Best positive thoughts in hindi-बिना कारण दुःखी रहने की आदत छोड़िए (Don’t Be Unhappy Without Any Reason) 

Best positive thoughts in hindi

Best positive  thoughts in hindi-बिना कारण दुःखी रहने की आदत छोड़िए (Don’t Be Unhappy Without Any Reason) 

1.सबसे बड़ा आश्चर्य तो यही है कि ‘आदमी अपने दुःखों के कारण दुःखी नहीं रहता, बल्कि पड़ौसियों के तथाकथित सुखों के कारण दुःखी रहता है और पड़ौसी भी इसी कारण दुःखी रहते हैं. इस प्रकार हर व्यक्ति ने दुःखी रहने का समुचित प्रबन्ध कर रखा है. जब कोई सुखी रहना ही नहीं चाहता है, तब किसी को सलाह देने का औचित्य ही समाप्त हो जाता है, फिर भी यदि आप सुखी रहना चाहते हैं तो बिना कारण दुःखी रहने की आदत छोड़नी पड़ेगी.

2. देखा जाय तो दुःखी रहना आदमी की आदत है. यही आदत धीरे-धीरे नियति बन जाती है. इसलिए सुखी रहने के लिए सिर्फ आदत बदलनी पड़ेगी. आश्चर्य तो यही है कि आदमी धीरे धीरे अपने दुःखों से समझौता कर लेता है, उनको बदलना नहीं चाहता. बदलने पर फिर से शुरूआत करनी पड़ेगी. अर्थात् यथास्थिति-वाद बदले बिना कोई सुखी रह ही नहीं सकता.

3. यदि सुखी रहना है तो वर्तमान में जीना सीखो. हर क्षण का उत्साह-उमंग, संग, आनन्द रस पीना सीखो, न अतीत को याद करो, न भविष्य की चिन्ता. तब बिना कारण दुःखी रहने की आदत अपने आप छूट जायेगी. याद रखें, दुःख तो अपने आप चला जायेगा, किन्तु सुख के उपभोग के लिए तो दूसरों का सहयोग लेना पड़ेगा, यदि आप इसी कारण सुख को स्थगित करते चलेंगे तो मान कर चलें, कभी सुखी नहीं हो सकेंगे. इसलिए वर्तमान के प्रत्येक क्षण को आनन्द के साथ, सहजता और समग्रता के साथ जीएं. समूचा जीवन ही धन्य हो उठेगा.

4. व्यक्ति व्यर्थ में ही अपने अतीत का गुणगान करता रहता है. और अपने वर्तमान को सबसे घटिया बताता रहता है. किन्तु यह भूल जाता है कि अतीत भी तो वर्तमान की दहलीज से ही गुजरता है. आश्चर्य तो यही है कि जब व्यक्ति अपने वर्तमान के साथ कभी खुश नहीं रह सकता, तब उसका अतीत कहाँ से खुशगवार रहा होगा. अर्थात् व्यक्ति ने जान-बूझकर अपने तथाकथित अतीत की यादों में दुःखी रहने का एक स्थायी बहाना ढूँढ़ रखा है. जब तक उसके पास बहाने मौजूद हैं, उसे कोई सुखी कर ही नहीं सकता.

5. हम सब एक ऐसे सर्किल में दौड़ रहे हैं, जिसका न आदि है, न अन्त ही. सर्किल में दौड़ते हुए कोई कैसे मान सकता है कि वह सबसे पीछे है या सबसे आगे है ? देखा जाए तो हम सब अपने-अपने स्थान पर दौड़ रहे हैं और हमारे “स्थान’ हमारे लिए महत्वपूर्ण हैं. इस दौड़ में यदि कोई अपने आपको सबसे पीछे समझता है तो दुनिया में उससे अधिक दुःखी कोई दूसरा हो ही नहीं सकता. यदि कोई अपने आपको सबसे आगे समझता है, तो उससे अधिक सुखी कोई दूसरा हो ही नहीं सकता. सर्किल में दौड़ते हुए यदि कोई कुछ लोगों को धकेल कर आगे निकल जाता है, तब भी वह सर्किल में ही रहता है और दुःखी रहता है, क्योंकि तब भी उसे बाकी लोग उससे आगे ही नजर आयेंगे. इसलिए यदि सुखी रहना है तो आगे ही नहीं, पीछे भी देखते चलें. 

