बक्सर का युद्ध |Battle of Buxar history in hindi

बक्सर का युद्ध

बक्सर का युद्ध (Battle of Buxar) (1764 ई०) 

बक्सर का युद्ध बंगाल के नवाब और अंग्रेजों के बीच हुआ। यह युद्ध अंग्रेजों के साम्राज्य विस्तार की लिप्सा तथा मीर जाफर ने जो बोया था, वही काटने के रूप में उसके सामने आया। यह युद्ध भी इतिहास प्रसिद्ध है। मीर जाफर को नवाब बनाने के बाद अंग्रेज उससे अपनी महत्वाकांक्षा की पूर्ति करते रहे। धीरे-धीरे खजाना खाली होने लगा तो मीर जाफर को सुचारु रूप से शासन चलाने में कठिनाई होने लगी। तब उसने अपनी संकीर्ण मनोवृत्ति के कारण हिन्दुओं के स्थान पर मुसलमानों को नियुक्त करना आरम्भ कर दिया। उसकी इस नीति का कड़ा विरोध हुआ। 

लार्ड क्लाइव को लगा कि जनता का असंतोष बढ़ने से कहीं विद्रोह न हो जाए, इससे बचाने के लिए 27 सितम्बर, 1760 ई० को कलकत्ता की ब्रिटिश कौंसिल ने मीर जाफर को नवाब के पद हटाकर उसके दामाद मीर कासिम को बंगला का नवाब बना दिया। मीर जाफर को 15,000 रुपए वेतन की पेंशन देकर उसे कलकत्ता भेज दिया गया। 

मीर कासिम अपनी स्थिति समझ गया था। उसकी समझ में बात आ गयी थी कि अंग्रेजों की कठपुतली बनकर वह रहा तो खजाने में कभी भी इस लायक धन न हो सकेगा कि वह सैनिकों को वेतन दे सके; इसलिए उसने अंग्रेजों की ओर से मुंह मोड़कर आवश्यक सुधार करने आरम्भ कर दिए। उसने नई सैनिकों की भर्ती आरम्भ कर दी तथा अंग्रेजों के व्यापार पर अंकुश लगाने आरम्भ कर दिए। उसने अपनी राजधानी मुंगेर में स्थानान्तरित कर दी ताकि वह अंग्रेजों के दबाव और प्रभाव से बचा रहे। उसने मुंगेर की किलेबन्दी करवाकर उसे सुदृढ़ कर लिया और वहां पर चालीस हजार की सेना रख दी। उन्हें यूरोपियन ढंग से प्रशिक्षित किया तथा अस्त्र-शस्त्र बनाने का एक कारखाना स्थापित कराया। 

अंग्रेज मीर कासिम की युक्ति को शुरू-शुरू में शासन और व्यवस्था सुधारने के रूप में देखते रहे। परन्तु जब उसने 40,000 की सेना खड़ी कर ली, तब उसका मुंह फेरने का उद्देश्य उनकी समझ में आया। उन्होंने एक बार फिर मीर जाफ़र को नवाबी सौंपने की तैयारी कर ली। 

बक्सर का युद्ध

मीर जाफर को बुलाकर उसे साथ लिया। कम्पनी की सेना, कमाण्डर एडम्स को नेतृत्व में मुर्शिदाबाद की ओर रवाना हुई। मीर कासिम की सेना भी मीर तकी नामक सेनापति के नेतृत्व मुंगेर से आगे बढ़ी। परन्तु मार्ग में ही एक युद्ध में मीर तकी पर घेरा डालकर अंग्रेजों ने उसे मार डाला। 

अगली लड़ाई मीर कासिम ने, अपने नेतृत्व में उदयनाला नामक स्थान पर अंग्रेजों से लड़ी। परन्तु इस युद्ध में उसे पराजय मिली। परन्तु उसका साहस भंग न हुआ। वह पलटकर मुंगेर आया और दुर्ग की सुरक्षा की पूरी व्यवस्था कर, सेना को नयी कुमुक लेकर पटना के लिए प्रस्थान किया। 

पटना पहुंचने पर उसने अंग्रेजों की टुकड़ी को हराया और उनके 149 सदस्यों को, जिनमें स्त्रियां और बच्चे भी थे, कैदी बनाकर उन्हें तलवार के घाट उतरवा दिया। इस घटना को ‘पटना हत्याकाण्ड’ नाम से पुकारा जाता है। 

एडम्स ने दोबारा फौज एकत्र कर मीर कासिम पर आक्रमण कर पटना में ही उसे पराजित कर पटना को अपने अधिकार में ले लिया। 

इस हार के बाद मुंगेर की पकड़ भी उसके हाथ से छुट गयी थी-उसने पलायन करके अवध के नवाब शुजाउद्दौला के पास जाकर शरण ली, उसने मुग़ल बादशाह शाह आलम से भी सहायता की प्रार्थना की, जो कि उस समय दिल्ली में हुकूमत कर रहा था। 

शाह आलम और शुजाउद्दौला दोनों ही मीर कासिम की सहायता को तैयार होकर, संयुक्त सेना द्वारा अंग्रेजों का मुकाबला करने बढ़ चले। वे जानते थे कि तीनों की समस्या एक सी है। यदि अंग्रेजों के बढ़ते कदम इस समय न रोके गए तो आने वाले कल में वे अवध और उसके बाद दिल्ली की हुकूमत भी हड़प कर लेंगे। 

सितम्बर, 1764 ई० को बक्सर के मैदान में तीनों की संयुक्त सेनाओं ने ब्रिटिश सेना को जा घेरा। जबरदस्त युद्ध हुआ। 

पर तीनों की संयुक्त सेना को हार का मुंह देखना पड़ा। बक्सर के युद्ध ने अंग्रेजों के भाग्य का नया अध्याय लिखा दिया। पूरे बंगाल में उनका अधिकार हो गया, साथ ही अवध और दिल्ली के बादशाह को भी अंग्रेजों के अधीन होकर हुकूमत के लिए मजबूर होना पड़ा। 

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