नाभिकीय प्रौद्योगिकी का लाभकारी स्वरूप अथवा नाभिकीय प्रौद्योगिकी के लाभ अथवा नाभिकीय प्रौद्योगिकी के कल्याणकारी उपयोग

नाभिकीय प्रौद्योगिकी का लाभकारी स्वरूप अथवा नाभिकीय प्रौद्योगिकी के लाभ अथवा नाभिकीय प्रौद्योगिकी के कल्याणकारी उपयोग 

नाभिकीय प्रौद्योगिकी इससे जुड़े खतरों के कारण आलोचना की शिकार अवश्य हुई है, किंतु इस तस्वीर का दूसरा पहलू यह भी है कि इस प्रौद्योगिकी के शांतिपूर्ण एवं सुरक्षित प्रयोग हमारे लिए किसी वरदान से कम नहीं हैं। यह कहना असंगत न होगा कि वर्तमान समय में नाभिकीय प्रौद्योगिकी हमारे लिए बहु उपयोगी साबित हो रही है। कृषि, स्वास्थ्य, चिकित्सा, उद्योग, खगोलीय क्षेत्रों सहित जीवन के अन्य अनेक क्षेत्रों में नाभिकीय प्रौद्योगिकी के कल्याणकारी उपयोग बढ़े हैं। 

“इसमें कोई दो राय नहीं कि आज के दौर में अपने शांतिपूर्ण अनुप्रयोगों के जरिए नाभिकीय प्रौद्योगिकी अत्यंत लाभकारी सिद्ध हो रही है। विज्ञान की यह सौगात अनेक स्तरों पर मानव विकास को प्रोत्साहित कर रही है तथा इसके उपयोगों से हम लाभान्वित हो रहे हैं।” 

इसमें कोई दो राय नहीं कि आज के दौर में अपने शांतिपूर्ण अनुप्रयोगों के जरिए नाभिकीय प्रौद्योगिकी अत्यंत लाभकारी सिद्ध हो रही है। विज्ञान की यह सौगात अनेक स्तरों पर मानव विकास को प्रोत्साहित कर रही है तथा इसके उपयोगों से हम लाभान्वित हो रहे हैं। इसने प्रगति एवं विकास के पथ को भी प्रशस्त किया है। इस प्रौद्योगिकी का उपयोग कर हम किस प्रकार लाभान्वित हो रहे हैं, आइये जाना जाए। 

नाभिकीय कृषि : आजकल नाभिकीय कृषि के लिए व्यापक स्तर पर विकिरण प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल किया जा रहा है। इसके लिए बाकायदा भारत के परमाणु ऊर्जा विभाग द्वारा ‘नाभिकीय कृषि | कार्यक्रम चलाया जा रहा है। इस कार्यक्रम के तहत दलहनों, तिलहनों और अनाजों की अधिक उपज प्राप्त करने के लिए विकिरण प्रौद्योगिकी का उपयोग किया जा रहा है। इसके अलावा विकिरण से प्रसंस्कारित सीवेज के मल का उपयोग खाद के रूप में किया जा रहा है, जिससे कृषि उपजों में बढ़ोत्तरी हुई है। इस तरह की खाद में भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ाने वाले पोटाश के तत्व तो प्रचुर मात्रा में होते ही हैं, मिट्टी के लिए उपयोगी ‘राइजोबियम’ जैसे कीटाणु भी पाए जाते हैं। बड़ोदरा में स्थित ‘सीवेज सलज हाइजेनाइजेशन संयंत्र किसानों के लिए अहानिकर अपशिष्ट कीचड़ (स्लज) उपलब्ध करवाता है। विकिरण प्रोद्योगिकी के प्रयोग से भारतीय किसान लाभान्वित हो रहे हैं। 

फसल सुधार : नाभिकीय प्रौद्योगिकी फसल सुधार के क्षेत्र में भी उपयोगी साबित हो रही है। इस दिशा में देश के कृषि विश्वविद्यालयों के सहयोग से मुंबई में स्थित ‘भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र’ (बार्क) अनुसंधान तथा विकास कार्यों में लगा हुआ है। बार्क ने अधिक उपज देने वाली दालों की 17, मूंगफली, सरसों, सोयाबीन एवं सूरजमुखी जैसे तेल बीजों की 12 तथा पटसन एवं चावल की एक-एक फसल विकसित की है। बार्क द्वारा विकसित हरी खाद की फसल ‘सेसबेनिया रोस्टराटा’ छोटे किसानों के लिए लाभदायी एवं किफायती सिद्ध हो रही है। बार्क द्वारा केले की व्यावसायिक किस्मों की पैदावार बढ़ाने के लिए उन्नत संवर्धन आधारित प्रक्रिया का प्रयोग किया जा रहा है। बार्क ने ‘सूक्ष्म प्रचारण प्रौद्योगिकी’ के जरिए अन्ननास में बड़ी मात्रा में बहुगुणन प्रविधि को मानकीकृत किया है। इसी क्रम में बार्क द्वारा विशेष रूप से मरुभूमियों के अनुकूल ‘अकेसिया विक्टोरिई’ जैसे सख्त पौधे विकसित किए हैं। फसल सुधार के लिए बार्क कषि मंत्रालय से सतत सपंर्क में रहता है। 

