प्लासी का युद्ध |Battle of Plassey history in hindi

Battle of Plasse

प्लासी का युद्ध (Battle of Plassey) (1757 ई०) 

युद्धों के इतिहास में भारत में हुए प्लासी युद्ध (1757 ई०) का काफी महत्व है। इस युद्ध में इस बात का निर्णय हो गया कि अंग्रेज भारत में अपनी मनमर्जी का हुक्मरां रख सकते हैं। ऐसे व्यक्ति को सत्ता पर चाहते हैं जो उनके व्यापारिक धन कमाने में पूरा-पूरा योगदान कर सकता है। 

पलासी युद्ध बंगाल के प्लासी नामक स्थान पर बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला और अंग्रेज सेना के बीच हुआ। इस युद्ध में भारत का एक वह चेहरा भी सामने आया जिसे ‘मीर जाफर’ के नाम से जाना जाता है, और जिसे भारतीय इतिहास में जयचन्द्र के समकक्ष खड़ा किया गया। ये दोनों नाम गद्दारों के रूप में भारतीय मानस में समाए हुए हैं। जब भी किसी देशद्रोही को उभाना देनी होती है तो उसे जयचन्द्र और मीर जफर कहकर लिखा और वर्णित किया जाता है। 

जयचन्द्र का नाम राष्ट्रद्रोही के रूप में तब सामने आया जबकि उसने मुहम्मद गौरी के पास जाकर उसे दिल्ली अधिपति पृथ्वीराज चौहान के विरुद्ध उकसाना और युद्ध के समय उसका साथ देने का वचन दिया। जयचन्द्र का आमंत्रण पाकर ही मुहम्मद गौरी का साहस बढ़ा कि वह पृथ्वीराज चौहान पर आक्रमण कर सके। पृथ्वीराज की हार के साथ ही भारत से हिन्दू राज्य का सूर्य अस्ताचल में चला गया था तथा मुस्लिम राज्य का सूर्य उग आया था। मुहम्मद गौरी द्वारा पृथ्वीराज चौहान को हराने के बाद ही भारत में मुस्लिम सल्तनत स्थापित हो सकी। मुस्लिम सल्तनत का स्थान 1526 में बाबर की विजय के साथ मुग़ल साम्राज्य ने घेरा। 

मीर जफर ने मुग़ल साम्राज्य में छेदकर, अंग्रेजों को उत्साहित और गद्दारी कर, भारत में ब्रिटिश साम्राज्य को स्थापित होने में सहायता की। 

इन ऐतिहासिक विवरणों को यहां इसलिए प्रस्तुत किया गया, ताकि प्यासी युद्ध का महत्व सामने आ सके।

प्लासी  युद्ध की भूमिका

अंग्रेजों ने बंगाल में सर्वप्रथम अपनी कोठी 1651 ई० में हुगली में तत्कालीन बंगाल के सूबेदार, शाहजहां के द्वितीय पुत्र शाहशुजा की अनुमति से बनायी थी। शोरे, रेशम और चीनी का व्यापार आरम्भ किया था। ये बंगाल के लिए प्रमुख निर्यात की वस्तुएं थीं। इसका आर्थिक लाभ देखकर ही शाहशुजा ने अंग्रेजों को भारत में व्यापार की अनुमति दी थी, पर क्या पता था कि आने वाले सौ साल के बाद वे भारत में हुकूमत करने का स्वप्न देखने लगेंगे तथा अगले दस साल बाद वे अपना साम्राज्य भी स्थापित कर लेंगे। 

अंग्रेजों ने दूसरी फैक्ट्ररी हुगली में 1651 ई० में स्थापित की। सन् 1658 ई० से 1663 ई० तक औरंगजेब द्वारा अंग्रेजों पर कुछ सख्त प्रतिबन्ध लगाने से उन्हें व्यापार में कुछ कठिनाइयां आयीं थीं। वे अपने व्यापार को विस्तार न दे सके थे। यह स्थिति सन 1717 ई० तक चलती रही। 

