बेकारी की समस्या पर निबंध|Problem of Unemployment Essay in Hindi

बेकारी की समस्या पर निबंध-Problem of Unemployment Essay in Hindi

बेकारी की समस्या पर निबंध-Problem of Unemployment Essay in Hindi

जिन आँखों की अटारियों पर खुशियों की ज्योति छिटकती रहती थी, आखिर वे ही तेलहीन दीए की तरह बुझी-बूझी क्यों है? जिन मुखाकृतियों पर प्रसन्नता की पूर्णिमा छाई रहती थी, आखिर उन्हीं पर अमावस्या की काली रजनी क्यों घिर आई है? जिन कमनीय कपोलों से सेब की ललाई टपकती रहती थी, उन्हीं पर विवर्णता की स्याह रेखाएँ क्यों उभर आई हैं? जिन ओठों पर कहकहों के पटाखे अहरह छूटते रहते थे, केही तारहीन विपंची की तरह विषण्ण मौन क्यों हैं? सारे प्रश्नों का एक हा उत्तर मिलेगा-बेकारी। 

बेकारी की बीमारी ने कितने बेकारों के जीवनरस को चूसकर नारंगी के छिलके की तरह दरकिनार कर दिया है। उनके सपनों का शीशमहल भहरा चुका है, उनके अरमानों की होली जल चुकी है। अभी जवानी पूरी तरह खिल भी नहीं पाई थी कि बुढ़ापे ने आकर दबोच दिया। उनकी आँखों के सामने अंधकार का लहराता हुआ समंदर है। व्यंग्यबाणों से छिदा-भिदा शरीर चलता-फिरता शवमात्र रह गया है। उनका जीवन-सारंगी के अधिकांश तार टूट चुके हैं, उससे कोई भी सुरीला सरगम नहीं निकल रहा है। 

लंदन-विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में पीएच० डी० की उपाधि पाए व्यक्ति ने नौकरी न मिलने के कारण बाप के ताने से परेशान होकर जहर खा लिया, एक इंजीनियर ने कुतुबमीनार से कूदकर प्राण त्याग दिए, एक प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण स्नातक ने रेल की पटरियों के नीचे अपनी जान दे दी, एक बेरोजगार टेकनिशियन ने गले में फंदा लगाकर आत्महत्या कर ली। कितने बेकार नवयुवकों को कहते सुना कि अब जहाज से कूदकर गंगामैया की शरण में जान देने के सिवा कोई चारा नहीं रह गया है। दिन-रात परिवार और समाज के व्यंग्यबाणों से घायल बेकारी की जिंदगी नरक की यातना बन जाती है। 

सरकारी आंकड़ों के अनुसार ही कब तक 50 करोड़  से भी अधिक व्यक्ति बेकारी के शिकंजे में जकड़े रहेंगे? दूसरे स्रोत के आँकड़ों के अनुसार बेकारी की संख्या एक करोड़ से पाँच करोड़ तक तथा अन्य आँकड़ों के अनुसार ऐसे बेकारों की संख्या एक करोड़ से एक करोड़ सत्तर लाख तक जाती है। यदि यही स्थिति रही, तो इस देश में बेकारों की इतनी विशाल वाहिनी तैयार हो जाएगी कि उसका कोई ठिकाना नहीं। बेकारों में शिक्षित और अशिक्षित बेकार-दोनों तरह के लोग हैं। 

अशिक्षित बेकारों में ही गाँव के अधिकांश लोग ऐसे हैं, जिन्हें सालभर काम नहीं मिलता। रोपनी-कटनी के समय तो उन्हें काम मिलता है, किंतु वर्ष के अधिकांश में ये यों ही बैठे रहते हैं। जिस जमीन पर एक व्यक्ति को लगा रहना चाहिए, उसपर पाँच-पाँच, सात-सात व्यक्ति इसलिए फँसे हुए हैं कि उन्हें दूसरा रोजगार नहीं मिलता। इसे हम अप्रत्यक्ष बेकारी भी कह सकते हैं।

यदि इन सबको सम्मिलित करके ठीक से हिसाब जोड़ा जाए, तो अर्थशास्त्रियों के अनुसार इस 85 करोड़ की आबादीवाले देश में 17 करोड़, यानी पचमांश व्यक्ति बेरोजगार है। कामदिलाऊ दफ्तरों के खाते से पता चला है कि अभी इस देश में 503118 इंजीनियर,  7 करोड़ मैट्रिकुलेट तथा  30 करोड़ ग्रेजुएट सड़कों पर ‘हाय नौकरी, हाय नौकरी’ करते हुए धूल फाँक रहे हैं। 

