Best life quotes in hindi-यदि कहीं स्वर्ग है तो यहीं है, इसी वक्त है (If There is Any “Heaven”, it is Here Only)

Best life quotes in hindi

Best life quotes in hindi-यदि कहीं स्वर्ग है तो यहीं है, इसी वक्त है (If There is Any “Heaven”, it is Here Only) 

1.वस्तु स्थिति तो यही है कि मृत्यु के बाद न कोई स्वर्ग है, न कोई नरक. यह तो महज कुछ निहित स्वार्थी और चालाक लोगों के दिमाग की उपज है. तथाकथित चालाक लोगों द्वारा हमें सदियों से डराया जा रहा है कि सद्कर्म करो, दान पुण्य करते रहो, वरना मरने के बाद नरक भोगना पड़ेगा. वस्तुतः स्वर्ग नरक की आढ़ में बहुत बड़ा कारोबार चलाया जा रहा है. यदि हम वस्तुस्थिति को समझ लें तो यह गौरखधन्धा स्वतः ही बन्द हो जायेगा.

2. प्रत्येक जीव के लिए आत्मा का अस्तित्व माना गया है. शरीर से पहले और शरीर के बाद भी आत्मा का अस्तित्व माना गया है. यह भी माना गया है कि आत्मा सुख दुख से ऊपर होती है. उसे कभी कोई कष्ट नहीं हो सकता. आत्मा अजर-अमर है. उसका तो बस पुनर्जन्म होता रहता है. माना जाता है कि आत्मा का पुनर्जन्म साल भर के अन्दर-अन्दर हो जाता है. तब उसे स्वर्ग या नरक में रहने का समय ही कितना सा मिल पाता होगा. फिर वह स्वर्ग में रहे या नरक में, उसे कोई फर्क नहीं पड़ेगा.

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3. मरने पर स्थूल शरीर तो पंच तत्वों में विलीन हो जाता है. सूक्ष्म शरीर जो सपनों के समय साथ रहता है, वह भी स्थूल शरीर के साथ ही समाप्त हो जाता है, मेरे विचार से सूक्ष्म शरीर का अस्तित्व स्थूल शरीर के साथ ही हो सकता है. पाठकों के विचार अलग हो सकते हैं. जीवात्मा का अस्तित्व आत्मा से अलग क्या हो सकता है ? तब स्वर्ग या नरक में आत्मा ही तो जा सकती है. और आत्मा तो जहाँ भी रहेगी, परमानन्द में ही रहेंगी. तब स्वर्ग या नरक का क्या अर्थ हो सकता है ?

4. वस्तुतः आपका स्वर्ग, आपका नरक आपके साथ ही है. ये दोनों आपके साथ ही समाप्त हो जायेंगे. जन्म के बाद और मृत्यु से पूर्व ही इनका अस्तित्व हो सकता है. स्वर्ग या नरक का विकल्प केवल आपके पास ही हो सकता है. किसी अन्य के पास नहीं हो सकता. स्वर्ग और नरक तो वस्तुतः व्यक्तिपरक है. आँख खुली रख कर तो देखिए, चारों ओर स्वर्ग ही स्वर्ग बिखरा पड़ा है.

5. जब प्रत्येक कार्य जागरण भरा हो, जब हर क्षण जोश से भरा हो, जब हर पल बोध एवम् सिमरन भरा हो, तब समझो यही स्वर्ग है. यही जीने का मकसद है. आप बैलगाड़ी से यात्रा करें या रेलगाड़ी से, आप कार से यात्रा करें या किसी अन्य वाहन से, जब तक दिल से यात्रा नहीं करेंगे, तब तक यात्रा का असली आनन्द नहीं उठा सकेंगे, दिल से जीवन यात्रा करके तो देखें, आपको किसी स्वर्ग की आवश्यकता ही नहीं रहेगी.

6. यदि आप मानसिक, शारीरिक एवम् आध्यात्मिक रूप से स्वस्थ हैं, सकारात्मक सोच एवम् आत्मविश्वास से भरपूर हैं, राग-द्वेष, चिन्ता और तनाव से मुक्त हैं, तो स्वर्गस्थ ही हैं. स्वर्ग में ही हैं. स्वर्ग तो वस्तुतः आपके भीतर ही है. तथाकथित बाहरी स्वर्ग कभी आपको स्वर्गीय आनन्द नहीं दे सकता. इसलिए अपने हृदय में विद्यमान स्वर्ग को पहचानो और इतना विकसित करो कि अन्दर-बाहर स्वर्ग ही स्वर्ग दृष्टिगोचर हो.

