कलिंग युद्ध | Battle of Kalinga History in hindi

कलिंग युद्ध |

कलिंग युद्ध (Kalinga War) (276 ई०पू०) 

भारत के प्राचीन इतिहास के अशोक को अशोक महान् कहकर वर्णित किया गया। उसने महानता इस आधार पर पायी क्योंकि कलिंग युद्ध के बाद उसने बौद्ध धर्म अपना लिया था। उसने शस्त्र को डालकर शास्त्र उठा लिया था। उसने बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए ‘धम्म’ शिलालेख, गुहालेख खुदवाये। अपनी पुत्री संघमित्रा तथा पुत्र कुणाल को भारत से बाहर बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए भेजा। 

सम्राट अशोक चन्द्रगुप्त मौर्य का पौत्र और बिन्दुसार का पुत्र था। चन्द्रगुप्त मौर्य मगध का सम्राट बना था। मगध सम्राट बनने के बाद उसने उस समय के भारत के समस्त सोलह जनपदों को अपने प्रभाव में ले लिया था। उसने राज्य विस्तार किया। सिकन्दर के जीते हुए भारत के भू-भाग पर राज्य करते सिकन्दर के सेनापति सेल्यूकस को हराकर काफी भू-भाग प्राप्त किया था। चन्द्रगुप्त मौर्य के बाद उसका पुत्र बिन्दुसार सिंहासनारूढ़ हुआ। उसने अपने पिता से भी अधिक राज्य विस्तार किया। उसने दक्षिण के राज्यों को भी जीता। इतिहासकार तारानाथ के अनुसार, “अशोक ने पूर्व और पश्चिम समुन्द्र के बीच के भू-खण्ड का स्वामी बना लिया था।” 

अशोक के कलिंग युद्ध के विवरण में अशोक के पिता और पितामह का विवरण भी देना इसलिए आवश्यक हो जाता है क्योंकि अशोक के कलिंग युद्ध की पृष्ठभूमि यहीं से बनती है। दक्षिण में उसके पिता ने विजय प्राप्त की थी। दक्षिण में ही कलिंग राज्य था-जो अशोक के समय में स्वतन्त्र राज्य हो गया था। 

अशोक का कलिंग युद्ध, विश्व के युद्ध इतिहास की महत्त्वपूर्ण घटना है, अशोक का राज्यारोहण की तिथि 269 ई०पू० के लगभग मानी जाती है। उसने राज्याभिषेक के आठ वर्ष बाद कलिंग पर आक्रमण किया था। 

इतिहासकारों का मत है कि बिन्दुसार के शासनकाल के अन्तिम दिनों में, जबकि राज्यकाल अशान्त परिस्थितियों से गुजर रहा था-कलिंग स्वतन्त्र हो गया था। कलिंग के पुनर्विजय का भार अशोक पर आया। 

कलिंग युद्ध में अशोक की सेना 

कलिंग युद्ध

कलिंग युद्ध, भारतीय इतिहास की सबसे दुति और क्रूर घटना कही जा सकती है। इतिहास में इसका कोई लिखित प्रमाण नहीं कि कलिंग युद्ध में अशोक ने कितनी सेना का उपयोग किया था, ना ही इसका विवरण है कि कलिंग का राजा कौन था। पर अनुमान है कि दस लाख से भी बड़ी सेना लेकर अशोक पूरी निर्दयता के साथ युद्ध भूमि में उतरा था। 

अशोक के आक्रमण के विरुद्ध कलिंग वासियों ने पूरी तत्परता दिखायी। अशोक के आक्रमण का मुकाबला करने के लिए कलिंग से भी एक विशाल सेना रणक्षेत्र में उतर पड़ी। युद्ध का परिणाम बेहद बीमत्स और भयानक था। कलिंग की सेना अशोक की सेना द्वारा निर्दयतापूर्वक वध कर दी गयी। 

अशोक ने युद्ध के परिणाम का खुद वर्णन करते हुए अपने तेरहवें शिलालेख में लिखा है- “1,50,000 शत्रु बन्दी हुए, 100,000 हत हुए और उससे कई गुना युद्ध के अनन्तर व्याधियों में मर गए।” 

युद्ध के अनन्तर व्याधियों से यही माना जाता है कि कलिंग युद्ध भूमि लाशों से पटी पड़ी थी। कलिंग के डेढ़ लाख सैनिक बन्दी बनाए गए थे, एक लाख युद्ध में हत हुए थे। चूंकि कलिंग योद्धाओं ने बेहद वीरता से युद्ध किया था अतः कहा जा सकता है कम से कम एक लाख अशोक की सेना के योद्धा भी मारे गए थे। दो लाख लोगों की लाशों से पटे पड़े युद्ध क्षेत्र में लाशें उठाने वाला भी कोई न बचा था। सड़ती हुई लाशों से ही व्याधियां फैली थीं जिसमें कई गुना (चार-छः लाख) कलिंग वासी मर गए थे।

युद्ध का परिणाम 

संग्राम भीषण हुआ था। कलिंग के बलिदान के बावजूद उनका देश जीत लिया गया था। संग्राम की भीषणता और अवर्णनीय कष्ट ने विजेता (अशोक) के मर्म को छू लिया था। अशोक का हृदय इस घटना से इतना द्रवित हुआ कि उसने शपथपूर्वक प्रतिज्ञा की कि साम्राज्य के विस्तार के लिए आगे वह शस्त्र न उठायेगा। इसके बाद ‘भेरीघोष’ सदा के लिए मूक हो गया और ‘धम्मघोष’ का शान्तिप्रद और नेह सिंचित नाद दिग्-दिगंत में गूंज उठा। 

अशोक के तेरहवें शिलालेख के ही अनुसार, घोषणा है- “कलिंग की विजय के बाद शीघ्र ही दवानामप्रिय धम्म के अनुकरण, धम्म के प्रेम और धम्म के उपदेश के प्रति उत्साहित हो उठा।” 

अशोक के स्तूपों से यह भी प्रमाण सामने आते हैं- ‘बौद्ध सिद्धान्तों को स्पष्ट रूप देने के लिए अशोक ने मोग्गलिपुत्र की अध्यक्षता में एक समिति बुलाई तथा बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए विदेशों में दूत भेजे।’

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