बेकारी-निवारण के लिए इसके कारणों पर विचार करना बहुत जरूरी है। हमारे देश में जनसंख्या का भीषण विस्फोट हो रहा है। परिवार नियोजन के कार्य असफल सिद्ध हो रहे हैं। 1967 ई० में भारतवर्ष की जनसंख्या 50 करोड़ थी। 1981 ई० में 70 करोड़ से भी अधिक हो गई थी। 1991 ई० 85 करोड़ के लगभग है। प्रतिवर्ष हमारे देश में लगभग 1 करोड़ 20 लाख मेहमान आ रहे हैं। यदि जन्म की यही त्वरा रही, तो आने वाले समय  में हमारे देश की आबादी 5 अरब  के करीब हो जाएगी।

जनसंख्या-विस्तार के अनुपात में उत्पादन में वृद्धि संभव नहीं है और उत्पादन के क्षेत्रों के अभाव के कारण बेकारी का बढ़ना स्वाभाविक है। कुछ लोग जनसंख्या वृद्धि में बेकारी की समस्या को जोड़ना आवश्यक नहीं समझते। उनका सोचना तभी सार्थक होता, जब बिना पेट का बच्चा पैदा होता। एक नए कवि ने इसपर ठीक ही व्यंग्य किया है 

बेकारी की समस्या 

का हल होगा सच्चा।

घर-घर में यदि जन्म ले सके 

बिना पेट का बच्चा ।। 

हमारे देश में पहले मनुष्य की औसत आयु सत्ताईस साल थी, किंतु अब यह बढ़कर बावन साल हो गई हैं। आयु-प्रत्याशा (life expectancy) बढ़ने के कारण है-हैजा, चेचक, मलेरिया तथा प्लेग जैसी अनेक नरसंहारक बीमारियों का उन्मूलन। इसलिए आबादी का उमड़ता पारावार बेकारी की अभिवृद्धि का जबरदस्त कारण है। 

मशीनों के आविष्कार तथा कल-कारखानों के कारण उद्योग-धंधे चौपट हो गए। मशीन के एक हाथ ने सैकड़ों हाथों का काम छीन लिया तथा अनेक लोगों को बेरोजगार कर भूखों मरने के लिए गलियों में फेंक दिया। गाँधीजी ने इसीलिए मशीनीकरण का विरोध किया था।

उद्योग-धंधे में स्वचालन (automation) तथा श्रम बचानेवाली पद्धतियों (labour-saving devices) से बहुत-सारे लोग बेरोजगार हो गए हैं। एक कंप्यूटर मशीन पचासों क्लर्कों को, श्रमिकों को बेकार कर सकती है। इधर अंकेक्षण के लिए हर सरकारी कार्यालय में कंप्यूटर का उपयोग होनेवाला है। कितने बेचारों के मुँह की रोटियाँ छिन जाएँगी। 

बेकारी का एक प्रमुख कारण है आज की दूषित शिक्षा-पद्धति। यह मैकॉले की शिक्षा-पद्धति अँगरेजी-शासन की फाइलें चलनेवाले क्लर्कों का निर्माण कर पाती है। पंडित नेहरू जब कहते थे कि ‘हमें बी० ए० नहीं, वैज्ञानिक और टेकनिकल विशेषज्ञ चाहिए’, तब इसका एक ही अर्थ होता था कि हमारी शिक्षण-पद्धति काहिल, उपयोगी धंधों को चलाने के ज्ञान से रहित व्यक्तियों को तैयार करती है। अतः, जब तक शिक्षा व्यापाराभिमुखी (business-oriented) नहीं होगी, तब तक बेकारों की सेना बढ़ती ही जाएगी। 

बेकारी का कारण समग्र राष्ट्रीय साधनों का अनुपयोग भी है। रोजगार के सारे स्रोतों का उपयोग करना जरूरी है। बंजर, रेगिस्तान, परती तथा पहाड़ी भूमि को काम में न लाने के कारण भी बेकारी का समाधान नहीं हो पा रहा है। 