6.व्यक्ति केवल कल के लिए जीता है, आज के लिए नहीं जीता. सोचता है, आज को तो जैसे-तैसे काट लो, कंजूसी करो, आवश्यक सुख-सुविधायें स्थगित करते चलो, कल आराम से रहेंगे, पर अफसोस ऐसा ‘कल’ कभी आता ही नहीं है. आयेगा भी तो ‘आज’ बन कर ही. जब आज को भोगने की आदत ही नहीं हो, तब किसी भी ‘आज’ को कहाँ भोग पायेगा. इसलिए ‘आज’ को भोगते चलो, भविष्य तो अपने आप ही बनता चला जायेगा.

7. यह भी आश्चर्य ही है कि जो कुछ भी हमारे पास है, उससे हम संतुष्ट नहीं हैं. हम सदैव ऐसी वस्तुओं के लिए व्यथित रहते हैं, जो कि हमारे पास नहीं हैं. जैसे ही कोई वस्तु अथवा सुविधा उपलब्ध होती है, हम जल्दी ही उससे ऊब जाते हैं. और नयी वस्तुओं, नयी-नयी सुविधाओं की कल्पना करने लग जाते हैं. हमारे दुःखों का वस्तुतः सबसे बड़ा कारण यही है, इन आमन्त्रित दुःखों को कम करने का सबसे सरल और कारगर उपाय यही है कि हम इस चाहत के क्रम को तोड़ दें और कभी खत्म न होने वाली इस दौड़ से अपने आपको बाहर कर लें. जो है, उसका पूरा-पूरा सदुपयोग आनन्द के साथ करें और जो आसानी से उपलब्ध हो सकता है, उसे प्राप्त करते चलें.

8. यह मानकर चलें कि आप जमीन पर चलते हुए केवल आगे और आगे ही बढ़ सकते हैं. न पीछे जा सकते हैं, न नीचे जा सकते हैं और न ऊपर ही चढ़ सकते हैं, याद रखें, पीछे जाने के लिए आपको पीछे मुड़ना पड़ेगा और पीछे मुड़ने पर भी आप आगे बढ़ते हुए ही नजर आयेंगे, क्योंकि रास्ते दोनों तरफ ही चलते हैं. जब आप लगातार चल रहे हैं, तब अफसोस किस बात का. चलने का अर्थ होता है, आगे बढ़ना. फिर मुँह लटका कर चलने का कोई अर्थ नहीं है.

9. यदि आप परमानन्द प्राप्त करना चाहते हैं तो कभी किसी से तुलना न करें. तुलना अगर करनी हो तो अपने आप से ही करें. सुखी या दुःखी रहने का विकल्प केवल आपके पास है. यदि आप सुखी रहना चाहते हैं तो आपके सामने कोई अड़चन नहीं है, किन्तु यदि आप किसी दूसरे की अपेक्षा सुखी रहना चाहते हैं, तब आप कभी सुखी हो ही नहीं सकते. यदि आप कम संसाधनों के साथ सुखी रहना नहीं जानते, तब आप अपार धन राशि से भी सुखी नहीं हो सकते.

दृष्टान्त- चिन्तामणि एक दिन किसी सन्त के पास पहुँचा और कहने लगा-‘महाराज मैं हमेशा चिन्तित रहता हूँ. जैसे-जैसे उम्र बढ़ रही है, चिन्तायें भी बढ़ती चली जा रही । हैं. कोई उपाय हो तो बतावें.’ इस पर सन्त ने प्रति-प्रश्न किया-‘जब तुम किसी खूटी पर अपने कपड़े टांगते हो, तब छूटी कपड़ों को पकड़ कर रखती है या कपड़े खूटी को पकड़े रखते हैं ?’ चिन्तामणि ने सोच कर जवाब दिया-‘महाराज खूटी तो स्थिर है, उस पर कपड़े स्वभावतः टंगे रहते है.’ सन्त बोले-‘बस यही तुम्हारे प्रश्न का उत्तर है.’ व्यक्ति अपने आपको कई बन्धनों-वस्तुओं रूपी खूटियों पर टांग देता है, और सोचता है, खूटियों ने उसे जकड़ रखा है. इसलिए केवल सोच को उलट दो, फिर कोई चिन्ता ही नहीं रहेगी.’ 