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7. प्रार्थना का अर्थ कभी मांगना नहीं होता, प्रार्थना का अर्थ होता है, परमात्मा का धन्यवाद. धन्यवाद इस बात का कि-‘जो कुछ मुझे चाहिए, वो सब मेरे पास है. जो मेरे पास नहीं है, वो मुझे नहीं चाहिए.’ प्रकृति ने हमें कितना सुन्दर एवम् अद्भुत शरीर दिया है. कौनसा ऐसा सुख या आनन्द है, जिसका हम उपभोग नहीं कर सकते. तब मरने के बाद कौनसा स्वर्ग चाहिए ? ऐसे किसी काल्पनिक स्वर्ग का औचित्य ही क्या है ?

8. भीतर का सूरज उगेगा, तब ही सुबह होगी. ऐसी सुबह कितनी शान्त, शीतल एवम् खुशगवार होगी. याद रखें, भीतर का सूरज सदैव सुबह का सूरज ही होगा, जो कभी अस्त नहीं होगा. भीतर का सूरज आपकी आत्मा को अंधकार में भी रास्ता दिखाते हुए प्रकाश की ओर ले जाता है. यही स्वर्ग है.

9. आदमी भूत की जुगाली और भविष्य की चिन्ता करने में ही अपना बहुमूल्य समय खराब कर देता है. पर यह भूल जाता है कि उसका भूत और भविष्य पर कोई नियन्त्रण नहीं है. नियन्त्रण तो केवल वर्तमान पर ही हो सकता है. और वर्तमान पर नियन्त्रण कर लेना ही भूत व भविष्य पर नियन्त्रण कर लेना है. अर्थात् वर्तमान ही सत्य है, वर्तमान ही स्वर्ग है. हमारे सारे सिद्धान्त कर्म को प्रधानता देते हैं. वस्तुतः कर्म ही जीवन का धर्म है. कर्म ही जीवन का मर्म है. कर्म ही जीवन की सार्थकता है. जहाँ कर्म, वही सफलता है. जहाँ सफलता, वही स्वर्ग है. याद रखें, स्वर्ग से सफलता नहीं, सफलता से स्वर्ग है.

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निष्कर्ष –(क) जीवन में शान्ति–अशान्ति मन के कारण है. जीवन में प्रेम-घृणा दिल के कारण है. और जीवन में आनन्द आत्मा के कारण है. अर्थात् आत्मा में केवल आनन्द ही आनन्द है. जब हम मन और हृदय के स्तर पर सोचते हैं, तब हमें सुख-दुःख दोनों की अनुभूति होती है, किन्तु जब आत्मा के स्तर पर सोचते हैं, तब केवल आनन्द की अनुभूति होती है. वस्तुतः आनन्द की अनुभूति ही स्वर्ग है. यह महत्त्वपूर्ण नहीं कि आपका जन्म कैसे हुआ? यह भी महत्व नहीं कि आपकी मृत्यु कैसे होती है ? महत्वपूर्ण तो यही है कि आप जीते कैसे हैं ? अर्थात् स्वर्ग और नरक का अस्तित्व तो जन्म और मृत्यु के बीच ही हो सकता है. (ख) सदियों से हमें डराया जा रहा है कि चौरासी लाख यौनियों में भटकने के बाद ही मनुष्य शरीर मिल पाता है. लेकिन हमें डरने की कतई आवश्यकता नहीं है. जरा तर्क की कसौटी पर देखिए-चौरासी लाख की गणना किसने की है ? क्या नये-नये जीव, नयी-नयी वनस्पतियों का आविर्भाव नहीं हो रहा है ? क्या किसी मनुष्य का पुनर्जन्म, कुत्ता-बिल्ली के रूप में सम्भव है ? इस सम्बन्ध में क्या कोई ठोस साक्ष्य उपलब्ध है ? कथायें तो सब काल्पनिक होती हैं. धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति मृत्यु से पूर्व ही सम्भव है. यदि पुनर्जन्म होता है तो यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, ईश्वरीय व्यवस्था है. इस व्यवस्था को तोड़ने वाले हम कौन होते हैं ? तथा कथित मोक्ष सम्बन्धी कोई साक्ष्य भी उपलब्ध नहीं है. इसलिए स्वर्ग, नरक, मोक्ष सब कुछ हमारे इसी जीवन में सम्भव है. मृत्यु के बाद नहीं. अर्थात् सफलता का नाम ही स्वर्ग है, मोक्ष है और असफलता ही नरक है. 

