मुग़ल और पुर्तगीज युद्ध | Battle of Mughal & Portuguese in hindi

मुग़ल और पुर्तगीज युद्ध

 मुग़ल और पुर्तगीज युद्ध | (Mughal & Portuguese War) (सन् 1631-32) 

भारत में मुग़ल साम्राज्य की युद्ध घटना में मुग़ल-पुर्तगीज युद्ध सबसे रोमांचक घटना है। यह युद्ध अकबर के पौत्र शाहजहां के शासन काल में, पुर्तगालियों से मुग़ल फौज ने लड़ा। इस युद्ध ने इस बात की ओर संकेत किया था कि यदि यूरोपीय देशों के लोगों को भारत में जरा भी छूट दी गयी तो वे इस छूट का फायदा अपनी हुकूमत कायम करने के लिए उठा सकते हैं। यदि आने वाले समय के लिए इस युद्ध को देखते हुए सतर्कता बरती जाती तो ईस्ट इण्डिया कम्पनी को भारत में इस तरह पैर जमाने का अवसर न मिलता कि वे देश के पूरे मालिक ही बन जाते, वे देश को गुलाम बनाकर मनमाना अत्याचार न कर पाते, उन्हें देश से निकाल बाहर करने में हजारों देश भक्तों को अपनी जान की कुर्बानियां न देनी पड़तीं। 

मुग़ल और पुर्तगीज युद्ध की शुरूआत इस तरह में हुई कि सोलहवीं शताब्दी के आरम्भ में, जहांगीर के शासनकाल में, पुर्तगालियों ने बंगाल में हुगली नदी के किनारे ठहरने की अनुमति प्राप्त की। ठहरने की इस अनुमति के बल पुर्तगालियों ने अपनी बस्ती बना ली थी। 

शाहजहां से पूर्व शासनकाल में पुर्तगालियों के प्रति शिष्टता की आभिव्यक्ति के स्वरूप, व्यापार और वाणिज्य चलाने के लिए कई सुविधाएं दी गयीं। समय बीतने के साथ पुर्तगालियों ने इन सुविधाओं को अपने अधिकार के रूप में देखना शुरू कर दिया और स्थानीय निवासियों के साथ अपने बर्ताव में उन्होंने आक्रामक रुख अख्तियार कर लिया। वे लोगों को ईसाई धर्म में धर्मान्तरण करने लगे, समुन्द्री डाके, अपहरण और दारू व्यापार का कार्य आरम्भ कर दिया।

पुर्तगालियों के इस घृणित गतिविधियों की जानकारी जहांगीर के शासनकाल में भी उसे बंगाल के सूबेदार ने दी थी, किन्तु सम्राट ने अपली विशुद्ध उदारता के नीति के चलते उनके विरुद्ध कोई पग न उठाया। 

शाहजहां के सत्ता में आने के साथ ही बंगाल के नए सूबेदार ने सूचना दी थी कि पुर्तगालियों ने हुगली पर अपनी बस्ती की किलेबन्दी कर रखी है। वे भारतीय व्यापारियों की नौकाओं से ‘शहदरी’ वसूल करते हैं। वे स्थानीय मुग़ल अधिकारियों की अवज्ञा करते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि बेगम मुमताज महल (शाहजहां की पत्नी) की दो दासियों का उन्होंने शाही नौका से अपहरण कर लिया था। 

उपरोक्त बातें जानकर शाहजहां अत्यन्त क्रोधित हुआ। उसने इस बात पर भी गौर किया कि उसके राज्यारोहण के अवसर पर पुर्तगालियों ने उसके प्रति आकर श्रद्धा अर्पित नहीं की थी, ना ही नियमानुसार उसे श्रद्धा उपहार भेंट किए थे। इन विचारों के साथ उसने जहांगीर के समय की शिकायतों पर गौर किया और पाया कि पुर्तगालियों ने खुद को स्वतन्त्र अस्तित्ववान मान लिया हैं|

उपरोक्त सारी बातों पर विचार करने के साथ ही शाहजहां ने बंगाल के सूबेदार कासिम खान को तुरन्त जवाबी हुक्म भिजवाया कि सारी सेना लेकर स्थल और जलमार्ग से पुर्तगाली बस्ती पर चढ़ाई कर दी जाए। 