The power of positive thinking in hindi-केवल वर्तमान को पकड़िए (Hold on to The Present Only) 

The power of positive thinking in hindi

1.’भूत’ वर्तमान की लाश है, ‘भविष्य’ वर्तमान की आस है. जी हाँ, जीवन तो वस्तुतः ‘वर्तमान’ के आस-पास है. जीवन में जो कुछ भी है, बस वर्तमान ही है. वर्तमान की दहलीज पर भविष्य के गर्भ से एक क्षण’ आता है और हमारे पकड़ने से पहले ही ‘भूत’ बन जाता है. हमारे जीवन की सफलता इसी पर निर्भर करती है कि हम हर क्षण को भूत बनने से पहले किस प्रकार पकड़ते हैं. यदि हम हर क्षण का सदुपयोग करते चलेंगे तो हमें न भूत की चिन्ता रहेगी, न भविष्य की आंशका.

2. जो कुछ होता है, वर्तमान में ही होता है। जो कुछ हुआ है, वर्तमान में ही हुआ है। और जो भी होगा, वर्तमान में ही होगा। अर्थात् वर्तमान ही सत्य है, वर्तमान ही शाश्वत है, वर्तमान ही सब कुछ है। हम चाहे ‘भूत’ का गुणगान करें या ‘भविष्य’ की चिन्ता करें, वर्तमान में ही करेंगे। वर्तमान ही समय का असली रूप है, वर्तमान ही छाया है, वर्तमान ही धूप है। सुख-दुख, अच्छा-बुरा, आमोद-प्रमोद, सफलता-विफलता सब कुछ वर्तमान में ही घटित होगा। इसलिए यदि हम वर्तमान में ‘जीना सीख जायें तो यही हमारे जीवन की सबसे बड़ी सफलता होगी।’

3. वर्तमान को इतना खूबसूरत बनायें, कि याद रखा जा सके. जीवन को इतना सकल व सफल बनायें कि स्वाद चखा जा सके. अगर हम वर्तमान को ठीक से पकड़ नहीं पायेंगे तो पछतावें के अलावा कुछ भी बचा नहीं पायेंगे. जो गुजर गया, सो गुजर गया, वापस नहीं आ सकता. किन्तु वर्तमान तो अभी भी हमारे हाथ में ही है. हम इसे जब भी और जहाँ से भी पकड़ना चाहेंगे, पकड़ लेंगे. तो आइए, वर्तमान को अभी और इसी वक्त पकड़िए और वर्तमान के साथ ही चलिए. आप कभी तिथि-वाह्य नहीं होंगे.

4. समझदार व्यक्ति के लिए हर क्षण एक नया क्षण ही होता है. जो हर क्षण का सुदपयोग कर लेता है, उसे न ‘भूत’ की चिन्ता करनी पड़ेगी न भविष्य की. किसी भी क्षण को व्यर्थ खोने का अर्थ होता है, जिन्दगी से उसे घटा देना. हम एक घंटा कम सोकर अपने वर्तमान में वृद्धि कर सकते हैं. यदि 21 दिनों तक जल्दी उठने का साहस कर लें, तो यह हमारी आदत बन जायेगी. भरपूर नींद के लिए तो छ: घण्टे ही पर्याप्त होते हैं. इस तरह हम कई तरीकों से समय की बचत करते हुए अपने वर्तमान को बढ़ा सकते हैं.

5. देखा जाय तो जिन्दगी कुछ भी नहीं, महज कुछ क्षणों का योग मात्र है. एक-एक क्षण जिन्दगी में जुड़ता है और एक-एक जीवन जगत में जुड़ता है. जो क्षण हमने जी लिया, वह हमारा हो गया. अगले क्षण के लिए कुछ भी नहीं कहा जा सकता. अर्थात् वर्तमान क्षण ही महत्वपूर्ण है. इसलिए हर क्षण को समग्रता से जीना चाहिए. हँसना हो, समग्रता से हँसें, पूरा मनोरंजन करें. आराम करना हो, पूरे विश्राम के साथ करें और जब काम करना हो, वस्तुतः काम ही करें. 

