बच्चों की कहानियां-परोपकारी महात्मा 

परोपकारी महात्मा 

परोपकारी महात्मा 

एक थे महात्मा। उनके अनेक शिष्य थे। शिष्यों का महात्माजी के पास आना-जाना लगा रहता था। महात्मा जी भक्तों को तरह तरह के उपदेश दिया करते थे। उनकी ज्ञान भरी बातें भक्तगण बहुत ध्यान से सुना करते थे।महात्माजी दूसरों के दुख-सुख का भी ध्यान रखते थे। वह हमेशा परोपकार में लगे रहते थे। 

महात्मा जी समय के साथ बूढ़े हो चले थे।बुढ़ापे का शरीर और लोगों की चिंता से महात्मा जी दुबले होने लगे। इससे उनका स्वास्थ्य गिरने लगा।उनके गिरते स्वास्थ्य से भक्तचिंतित होगए। उन्होंने महात्माजी के लिएखानाभेजनाशुरू कर दिया।रोज फल दूध के साथ-साथ तरह-तरह का भोजन भक्तों द्वारा लाया जाता। पर सब बेकार।भक्त जो भी लाते, महात्मा जी उन्हें उन्हीं के बीच बोट देते थे। 

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परोपकारी महात्मा 

महात्मा जी सबसे कहते, “जीवन भर खाया, अब कितना खाऊ? मैं तो जाने वाला है। जिन्हें रहना है, उन्हें खाने को देरहा हूँ।” महात्माजी बस नाम मात्र का भोजन करते थे। 

महात्मा जी के भक्तों को चिंता लगी हुई थी। सभी चाहते थे कि महात्मा जी उनके बीच बने रहें। उन्हें लोग स्वस्थ और ठीक-ठाक देखना चाहते थे। 

एक भक्त ने उपाय सोचा। उसने महात्माजीसे पूछा, “आपने बताया है कि मृत्यु के बाद भी हमें दूसरों के काम आना चाहिए। मृत्यु के बाद आप भी क्या किसी के काम आएंगे?” 

मेरा मृत शरीर मांसाहारी पशु-पक्षियों और कीटों के काम आएगा” महात्मा जी ने आश्वस्त होकर कहा,”वेसब मेरे मृत शरीर की बोटी-बोटी खा जाएंगे।” 

श्रद्धालुभक्त ने व्यंग्यके लहजे में कहा, “बोटी-मांस ? शरीर में मांस हो, तब तो कोई खाएगा? सूखी हड्डियों के ढांचे में उन्हें क्या मिलेगा? इसलिए मरने से पहले आप मोटे-तगड़े हो जाएं। इससे मरने के बाद आपके मृत शरीर से कुछजीवों का तो पोषण होगा।” 

महात्माजी को भक्त की बात लगगई।मरने की बात सोचने के बदले वह भक्तों का लाया फल दूध आदि खाने लगे। इसका अच्छा प्रभाव हुआ।कुछ ही दिनों में वह स्वस्थ हो गए। अपने भक्तों को पहले की तरह वह फिर से उपदेश देने लगे।

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