धन को माया मत मानिए (Assets Are Not To Be Considered “Maya”

 1. हमारे लगभग सभी साधु-सन्तों और धार्मिक ग्रन्थों ने ‘धन’ को माया बताया है. और ‘माया’ को ही मोक्ष प्राप्ति के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा ठहराया है. देखा जाय तो इसी दार्शनिक पृष्ठभूमि ने हमारे देश को सर्वाधिक नुकसान पहुँचाया है, परिणामतः इक्कीसवीं सदी में भी भारतवासियों की औसत आय विश्व की तुलना में इक्कीस गुणा कम है. दूसरी ओर यह भी सच है कि धन को ‘माया’ बताने वाले तथाकथित साधु-सन्तों और धार्मिक व्यक्तियों ने जम कर धन कमाया है. जरा सोचिए, इस दोहरे मापदण्ड का क्या अर्थ है ? अब तो धन के महत्व को समझना ही पड़ेगा.

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2. शरीर, मन, विचार एवम् भाव की दृष्टि से हम प्रकृति के गुलाम हैं, वस्तुतः यही ‘माया’ है. सृष्टि की माया को समझ पाने में हम अभी तक नाकाम हैं, वस्तुतः यही ‘माया’ है. अर्थात् भौतिक सुख-सुविधायें ‘माया’ की परिधि में नहीं आती हैं. और भौतिक सुख-सुविधाओं के लिए धन की आवश्यकता होती है. इसलिए ‘धन’ को माया कैसे कहा जा सकता है.

3. स्वास्थ्य, सुरक्षा, नियन्त्रण, निर्भरता, शक्ति, स्वतन्त्रता, प्रेम, प्रसन्नता, आजीविका आदि सभी मानवीय क्रिया-कलापों के लिए सर्वप्रथम धन की आवश्यकता होती है. आज तो ‘धन’ के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती. धन तो हमारी छटवीं इन्द्री है, जो पाँचों कार्मेन्द्रियों को सुख पहुँचाती है, यह सही है कि धन की कोई अन्तिम सीमा नहीं है, किन्तु एक परिवार के लिए न्यूनतम सीमा के आधार पर गरीबी रेखा का निर्धारण किया जाता है. दुर्भाग्यवश आज भी हमारे देश की करीब एक चौथाई जनसंख्या गरीबी रेखा के नीचे लटक रही है. हमारे यहाँ एक सोची समझी साजिश के तहत धन को ‘माया’ बताया गया है. और पिच्चासी प्रतिशत लोगों को सदियों से बेवकूफ बनाया जा रहा है. इसी दुर्भाग्यशाली सामाजिक व्यवस्था के कारण ‘धन’ का तर्कपूर्ण वितरण नहीं हो पाया है. आज भी देश की कुल सम्पदा के बावन प्रतिशत हिस्से पर मात्र पाँच प्रतिशत अति चालाक लोगों का आधिपत्य है, बीस प्रतिशत के पास तो कोई सम्पदा ही नहीं है. लेकिन अब धीरे-धीरे सामाजिक परिवर्तन आ रहा है..

5. कौन कहता है कि संतोषी सदा सुखी रहता है. जब आबादी बहुत कम थी, आवश्यकतायें बहुत कम थीं, तब संतोष में सुख मिलता होगा. आज कौन ऐसा है, जो केवल संतोष के साथ जी सकता है ? यदि हर व्यक्ति संतोषी होता तो दुनिया में इतना विकास हर्गिज नहीं होता. इसलिए हर व्यक्ति को अधिक से अधिक सम्पदाओं का सृजन करना चाहिए, ताकि हमारा देश दुनिया की दौड़ में आगे निकल सके. 

6.हमारे यहाँ एक अजीब दौड़ चल रही है. एक व्यक्ति ‘धन’ की तरफ दौड़ रहा है. और दूसरा ‘धन’ के विपरीत दौड़ रहा है. प्रथम व्यक्ति धन के और करीब आना चाहता है, जबकि दूसरा धन से और दूर निकल जाना चाहता है, अर्थात् दोनों ही दौड़ रहे हैं और दोनों की दौड़ का केन्द्र बिन्दु ‘धन’ ही है. मजे की बात तो यही है कि इस दौड़ में पहला व्यक्ति अभी भी धन से दूर है और दूसरा व्यक्ति अभी भी धन के नजदीक ही है. तो आइए, इस दो तरफा दौड़ को सही दिशा दें. जब सबकी दौड़ धन की तरफ होगी, तब ही दौड़ सार्थक होगी..