6.यदि हम वर्तमान को नहीं पकड़ पायेंगे तो जीवन में कुछ भी नहीं कर पायेंगे. तब हम केवल ‘भूत’ बनते चले जायेंगे और भविष्य’ के लिए हाथ मलते रह जायेंगे. वस्तुतः वर्तमान ही एकमात्र संभावना है. तो आइए केवल संभव को ही पकड़ें. न भूत संभव है, न भविष्य संभव है. यदि हम संभव को पकड़ते चलेंगे तो असंभव भी संभव होता चला जायेगा. और यदि वर्तमान को नहीं पकड़ पायेंगे तो संभव भी असंभव होता चला जायेगा.

7. वस्तुतः वर्तमान ही एकमात्र सत्य है. भूत-भविष्य सब मिथ्या है, यही तथ्य है. हर व्यक्ति का अपना वर्तमान होता है, जो उसके जन्म से लेकर मृत्यु तक चलता है. इसलिए यदि कोई अपने जीवन से प्यार करना चाहता है तो उसे अपने वर्तमान से प्यार करना होगा. न जन्म निश्चित है, न मृत्यु निश्चित है, किन्तु वर्तमान तो निश्चित है और जो निश्चित है, उसे ही पकड़ा जा सकता है. वर्तमान के अतिरिक्त कुछ भी निश्चित नहीं है. इसलिए व्यक्ति केवल अपने वर्तमान को ही पकड़ सकता है. वर्तमान के अतिरिक्त किसी को पकड़ने की आवश्यकता भी नहीं है.

8. आश्चर्य कि सब कुछ जानते हुए भी हम केवल ‘कल’ के लिए जीते हैं. वे लोग सचमुच भाग्यशाली हैं, जो ‘आज’ के लिए जीते है. जरा सोचिए, यहाँ सभी मानवेतर प्राणी सिर्फ वर्तमान में जीते हैं. इन प्राणियों से कुछ तो हमें सीखना ही चाहिए. अक्सर हम सोचते हैं, अभी तो लम्बी-चौड़ी जिन्दगी पड़ी है, जरूरत होने पर सीख लेंगे. तब हम कभी नहीं सीख पायेंगे.

9. सबसे बड़ा आश्चर्य तो यही है कि हम अपने वर्तमान को ‘कल’ के नाम गिरवी रख कर चलते हैं. आज की सुविधाओं को कल के लिए स्थगित करते रहते हैं और काल्पनिक भविष्य के सपने देखते रहते हैं. किन्तु यह भूल जाते हैं कि भविष्य भी तो वर्तमान में ही आयेगा और यदि हम वर्तमान को पकड़ नहीं पाते हैं, तब हमारे सपने भी सपने ही रह जायेंगे.

दृष्टान्त- एक व्यक्ति ने किसी सन्त की खूब सेवा की. सन्त ने प्रसन्न होकर उसे पारस पत्थर देते हुए बताया कि-‘यह पत्थर लोहे को सोना बना सकता है, किन्तु इसका उपयोग केवल एक बार ही किया जा सकता है. तीन दिन बाद यह स्वतः ही प्रभावहीन हो जायेगा. तुम्हारा वक्त शुरू होता है, अब.’ व्यक्ति ने सोचा, अभी तो तीन दिन हैं. वह लोहा एकत्रित करने में जुट गया. जैसे-जैसे लोहा एकत्रित होने लगा, उसकी कल्पनायें भी आकाश में उड़ने लगी. बिना किसी को बताये रात-दिन इसी काम में लगा रहा. और अपने घर के सामने लोहे का एक बहुत बड़ा ढेर खड़ा कर दिया. अपनी घड़ी के अनुसार जैसे ही बहत्तर घण्टे पूरे होने वाले थे, उसने पारस पत्थर को लोहे के ढेर पर रख दिया. किन्तु लोहे में कोई परिवर्तन नजर नहीं आया. उसने पत्थर को लोहे पर घिसना शुरू कर दिया. किन्तु कुछ भी नहीं हुआ. लालची व्यक्ति पसीना-पसीना हो गया. और सीधा सन्त के पास दौड़ा. सन्त ने समझाया-‘तुम्हारी घड़ी पाँच सैकण्ड पीछे चल रही थी. पाँच सैकण्ड के विलम्ब के कारण ही तुम्हें सफलता नहीं मिल सकी. तुमने वर्तमान को न पकड़ कर भविष्य को पकड़ा, इसलिए जो मिल सकता था, वह भी नहीं मिला. वस्तुतः हम जीवन भर वर्तमान रूपी पारस पत्थर को लिए घूमते रहते हैं, किन्तु समय पर उपयोग नहीं कर पाते हैं. 

