मेवाड़ युद्ध |Battle of Mewar history in hindi

Battle of Mewar

मेवाड़ युद्ध (Battle of Mewar) (सन् 1606-15 ई०

 मुग़ल साम्राज्य के सबसे शक्तिशाली शासक अकबर के बाद उसके एकलौते पुत्र जहांगीर उर्फ सलीम का राज्यारोहण हुआ। जहांगीर के पदारोहण के समय मुग़ल साम्राज्य मेवाड़ के साथ युद्धरत था। इस बात की चर्चा चारों ओर थी कि मेवाड़ का अस्तित्व अंशतः स्वयं उसकी (जहांगीर) की बेवकूफी के कारण ही था। 

इसकी वजह यह कही जाती थी कि अकबर के जीवित रहते उसे मेवाड़ विजय के लिए उसे भेजना चाहा था, परन्तु उसने पिता की आज्ञा मानने से इनकार करते हुए युद्ध भूमि में जाने से इनकार कर दिया था। उसकी जिद थी कि अकबर उसके लिए सिंहासनच्युत करके साम्राज्य की बागडोर उसके हाथों में दे दे। जहांगीर की अवज्ञाकारिता से बगावत पूरे साम्राज्य में फैल चुकी थी। जहांगीर की इस बदनामी के बाद अकबर चाहकर भी उसके हाथों में सल्तन्त की पूरी बागडोर न दे सकता था। उसे मामूल था कि अपनी कमजोरियों के कारण वह विशाल साम्राज्य को गवां देगा। 

परन्तु, मौत ने जब दरवाजे पर आकर दस्तक दी तो अकबर ने 25-26 अक्टूबर, 1605 को अपनी अन्तिम सांस रहते जहांगीर को अपनी तलवार पगड़ी देते हुए उसके हाथों में साम्राज्य की बागडोर दे दी और इस दुनिया को अलविदा कहा। इस तरह जब सल्तनत की जिम्मेदारी आ पड़ी तो जहांगीर के लिए अपने आपको कुशल प्रशासक साबित करने के लिए तथा निकम्मा, लापरवाह शहजादा के कलंक से मुक्त होने के लिए, सबसे पहले मेवाड़ विजय की ओर ही कदम बढ़ाया। मेवाड़ विजय उसके सम्मान का विषय बन गयी थी। बादशाह अकबर अपने जीवन-काल में मेवाड़ से लड़ते-लड़ते मृत्यु को प्राप्त हो गया था, पर मेवाड़ विजय न कर सका था। अतएव जहांगीर की सोच थी कि जो काम पिता न कर सका, उसे उसने कर दिखाया तो कुशल-विजेता शासक के रूप में पूरे साम्राज्य में धाक जम जाएगी। 

इसलिए राज्यारोहण के तुरन्त बाद ही उसने अपने द्वितीय पुत्र शहजादा परवेज के नियंत्रण में मेवाड़ की ओर सैनिक अभियान जारी कर दिया। इस अभियान की सफलता के लिए एक साम्राज्यिक मंत्री तथा पांच हजार के मनसबदार आसफ खां तथा सेनापति जफर बेग को लगाया गया। उसके भाग्य से यह अच्छा संयोग था कि महाराणा प्रताप का 1597 ई० में निधन हो गया था। महाराणा प्रताप के बाद मेवाड़ के स्वतन्त्रता संग्राम राजपूत सेनानियों का नेतृत्व प्रताप का पुत्र अमरसिंह कर रहा था। प्रताप के समान अमरसिंह उस आन-बान का स्वामी साबित न हुआ था, जैसे महाराणा प्रताप थे, जिसकी वजह से वफादार राजपूतों की शक्तियां छिन्न-भिन्न हो रही थीं। स्वयं अमरसिंह का चाचा महाराणा सागर, कष्टों से थककर अमरसिंह का साथ छोड़कर मुग़ल दरबार का पेंशन भोगी बन गया था। उसे शाही सेना से सम्मानजनक पद दे दिया गया था। 

जहांगीर द्वारा भेजी गयी शाही सेना के साथ देवार दर्रे पर 1606 ई० खूनी युद्ध हुआ, किन्तु यह युद्ध अनिर्णायक साबित हुआ। जहांगीर ने महाराणा सागर को अपने आश्रित चित्तौड़ में नियुक्त किया, किन्तु चित्तौड़ के राजपूतों ने उसे विश्वासघाती मानकर उसे स्वीकार न किया। सागर को वहां राजपूतों से इतनी धिक्कार सुनने को मिली कि उसने शीघ्र ही चित्तौड़ को छोड़ दिया। जब जहांगीर खुद मेवाड़ रवाना होने जा रहा था कि उसके पुत्र खुसरो ने विद्रोह कर दिया। 