7. गहराई से देखा जाए तो इस जगत में सब कुछ माया ही तो है. जो हमारे पास है, वो केवल हमारे पास है, हमारा नहीं है. पर इसका अर्थ यह तो नहीं कि हम अपने पास कुछ भी न रखें. पास होने का अहसास ही हमारे विकास का असली कारण है. अब तो सब ओर विकास की ही माया है. और यदि हम इस माया से बचने के प्रयास करेंगे तो विकास से कट जायेंगे.

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8. प्रतिभा से सम्पदा अर्जित की जा सकती है, पर सम्पदा से प्रतिभा नहीं. इसलिए सर्वप्रथम प्रतिभा अर्जित करें, फिर सम्पदा अर्जित करेंऔर सम्पदा के माध्यम से अपनी प्रतिभा का सदुपयोग करते चलें. याद रखें, प्रतिभा तो हर स्थिति में महत्वपूर्ण है, चाहे कितना ही धन हो, यदि प्रतिभा नहीं हो तो धन को जाने में भी देर नहीं लगेगी. कहा भी जाता है कि धन को आने में तो बहुत देर लगती है, किन्तु जाने में कोई देर नहीं लगती.

9. किसी ने ठीक ही कहा है-“पैसा खुदा तो नहीं, पर खुदा की कसम, खुदा से कम भी नहीं.’ खुदा के नाम पर कब तक मांगते रहोगे ? अपने नाम पर मांग कर तो देखो. पूर्ण आत्मविश्वास के साथ अपनी योग्यता को समुचित रूप से लगाकर तो देखो, तब आपको किसी के नाम कुछ भी मांगने की आवश्यकता नहीं रहेगी.

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दृष्टान्त- एक किसान ने अपनी बैलगाड़ी के दोनों तरफ दो-दो बैल जौत लिए और दोनों तरफ हाँकने लगा, किन्तु गाड़ी किसी भी तरफ नहीं बढ़ रही थी. किसान ने दोनों तरफ दो लक्ष्य निर्धारित कर रखे थे. एक तरफ धन और दूसरी तरफ ध्यान. वह दोनों तक पहुँचना चाह रहा था. तब एक बृद्ध पुरुष वहाँ से गुजरा. उसने किसान को समझाया कि चारों बैलों को गाड़ी के आगे की ओर जोत दो, गाड़ी सरपट दौड़ने लगेगी और तुम अपने लक्ष्यों को प्राप्त कर लोगे. याद रखो, धन और ध्यान एक दूसरे के विपरीत नहीं हैं, बल्कि एक दूसरे के पूरक हैं, और दोनों एक ही स्थान पर उपलब्ध हैं. जब तक धन नहीं होगा, तब तक हमारा समूचा ध्यान धन की ओर ही लगा रहेगा. धन की प्राप्ति पर ही हमारा ध्यान भीतर की तरफ उतर सकता है. परन्तु मजा तो तब है, जब धन और ध्यान साथ-साथ रहें. आज के इस भौतिक युग में तो धन को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए. यदि गहराई से देखा जाय तो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष जैसे पुरुषार्थों का ‘धन’ के बिना कोई अस्तित्व ही नहीं है. सफलता का मापदण्ड केवल ‘धन’ ही है. जीवन का सार केवल ‘धन’ ही है.  

अपने संसार को भी पहचानिए (Identify Your World Also) 

1.आदमी अपने परिवार एवम् आसपास के लोगों को जानने के जितने प्रयास करता है, हर व्यक्ति उतना ही अधिक अजनबी बनता चला जाता है, सबसे बड़ा आश्चर्य तो यही है कि सबसे निकटतम व्यक्ति ही सबसे अधिक अनजाना रह जाता है. इसलिए कभी भी लोगों को जानने का कोरा दम्भ मत भरिए. पहले लोगों को जानिए, फिर सतर्कता पूर्वक व्यवहार करिए और सदा सावधान रहिए.