 

समय को ही सम्पत्ति समझिए 

(Time Alone is Wealth) 

  1. किसी के पास कितना धन है, यह महत्वपूर्ण नहीं, उसके पास कितना समय है, यही महत्वपूर्ण 

है. जिसके लिए समय ही सब कुछ है, वही समय के लिए महत्वपूर्ण है. समय तो निर्बाध रूप से चल रहा है, किसी के रोकने से रूकने वाला नहीं है, जो समझता है कि उसके रूकने पर समय भी रूक जायेगा, उससे बड़ा नासमझ दूसरा नहीं है, जो अपना समय नष्ट करता है, वो अपने 

आपको ही नष्ट करता है. 2. समय तो सीमित है और हमारी अपेक्षायें असीमित हैं. इसलिए उपलब्ध समय के साथ समन्वय 

बिठा कर सीमित को असीमित में बदलना ही सफलता है. समय का सदुपयोग और उचित प्रबन्धन ही समय की बचत है. समय की बचत ही हमारा एकमात्र बैंक बैलेन्स है. हमारी 

सार्थकता इसी बैंक बैलेन्स पर निर्भर करती है. 3. यह सही है कि सभी को एक दिन में चौबीस घण्टे ही उपलब्ध हैं. प्रकृति इस सम्बन्ध में किसी 

के साथ कोई भेदभाव नहीं करती, न किसी को एक सैकण्ड कम देती है, और न किसी को एक सैकण्ड अधिक, किन्तु यदि आप चाहें तो अपने समय की फिजूलखर्ची को रोकते हुए अपने समय में आशातीत वृद्धि कर सकते हैं. आप दूसरों को भी अपने काम में भागीदार बनाकर उनके थोड़े-थोड़े समय को अपने समय में जोड़कर चौबीस घण्टों को असीमित घण्टों में बदल सकते हैं. अर्थात् समय 

को बढ़ाया जा सकता है. समय को बढ़ाने का दूसरा नाम ही सफलता है. 4. जो समय का ध्यान रखता है, समय भी उसका ध्यान रखता है. जो समय का सम्मान करता 

है, समय भी उसका सम्मान करता है. जो समय की बचत करता है, समय भी उसका बचाव करता है. जो समय की फिजूलखर्ची करता है, समय भी उसे रास्ते में ही खर्च कर देता है. जो 

समय के पीछे चलता है, समय उसे सदा के लिए पीछे ही कर देता है. 5. एक व्यक्ति को अपने जीवनकाल में समय मिलता ही कितना है. जीवन के प्रथम पच्चीस वर्ष तो वह 

शिक्षण-प्रशिक्षण व जीवन की तैयारी में लगा देता है. व्यक्ति सामान्यतः साठ वर्ष की आयु तक ही क्रियाशील रह पाता है, इस प्रकार उसे मात्र पैंतीस वर्ष का सक्रिय जीवन ही मिल पाता है, इस अवधि का दो तिहाई कालांश तो सोने-जगने, नहाने-धोने, घूमने-फिरने, खाने-पीने और मौज-मस्ती में ही चला जाता है. जरा हिसाब तो लगाइए, जीविकोपार्जन के लिए उसे कितना कम समय मिल पाता है. अर्थात् हमारे पास समय बहुत ही कम है और जो है वह भी नितान्त ही अनिश्चित है. इस 

