श्रीकृष्ण और जरासंध का युद्ध | Battle of Shri Krishna and Jarasandha

श्रीकृष्ण और जरासंध का युद्ध | Battle of Shri Krishna and Jarasandha

श्रीकृष्ण और जरासंध का युद्ध | Battle of Shri Krishna and Jarasandha

जरासंध बहुत शक्तिशाली राक्षस था। उसने अपनी दोनों बेटियों का विवाह मथुरा के राजा कंस से कर दिया था। जब भगवान कृष्ण ने दुष्ट कंस को खत्म कर दिया, तो उसकी दोनों पत्नियां अपने पिता के पास जाकर बोलीं, “पिता जी, कृष्ण ने नाजायज तरीके से हमारे पति का वध किया है। जब तक हम अपने पति की मौत का बदला नहीं ले लेंगी, तब तक हमें चैन नहीं मिलेगा।” ऐसे में जरासंध ने कसम खाई कि वह अपने दामाद की हत्या का बदला अवश्य लेगा। उसने सारे संसार से दुष्ट राक्षसों की सेना एकत्र की, ताकि श्रीकृष्ण और यादवों को सबक सिखाया जा सके। 

राक्षस जरासंध ने अपनी राक्षसों की सेना के साथ मथुरा पर सत्रह बार हमला किया। भगवान कृष्ण हर बार सभी राक्षसों को समाप्त कर देते, लेकिन जरासंध के प्राण छोड़ देते। 

एक दिन भगवान कृष्ण को समाचार मिला कि जरासंध ने यादव वंश को नष्ट करने की योजना बनाई है और उसने कई राजाओं को भी अपने साथ मिला लिया है। जरासंध के जीवन का केवल एक लक्ष्य था-मथुरा और यादव वंश का नाश। 

जब जरासंध के सहयोगी राजा और राक्षस मथुरा की ओर बढ़े, तो यादव घबरा गए। तभी यह निर्णय लिया गया कि राजधानी को मथुरा से द्वारका ले जाया जाए। 

श्रीकृष्ण ने अपने नाना उग्रसेन के समक्ष यह प्रस्ताव रखते हुए कहा कि उन्हें मथुरा को छोड़ देना चाहिए। उनके नाना बोले, “कृष्ण! यदि तुम मथुरा छोड़कर चले जाओगे, तो तुम्हें सदा ‘रणछोड़’ (युद्ध का मैदान छोड़कर जाने वाला) के नाम से जाना जाएगा।” यह सुनकर श्रीकृष्ण मुस्कराने लगे। 

भगवान कृष्ण को इस बात से कोई अंतर नहीं पड़ता था कि लोग उन्हें ‘रणछोड़’ का नाम देंगे। उन्होंने अपने नाना से कहा, “मेरे तो पहले से ही बहुत से नाम हैं। अगर एक अन्य नाम जुड़ गया, तो उससे कोई अंतर नहीं पड़ेगा।” 

परंतु बलराम जरासंध से लड़ना चाहते थे। भगवान कृष्ण ने उन्हें समझाया, “युद्ध को सारी मुश्किलों का हल नहीं माना जा सकता। मथुरा आने वाले विरोधी राजाओं का दल बहुत बड़ा है, जिससे इस युद्ध में जान और माल की भारी हानि होगी। मैं नहीं चाहता कि यहां असंख्य लोग मारे जाएं।” सभी लोगों ने बेमन से भगवान कृष्ण की बात मान ली। 

अब राजा उग्रसेन को इस बात की चिंता थी कि अल्प समय में इतनी बड़ी नगरी कैसे बनाई जा सकेगी। जब मथुरा वासी सो रहे थे, तो भगवान कृष्ण ने देवताओं के शिल्पी विश्वकर्मा को बुलवाया और कहा कि वे सागर के निकट द्वारका की सुंदर नगरी तैयार कर दें। 

