मुनक्का महान की दुकान

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बच्चों की कहानियाँ –मुनक्का महान की दुकान

एक दिन मुहल्ले वालों की नींद खुली तो देखा मियाँ मुनक्का चबूतरे पर जामुनों की दुकान सजाए बैठे हैं और हाथ हिला ‘ला कर ऐसी आवाज लगा रहे हैं जैसे जामुनों के ढेर पर कोई आ फड़फड़ा रहा हो, “आइए मेहरबान, कद्रदान ! आइए, र्मी का मेवा खाइए।” देखते ही देखते सारा मुहल्ला इकट्ठा हो गया। पहलवान पिस्ता अपनी घुटी हुई खोपड़ी पर हाथ फिराते, लुंगी समेटे नज़दीक आए और मियाँ मुनक्का को छू-छू कर देखने लगे। मियाँ मुनक्का ने तिलमिला कर उन्हें झटका तो वह हैरानी से चीख-चीख कर कहने लगे, “असली है, भाइयों ये असली मियाँ मुनक्का है।” 

“अमाँ, तुम तो गज़ब के आदमी हो? असली नहीं तो क्या मेरा भूत यहाँ खड़ा है?” मियाँ मुनक्का खीझकर बोले। 

“हमें तो यही लगा।” पहलवान पिस्ता बोले, “कभी तो तुम्हें काम-धाम करते देखा नहीं। जेब में फूटी कौड़ी कभी रही नहीं। यह रातों-रात व्यापार कैसे शुरू कर दिया, यकीन नहीं आता।” 

“अरे पहलवान, इंसान की किस्मत बदलते देर नहीं लगा बस, यह खुदा की मेहरबानी ही समझो।” मियाँ मुनक्का त कर बोले। 

बड़ी देर से सोच-विचार में पड़े मिर्जा चिलगोजा टोपी उतार कर सिर खुजलाते हुए बोले, “यार, खुदा की मेहरबानी से गधा तो पहलवान हो सकता है पर तुम दुकानदारी करने लग जाओ, यह नामुमकिन-सा लगता है।” 

मियाँ मुनक्का तिलमिला कर कोई जवाब देते कि हकीम किशमिश करीब आकर बोले, “लेकिन कुछ भी कहो जामुन बहुत उम्दा किस्म के हैं। इतने बड़े जामुन तो सिर्फ खाँ साहब की बगिया में ही मिलते हैं।” 

“अमाँ हकीम साहब, एक जामुन चख कर तो देखिए… एकदम मलाई है, मलाई । मुँह में रखते ही कपूर जैसा घुल जाता है। इसकी गुठली गेहूँ से ज्यादा नहीं होगी। एक बार खाएँगे तो सब भूल जाएँगे।” मियाँ मुनक्का ऐंठ कर बोले। 

सब के सब चखने के बहाने जामुन उठा-उठा कर खाने लगे। मियाँ मुनक्का हड़बड़ा गए कि इस तरह तो सारे जामुन चखने में ही खत्म हो जाएंगे। वह चिल्ला कर बोले, “देखो, यारो घोड़ा अगर घास से यारी करेगा तो भूखा मर जाएगा। तुम सब हमारे पक्के यार हो। पर दुकानदारी में कोई यारी नहीं। बिना पैसे के किसी को एक जामुन भी नहीं उठाने दूंगा।” 

“यार, तुम तो बड़े बेमुरौवत निकले।” मिर्जा चिलगोजा, जो लोगों की भीड़ में जामुन उठाने से रह गए थे, तिलमिला कर बोला, “अच्छा बताओ, क्या हिसाब दिए?” 

“40 रुपया पाव।” मियाँ मुनक्का ने सपाट ढंग से कहा। 

“क्या…? 160 रुपये किलो…? इतने में तो दो किलो सेब मिल जाएगा।” गोल-मटोल लाला बादाम उछालकर बोले। 

“तो जाकर सेब खाओ न, लाला। कौन रोके है तुम्हें ? लेकिन फिर हकीम साहब के पास दौड़े-दौड़े मत जाना कि मेरी शुगर बढ़ गई।” मियाँ मुनक्का के जवाब ने लाला बादाम की मूंछे नीची कर दी। सचमुच उन्हें शुगर की बीमारी थी। शादी-ब्याह में मुफ्त का माल देख-देख कर ललचाते, पर खाने से डरते कि बाद में हकीम किशमिश के दवाखाने पर जेब ढीली करनी पड़ेगी। फलों की तासीर तो उन्हें नहीं पता थी पर इतना जरूर जानते थे कि जामुन शुगर की बीमारी में फायदेमंद होता है। खिसीयाई हँसी हँसते हुए बोले, “अगर 50 रुपये में दो तो 2 किलो ले लूँगा।