प्रकार समय अनमोल है. याद रखें, जो जितना अल्प होता है, उतना ही अमूल्य होता है. 6. जीवन तो वैसे ही बहुत छोटा और अनिश्चित होता है. फिर अपने अमूल्य समय को निरर्थक एवम् 

अनुत्पादक कार्यों में खर्च कर देने का क्या औचित्य है. याद रखें, आज का युग तो प्रतियोगिता का युग है. अब ऐसा कोई क्षेत्र नहीं बचा, जहाँ प्रतियोगिता न हो. हर प्रतियोगिता के लिए निश्चित रूप से समय ही सबसे बड़ी कसौटी है, अर्थात् समय ही सबसे बड़ी सम्पत्ति है. 

  1. समय की बचत की दिशा में सृष्टि के आरंभ से ही नये-नये प्रयोग होते रहे हैं, मानव सभ्यता के विकास 

का प्रमुख कारण भी यही रहा है. आज तो आधुनिक तकनीक की मदद से बहुत अधिक समय बचाया जा सकता है, और आने वाले समय में तो समय को बचाने की दिशा में बहुत बड़ी क्रान्ति होने वाली है, अर्थात् हम आधुनिक तकनीक के माध्यम से अपने समय की बचत करते हुए बचे हुए समय 

को अन्य सृजनात्मक कार्यों में लगा सकते हैं. समय की उपलब्धता ही हमारी सफलता है. 8. देखा जाय तो जीवन केवल कुछ उपयुक्त क्षणों का योग मात्र है. समय ही हमारी बिसात है और 

समय ही हमारी थाती है. लेकिन हम प्रायः अपना कीमती समय दूसरों की बुराई, व्यवस्था की आलोचना और अहम् की लड़ाई में ही बर्बाद कर देते हैं. व्यर्थ की बातों से बचने पर हम कितने तरोताजा और ऊर्जावान होते हैं, इसका अनुमान अनुभव में उतरने पर ही लगा सकते हैं. इसलिए बातूनी बनना, फालतू की पंचायत करना, फटे में टांग फंसाना और व्यर्थ की बहस में अपना वक्त एवम् अपनी ऊर्जा 

लगाना छोड़ कर तो देखिए, आपको समय की कमी कभी नहीं रहेगी. 9. याद रखें, किसी पूजा स्थल या देवालय पर जाकर पूजा अर्चन करने से तन, मन, धन, स्थान 

और समय का अपव्यय ही होता है. पूजा पाठ की बजाय स्वाध्याय, व्यायाम, प्राणायाम, योगादि करिए और सदैव मानसिक, शारीरिक एवम् आध्यात्मिक रूप से स्वस्थ्स रहिए. स्वस्थ रह कर ही आप 

समय का सही उपयोग कर सकते हैं और सफलता अर्जित कर सकते हैं. दृष्टान्त 

एक सन्त ने प्रवचन के दौरान बताया कि समय अनमोल है. समय के बदले मन चाही कीमत वसूली जा सकती है, प्रवचन सुनने के बाद एक अनाड़ी बाजार में जाकर बैठ गया और आने-जाने वालों से कहने लगा-‘मेरा समय बड़ा कीमती है, किन्तु मैं बहुत ही सस्ते में देने के लिए तैयार हूँ. जिसको भी चाहिए, घण्टों के हिसाब से बुक करवा सकते हैं. लोगों ने उसे पागल समझा. कुछ ने उत्सुकतावश पूछ लिया-‘तुम्हारे समय का हम क्या करेंगे ?’ अनाड़ी ने जवाब दिया-‘आप कुछ भी कर सकते हैं. जब आप खरीद लेंगे तो समय आपका हो जायेगा.’ पर अफसोस कि अनाड़ी का एक भी घण्टा नहीं बिका, अनाड़ी वापस संत के पास पहुँचा और गुस्से में अपनी समस्या रखी. संत ने हँसते हुए समझाया-‘वक्त तो ब्लैंक चैक है उस पर श्रम की कलम और विचारों की स्याही से धन राशि लिखनी पड़ती है. तब ही समय की कीमत मिल पाती है.’

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