श्रीकृष्ण और जरासंध का युद्ध

विश्वकर्मा ने भगवान कृष्ण को द्वारका नगरी की निर्माण योजना दिखाते हुए कहा, “प्रभु! इस नगरी का निर्माण तभी हो सकता है, जब समुद्र देव हमें वहां थोड़ी भूमि दे दें।” अतः भगवान कृष्ण ने समुद्र देव से भूमि देने की प्रार्थना की। उन्होंने प्रसन्न होकर भूमि प्रदान कर दी और देखते ही देखते स्वर्ण नगरी तैयार हो गई। भगवान कृष्ण ने बलराम से कहा, “मजबूत चारदीवारी से घिरी यह नगरी हमारे वंशों की रक्षा करेगी, जब तक हम सारे राक्षसों का अंत नहीं कर देते।” इसके बाद श्रीकृष्ण और बलराम सभी लोगों को अपने साथ द्वारका ले आए। जब मथुरा वासी सुबह सोकर उठे, तो उन्होंने स्वयं को समुद्र के बीच बनी सुंदर नगरी में पाया। 

कालयवन नामक राक्षस अपने पिता मुनि गर्ग के अपमान का बदला लेने के लिए यादव वंश का नाश करना चाहता था। उसने मथुरा को नष्ट करने हेतु जरासंध से हाथ मिला लिया। तत्पश्चात उन्होंने एक साथ पूर्व और पश्चिम दिशा से हमला करने की योजना बना ली। लेकिन जब वे लोग मथुरा पहुंचे, तो खाली नगरी ने उनका स्वागत किया। परंतु जरासंध ने क्रोधवश खाली मथुरा को ही तहस-नहस कर दिया और श्रीकृष्ण को ‘रणछोड़’ कहकर पुकारा। 

इधर भगवान कृष्ण अपने विष्णु अवतार में कालयवन राक्षस से भेंट करने के लिए चल पड़े। उसी समय कालयवन भगवान कृष्ण का पीछा करने लगा, जो सुदूर स्थित गुफा की ओर बढ़े जा रहे थे। 

कालयवन ने अनेक तपस्या और यज्ञों के बाद भगवान शिव से यह वरदान लिया था कि किसी यादव के हाथों उसका वध नहीं होगा। भगवान कृष्ण जानते थे कि उस वरदान के कारण वे कालयवन का वध नहीं कर सकेंगे, इसलिए उन्होंने छल से काम लेने का विचार किया। 

जब राक्षस कालयवन भगवान कृष्ण का पीछा कर रहा था, तो उन्होंने यह दर्शाया कि वे उससे डरकर, मैदान छोड़ भाग रहे हैं। परंतु कालयवन किसी साये की तरह उनका पीछा करता रहा। 

श्रीकृष्ण और जरासंध का युद्ध

कालयवन राक्षस को यह देखकर बहुत आनंद आ रहा था कि जिस भगवान कृष्ण के नाम से सभी बलशाली और दुष्ट राक्षस थर-थर कांपते थे, वही उसके भय से भागे जा रहे थे। वह जोर से चिल्लाया, “अरे कायर! भागता कहां है? रुक तो सही। अगर तुझमें साहस है, तो यहीं ठहर और मेरे साथ दो-दो हाथ कर!” 

परंतु राक्षस कालयवन को यह नहीं पता था कि भगवान कृष्ण अपनी योजना के अनुसार काम कर रहे थे। वे राक्षस कालयवन को उस गुफा की ओर ले जाना चाहते थे, जहां राजा मुचुकुंद रूपी मौत स्वयं ही उसकी प्रतीक्षा कर रही थी। 

श्रीकृष्ण पीछे पलटकर बोले, “क्यों नहीं कालयवन, दो-दो हाथ भी कर लेंगे। लेकिन यह तभी संभव होगा, जब तुम मुझ तक पहुंच जाओ। पहले मुझे पकड़कर तो दिखाओ, युद्ध की बात बाद में होगी।” 

श्रीकृष्ण और जरासंध का युद्ध

यह सुनकर राक्षस कालयवन का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया और वह अंधाधुंध भगवान कृष्ण के पीछे दौड़ने लगा। वह सपने में भी नहीं सोच सकता था कि भगवान कृष्ण उसे कहां ले जा रहे थे। 