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2. याद रखें, आपके जानकार लोग कभी भी आपको कामयाब होते हुए देखना नहीं चाहेंगे. यदि किसी तरह आप कामयाब हो भी गये तो आपके तथाकथित शुभचिन्तक ही आपको बर्बाद होते हुए देखना चाहेंगे. यह एक मानवीय कमजोरी है, जो उतनी ही स्वाभाविक है, जितनी कि मानव प्रगति है. इसलिए सबसे पहले अपनी इस कमजोरी को पहचानते हुए अपने से दूर करें, फिर आपको आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक पायेगा.

3. वैसे तो आज समूचा संसार एक छोटा सा गाँव बन गया है. संचार क्रान्ति के कारण पूरा जगत ही आपकी टेबिल पर सिमट आया है. इन्टरनेट, इलैक्ट्रोनिक मीडिया आदि के माध्यम से आज हम घर बैठे-बैठे ही दुनिया भर की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं. मोबाइल क्रान्ति के द्वारा हम हर समय, हर स्थान पर किसी से भी सम्पर्क कर सकते हैं, लोगों से सम्पर्क में रह सकते हैं. वार्ता, सूचना, मनोरंजन, ध्वनि एवम् चित्र रिकॉर्ड करने जैसी अनेकों सुविधायें इस छोटे से यंत्र से प्राप्त की जा सकती हैं. किन्तु अपने सम्पर्क में आने वाले व्यक्तियों को जानने के लिए अपना माध्यम इन सबसे अलग ही खोजना पड़ेगा.

4. यह सही है कि संसार की सबसे सुन्दर वस्तु को न देखा जा सकता है, न छुआ जा सकता है, उसे तो केवल दिल की गहराई से अनुभव किया जा सकता है. स्नेह, श्रद्धा, प्यार, ममत्व, अपनत्व आदि सुन्दरतम भाव हैं, जिन्हें महज अनुभव किया जा सकता है. ऐसे भावों पर टिके सभी रिश्तों को स्वार्थ से ऊपर उठकर देखिए. फिर देखिए, संसार कितना सुन्दर है.

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5. यह भी सही है कि जमाने के जितने गम हैं, उनके सामने हमारे गम बहुत कम हैं. जब हम इस जगत को इस नजरिए से देखेंगे तो अपने आपको बहुत हल्का पायेंगे, अपने आपको दूसरों की अपेक्षा अधिक सौभाग्यशाली समझेंगे. इसलिए, हमें सदैव प्रसन्न रहना चाहिए. मुस्कुराने से मुसीबतें सिकुड़ जाती हैं, हँसने से मुसीबतें हल्की पड़ जाती हैं. दुनिया में आये हैं तो दुनिया में ही रहना पड़ेगा. चाहे सुखी रहें या दुखी रहें. जब रहना ही है तो दुखी हो कर नहीं, सुखी होकर रहें, हँसते हुए रहें. यही हमारी सफलता है.

6. हम संसार को तो नहीं बदल सकते, किन्तु अपने आपको अवश्य बदल सकते हैं. जब हम अपने आपको बदल लेते हैं, तब संसार भी अपने साथ बदला हुआ ही लगता है. हमें अपना निर्माण करना चाहिए, संसार का निर्माण तो अपने आप होता चला जायेगा. जिसे बदला नहीं जा सकता, उसे स्वीकार करने में कोई हर्ज नहीं है,

7. शैयर्स की भांति व्यक्ति के भी दो मूल्य होते हैं, एक अंकित मूल्य (Face Value) और दूसरा बाजार मूल्य (Market Value). दोनों मूल्य सामान्यतः कभी समान नहीं होते. अंकित मूल्य तो स्थित रहता है, किन्तु बाजार मूल्य चढ़ता उतरता रहता है. नीचे शून्य तक और ऊपर आसमान तक जा सकता है. इसलिए लोगों को उनके अंकित मूल्यों की बजाए उनके बाजार मूल्यों की कसौटी पर कसना चाहिए. यदि आप अपना बाजार मूल्य अंकित मूल्य से सदा ऊपर बनाये रखेंगे तो अपने को ‘ए’ क्लास में बनाये रख सकेंगे और लोगों का विश्वास प्राप्त करते रहेंगे.

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8. लोगों से न अधिक दूरी रखें, न अधिक नजदीकी ही, वरना या तो जम जाओगे या जल जाओगे. लोगों पर न अधिक विश्वास करें, न अधिक अविश्वास ही, वरना या तो डूब जाओगे या विश्वास खो दोगे. विश्वास तो करें, मगर आँख खोलकर. बिना उचित कारण अविश्वास भी न करें, संसार में रहें, किन्तु संसार को अपने भीतर न रहने दें.

