सच्ची घटना पर आधारित-तांगानिका की डाकिनें

सच्ची घटना पर आधारित

सच्ची घटना पर आधारित-तांगानिका की डाकिनें

यह कहानी तांगानिका की उन खूनी डाकिनों की है, जिन्हें दारेसलाम (तांगानिका) के उच्च न्यायालय ने सश्रम सख्त कारावास की सजा सुनाई है। उनके नाम हैं-नेआम सेनी (70 वर्ष), जामाल्टा (40 वर्ष) व जिविवु (20 वर्ष)। 

दरअसल, अफ्रीका की धर्म पुरोहित महिलाएं देवताओं की प्रसन्नता के लिए लोगों की हत्या कर दिया करती थीं। अब तक उन्होंने अनगिनत लोगों के प्राणों का हरण किया। उन पर उच्च न्यायालय में काफी समय तक मुकदमा चला। 

इससे यह स्पष्ट होता है कि रूफीजी डेल्टा के आस-पास डाकिन विद्या (अघोर विद्या) बड़े पैमाने पर व्याप्त है। उन डाकिनों का ऐसा विश्वास है कि कोई भी उनका कछ भी नहीं बिगाड़ सकता। लेकिन एक पुलिस अधिकारी ने उन्हें उस समय पकड़ा जब वे डाकिनें रंग-बिरंगी जादुई चादरें (कांगा) ओढ़े बैठी थीं। उन चादरों को वे रक्षा कवच समझती हैं। 

जिस पुलिस अधिकारी ने उन्हें पकड़ा, उसने उन पर नृशंस हत्याओं के आरोप लगाए। जब उन पर उनकी ही भाषा कीरूफीजी’ में आरोप लगाए गए, तो वे ऐसे मुस्करा दी, जैसे उन्हें कोई प्रशंसनीय कार्य करने का श्रेय दिया जा रहा है। 

तांगानिका ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण अफ्रीका में डाकिनी कृत्य एक प्रकार का पौरोहित्य कर्म माना जाता है, जिसे अधिकतर वहां की महिलाएं ही अंगीकार करती हैं। देवता की कृपा प्राप्त करने के लिए उन्हें तन्त्र साधना करनी पड़ती है। उन अफ्रीकी महिलाओं का विश्वास है कि देवता उनके वश में रहते हैं और देवताओं की सहायता से वे किसी का भी अच्छा-बुरा कर सकती हैं। 

अतः लोग उनसे डरते हैं और उनको असीम सम्मान देते हैं तथा उनकी यथाशक्ति सहायता भी करते हैं जिससे उनकी कृपा उन पर बनी रहे।

सच्ची घटना पर आधारित-तांगानिका की डाकिनें

तीनों डाकिनों में से बीस वर्षीया सबसे छोटी डाकिन जिविव से जब पूछा गया तो उसने अदालत को बताया कि दूसरी डाकिनों के आदेश से उसे उनके दल में सम्मिलित होना पड़ा। उन डाकिनों ने कहा था कि अगर वह उनके दल में भर्ती नहीं होगी तो उसका सर्वनाश कर दिया जाएगा। इसलिए वह डर गई और उनके घनघोर जंगल में बने मठ में सम्मिलित हो गई। 

उसने बताया कि उसकी दीक्षा के समय गांव के मुखिया की लड़की का वध किया गया था और उसके मांस के टुकड़े काट-काट कर सबने प्रसाद के रूप में ग्रहण किया था। वह छोटी लड़की एक झाड़ी में छिपा कर रखी गई थी। उसे कुछ खिला कर बेहोश कर दिया गया था, अत: वध के समय वह रोने-चिल्लाने की स्थिति में भी नहीं थी। डाकिनों ने उससे कहा कि तुझे भी अपने पति की बलि इसी प्रकार से देनी होगी। 

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उसने बताया कि धर्माध्यक्ष डाकिन नेआम सेनी 7 मार्च, 1962 को कछ दवा लेकर आई और मुझसे बोली कि गुप्त रूप से इसे अपने पति मसौदी को खिला देना। मैं सकपका गई। डरी जरूर लेकिन अब डाकिनों के दल से अलग होना असम्भव था। उनकी नाराजगी से मेरा सर्वनाश हो सकता था। इसलिए उनका कहना मानना मेरी विवशता थी। दवा खाकर मसौदी एकाएक बेहोश होकर गिर पड़ा। तभी अन्य डाकिनें धड़धड़ाती हुई उसके घर में चली आईं और मसौटी को उठाकर ले गईं। 

मसौदी पर अब क्या बीतने वाली है, इसकी कल्पना करके ही मैं कांप गई और तत्काल भाग कर अपने श्वसुर के पास जाकर सारा भेद उनको बता दिया। 

दो दिन की कड़ी दौड़-धूप के बाद मसौदी का शव एक झाड़ी में पड़ा मिला। उसके शरीर पर कुछ ऐसा लेप पोत दिया गया था, जिससे वह बुरी तरह से सूज गया था। उसे घर लाया गया, किन्तु मृत मसौदी जिसे अन्य डाकिनों ने मार डाला था, अब कहां जिन्दा होने वाला था? 

