बांग्लादेश मुक्ति युद्ध|Bangladesh Liberation War

बांग्लादेश आजादी की लड़ाई

बांग्लादेश मुक्ति युद्ध (बांग्लादेश स्वतन्त्रता का युद्ध-Bangladesh Independence War,1971 ई०) 

बांग्लादेश स्वतन्त्रता का युद्ध भारत पाकिस्तान द्वारा, तृतीय भारत-पाक युद्ध के रूप में लड़ा गया। पर अपने आरम्भिक रूप से यह ‘बांग्लादेश मुक्ति युद्ध’ था। यह पश्चिमी पाकिस्तान और पूर्वी पाकिस्तनियों के बीच संघर्ष के रूप में फूट पड़ा था। 

भारत की स्वतन्त्रता के बाद जब पाकिस्तान बना था तो उसके पक्ष में वह क्षेत्र भी गया था, जोकि 1971 ई० के बाद से बांग्लादेश कहलाया। उस समय पाकिस्तान पूर्वी पाकिस्तान और पश्चिमी पाकिस्तान की हैसियत से जाना जाता था। भारत-पाक बंटवारे में पाकिस्तान को वह हिस्सा भी मिला था, जो पूर्वी पाकिस्तान था जहां की भाषा बंगाली थी, जहां की संस्कृति पश्चिमी पाकिस्तान से अलग थी। 

बंटवारे के बाद पश्चिमी पाकिस्तान खुशहाल होता गया, पूर्वी पाकिस्तान में गरीबी और बेरोजगारी बढ़ती गयी। चुनावों में पूर्वी पाकिस्तान के लोग बराबर की साझेदारी रखते थे मगर मजलिसे सूरा (पाकिस्तान की ससंद) द्वारा उनकी खुशहाल जिन्दगी के लिए कोई उपाय न किए जाते थे। 

सन् 1970 में पाकिस्तान के आम चुनाव के वक्त पूर्वी पाकिस्तान की अवामी लीग पार्टी को पाकिस्तानी संवाद के लिए इतनी सीटे-मिल गयीं कि वह बहुमत प्राप्त पार्टी के रूप में सरकार बनाने का दावा कर सके। अवामी लीग के नेता शेख मुर्जीबुर्रहमान ने पाकिस्तान के राष्ट्रपति यायाखां से मिलकर सरकार बनाने का दावा किया। पर पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के नेता जुलिफ्कार अली मुट्टों ने भी अपना दावा पेश किया। 

राष्ट्रपति याह्या खां ने, मुजीबुर्रहमान को अपना पक्ष रखने का मौका दिए बगैर जुल्फिकार अली भुट्टो को सरकार बनाने का मौका दे दिया। 

मजलिसे-सूराके मुजीबुर्रहमान के पास 169 सदस्य थे जबकि जुल्फिकार अली भुट्टो के पास 167। दो सदस्य कम होने तथा अल्पमत पक्ष को सरकार बनाने की इजाजत देते ही बांग्लादेश के लोगों के दिलो-दिमाग में यह बात बैठ गयी कि पाकिस्तानी राष्ट्रपति ने पूर्व और पश्चिम का खुलकर भेदभाव किया। 

पूर्वी पाकिस्तान की जनता ने इसे जारियत की हत्या माना, और विरोध में आन्दोलन, प्रदर्शन करने लगे। पूर्वी पाकिस्तान के लोगों द्वारा आन्दोलन प्रदर्शन का गला बुरी तरह घोटा गया। सैनिकों और पुलिस ने आन्दोलनकारियों को पकड़-पकड़ कर जेलों में डालना शुरू कर दिया। 

इस नाइंसाफी पर पूरा पूर्वी पाकिस्तान विद्रोही हो गया। 25-26 मार्च 1971 की रात 1:30 पर मुर्जीबुर्रहमान को गिरफ्तार कर लिया गया। 

रेडियो पाकिस्तान के खबर के अनुसार 29 मार्च, 1971 को मुर्जीबुरहमान को पश्चिमी पाकिस्तान ले जाया गया। 

पूर्वी पाकिस्तान के अवामी लीग के नेताओं ने 9 अप्रैल, 1971 को ‘बांग्लादेश की स्वतन्त्रता’ घोषित कर दी। पूर्वी पाकिस्तान के अर्धसैनिक बल और पाकिस्तान राइफल्स ने विद्रोह कर दिया। नागरिकों की एक छापामार सेना ‘मुक्ति वाहिनी’ का गठन किया गया।