भगवान कृष्ण भागते-भागते कालयवन राक्षस को एक ऐसी गुफा में ले गए, जहां मुचुकुंद नामक एक राजा आराम से सो रहे थे। राजा मुचुकुंद के निकट जाकर श्रीकृष्ण ने उन्हें अपना पीला-रेशमी वस्त्र ओढ़ा दिया। जब 

कालयवन गुफा में पहुंचा, तो उसे लगा कि भगवान कृष्ण वहां सो रहे थे। उसने सोचा, ‘यह ग्वाला यहां छिपा बैठा है।’ 

कालयवन ने सोते हुए राजा मुचुकुंद को श्रीकृष्ण समझकर जोर से ठोकर मारी। राजा मुचुकुंद ने कृतयुग में धरती पर शासन किया था और राक्षसों का नाश करने में देवताओं की सहायता की थी। उस दौरान भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय ने देवताओं के सेनापति का पद संभाला था। राजा मुचुकुंद कई वर्षों से नहीं सोए थे, क्योंकि उन्हें अक्सर देवताओं और राक्षसों के युद्ध में देवताओं की सहायता करने के लिए जाना पड़ता था। 

श्रीकृष्ण और जरासंध का युद्ध

इस तरह धरती पर हजारों साल बीत गए। कोई भी ऐसा प्राणी नहीं आया, जो राजा मुचुकुंद की मदद कर सके। वे मोक्ष पाना चाहते थे। वे चाहते थे कि देवताओं की सहायता करने के एवज में उन्हें मोक्ष प्रदान किया जाए। देवताओं ने कहा, “हम आपकी सहायता करना चाहते हैं। लेकिन हम ऐसा नहीं कर सकते, क्योंकि केवल भगवान विष्णु ही आपको मोक्ष दे सकते हैं।” यह सुनकर राजा मुचुकुंद ने देवताओं से कहा कि उन्हें गहरी नींद में जाने का वरदान दिया जाए और जो भी व्यक्ति उनकी नींद में बाधा डाले, उनकी दृष्टि पड़ते ही उसके प्राणों का उसी समय अंत हो जाए। 

देवताओं ने राजा मुचुकुंद को वरदान देने के बाद वह स्थान दिखा दिया, जहां वे गहरी नींद में सो सकते थे। जब राक्षस कालयवन ने राजा मुचुकुंद को ठोकर मारी, तो उन्होंने गहरी निद्रा को त्याग कर अत्यंत क्रोधवश आंखें खोलीं। उनकी आंखों से निकली तेज लपटों के कारण राक्षस कालयवन तत्काल वहीं जलकर राख हो गया। 

कृष्ण और जरासंध का युद्ध

राजा मुचुकुंद जाने कितने वर्षों से सोए हुए थे। देवताओं द्वारा मिले वरदान के कारण उनकी आंखों से बरसती ज्वाला के आगे वह दुष्ट राक्षस पल भर भी नहीं टिक सका। वह वहीं जलकर राख का ढेर बन गया। 

राजा मुचुकुंद समझ गए कि देवताओं ने उन्हें एक दुष्ट राक्षस को मारने का साधन बनाया था। उन्होंने आंखें बंद करके भगवान विष्णु का स्मरण किया और उनसे अपने समक्ष प्रकट होने का निवेदन किया। 

राजा मुचुकुंद के निवेदन पर भगवान कृष्ण अपने विष्णु रूप में उनके समक्ष प्रकट हुए और उनसे पूछा कि वे क्या चाहते हैं। 

राजा मुचुकुंद ने कहा, “प्रभु! मैं कितने जन्मों से आपकी प्रतीक्षा में था। कृपया मुझे मोक्ष प्रदान करें, ताकि मैं वैकुंठ धाम जा सकूँ।” 

भगवान कृष्ण ने राजा मुचुकुंद की इच्छा पूरी कर दी। 

राजा मुचुकुंद को उनके भक्तिभाव के लिए मोक्ष प्रदान किया गया। इस प्रकार भगवान कृष्ण द्वारा दुष्ट राक्षस कालयवन का वध करने की योजना भी सफल हुई। इस घटना से यह स्पष्ट होता है कि भगवान कृष्ण किसी भी राक्षस का वध करने के लिए एक सुनिश्चित योजना बनाकर उसके अनुसार कार्य करते थे। 