औरंगजेब के निधन के बाद बंगाल के स्वतन्त्र शासक बनते गए। वे आपसी संघर्ष में जूझते गए। अंग्रेज इस बात को जान गए थे कि औरंगजेब के उत्तराधिकारी कमजोर और निकम्मे हैं। 

अंग्रेजों को जिस अवसर की प्रतीक्षा थी वह उन्हें 1756 ई० में आकर मिल गया-जबकि बंगाल की गद्दी पर नवाब अलीवर्दी के बाद सिराजुद्दौला बंगाल के नवाब के रूप में गद्दी पर बैठा। इसके गद्दी पर बैठने में कुछ सम्बन्धियों का विरोध था। 

सिराजुद्दौला ने अपने विरोधियों पर ध्यान न देकर अंग्रेजों की ओर ध्यान दिया। अलीवर्दी के जीवनकाल में ही सिराजुद्दौला को सलाहकारों ने चेतावनी दी थी कि वह अंग्रेजों की ओर से सावधान रहे। सिराजुद्दौला को आशंका थी कि किसी दिन अंग्रेज अपनी शक्ति इतनी बढ़ा लेगें कि बंगाल का राज्य हड़प लेंगे। नवाब जब सत्तासीन हुआ तो अंग्रेजों ने उसे उपहार देने न आकर अपनी ताकत का इजहार कर दिया। 

इतना ही नहीं उन्होंने उन लोगों के गिरोह को सम्मान देना आरम्भ कर दिया जो उसके विरोधी थे। उन्होंने नवाब को समुन्द्री व्यापार की चुंगी देना भी बन्द कर दिया। उन्होंने अपनी बस्तियों की किलेबन्दी भी आरम्भ कर दी। नवाब ने उन्हें चेतावनी दी कि वे किलेबन्दी करने का कार्य रोक दें। पर अंग्रेजों ने इस चेतावनी पर कोई ध्यान न दिया।

आदेश की इस उपेक्षा के विरुद्ध, नवाब ने 24 मई, 1756 ई० को सेना को आदेश दिया कि वे अंग्रेजों की कासिम बाजार स्थित कोठी पर आक्रमण कर उस पर अपना कब्जा कर लें। नवाब की सेना के मुकाबले अंग्रेजों ने युद्धक कार्रवाई की, पर वे बुरी तरह परास्त हुए। 

हार होने पर बचे हुए अंग्रेज अपनी पत्नी और बच्चों के साथ समुन्द्री जहाजों में बैठकर भाग निकले। 

कहा जाता है कि कोठी में बचे हुए, बन्दी बनाए गए 146 अंग्रेज कैदियों को दुर्ग की एक अत्यन्त अन्धकारमय छोटी कोठरी में नवाब ने कैद कर दिया। उस बन्दी कोठरी में इतनी कम जगह थी कि जब प्रातः काल कोठरी खोली गयी तब उसमें केवल 23 व्यक्ति ही जीवित पाए गए। 123 व्यक्तियों की दम घुटने से मृत्यु हो गयी थी। 

कलकत्ते पर अपना अधिकार जमा लेने के बाद नवाब ने माणिकचन्द्र नामक व्यक्ति को वहां को गवर्नर बना दिया तथा स्वयं मुर्शिदाबाद लौट आया। 

बंगाल में हार के बाद अंग्रेजों ने लार्ड क्लाइव की अध्यक्षता में एक स्थल सेना तथा वाट्सन की अध्यक्षता में एक जल सेना बंगाल के लिए भेज दी। बंगाल के तट पर आ लगने वाली इस ब्रिटिश सेना ने हुगली पर जमकर लूट-पाट कर अपना दबदबा बिठाना आरम्भ किया। नवाब ने फिर आक्रमण किया, परन्तु इस बार शक्ति सन्तुलन होने के कारण दोनों ओर से सन्धि हो गयी। यह सन्धि ‘अलीनगर सन्धि’ के नाम से जानी जाती है। 

