घाघरा का युद्ध |Battle of Ghaghra History in hindi

Battle of Ghaghra History in hindi

घाघरा का युद्ध (Battle of Ghaghra) (1529 ई०)

राजपूतों की शक्ति को दबाने के बाद बाबर की अगली चुनौती उन अफगान सरदारों की ओर से मिली जो पानीपत के युद्ध के बाद बचकर निकल भागे थे, अथवा युद्ध में शामिल न होकर अपना राज्य सम्भालते रहे थे। वे सब बाबर को दिल्ली आगरा की सत्ता पर आसीन होते समय बिहार में एकजुट हो रहे थे। इन सब अफगान अमीरों का नेतृत्व सुल्तान इब्राहीम लोदी का छोटा भाई और दिल्ली सिंहासन का प्रबल दावेदार महमूद लोदी कर रहा था। 

महमूद लोदी ने बंगाल के शासक नुसरत शाह का भी सहयोग यह कहकर प्राप्त कर लिया था कि अगर बाबर को जमने दिया गया तो बाबर के अगले आक्रमण का शिकार वह खुद होगा। इस तरह बिहार में एकजुट हुए अफगान सरदार अपनी-अपनी सेना की टुकड़ियां लिए हुए, तथा नुसरत शाह की पूरी सैन्य शक्ति, महमूद लोदी के नेतृत्व में युद्ध भूमि में आ जमी। उस सेना का इरादा दिल्ली-आगरा पहुंचकर बाबर को ललकारना था। परन्तु बाबर ने उनका इन्तजार नहीं किया, वह अपनी सेना लेकर बढ़ आया। घाघरा और गंगा नदी के संगम पर 6 मई, 1821 ई० को उसने उन्हें ललकारा। 

दोनों ओर की सेना में जबरदस्त मुठभेड़ हुई। लाशों पर लाशें बिछने लगीं। पर शीघ्र ही बाबर के सैनिक अफगानों पर भारी पड़ गए। अफगान सेना ध्वस्त होने लगी। बाबर की विजय देखकर महमूद लोदी जान बचाकर बर्मा की ओर भाग गया। वहां वह मख कबायलियों द्वारा मौत के घाट उतार दिया गया। 

महमूद लोदी के कत्ल हो जाने के बाद अफगान सरदार नेतृत्वविहीन हो चुके थे। बाबर ने पूरे बिहार को अपने अधिकार में कर लिया। बंगाल के शासक नुसरत शाह ने बाबर से समझदारी भरी सन्धि की। इस सन्धि की शर्त तय हुई कि दोनों राज्य एक-दूसरे के क्षेत्र में हस्तक्षेप न करेंगे। शत्रु की नाही सहायता थी कि नुसरत शाह बाबर का मुकाबला नहीं कर सकता था, बाबर दिल्ली से बंगाल चलकर आ, हुकूमत सम्भालने का उस समय इच्छुक न था। बाबर ने अफगान सरदारों की भी विश्वसनीयता प्राप्त करने के लिए, उन्हें बिहार के अलग-अलग क्षेत्र में अपनी जागीर बनाए रखने की अनुमति दे दी थी।

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

3 × 2 =