Krishna story in hindi-श्रीकृष्ण गुरुकुल में 

कंस की हत्या के बाद श्रीकृष्ण ने अपने नाना उग्रसेन जी को पुनः मथुरा का राजा बना दिया। इसके बाद भगवान कृष्ण तथा बलराम का यज्ञोपवीत संस्कार किया गया। पहले सभी बालकों को विद्या ग्रहण करने के लिए गुरुकुल में जाकर रहना पड़ता था। भगवान कृष्ण और बलराम को भी मुनि सांदीपनि के आश्रम में भेजा गया, जो काशी में निवास करते थे। 

Krishna story in hindi-श्रीकृष्ण गुरुकुल में 

भगवान कृष्ण और बलराम ने बहुत से दुष्टों का वध किया था, इस कारण वे पूरी दुनिया में प्रसिद्ध थे। लेकिन अब वे बहुत विनीत भाव से अपने गुरु की सेवा करते और उनके सभी आदेशों का पालन करते। दोनों भाई आश्रम में रहकर भोजन पकाने में गुरुमाता की सहायता भी करते थे। मुनि सांदीपनि अपने इन शिष्यों से बहुत प्रसन्न थे। 

भगवान कृष्ण और बलराम ने मुनि सांदीपनि से सभी वेदों, उपनिषदों तथा अन्य ग्रंथों का ज्ञान प्राप्त किया। इसके अतिरिक्त उन्हें कल्प, ज्योतिष तथा व्याकरण जैसे विषयों का भी ज्ञान दिया गया। वे धनुषविद्या, राजनीति तथा चौंसठ कलाओं में भी माहिर हो गए। 

मुनि सांदीपनि के आश्रम में एक अत्यंत निर्धन ब्राह्मण का पुत्र सुदामा भी पढ़ता था। समय बीतने के साथ-साथ भगवान कृष्ण और सुदामा में बहुत गहरी मित्रता हो गई। 

एक दिन मुनि सांदीपनि की पत्नी अर्थात गुरुमाता ने भगवान कृष्ण और सुदामा से कहा कि वे जंगल से थोड़ी लकड़ियां ले आएं, ताकि चूल्हा जलाकर भोजन पकाया जा सके। जब वे दोनों लकड़ियां लेने के लिए जंगल  में पहुंचे, तभी अचानक काले बादल छा गए और भयंकर वर्षा होने लगी।

Krishna story in hindi-श्रीकृष्ण गुरुकुल में 

भगवान कृष्ण और सुदामा वर्षा से बचने के लिए एक विशाल पेड़ की शाखाओं पर जा बैठे। श्रीकृष्ण सुदामा से नीचे वाली शाखा पर बैठे थे। उन्होंने कहा, “सुदामा! मुझे बहुत भूख लगी है।” परंतु सुदामा ने उनकी बात का कोई उत्तर नहीं दिया। उस समय सुदामा वह चिड़वा खाने में व्यस्त थे, जो गुरुमाता ने दोनों के लिए बांधकर दिए थे। श्रीकृष्ण सुदामा के पास उनकी शाखा पर पहुंचे और मजाक में बोले, “सुदामा! तुम्हें इस चिड़वे का उधार चुकाना होगा। तुम्हें इसे बाद में मुझे देना होगा।” थोड़ी देर बाद वर्षा बंद हो गई और वे दोनों जंगल से लकड़ियां लेकर आश्रम में वापस आ गए। कुछ समय बाद भगवान कृष्ण और सुदामा इस घटना को भूल गए। 