9. दुनिया एक दौड़ है. इसी दौड़ के कारण आज हम यहाँ तक आ पहुँचे हैं. और आगे कहाँ तक पहुँचेंगे, कह नहीं सकते. यह सही है कि जहाँ दौड़ है, वहाँ होड़ है. इस होड़ से हम अपने आपको अलग नहीं कर सकते. कहीं दुनिया हमें दौड़ से अलग नहीं कर दे, इसलिए हमें दौड़ और होड़ दोनों में बने रहना पड़ेगा.

 

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दृष्टान्त- एक दार्शनिक की हार्ट अटैक से अचानक मृत्यु हो गई. उसे ऐसा लगने लगा, जैसे उसका शरीर उससे दूर पड़ा है. वह दूर से अपने शरीर को देखने लगा, किन्तु उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था. कहते हैं, मृत्यु के समय कुछ ऐसा ही घटता है, दार्शनिक का छोटा बेटा नौकरी के कारण कस्बे से दूर था. बस उसी का इन्तजार था. धीरे-धीरे परिचित रिश्तेदार एकत्रित होने लगे. हर व्यक्ति कुछ न कुछ सोच रहा था, दार्शनिक की आत्मा को सबके अन्दर की आवाज स्पष्ट सुनाई पड़ रही थी. पत्नी सोच रही थी-‘इतनी जल्दी क्या थी? थोड़ा बैंक बैलेन्स तो छोड़ जाते ? मेरा बन्दोबस्त तो कर जाते ?’ बड़ा बेटा-‘पैसा तो बिजनेस में फंसा हुआ है. अचानक आ गये खर्चे का इन्तजाम कहाँ से होगा? छोटे भाई पर ही डालना पड़ेगा.’ बहु-‘सास से बदला लेने का अब मौका मिलेगा. पड़ौसी-‘बेचारा, जिन्दगी भर कंजूसी में ही रहा. अच्छा हुआ कि चलता फिरता ही चला गया, वरना बेचारे की दुर्गति ही होती. उधार माँगने वाला-‘अब बारह दिन तो माँग भी नहीं सकते. पूरा हिसाब बना कर दोनों बेटों को पकड़ा देंगे.’ उधार चुकाने वाला-‘फिलहाल चुप रहना ही बेहतर है. बेटों द्वारा माँगने पर देखा जायेगा.’ मित्र-‘आदमी भला था. सुख-दुःख में काम आता था.’ अभी तैयारी ही चल रही थी कि मृत शरीर में अचानक हलचल हुई. धीरे-धीरे साँस चलने लगी. थोड़ी ही देर में दार्शनिक पुनः जीवित होकर बैठा हो गया. इस पर सबके सब आश्चर्यचकित होकर खुशी से रोने लगे. दार्शनिक धीरे से बोला-‘आप लोग शान्त हो जाइए, मैं आप लोगों के जज्बातों को समझ सकता हूँ, थोड़ी देर पहले मैं आपके गम को भी महसूस कर रहा था.’ 

सात आश्चर्य 

  1. आदमी कभी भी अपनी गलती स्वीकार नहीं करता, बल्कि अपनी तमाम 

असफलताओं का दोष दूसरों पर डालने में ही अपनी सफलता समझता है. 

  1. आदमी अपने दुखों के कारण दुरवी नहीं रहता, बल्कि पड़ोसियों के तथाकथित 

सुखों के कारण दुरवी रहता है और पड़ौसी भी इसी तरह दुःखी रहते हैं. 

  1. आदमी अपनी प्रशंसा के लिए सब कुछ दाव पर लगा देता है, फिर भी कभी 

सन्तुष्ट नहीं हो पाता है. 

  1. आदमी सदैव इसी गलतफहमी में रहता है कि वह सब कुछ जानता है, जबकि 

हकीकत तो यही है कि वह खुद को भी ठीक से कहाँ जान पाता है. 

  1. आदमी अपने अनुभवों से कुछ भी सीरवना नहीं चाहता है, जबकि वह अपने 

अनुभवों के आधार पर ही आगे बढ़ सकता है. 

  1. आदमी अक्सर अपनी बात दूसरों पर थोपना चाहता है, भले ही वह खुद भी 

अपनी बात से सहमत न हो. 

  1. आदमी पर दूसरों को मुफ्त में सलाह देने का भूत सवार रहता है, भले ही 

वह खुद भी ऐसी सलाह पर कभी अमल न करता हो. 

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