शाही आदेश पाते ही कासिम खान ने पुर्तगाली बसती पर चढ़ाई कर दी।

 उस समय तक पुर्तगाली अपनी स्थिति इतनी सुदृढ़ कर चुके थे कि मुग़ल सेना के आक्रमण को उन्होंने न केवल असफल कर दिया बल्कि जवाबी आक्रमण में तोपखाने का प्रयोग कर भारी संख्या में मुग़ल सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया। 

पुर्तगालियों के जवाबी आक्रमण से कासिम खान हत्प्रभ हो उठा। उसने शाही सेना तलब की-भारी संख्या में शाही सेना के पहुंचने और पूरी व्यूह रचना करने के बाद कासिम खान ने पूरी शक्ति से पुर्तगाली बस्ती को घेर लिया। 

सन् 1631 ई० के अन्तिम महीने में की गयी घेराबन्दी और युद्ध, तीन महीनों तक जारी रहा। दोनों ओर से काफी लोग मारे गए। 

मुग़ल और पुर्तगीज युद्ध

अन्ततः तीन माह बाद सन् 1632 के शुरूआती माह में मुग़ल सेना ने शाही तोपखाने का इस्तेमाल कर अपनी स्थिति इस रूप में मजबूत की कि वे पुर्तगाली बस्ती तक पहुंच सकें। एक बार पुर्तगालियों की बस्ती में सेना के घुसते ही सूबेदार सेनापति कासिम खान ने अपनी सेना को हुक्म दिया कि पुर्तगाली निवासी पर हमला किया जाए। यह हुक्म इसलिए दिया था क्योंकि निवास स्थानों से गोलीबारी हो रही थी और मुग़ल सैनिक मारे जा रहे थे। निवास स्थानों पर मुग़ल सेना का हमला होते ही पुर्तगाली भी आग उगलने वाले हथियारों के साथ प्रतिशोध करने सामने आ गए। 

जब तक पुर्तगालियों की प्रतिरोध शक्ति बची रही वे प्रचंडता से लड़ते रहे। सैकड़ों पुर्तगाली लड़ाके लड़ते हुए मारे गए। उनकी लड़ने की क्षमता कम पड़ने लगी तो वे खुले समुन्द्र में नौकाओं से भाग खड़े हुए। 

मुगलों ने दूर-दूर तक पीछा करके भागते हुए पुर्तगालियों में से काफी लोगों को ढेर कर दिया। इस प्रकार पुर्तगाली बस्ती पर भी मुग़ल सैनिकों का पूर्ण अधिकार हो गया था तथा हुगली नदी का क्षेत्र पुर्तगाली समुन्द्री दस्युओं से मुक्त हो गया। 

इस युद्ध में एक हजार से अधिक मुग़ल सैनिक मारे गए, जबकि दूसरी ओर पुर्तगाली स्त्री, पुरुष और बच्चों के मारे जाने की संख्या 10,000 से ऊपर जा पहुंची थी। 

बताया जाता है कि 4,400 लोग गिरफ्तार किए गए। इसमें स्त्री और पुरुष दास युवतियां थीं। इन्हें पुर्तगालियों ने बलात् ईसाई धर्म में धर्मान्तरित किया गया था। वे पुर्तगालियों के पास बन्दी अवस्था में रह रहे थे और उन्हें दास रूप में बेचा जाने वाला था-उन्हें मुग़ल सैनिकों ने आजाद करा लिया था। 

एक योरोपीय लेखक के अनुसार- “हुगली की बस्ती के विनाश और पुर्तगालियों के साथ किए गए अमानवीय व्यवहार को निरन्तर शाहजहां की धार्मिक असहिष्णुता का प्रतीक मना गया है।” 

उपरोक्त विवरण भी सत्य है, परन्तु पूरा सत्य नहीं। सत्य यह है कि 

पुर्तगालियों की जलदस्युता, उनका धर्मान्तरण जोश, उनका दास व्यापार का अमानवीय कृत्य ने उन्हें अंजाम तक पहुंचाया।” 

शाहजहां के कठोर कदम ने पुर्तगालियों की कमर तोड़ दी थी-अन्यथा ब्रिटिशों से पहले पुर्तगालियों की दासता का शिकार भारत को होना पड़ता। 

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