वैसे तो 160 रुपये में बेच रहा हूँ, पर तुम अपने दोस्त ठहरे, 5 रुपये कम दे देना। लेकिन इससे कम किसी कीमत पर नहीं। लेना हो तो लो, वर्ना चलते बनो।” मियाँ मुनक्का बेरुखी से बोले। 

लाला बादाम भाव-ताव करने में पक्के थे। दुकानदार की नब्ज पकड़ना जानते थे। बोले, “ठीक है, तो फिर अपने जार अपने पास रखो। मैं तो चला।” 

यह कह कर वह चल दिए। सोच रहे थे मियाँ मुनक्का पीछ से आवाज़ देंगे। बोहनी का टाइम है। ऐसा ग्राहक कहाँ मिलेगा, जो 2 किलो एक साथ खरीद ले। पर काफी दूर निकल जाने के बाद भी मियाँ मुनक्का ने आवाज़ न दी तो मन मार कर लौट आए। बड़ी तकलीफ से 300 रुपये निकाले और देते हुए बोले, “इतने में 2 किलो देना हो तो दे दो, वर्ना छोड़ो।” लोगों ने भी उनकी पुरजोर वकालत की। आखिरकार बड़ी हुज्जत के बाद मियाँ मुनक्का तैयार हो गए। 

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बस, फिर क्या था? लोगों में जामुन खरीदने की होड़ लग गई। पल भर में मियाँ मुनक्का के जामुन साफ। मियाँ मुनक्का ने दुकान बढ़ा दी और ऐंठ कर ऐसा चले जैसे कोई जंग फतह कर ली हो। दो दिन बाद लोगों ने देखा मियाँ मुनक्का आमों की दुकान सजाए बैठे हैं। एक से बढ़कर दशहरी आम। खूब बड़े और पके हुए। रंग ऐसा कि देखने से मुँह में मिठास घुलने लगे। आसपास मक्खियों और ततैयों के झुंड आमों की मिठास का प्रचार करते हुए भनभना रहे थे। मियाँ मुनक्का बीच-बीच में उन्हें मटमैली साफी से उड़ाते हुए आवाज दे रहे थे, “आइए, मेहरबान कद्रदान ! फलों के राजा का जायका लीजिए। एक बार खाएँगे, बार-बार आएँगे।” 

लोगों की भीड़ फिर इक्ट्ठा हो गई। लोगों को लगा कि मियाँ मुनक्का सचमुच सुधर गए हैं। हकीम किशमिश आँखें फाड़ते हुए बोले, “क्या शानदार दशहरी लाए हो मियाँ । असली मलिहाबादी हैं। जरा-सा छू भर लो तो हाथ मिठास से चिपचिपाने लगते हैं। ऐसे आम तो दुल्लन की आढ़त पर देखे हैं।” 

“सही कहा हकीम साहब।” मिर्जा चिलगोजा बोले, “सिफ देखे ही हैं। इतने महँगे आम तो शहर के बड़े-बड़े लोगों को ही मयस्सर होते हैं।” 

“नहीं जनाब, आज मुनक्का ने आप लोगों के लिए दिल खोल दिया है। सिर्फ 40 रुपये किलो।” मियाँ मुनक्का हड़बड़ी में बोले, “इतने सस्ते आम दुनिया में कहीं न मिलेंगे। जिसे चाहिए ले जाओ। लेकिन सिर्फ 10 बजे तक। लोगों की चहलकदमी बढ़ने से पहले ही दुकान बढ़ा दूंगा।” 

इतने कम दामों में इतना बढ़िया आम । लोग टूट पड़े। देखते ही देखते मियाँ मुनक्का की दुकान साफ हो गई। उन्होंने पैसों की बकसिया बगल में दबाई और कपड़े झाड़कर लंबे-लंबे डग भरते हुए अपने घर निकल गए। 

मुहल्ले वाले हैरत में थे। भला मियाँ मुनक्का के कान में किसने क्या फूंक दिया कि अपना आलस छोड़कर दुकानदारी करने लगे। वर्ना उनका तो एक ही उसूल था – ‘अजगर करै न चाकरी, पंछी करै न काम…’ हैरत की बात यह भी थी कि उनके पास दुकानदारी के लिए पैसा कहाँ से आया? पैसों से तो उनका साथ दिन-रात जैसा था। दर्जी भी उनके कुर्ते में जेब नहीं लगाता था। 

“अमाँ, मुझे तो लगता है मियाँ मुनक्का अपने रामपुर वाले चाचा से मोटा माल ऐंठ लाए हैं।” हकीम किशमिश ने अपनी आशंका जाहिर की। 

“अजी छोड़िए भी।” मिर्जा चिलगोजा बोले, “मैं तो उनके साथ कई बार रामपुर गया हूँ। चचा मियाँ फक्कड़ी में इनसे भी दस कदम आगे हैं। पुरखों की कोठी के चौखट-दरवाजे बेच कर खर्चे का जुगाड़ करते हैं। वह भला क्या दे पाएँगे?” 

