चौसा का युद्ध |Battle of Chausa history in hindi

Battle of Chausa history in hindi

चौसा का युद्ध (Battle of Chausa) (26 जून, 1539 ई०) 

सन् 1530 ई० में बाबर की बीमारी की वजह से मृत्यु हो गयी थी। उसके निधन के बाद उसका ज्येष्ठ पुत्र हुमायूं मुग़ल सिंहासन पर आसीन हुआ। 

हुमायूं के अलावा बाबर के तीन अन्य पुत्र क्रमशः कामरान, हिन्दाल और असकरी थे। अपने जीते जी ही बाबर ने तीनों के लिए अलग-अलग राज्य प्रशासन देकर सन्तुष्ट कर दिया था। पर यह सन्तुष्टि बाबर के जीते जी ही रही। बाबर के आंख मुंदते ही हुमायूं के भाइयों की निगाहें दिल्ली की सत्ता पर जम गयीं। इसकी वजह थी हुमायूं की कमजोरी। हुमायूं की सबसे बड़ी कमजोरी अफीम की लत थी। अपनी अफीम की लत की वजह से ही उसे मृत्यु को प्राप्त होना पड़ा-यह विषय बहुत बाद का है, क्योंकि सत्तासीन होने के बाद वह आगे 26 वर्षों तक जीवित रहा और सागर के बीच पड़ी नौका की तरह वह इधर-से-उधर डोलता हुआ शासन करता रहा। 

हुमायूं के अफीम की लत का शिकार होने की जानकारी जब उसके विरोधियों को मिली; तब वे लोग एक बार पुनः सिर उभारने लगे, जिन्हें बाबर ने युद्ध में हराकर सुविधाएं देकर सन्तुष्ट कर दिया था। ऐसे लोग बिहार के अफगान थे। अफगानों के नेता महमूद लोदी की हत्या के बाद शेरशाह सूरी या शेरखान नामक अफगानों का नेता तेजी से उभर पड़ा था। 

हुमायूं उस समय गुजरात और मालवा के विजय अभियानों में लगा हुआ था, जबकि उसकी व्यस्तता का लाभ उठाते हुए शेरशाह ने दक्षिणी बिहार में अपनी स्थिति काफी सुदृढ़ कर ली थी। उसने बंगाल विजय अभियान की ओर अपना पग बढ़ाया, उस समय बंगाल में ग्यासुद्दीन महमूद शासन कर रहा था। ग्यासुद्दीन महमूद, नुसरत शाह के उत्तराधिकारी के रूप में सिंहसनासीन हुआ था। नुसरत शाह दिल्ली साम्राज्य के साथ मैत्री से बंधा था, ग्यासुद्दीन भी उस दोस्ती को निभा रहा था। शेरशाह ने बंगाल पर आक्रमण कर दिया। ग्यासुद्दीन महमूद, शेरशाह से मुकाबला करने लायक शक्ति न रखता था। उसने खुद को गौर के किले में बन्द कर लिया था। दिल्ली में उसने सूचना भेज दी थी। 

हुमायूं को सूचना मिली, परन्तु उस समय हुमायूं अफीम खाकर स्वर्ग का अनुभव करता हुआ विलासिता में डूबा हुआ था। उसने ग्यासुद्दीन की भेजी सूचना पर कार्यवाही करने में काफी समय बर्बाद कर दिया। काफी समय खराब करने के बाद वह सेना लेकर ग्यासुद्दीन की मदद के लिए रवाना हुआ। 

Battle of Chausa history in hindi

हुमायूं के पास 70,000 से 80,000 सैनिक तथा तोपखाना था। वह चाहता तो सीधे शेरशाह पर हमला करके उसकी कमर तोड़ देता। पर, उसने गलतियां पर गलतियां कीं-उसने हमला करने के बजाय, शेरशाह के अधिकार वाले चुनार किले को जा घेरा जहां वह समझता था कि शेरशाह के परिवारी सदस्य हैं, किला घेरने के कारण, शेरशाह अपने परिवारी सदस्यों को बचाने के लिए तुरन्त ही बंगाल से लौटा आयेगा। 

जबकि शेरशाह का ज्येष्ठ पुत्र जलाल खान तथा उसका प्रतिभाशाली सेनापति उस समय बंगाल विजय अभियान में लगे हुए थे। 

6 अप्रैल, 1538 में शेरशाह ने बंगाल को जीत लिया। गौर का पूरा क्षेत्र उसके हाथ आ गया। ग्यासुद्दीन जख्मों से चूर, कठिनता से शेरशाह के हाथों बच निकला था-हुमायूं के सामने पहुंचकर अपने प्राण त्यागते हुए जैसे इस बात का संदेश दिया कि वह व्यर्थ वहां समय बर्बाद कर रहा था। चुनार किले के घेराव में हुमायूं ने छः माह का समय निरर्थक बर्बाद कर दिया था। 