खुसरो का विद्रोह 1608 से 1615 तक चलता रहा। जिसके चलते जहांगीर मेवाड़ अभियान पर न जा सका-परन्तु उसने मेवाड़ से ध्यान हटाया नहीं। महाराणा सागर के चित्तौड़ से वापस आ जाने के बाद 1608 ई० में महावत खान के नेतृत्व में मुग़ल सेनाएं मेवाड़ में घुसी और वहां के मैदानी प्रदेशों को रौंद डाला। किन्तु राणा अमर सिंह ने उन्हें मेवाड़ की पहाड़ियों और जंगलों में बढ़ने से रोक दिया। 

Battle of Mewar

सन् 1609 में जहांगीर की ओर से भेजे अब्दुल्ला खान ने मेवाड़ पर जबरदस्त हमला कर नगर और बस्तियों में आग लगवा दी…परन्तु वह भी राणा अमर सिंह के घुटने टिकवाने में असफल रहा। सन् 1611 ई० में मिर्जा अजीज कोका तथा राजकुमार खुर्रम को मेवाड़ के विरुद्ध शाही सेना का नेतृत्व करने का निर्देश दिया-परन्तु दो लोगों के हाथों में सेना की कमान होने के कारण उनमें मतैक्य न रहा; परिणामतः उनका अभियान सफल न हुआ। 

सन् 1613 ई० में जहांगीर ने स्वयं अपनी व्यक्तिगत निगरानी में मेवाड़ पर अविजय सैनिक कार्यवाही का निर्णय किया। उसने अपना मुख्यालय अजमेर स्थानान्तरित करके सम्पूर्ण सेना को मेवाड़ के विरुद्ध युद्ध के लिए तैनात किया, नूरजहां और आसफ खां की सिफारिश पर आक्रमणकारी सैनिकों का पूर्ण नियंत्रण राजकुमार खुर्रम ने सम्भाला। 

खुर्रम ने मेवाड़ में आतंक और बर्बरता की युक्ति अपनायी। उसने शहरों का विध्वंस कर गांवों को मिट्टी में मिला डाला। खेतों में लहलहाती फसलों में आग लगवा दी। राजपूतों के सुरक्षित और बाधित क्षेत्रों को अवरुद्ध कर दिया। यहां तक कि इन क्षेत्रों को जाने वाले जलमार्गों को भी बन्द कर दिया ताकि वहां के लोगों को रसद न मिल सके। 

यह सब होते ही मेवाड़ में अकाल और भुखमरी फैल जाने से स्थिति और भी खराब हो गयी। परिणामतः मेवाड़ के जियाले राजपूतों की हिम्मत टूट गयी। वे अपने परिवार के स्त्री और बच्चों के भुखमरी भरे जीवन से टूट गए। 

विशाल मुग़ल साम्राज्य तथा लघु मेवाड़ राज्य के बीच यह संघर्ष असमान ही नहीं, बल्कि बर्बरता पूर्वक दमन था। आन के पक्के राजपूत सैनिकों की संख्या लगातार युद्ध के चलते, वीरगति पाते कम होती जा रही थी। चारों ओर 9 साल से जबरदस्त घेराबन्दी चली आ रही थी, नए सैनिक मिलने बन्द हो गए थे। रसद आपूर्ति का साधन न रह गया था। जंगली कंदमूल भी साथ छोड़ने लगे थे। 

महाराजा अमरसिंह भी युद्ध में घायल हो चुके थे। अन्ततोगत्वा राजा अमरसिंह तथा उनके सहयोगियों ने युद्ध की दीर्घावधि की व्यर्थता से होने वाली क्षति, जिससे पूरे राज्य तथा उनके व्यक्तियों पर कठिनाइयों का पहाड़ आ पड़ा था, को महसूस करते हुए, सन् 1615 में अपने चाचा शुभकरण को सम्मानजनक शर्तों के साथ समझौता करने को भेजा।

जहांगीर ने स्थिति में बदलाव देखा तो तुरन्त समझौता की शर्तों को मान लिया। 

इस सन्धि के शर्तों के अनुसार राणा अमरसिंह ने जहांगीर को अपना अधिराज के रूप में मान्यता दी। मुगलों ने मेवाड़ के चित्तौड़ सहित सभी क्षेत्रों को राणा अमरसिंह को लौटा दिया। इस तरह मेवाड़ का नौ वर्षों के खूनी युद्ध का जो परिणाम, सन्धि के रूप में सामने आया, उसे दोनों पक्ष ने पूरे उत्साह से स्वीकार किया।

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