हल्दी घाटी का युद्ध |Battle of Haldighati history in hindi

हल्दी घाटी का युद्ध

हल्दी घाटी का युद्ध (Battle of Haldighati) (18 जून, 1576 ई०) 

भारत की सत्ता पर आसीन होकर 20 वर्ष गुजार चुकने के बाद, अकबर भारत के बहुत बड़े भू-भाग का अधिपति बन गया था। उसने राजपूतों के साथ रोटी-बेटी का सम्बन्ध (राजपूतों को सेना में उच्च पद देकर-वैवाहिक सम्बन्ध बनाकर) बनाकर कुशल प्रशासनिक क्षमता का परिचय दिया। अपनी इस नीति के कारण अकबर ने राजपूताना के अजेय समझे जाने वाले विशाल क्षेत्र पर अपना अधिकार कर लिया। 

राजपूतों में यदि कोई वीर राजपूत शिरोमणि, अकबर के सामने न झुका था, उसकी अधीनता स्वीकार की थी तो वे थे महाराणा प्रताप। सिसौदिया राजपूत कुल में जन्मे महाराणा प्रताप, चित्तौड़ के राजा उदय सिंह के पुत्र और राणा-सांगा के पौत्र थे।

 हल्दीघाटी के युद्ध से पूर्व अकबर को मेवाड़ की विजय मिल चुकी थी। मेवाड़ को अपने अधीन करने के लिए अकबर ने 1567 ई० में चित्तौड़ के किले पर आक्रमण किया था। चित्तौड़ किले में, हमले के समय राजा उदय सिंह बचकर निकल गए थे। उस समय किले की सुरक्षा का भार दो वीर राजपूत योद्धा जयमल एवं फतेहसिंह उर्फ फत्ता पर था। 

हल्दी घाटी का युद्ध

इस घमासान युद्ध में 30,000 राजपूतों ने अपने प्राणों का बलिदान दिया। जयमल और फत्ता ऐसा युद्ध लड़े कि अकबर को उनकी वीरता के सामने सिर झुकाना पड़ा। उसने इन दोनों की वीरता की स्मृति में आगरा किले के द्वार पर प्रस्तर मूर्तियां स्थापित करायीं। 

महाराणा प्रताप अपने पिता उदयसिंह के निधन के बाद सत्तासीन हुए थे। राजस्थान में मेवाड़ का कुछ भू-भाग अभी मुग़ल साम्राज्य के अधीन न हो पाया था। वही कुछ भू-भाग महाराणा प्रताप के अधिकार में था। वह क्षेत्र वीहड़ पहाड़ियों जंगलों से भरा था। 

हल्दी घाटी का मैदान, जहां मुग़ल सेना का राजपूत सेना से युद्ध हुआ, वहां की भूमि पिसी हल्दी की भाति पीली और आधियों में उड़ती रहती है, इसी से इस क्षेत्र को हल्दीघाटी कहा जाता है। 

मेवाड़ पर पूर्ण अधिकार करने के लिए अकबर ने निजी तौर पर प्रयास किए कि महाराणा प्रताप उनकी मात्र अधीनता स्वीकार कर लें और जो सुविधा चाहें वह प्राप्त करें। वह उन्हें अन्य राजपूत राजाओं के समान राजा का पद और ऊंचे मनसब देने तक को तैयार था। परन्तु, राजपूती आन के धनी महाराणा प्रताप को किसी भी मूल्य पर पराधीनता स्वीकार न थी। अन्ततः अकबर ने राजा मानसिंह और सेनापति आसफ खां के नेतृत्व में विशाल मुग़ल सेना को मेवाड़ विजय के लिए भेजा।

दोनों सेनाओं के बीच गोगुंडा के निकट, अरावली पहाड़ी के हल्दीघाटी शाखा के मध्य 18, जून, 1576 ई० में घमासान युद्ध हुआ। इस युद्ध में महाराणा की सेना को पराजय मिली। स्वयं महाराणा प्रताप व उनका घोड़ा चेतक जख्मी हुआ। ऐसे विकट समय में, जबकि महाराणा का और अधिक देर युद्ध करते रहना असम्भव हो गया था-एक वीर राजपूत झाला के नायक ने, महाराणा को बचाने का क्षत्रिय धर्म निभाने का कार्य किया। 