वास्तविकता सामने आने पर हुमायूं बंगाल के लिए रवाना हुआ, पर उसने गौर की ओर जाने वाले तेलियागढ़ी वाले सड़क मार्ग को न पकड़कर छोटा मार्ग दर्रे का अपनाया था। जिसका परिणाम इस रूप में सामने आया कि शेरशाह का पुत्र जलालखान उस दर्रे पर सेना लेकर पहुंच गया और दो माह तक हुमायूं को उस मार्ग से आगे बढ़ने न दिया। 

इस दो माह की अवधि का शेरशाह ने पूरा फायदा उठाया। वह गौर से बिहार लौट आया और रोहतास किले से शाही खजाना उठा ले जाने का कार्य किया। 

15 अगस्त, 1538 में जब हुमायूं ने गौर में प्रवेश किया तो वहां बड़ी मात्रा में शराब, अफीम और विलासिता की चीजें उसके सामने बिखरी पड़ी थीं। शेरशाह ने उसके आनन्द और आमोद-प्रमोद के साधन योजना बध रूप से जुटाकर छोड़े थे। जैसी शेरशाह की योजना थी, ठीक उसी रूप में हुमायूं विलासिता में फंस गया था। 

इतिहासकार नियायत उल्ला ने लिखा है- 

“गौर का शाही भवन उत्कृष्ठ प्रकार के हीरे-मोतियों से सजा हुआ था तथा उसके अन्दर अत्यधिक कीमती कालीन, रेशम का सामान आदि इस आशा से बिछा दिए गए थे कि हुमायूं इससे अभिभूत होगा और वहां काफी समय तक ठहरने के लिए प्रवृत्त हो जाएगा।” हुआ भी ऐसा ही जैसा कि शेरशाह ने अनुमान लगाया था। हुमायूं वहां ठहरकर विलासिता में डूब गया और एक प्रकार से शेरशाह को भूल गया। 

इस बीच शेरशाह को अपनी स्थिति काफी मजबूत बनाने का अवसर मिल गया। 

उधर, हुमायूं की दिल्ली में अनुपस्थिति का लाभ उठाकर उसके भाइयों अस्करी और हिन्दाल में वैमनस्य पैदा हो गया। हुमायूं उस समय बंगाल की व्यवस्था सम्भालने में लगा हुआ था। इस काम में उसे जब सफलता मिली तब दिल्ली की अव्यवस्था को सम्भालने हुमायूं वापस हुआ। उस समय बिहार और उत्तर प्रदेश की सीमा पर चौसा नामक स्थान पर शेरशाह ने पूरी घेराबन्दी कर रखी थी। चौसा में कर्मनासा नदी के तट पर अफगानों की सेना के साथ शेरशाह ने हुमायूं की मुग़ल सेना पर हमला बोल दिया। 

दोनों ओर की सेनाएं दिलेरी से लड़ीं। अन्ततः हुमायूं का भाग्य दगा कर गया। उसकी सेना ने बुरी तरह युद्ध भूमि से पीठ दिखायी। वे मैदान से भाग खड़ी हुई। हारी हुई जंग में एक बदनुमा दाग यह भी हुमायूं के माथे पर लगा कि 26 जून, 1539 ई० को युद्ध के अन्तिम क्षण में हुमायूं ने नदी में कूदकर अपनी जान बचाने की चेष्टा की। एक भिश्ती ने उसकी ओर मशक फेंककर उसे नदी पार उतर जाने में सहायता दी। यदि वह भिश्ती उस समय उसकी सहायता न करता तो नदी पार करना हुमायूं के लिए असम्भव हो जाता। 

बहरहाल, नदी पार कर हुमायूं किसी तरह आगरा पहुंचा। चूंकि शेरशाह की सेना नदी नहीं पार कर सकती थी इसलिए हुमायूं बच गया था। 

हुमायूं की सारी सेना चौसा युद्ध में तबाह हो गयी थी। आगरा पहुंचकर उसने अपने भाई कामरान से 10,000 सैनिकों की मांग की तो उसने इनकार कर दिया। कामरान लाहौर का अधिपति था। उसके पास तपे-तपाए सैनिक थे। यदि वह 10,000 सैनिक दे देता तो हुमायूं के भाग्य में जो दुर्भाग्य लिखा था वह टल जाता।

कन्नौज में निर्णय 

शेरशाह के दिल्ली की ओर बढ़ने की सूचना पाकर, हुमायूं 17 मई, 1540 को कन्नौज में उससे जा टकराया। दोनों ओर की सेनाओं ने प्राण-प्रण से युद्ध किया। हुमायूं के पास थोड़े सैनिक थे-युद्ध हारना निश्चित था। उसके भाई कामरान, हिन्दाल, अस्करी तमाशा देखते रहे। कन्नौज का युद्ध हारने के बाद हुमायूं को भारत से भागना पड़ा। उसे शेरशाह के साथ-साथ अपने भाईयों से भी जान का खतरा था।

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