खाद्य संरक्षण : आवश्यक भोज्य पदार्थों को संरक्षित करने तथा वर्ष पर्यन्त उनकी उपलब्धता को बनाए रखने के लिए भी नाभिकीय प्रौद्योगिकी उपयोगी एवं लाभकारी सिद्ध हो रही है। खाद्य पदार्थों के संरक्षण में प्रयुक्त नाभिकीय तकनीक को ‘इरेडिएशन’ (Irradiation) प्रक्रिया कहा जाता है। इसके लिए गामा किरणों के प्रभाव को उपयोग में लाया जा रहा है। इरेडिएशन की यह प्रक्रिया पूर्णतया भौतिक रूप से संपन्न होती है और इसमें किसी भी प्रकार के रसायनों का प्रयोग नहीं किया जाता है। इस संरक्षण में खाद्य पदार्थ के आकार-प्रकार, रंग, स्वाद एवं गुणवत्ता में किसी भी प्रकार का बदलाव नहीं आता है। इरेडिएशन की इस विधि से आलू, प्याज आदि में शीघ्र प्रस्फुटन नहीं होता है। गेहूं की फसल को कीटों से बचाने तथा मछली व मांस को अधिक समय तक सुरक्षित रखने में भी यह विधि उपयोगी साबित हो रही है। अनेक प्रकार के फल एवं सब्जियों, फूलों और कॉफी की फलियों को अधिक समय तक संरक्षित रखने के लिए विकिरण एवं तापमान कम रखने के प्रभावों पर भी शोध कार्य हो रहे हैं। अल्फांसों एवं केसर प्रजाति के आमों के निर्यात को संभव बनाने में साइटोनसैनिटरी ट्रीटमेंट का महत्वपूर्ण योगदान है, जिसके लिए ‘कुशल रेडिएशन प्रोसेसिंग केंद्र की स्थापना की गई है, जो कि विश्व का पहला कोबाल्ट 60 गामा विकिरण केंद्र है। कुल मिलाकर खाद्य संरक्षण एवं सुरक्षा में नाभिकीय प्रौद्योगिकी अत्यंत लाभकारी सिद्ध हो रही है। 

स्वास्थ्य एवं चिकित्सा : स्वास्थ्य एवं चिकित्सा के क्षेत्र में भी नाभिकीय प्रौद्योगिकी लाभकारी साबित हो रही है। निदान, उपचार एवं स्वास्थ्य देखभाल में विकिरण समस्थानिकों (रेडियो आइसोटोप्स) एवं उनके यौगिकों का अनेक प्रकार से उपयोग होता है। भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र द्वारा जलने-कटने और कोढ़ केलिए विकिरण प्रसंस्कृति हाइड्रोजन, गठिया के इलाज के लिए होलोमियम 166 हाइड्राक्सी एपेटाइट एवं सेमारियम-153 हाइड्राक्सी एपेटाइट, रेडियो भेषज व अंदरूनी रेडियोथेरेपी के लिए ल्यूथिनियम-177 से साथ फोस्फोनेट्स की रेडियोलेबलिंग का सफल विकास किया है। क्षय रोग के संक्रमण का पता लगाने के लिए भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र द्वारा ‘सीरो-डायगनोस्टिक किट’ तैयार की गई है, तो त्रि-आयामी कोन-बीम टोमोग्राफी का इस्तेमाल कर एक्स-रे चित्र उतारना भी इस केंद्र की एक बड़ी उपलब्धि है। मुंबई में भाभा परमाणु अनुसंधान । केंद्र का विकिरण चिकित्सा केंद्र नाभिकीय चिकित्सा और संबद्ध विज्ञानों के शोध और विकास से जुड़ा है। यह केंद्र देश के थायराइड रोगियों के लिए विशेष महत्व का है। थायराइड हारमोन की जांच हेतु टी3/टी4 चुंबकीय किट आधारित किट बाजार में आ चुका है। सालाना पांच लाख रोगियों से प्राप्त नमूनों की जांच में इन ‘रेडियोइम्युनोएसे किट्स’ का प्रयोग किया जाता है। कैंसर, हृदयरोग और न्यूरोलॉजिकल समस्याओं के समाधान हेतु बहुत कम आयु वाले | विशेष आइसोटोप की जरूरत होती है। इन जरूरतों को पूरा करने के | लिए इस केंद्र में चिकित्सा साइवलोट्रोन लगाया गया है। इसी क्रम में । देश के पूर्वी भागों में रेडियो निदान की जरूरतों को पूरा करने के लिए कोलकाता में क्षेत्रीय विकिरण केन्द्र की स्थापना की गई है। 