बांग्लादेश मुक्ति में भारत की भागीदारी

बांग्लादेश स्वतन्त्रता

पाकिस्तान की सेना में ‘मुक्ति विद्रोह’ करने के लिए पूर्वी पाकिस्तान की बंगाली जनसंख्या के खिलाफ व्यापक संहार किया। अल्प संख्यक हिन्दू आबादी वाले क्षेत्रों में यह संहार कुछ ज्यादह ही हुआ। 

लगभग 1,00,000 लोग भारत में शरणार्थी के रूप में दाखिल हो गए। उनके दाखिल होने का मार्ग पश्चिमी बंगला, बिहार, असम, मेघालय और त्रिपुरा की सीमाएं थीं। वे विस्थापित थे, अपनी जन्मभूमि में जुल्म सह रहे थे। सपरिवार पलायन करके भारत में शरण लेने आ रहे थे। उक्त प्रदेशों की प्रान्तीय सरकारों ने शरणार्थी शिविर स्थापित करके उन्हें शरण दी। 

पूर्वी पाकिस्तान में सैनिक शासन को घोषणा कर दी गयी। राष्ट्रपति यह्याखां का दमन चक्र तेज हो गया था। 

भारत की प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी ने इस नरसंहार के खिलाफ विश्व की महान् शक्तियों से हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया। मगर किसी ने ध्यान न दिया। 

पूर्वी पाकिस्तान की मुक्ति का संग्राम याह्या खां से दबाए न दब रहा था। कुछ दिनों के अन्दर ही उन्होंने ‘बांग्लादेश’ की घोषणा कर दी। भारत ने ‘बांग्लादेश’ को मान्यता दे दी। 

नवम्बर, 1971 ई० तक पूर्वी पाकिस्तान में भारतीय सीमाओं पर पाकिस्तानी सैनिकों का जमाव पूरी तरह से हो गया था। 23 नवम्बर को जनरल यया खां ने आपात्कालीन स्थिति की घोषणा करके पाकिस्तानियों को भारत से युद्ध के लिए तैयार रहने का अह्वान दिया। 3 दिसम्बर, 1971 की शाम 5:40 पर पाकिस्तानी वायुसेना ने भारत के कई मोर्चे पर हवाई हमले करके युद्ध आरम्भ कर दिया। 

भारत भी युद्ध में कूद पड़ा। पूर्वी और पश्चिमी दोनों ही मोर्चे पर जल, स्थल तथा वायुसेना का पूरी ताकत से इस्तेमाल करके भीषण आक्रमण आरम्भ कर दिया। 

3 दिसम्बर, 1971 ई० को आरम्भ हुआ यह युद्ध 17 दिसम्बर, 1971 ई० को समाप्त हो गया जबकि बांग्लादेश में पाकिस्तान की लड़ती हुई एक लाख फौज को पाकिस्तानी जनरल सहित भारतीय सेना के जांबाजों ने आत्मसमर्पण करने को मजबूर कर दिया। 

विश्व के इतिहास में, दो देशों के बीच होने वाले युद्ध में इतनी बड़ी फौज ने अपने जनरल के रहते आत्मसमर्पण किया हो, ऐसा विवरण नहीं मिलता। पाकिस्तान की भयानक पराजय हुई थी। 

हिन्दुस्तान से हुई से शर्मनाक पराजय का दोष, पाकिस्तानी अवाम ने जनरल यह्या खां को दिया। यह्या खां राष्ट्रपति पद से हट गए। जुल्फिकार अली भुट्टो ने पाकिस्तान के राष्ट्रपति का पद भार वहन किया। 

भारत के लिए पाकिस्तानी युद्धबंदी और बांग्लादेशी शरणार्थी बहुत बड़ी आर्थिक समस्या के रूप में थे।

28 जून, 1972 को एक शिखर सम्मेलन का आयोजन हुआ, जो 2 जुलाई, 1972 तक चलता रहा। इस शिखर सम्मेलन ने भारत की ओर से पाकिस्तानी राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो भी उपस्थित थे। 

3 जुलाई, 1972 को शिमला शिखर सम्मेलन में इन्दिरा गांधी और भुट्टो के 6 सूत्री संधि पत्र पर हस्ताक्षर हुए। 

1971 के भारत-पाक युद्ध के नतीजे में, दुनिया के नक्शे में एक नया देश उभरकर सामने आया था-बांग्लादेश। इस देश के सर्वमान्य नेता थे शेख मुर्जीबुर्रहमान। उन्हें पाकिस्तान को रिहा करना पड़ा था और उन्होंने बांग्लादेश में ‘बंग बंधु’ के नाम से सम्मान प्राप्त किया।

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