मगर यह सन्धि ज्यादा  दिन न चल सकी। अंग्रेजों ने अपनी हार का बदला लेने के लिए कूटनीति रचकर मीर जाफर नामक नवाब के विरोधी और सम्बन्धी को मिलाकर सिराजुद्दौला के सैनिक भेद को जाना। मीर जाफर को सिराजुद्दौला के स्थान पर नवाब की गद्दी पर बिठाने का समझौता किया। 

अपना षड्यन्त्र पूरा करके, तथा पूरी तैयारी करके क्लाइव ने अलीनगर सन्धि तोड़ने का बहाना ढूढ़ते हुए, सेना सहित राजधानी की ओर कूच कर दिया। 

नवाब को भी इस बात की सूचना मिल चुकी थी कि क्लाइव अपनी सेना के साथ युद्ध के लिए बढ़ा चला आ रहा था। नवाब आनन-फानन सेना को साथ ले, आगे बढ़ आया।

Battle of Plasse

23 जून, 1751 ई० को प्लासी के मैदान में नवाब की सेना और अंग्रेज सेना के बीच घमासान युद्ध हुआ। उस युद्ध के अवसर पर जो भीतरघात हुआ था, उससे सिराजुद्दौला बेखबर था। दरअसल अंग्रेजों से गुपचुप सन्धि करके मीर जाफर ने जाकर सिराजुद्दौला की विश्वसनीयता प्राप्त कर ली थी तथा उस युद्ध में वह सेनापति के रूप में नवाब की सेना का नेतृत्व करते हुए आया था। 

नवाब की सेना भिड़ चुकी थी पर सेनापति मीर जाफर चुपचाप खड़ा था। उसे ऐसा करता देख नवाब की सेना का भी उत्साह भंग हो गया। वह मैदान से पीछे हट गयी तथा उसने हथियार डाल दिए।

अपने सेनापति के विश्वासघात को देखकर और सारी स्थितियां जानकर सिराजुद्दौला युद्ध भूमि से अपनी जान बचाकर भागा परन्तु मीर जाफर का पुत्र मीरज ने एक टुकड़ी के साथ उसका पीछा करके, उसे कुछ दूर जाकर ही घेर लिया और उसका वध कर दिया गया। 

इस तरह अंग्रेजों की कटनीति और मीर जाफर के विश्वासघात और गहारी से अलीवर्दी खां के वंश का अन्त हो गया। 

अंग्रेजों ने नवाब सेना द्वारा हथियार डाल दिए जाते ही मैदाने जंग में ही मीर जाफर को बंगाल का नवाब घोषित कर दिया। 

परन्तु, अगले दिन से यह बात सामने आ गयी कि मीर जाफर नाम का ही बंगाल का नवाब है-सम्पूर्ण शक्तियां तो लार्ड क्लाइव के हाथ में हैं। वह तो अंग्रेजों के हाथों की कठपुतली है। कठपुतली इस रूप में साबित हुआ क्योंकि लार्ड क्लाइव की मांग पर मीर जाफर ने 24 परगना की जागीर अंग्रेजों को दे दी। उस जागीर से वार्षिक आय 10 लाख रुपए की प्रत्येक वर्ष बंगाल के नवाब को हुआ करती थी। 

ब्रिटिश कम्पनी को सम्पूर्ण बंगाल में स्वतन्त्र रूप से व्यापार करने की आज्ञा भी मिल गयी। 

अब अंग्रेज सैनिक बंगाल के चप्पे-चप्पे में बेरोक-टोक न सिर्फ जा सकते थे, बल्कि वे लूट-खसोट भी करने लगे थे। 

इस तरह कठपुतली शासक, लार्ड क्लाइव के इशारे पर मनचाहे रूप से नचाता रहा और अंग्रेज बंगाल को अपनी गुलामी में लेने का कार्य करते चले जा रहे थे।

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