उन दिनों शिक्षा पूरी होने पर गुरु को गुरुदक्षिणा देने का प्रचलन था। जब शिष्यों की पढ़ाई पूरी हो जाती थी, तो वे अपने गुरु को गुरुदक्षिणा देते थे। भगवान कृष्ण तथा बलराम भी अपनी शिक्षा पूरी होने के बाद मुनि सांदीपनि के पास गए और उन्हें प्रणाम करने के बाद पूछा, “गुरुदेव! अब हम लोग अपने घर वापस जाने वाले हैं। कृपया हमें बताएं कि गुरुदक्षिणा के रूप में हम आपको क्या दें?” मुनि सांदीपनि ने उत्तर दिया, “मेरे बच्चो! यह मेरा सौभाग्य था कि मुझे तुम जैसे आदर्श शिष्यों को शिक्षा प्रदान करने का अवसर मिला। तुम लोगों के साथ रहने से मेरी सारी भौतिक इच्छाओं का अंत हो गया है। लेकिन मैं आज भी अपने पुत्र को नहीं भुला सका, जिसकी मृत्यु हुए कई वर्ष बीत गए हैं। वह प्रभास सागर के किनारे खेल रहा था कि न जाने कैसे पानी में डूब गया। मैं चाहता हूं कि तुम लोग उसे जीवित करके मेरे पास वापस ले आओ।” 

भगवान कृष्ण और बलराम मुनि सांदीपनि के पुत्र को वापस लाने के लिए चल दिए। वे प्रभास सागर के किनारे पहुंचे और सागर देव को आदेश दिया कि वे मुनि सांदीपनि का पुत्र वापस कर दें। 

Krishna story in hindi-श्रीकृष्ण गुरुकुल में 

सागर देव ने उत्तर दिया, “मुनि का पुत्र मेरे पास नहीं है। उसे तो राक्षस शंख ले गया था। उसके पास ‘पांचजन्य’ नामक एक पवित्र शंख है और वह उसके भीतर रहता है।” तत्पश्चात भगवान कृष्ण समुद्र के भीतर गए और शंखासुर को मार डाला, लेकिन उन्हें मुनि सांदीपनि का पुत्र वहां भी नहीं मिला। वे उसका शंख लेकर चल पड़े। 

इसके बाद भगवान कृष्ण और बलराम, यमराज की नगरी यमपुर पहुंचे। जब श्रीकृष्ण ने ‘पांचजन्य’ शंख बजाया, तो यमराज ने बाहर आकर उनका स्वागत किया। 

उन्होंने यमराज को आदेश दिया कि वे मुनि सांदीपनि का पुत्र वापस कर दें। यमराज ने तत्काल मुनि सांदीपनि का पुत्र उनके हवाले कर दिया। जब उस युवक में जान वापस आ गई, तो भगवान कृष्ण और बलराम उसे लेकर मुनि सांदीपनि के आश्रम में गए। इस प्रकार उन्होंने अपने गुरु को गुरुदक्षिणा के रूप में उनका पुत्र सौंप दिया। 

Krishna story in hindi-श्रीकृष्ण गुरुकुल में 

उसी दिन से भगवान कृष्ण ‘पांचजन्य’ नामक उस शंख को अपने पास रखने लगे। महाभारत का युद्ध शुरू करने के लिए जब अर्जुन ने ‘देवदत्त’ नामक अपना शंख बजाया था, तो भगवान कृष्ण ने भी अपना ‘पांचजन्य’ शंख बजाकर युद्धारंभ होने की घोषणा की थी। 

मुनि सांदीपनि अपने पुत्र को जीवित पाकर बहुत प्रसन्न हुए। भगवान कृष्ण और बलराम ने ऐसा काम कर दिखाया, जो वास्तव में किसी दूसरे के बस में नहीं था। गुरुमाता ने भी अपने प्यारे शिष्यों को आशीर्वाद दिया। इस प्रकार भगवान कृष्ण और बलराम ने गुरुदक्षिणा के रूप में मुनि सांदीपनि का पुत्र उन्हें वापस लौटाकर अपना कर्तव्य पूरा किया। इसके बाद भगवान कृष्ण और बलराम अपने गुरु से विदा लेकर मथुरा वापस लौट आए। अभी उन्हें बहुत से काम करने थे। अभी तो अनेक दुष्टों और राक्षसों को मौत के घाट उतारना था, जो वहां के लोगों को अक्सर परेशान करते रहते थे। 

 

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