भाभा अनुसंधान केंद्र द्वारा खर्चीली आयातित टेलोथेरेपी के स्थान पर कम लागत वाली टेलीथरेपी इकाई, कोबाल्ट-60 टेलीथेरेपी मशीन का विकास किया जा चुका है। इस केंद्र द्वारा आंख के कैंसर के इलाज के लिए चावल के दाने के बराबर अतिलघु आकार के रेडियोधर्मी स्रोत का विकास भी किया जा चुका है। इसमें आयोडीन 125 की मात्रा 2-3 मिली क्यूरी होती है। 

“नाभिकीय प्रौद्योगिकी से भूजल भंडारों का पता लगाने और उनकी पुनर्चालन स्थितियों का आकलन करने में बहुत सहायता मिली है। तटवर्ती उड़ीसा के डेलांग-पुरी क्षेत्र में भूजल की रीचार्ज स्थितियों के मूल्यांकन, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश एवं हिमालयी क्षेत्रों में गर्म जल के स्रोतों के निर्धारण एवं पश्चिमी राजस्थान में पौराणिक नदी सरस्वती के प्राचीन मार्ग के निर्धारण में भी नाभिकीय प्रौद्योगिकी मददगार साबित हुई है।” 

औद्योगिक उपयोग : गामा स्कैनिंग में भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र की विशेषज्ञता का उपयोग प्रमुख पेट्रो रसायन उद्योगों द्वारा प्रक्रिया उपकरणों की समस्या को दर करने, भमिगत पाइपलाइनों में रिसाव का पता लगाने तथा औद्योगिक प्रक्रिया नियंत्रणों इत्यादि में किया जा रहा है। रेडियो ट्रेसिंग तकनीकों का प्रयोग कर इंडियन आयल कॉरपोरेशन की हरियाणा स्थित पानीपत रिफाइनरी तथा तमिलनाडु पेट्रोप्रोडक्ट्स लि. में एक्सचेंजर्स में रिसावों का पता लगाया गया। गामा स्कैनिंग का सफल उपयोग देश के प्रसंस्करण उद्योगों में सर्वश्रेष्ठ प्रसंस्करण हेतु किया जा रहा है। इससे उत्पादन में होने वाली उस क्षति को कम किया जा सका है, जो इस प्रकार के बड़े उद्योगों में प्रतिदिन कई करोड़ रुपये की होती है। पाइपाइनों में रिसाव और बहाव दर का आकलन एवं तलछट अध्ययन के लिए रेडियो रसायनों का प्रयोग किया जा रहा है। 

भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र द्वारा विकसित गामा स्कैनिंग तकनीक का लाभ बड़े पेट्रो रसायन उद्योगों द्वारा प्रोसेस उपकरणों में आई समस्याओं को दूर करने, दबी हुई पाइप लाइनों में क्षरण का पता लगाने, औद्योगिक प्रक्रियाओं के नियंत्रण आदि में किया जाता है। भाभा परमाण अनुसंधान केंद्र द्वारा किए गए अन्य महत्त्वपूर्ण अध्ययनों में गैस अथॉरिटी ऑफ इण्डिया की 350 किमी लम्बी प्राकृतिक गैस पाइप लाइन से क्षरण बिंदुओं का पता लगाना और मुम्बई व बडोदरा आधारित कंपनियों में आसवन व विगैसीकरण स्तमों का गामा स्कैनिंग शामिल है। 

भाभा परमाण अनसंधान केन्द्र के रेडियो ट्रेसिंग अनुभव का लाभ अनेक प्रकार से औद्योगिक इकाइयों द्वारा उठाया जा रहा है। औद्योगिक प्रसंस्करण स्तम्भों में समस्याओं के ऑनलाइन समाधान के लिए गामा तकनीक जरूरी अभेद्य तकनीक है। इस तकनीक का इस्तेमाल कर भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र ने रिलायंस इण्डस्ट्रीज लिमिटेड, हजीरा, गुजरात के डिप्रोपेनाइजर स्तम्भ की जाँच की और परमाणु ऊर्जा विभाग के विभिन्न केंद्रो में शील्डिंग इंटीग्रिटी परीक्षण किए। ट्राम्बे में विकसित गामा स्कैनिंग प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल देश में अनेक प्रसंस्करण उद्योगों में समस्याओं के निवारण और प्रक्रियाओं को बेहतर बनाने में किया जाता है। इससे उत्पादन व्यय में कमी आयी है जो कि बडी इकाइयों के लिए करोडों रुपए प्रतिदिन हो सकती है। 