झाला के नायक ने अपना प्राणोत्सर्ग कर प्रताप को बचाने की युक्ति अपनायी थी। उसने आगे बढ़कर महाराणा का छत्र अपने ऊपर तान लिया और मुग़ल सेना से युद्ध करने लगे। ऐसा होने पर महाराणा को पीछे सुरक्षित रह जाने का अवसर मिल गया था। उनके वीर साथियों ने उन्हें सुझाया-“इस समय युद्ध भूमि से पीछे हट जाना ही श्रेष्ठ क्षत्रिय धर्म है। आप यदि जीवित रह जाते हैं तो मेवाड़ की रक्षा होती रहेगी, क्योंकि आपके नेतृत्व में नयी राजपूती सेना तैयार हो जाएगी। आप ही न रहे तो मेवाड़ का पतन और राजपूतों की परतंत्रता निश्चित है।” 

वीर साथियों की बात प्रताप को तर्क संगत लगी थी। उन्होंने जख्मी चेतक को घुमा दिया। दूसरी ओर, झाला नायक को, महाराणा प्रताप का धोखा खाए हुए मुग़ल सेना, उन पर चारों ओर से टूट पड़ी थी। झाला नायक के साथ की राजपूत टुकड़ी ने पूरे वीरोचित से युद्ध करते हुए अपने प्राणोत्सर्ग कर दिया। अंत में झाला नायक ने भी वीरगति पायी। मुग़ल सेना विजय उल्लास में भर उठी कि प्रताप के वीरगति पाने के बाद बादशाह अकबर का संकल्प और विजय निश्चित हो गयी है। 

पर, मुग़ल सेनापति आसफ खां, मानसिंह तथा बादशाह अकबर की विजयोल्लास को खुशी उस समय काफूर हो गयी जब कि उन्होंने जाना कि प्रताप युद्ध भूमि से बच निकले हैं। 

यह बात सही थी-प्रताप को सलाह देने वालों का कथन भी सही साबित हुआ था। युद्ध भूमि से बच निकलने के कुछ देर बाद एक नाले को पार करने के बाद महाराणा प्रताप का विश्व प्रसिद्ध घोड़ा चेतक, जख्मों से चूर गिर कर प्राण त्याग बैठा था। 

हल्दीघाटी के युद्ध में ‘चेतक’ ने जो स्वामी भक्ति निभायी थी, वह इतिहास में अभूतपूर्व है। शरीर पर लगे घावों के बाद भी वह स्वामी को वहां तक बचाकर सुरक्षित निकाल लाया था, जहां के बाद प्रताप को खतरा न था। बहादुर चेतक के प्राण त्यागने पर, उसकी स्वामी भक्ति पर महाराणा प्रताप की आंखें छलक आयी थीं।

हल्दीघाटी के मैदान में हजारों-हजार मुगलों और राजपूतों के शव बिखरे पड़े थे। इस युद्ध को बेशक अकबर ने अपनी जीत का युद्ध समझा था; परन्तु जिस उद्देश्य से यह युद्ध हुआ था, उस उद्देश्य में देखा जाए तो युद्ध अनिर्णित रहा था। अकबर, महाराणा प्रताप पर विजय, उन्हें झुकाना या उन्हें युद्ध भूमि में वीरगति पाया हुआ देखना चाहता था। इस अर्थ में, वह ना तो महाराणा प्रताप पर विजय ही पा सका था, ना ही महाराणा प्रताप अकबर के सामने झुके ही थे, ना ही वे युद्ध में वीरगति ही पा सके थे। 

बच निकलने वाले महाराणा प्रताप, हल्दीघाटी के युद्ध के बाद भी मेवाड़ के उस क्षेत्र के अधिपति थे, जिसके लिए वह युद्ध हुआ था। अलबत्ता नई सेना तैयार करने तक वे मुग़ल सेना से सीधे भिड़ना समझदारी न समझ रहे थे। उन्होंने घास की रोटियां खाईं, नंगे चट्टानी फर्श पर सोए, बच्चों की भूख देखी। मन द्रवित हुआ, पर अन्त समय तक वे मुग़ल शहंशाह अकबर के सामने झुके नहीं, अधीनता स्वीकार नहीं की। अजेय योद्धा के रूप में सन् 1599 ई० में उनका स्वर्गवास हुआ।

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