तांगानिका की अदालत ने नेआम सेनी को 6 वर्ष, जामाल्टा को 5 वर्ष तथा जाविवू को 3 वर्ष की सजा सुनाई। जज ने अपने फैसले में लिखा कि इस क्षेत्र में फैला हुआ अन्धविश्वास एक प्रकार से डाकिनी आतंक का पुष्टपोषण हो सकता है। जिस मुखिया की लड़की की बलि दी गई थी, उस तक ने मारे डर के गवाही नहीं दी। लोग उनके कुकृत्यों की चर्चा करते हुए भी डरते हैं। ऐसी दशा में सबूत के अभाव में उन्हें प्राण-दण्ड जैसी सजा कैसे दी जा सकती थी? 

तांगानिका ही नहीं बियना से लगभग 200 मील उत्तर में स्थित क्राको नगर के न्यायाधीश को एक गुमनाम पत्र मिला जिसमें लिखा था कि सोला नामक ईसाई मिशन के भिक्षुणी आश्रम में एक भिक्षुणी 20 वर्ष से नरक जैसी कोठरी में पड़ी अमानवीय पीड़ाएं सह रही है। उसे मुक्त कराया जाए। वह विक्षिप्तावस्था में है। न्यायाधीश उस गुमनाम पत्र को पढ़ कर असमंजस में पड़ गए। 

बहुत सोच-विचार के बाद उन्होंने मामले की जांच-पड़ताल करना उचित समझा और वह आरोप पत्र जांच के लिए विभाग के अधिकारी सिगमंड गैरहार्ट को सौंप दिया। 

आस्ट्रिया में उन दिनों कानून पर धर्माध्यक्षों का प्रभाव था। उनकी आज्ञा के बिना पुलिस धर्म स्थलों में प्रवेश तक नहीं कर सकती थी। फिर भी अधिकारी महोदय ने स्थानीय धर्माध्यक्ष से आज्ञा प्राप्त कर ली और उस महिला की तलाश करने लगे। जिस कोठरी में महिला नारकीय जीवन भुगत रही थी वह 3 फीट 11 इंच लम्बी तथा 1 फुट 11 इंच चौड़ी थी। नियत समय पर एक बार भोजन-पानी दरवाजे के छेद से ही उसे मिल पाता था।

 20 वर्ष की लम्बी अवधि में उसे एक बार भी बाहर नहीं निकाला गया था और न कभी उसे नहाने अथवा कपड़े धोने की ही सुविधा प्रदान की गई थी। इतना अमानवीय कठोर दण्ड उसे किस अपराध में भुगतना पड़ा। इसका उत्तर देते हारा उसने कहा कि मैंने किसी से प्रेम किया था। पूरी बात कहे बिना ही वह फट-फट कर रोने लगी। आश्रम की प्रमुख भिक्षुणी ने उस पर लगे दुराचार का आरोप दुहराया। 

जिस पुलिस अधिकारी ने उक्त महिला का पता लगाया था, वह मारे क्रोध के कांप रहा था। उसने सफाई पेश करने वाली भिक्षुणियों से कहा कि तुम मनुष्यता से रहित शैतान की औलाद हो। जिस स्थिति में इसे 20 वर्ष रखा गया, तुम लोग उसमें 20 मिनट ही रहकर दिखलाओ। 

यह मुकदमा 23 जुलाई, 1869 को अदालत में प्रस्तुत हुआ। प्रमुख भिक्षुणी ने अपने बयान में कहा कि इस मुकदमे के द्वारा हमारे पवित्र विहार की प्रतिष्ठा नष्ट करने की अधर्मियों द्वारा निंदनीय चेष्टा की जा रही है। 

अदालत ने आश्रम के सभी कार्यकर्ताओं पर नागरिक स्वतन्त्रता के अपहरण करने का आरोप लगाया। सभी को दण्ड मिल सकता था। किन्तु अदालत बीच में ही बन्द हो गई। क्योंकि पोप तथा सम्राट ने मिलकर ऐसे अवरोध खड़े कर दिए ताकि मुकदमा चलना असम्भव हो गया। गवाहों को डरा दिया गया। इस कलंक काण्ड पर पर्दा डाल दिया गया। लेकिन क्या वे भिक्षुणियां उन डाकिनों से किसी प्रकार से कम थीं? 

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