खगोलशास्त्र में उपयोग : नाभिकीय प्रौद्योगिकी का लाभ खगोलीय क्षेत्र में भी प्राप्त हो रहा है। रेडियो खगोलशास्त्र के क्षेत्र में ऊटकमंड (तमिलनाडु) के समीप नीलगिरि की पहाड़ियों में रेडियो टेलीस्कोप एरै दशकों से काम कर रहा है। दूर की आकशगंगाओं, और ग्रहों के बीच वस्तुओं के रेडियो स्रोतों के अध्ययन में इसका इस्तेमाल किया जाता है। भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र द्वारा माउंट आबू (राजस्थान) में अंतर्राष्ट्रीय स्तर के खगोलशास्त्रीय अनुसंधान सविधा केंद्र की स्थापना की गई है। यह टैक्टिक (टेरा-इलेक्ट्रॉन वोल्ट एटमास्फीरियक सेरंकोव टेलीस्कोप) से युक्त है। यह भारत का पहला गामा-रे टेलीस्कोप है। 

जल प्रबंधन में उपयोग : भाभा परमाणु अनुसंधान केन्द्र द्वारा विलवणीकरण (Desaltation) प्रौद्योगिकी विकसित की जा चुकी है, जो कि बहुचरणीय फ्लैश वाष्पीकरण, रिवर्स आस्मोसिस एवं कम तापमान वाष्पीकरण पर आधारित है। इन तकनीकों का इस्तेमाल कर ग्रामीण क्षेत्रों तथा जलयानों पर पीने के पानी के लिए विलवणीकरण संयंत्र लगाए गए हैं। परमाणु रिएक्टरों से निकल रही कम दाब वाली वाष्प तथा व्यर्थ जा रही ऊष्मा का इस्तेमाल करने के लिए तमिलनाडु में 6300 घनमीटर प्रतिदिन क्षमता वाला बहुचरणीय फ्लैश वाष्पीकरण तथा रिवर्स आस्सोसिस नाभिकीय विलवणीकरण का संयुक्त संयंत्र लगाया गया है। इसी क्रम में वर्ष 2008 में चेन्नई में 1800 घनमीटर प्रतिदिन तथा जोधपुर (राजस्थान) में 30 घनमीटर प्रतिदिन क्षमता वाले विलवणीकरण संयंत्र लगाए जा चुके हैं। 

नाभिकीय प्रौद्योगिकी से भूजल भंडारों का पता लगाने और उनकी पुनर्चालन स्थितियों का आकलन करने में बहुत सहायता मिली है। तटवर्ती उड़ीसा के डेलांग-पुरी क्षेत्र में भूजल की रीचार्ज स्थितियों के मूल्यांकन, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश एवं हिमालयी क्षेत्रों में गर्म जल के स्रोतों के निर्धारण एवं पश्चिमी राजस्थान में पौराणिक नदी सरस्वती के प्राचीन मार्ग के निर्धारण में भी नाभिकीय प्रौद्योगिकी मददगार साबित हुई है। इसके अलावा भूजल में फ्लोराइड मिले होने की जांच, केरल और राजस्थान के कुछ बांधों में रिसाव व क्षरण की समस्या के समाधान, पश्चिमी राजस्थान के जैसलमेर जिले में पराकालीन नहरों में भूजल की उत्पत्ति एवं हनुमानगढ़ (राजस्थान) में इंदिरा गांधी नहर परियोजना कमान क्षेत्र में लवणता का पता लगाने में भी नाभिकीय प्रौद्योगिकी से मदद मिली है। 

नाभिकीय प्रौद्योगिकी की बढ़ती उपादेयता के आलोक में सारतः यह कहा जा सकता है कि यह प्रौद्योगिकी एक वरदान की तरह मानव जीवन को संवार रही है तथा विभिन्न स्तरों पर हमें लाभान्वित कर रही है। आने वाले दिनों में मानव विकास एवं प्रगति में इसकी भूमिका और महत्वपूर्ण होगी, इसे ध्यान में रखकर इस प्रौद्योगिकी को और संवर्धित करने की आवश्यकता है। हम इस दिशा में आगे भी बढ़ रहे 

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