वर्तमान शिक्षा-पद्धति का एक और भयानक दोष है कि कोई भी पढ़ा-लिखा (डिग्रीधारी) व्यक्ति अब कोई हाथ-पैर हिलानेवाला स्वतंत्र रोजगार करना नहीं चाहता। उसे दो-तीन सौ रुपये महीने पर क्लर्क बनना अच्छा लगता है, लेकिन अपनी जमीन जोतना, छोटे-छोटे उद्योग-धंधे चलाना, व्यापार-वाणिज्य करना अच्छा नहीं लगता। इस किताबी शिक्षा ने श्रम के प्रति उपेक्षा और अवज्ञा का भाव भर दिया है। श्रमनियोजित कार्यों को प्रतिष्ठा-विनाशक समझा जा रहा है।

ब्राह्मण होकर चमड़े का रोजगार करे, क्षत्रिय होकर होटल चलाए-यह अपमानजनक माना जाता है। जाति-पाँति की रूढ़िवादी धारणा, पुराने धार्मिक अंधविश्वास तथा शिक्षा से. उपजी अहम्मन्यता ने श्रम का ऐसा अवमूल्यन कर दिया है कि बेकारों की पलटन तैयार होती ही जा रही है। अतः, सचमुच ऐसी शिक्षा का नाश होना चाहिए, जो केवल नौकरी के लिए बनी है। राष्ट्रकवि गुप्तजी ने ठीक ही कहा है 

शिक्षे! तुम्हारा नाश हो,

जो नौकरी हित ही बनी। 

बेकारी का यह विषवक्ष छतनार न होता जाए, इसके लिए इसके कारण का पर ही कुठाराघात करना होगा। भूतपूर्व राष्ट्रपति वराहगिरि बेंकटगिरि ने बकाय का समाधान सुझानेवाली पस्तक ‘जॉब फॉर आवर मिलियन्स’ (lob For our Millions) में बेकारी की बीमारी की रामबाण औषधि के रूप में एक आदर्श वाक्य दिया है-हर घर एक कुटीर-उद्योग तथा जमीन की हर एकड एक चरागाह (Every house a cottage industry, every acre of land-a pasture)। इससे अशिक्षित वर्ग कापू तथा आधा, दृश्य तथा अदृश्य बेकारी का बहुत बड़ा समाधान हो सकता है, साथ-ही-साथ यह शिक्षित लोगों के लिए बहुत बड़ा आश्रय-स्थल सिद्ध हो सकता है।

वस्त्र-निर्माण, मधुमक्खीपालन, रेशम के कीट का पालन, मछलीपालन, पशुपालन, काठ के सामान तथा खिलौने आदि के निर्माण की ओर प्रेरित होने पर युवकों के लिए कार्य के अपार झरोखे खुल जाते हैं। खेत के छोटे-छोटे टुकड़ों की चकबंदी-हदबंदी से बची जमीन, परती तथा पहाडी जमीन पर सहयोगी सघन कृषि के द्वारा छोटे-छोट किसानों को भी वर्षभर काम मिल सकता है। 

केवल बी० ए० और एम० ए० बनानेवाली शिक्षा को सीमित कर व्यवसाय पर आधृत औद्योगिक प्राविधिक शिक्षा देनी होगी। श्रम को प्रतिष्ठा की दृष्टि से देखना होगा। युवकों में अपने दाहिने हाथ की शक्ति पर विश्वास का यदि बल भरा जाए, तो फिर स्वतः नियुक्ति की लाखों संभावनाएँ नजर आ सकती हैं। आत्मनिर्भर, श्रम को भगवान समझनेवाले, नई प्रेरणाओं से ओतप्रोत युवकदल जब तक काम में नहीं भिड़ेंगे, तब तक बेकारी की यह सुरसा अपना विकराल मुँह फैलाती ही जाएगी।

बेकारों के लिए बीमे की बात कही जाती है, कुछ बेकारी-भत्ता दिए जाने की बात कही जाती है, किंतु ओस चाटने से कहीं प्यास बुझती है? भ्रमणशील एक्सचेंजों की बात कही जाती है कि बेकारों का पंजीयन करें, बेकारों की गुणात्मक और संख्यात्मक क्षमता का पता लगाएँ और उसके आधार पर योजनाएँ बनाकर बेकारी के दानव को मार भगाने की चेष्टा की जाए। यह आवश्यक है; किंतु इससे भी अधिक आवश्यक है आय और उसके साधनों का समीकरण और विकास, ताकि उनसे नए लोगों को काम और रोजगार मिल सके|

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