करनी चाहिए. जब कोई सफल होने लगता है, तब धन अपने आप आने लगता है. याद रखें, पैसे से पैसा तो कमाया जा सकता है, किन्तु सफलता को नहीं पाया जा सकता. सफलता को धन से नहीं, मन से ही आंका जा सकता है. किसी के पास कितना धन है, यह महत्वपूर्ण नहीं है. महत्वपूर्ण तो यही है कि कोई अपने धन   का सदुपयोग कितनी सफलता के साथ करता है.

6. सफलता तो एक कला है. कला व्यक्ति का आन्तरिक गुण है, कला को बाजार से नहीं खरीदा जा सकता. पर हाँ, कला से बाजार को अवश्य खरीदा जा सकता है. सफलता तो एक दर्शन है. दर्शन व्यक्ति का मन्थन है. दर्शन को खरीदा नहीं जा सकता. पर हाँ, दर्शन से सब कुछ पाया जा सकता है. जब कला और दर्शन का मिलन होता है, तब ही सफलता का कमल खिलता है.

7. सफलता धन से नहीं, प्रसन्नता से आती है. प्रसन्नता दौलत से नहीं, दिल से आती हैं. दौलत आदमी को आलसी बनाती है, जबकि सफलता क्रियाशील बनाती है. सफलता तो जीवन का पर्याय है, जीवन का अर्थ है. सफलता तो जिन्दगी की पहली व आखिरी शर्त है. इसलिए शर्त से समझौता नहीं किया जा सकता, सफलता से समझौता नहीं किया जा सकता. सफलता तो जीवन की अनिवार्यता है. सजग, सक्रिय, सतत् प्रयत्नशील एवम् प्रतिबद्ध व्यक्ति के लिए सफलता दुष्कर नहीं है.

8. जिस प्रकार पैसे से प्यार नहीं खरीदा जा सकता, उसी प्रकार पैसे से पुण्य भी नहीं खरीदा जा सकता. पर हाँ, पैसे से घृणा और पाप को अवश्य खरीदा जा सकता है. नैतिकता से पैसा तो कमाया जा सकता है, किन्तु पैसे से नैतिकता को नहीं खरीदा जा सकता. याद रखें, कामयाबी से पैसा तो कमाया जा सकता है, परन्तु पैसे से कामयाबी नहीं कमाई जा सकती. पैसे से सुविधायें तो जुटाई जा सकती है, किन्तु मन की शान्ति नहीं पायी जा सकती. मन की शान्ति के लिए तो सफलता का वरण करना ही पड़ेगा.

9. अगर धन से ही सफलता को खरीदना संभव होता तो यहाँ कोई असफल ही नहीं होता. धन तो उधार भी खूब मिल जाता है, परन्तु सफलता का सौदा उधार नहीं होता. अर्थात् सफलता को नकद या उधार किसी भी तरह नहीं खरीदा जा सकता. पर हाँ, सफल व्यक्ति बाजार से बहुत कुछ उधार खरीद सकता है. सफल व्यक्ति की बहुत बड़ी साख होती है. साख के बिना तो जिन्दगी राख होती है. जहाँ सफलता है, वहीं साख है.

दृष्टान्त –युवक लेवमेन को भावी महत्वाकांक्षी योजनाओं के साथ दार्शनिक युकाची के समक्ष प्रस्तुत किया गया और पूछा गया-‘इन योजनाओं को पूरा करने के लिए क्या किया जाना चाहिए ?’ युकाची ने योजनाओं की सूची को लौटाते हुए स्पष्ट किया-‘इस सूची में प्रथम योजना का तो उल्लेख ही नहीं है, जिसके बिना बाकी योजनायें व्यर्थ हैं.’ इस पर लेवमेन के पिता जोशुआ ने चकित होकर पूछा-‘जरा बताइए, कौनसी योजना छूट गई है ?’ युकाची ने बताया-‘प्रथम योजना होनी चाहिए, अपने स्वभाव एवम् चरित्र का निर्माण, जिसके बिना न कोई व्यक्ति बड़ा कार्य कर सकता है और न कोई बड़ा बन सकता है. और यह सही है कि स्वभाव एवम् चरित्र को खरीदा नहीं जा सकता. सफलता स्वभाव एवम् चरित्र पर ही निर्भर करती है. 

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