मझे तो लगता है मियाँ मुनक्का के हाथ कोई खजाना लग गया है। परसों कुदाल लेकर आँगन में जाने क्या खटपट कर रहे थे।” चचा छुहार बोले। 

“हाँ, भैया सही कह रहे हो। आजकल वह घर से निकलते भी नहीं। दिन भर दरवाजा बंद करके घर में ही पड़े रहते हैं।” चिरौंजी बनिया बोला। 

“कल एक पहर रात गए मैंने उन्हें मुहल्ले से बाहर जाते देखा था। टोका तो एकदम हड़बड़ा गए और कोई जवाब न दे सके।” सुपारी बोला। 

“हैरत की बात यह भी है कि वह लोगों की आमद-रफ्त बढ़ने से पहले ही दुकान बढ़ा देते हैं। दुकानदारी के वक्त भी ऐसा हड़बड़ाए रहते हैं, जैसे किसी से डर रहे हों।” हकीम किशमिश गंभीर मुद्रा में बोले। 

देर तक तरह-तरह की बातें होती रहीं। सब अपनी-अपनी राय देते रहे। पर सच्चाई किसी को नहीं पता चली। दो एक दिन बाद लोगों ने देखा मियाँ मुनक्का खरबूजों की दुकान लगाए हुए हैं। 

लोगों की भीड़ फिर इकट्ठा हो गई। पर इस बार हकीम किशमिश आगे बढ़कर बोले, “देखो मियाँ मुनक्का, आज तुम्हें सारा राज़ बताना ही पड़ेगा। हम लोगों ने तय किया है कि जब तक असलियत नहीं बताओगे, कोई कुछ नहीं खरीदेगा।” 

मियाँ मुनक्का एकदम सकपका गए। पर अगले ही पल सँभलते हुए बोले, “अमाँ, आप लोगों को आम खाने से मतलब है कि पेड़ गिनने से? इतने सस्ते में घर बैठे ताजा फल दे रहा हूँ। मंडी जाकर लाना पड़ता तो ज्यादा पैसे भी खर्च होते और कायदे का सौदा भी न मिलता। सस्ते में मिल रहा है इसलिए ऐंठ दिखा रहे हो।” 

“देखो, तुम हम सबके पक्के यार हो। इसलिए सच्चाई जानने का हक बनता है कि नहीं? भला ऐसा कौन हो सकता है कि जिसकी जेब में फूटी कौड़ी न रहती हो, एकाएक व्यापार शुरू र दे?” लाला बादाम बोले।। 

“झूठमूठ दोस्ती की दुहाई मत दो, लाला। सच तो यह है कि मुझे कमाता देख कर तुम सब जलने लगे हो। तुम्हें लगता है कि इसके पास भी पैसे हो गए तो यह हमको क्यों घास डालने लगा?” मियाँ मुनक्का चिढ़कर बोले। । अभी यह बातें हो ही रही थीं कि गली के सिरे पर लोगों के दौड़ने-चिल्लाने का शोर सुनाई दिया, “पकड़ लो, मारो यही है, जाने न पाए।”

सबने पीछे पलटकर देखा तो लौंगिया अहीर अपने मुस्टंडों के साथ लिए गुस्से में फनफनाता दौड़ा आ रहा था – “आज इसकी हड्डियों का ऐसा चूरमा बनाऊँगा कि अब ये दोबारा चोरी करना भूल जाएगा। रात की रात सारा खेत साफ कर दिया। मैं बेचारी भैंसियों पर नाहक डंडे बरसा रहा था। अभी सबक सिखाता हूँ।” __ मियाँ मुनक्का के होश फाख्ता हो गए। जब तक लोग कुछ समझते कि वह दुकान छोड़ कर भाग खड़े हुए। पर कहते हैं न कि जब मुसीबत आती है तो चारों तरफ से आती है। अभी वह थोड़ी दूर ही भागे थे कि सामने से दुल्लन आढ़ती अपने आदमियों के साथ लाठी-डंडे लिए आता दिखा। 

“इसने रातों-रात मेरे सबसे महँगे आमों की चार पेटियाँ उड़ा लीं। आज तो इसकी अच्छी मरम्मत करूँगा।” 

मियाँ मुनक्का बटेर की तरह फड़फड़ाने लगे। मुसीबत सि पर खड़ी थी। बचने का कोई उपाय नहीं था। उन्होंने आव दे न ताव, लाला बादाम की पीठ पर पैर रखकर दीवार पर चढ़े। सोचा उस पार कूदकर भाग जाएँगे। लेकिन दीवार के उस पार का नजारा देखकर उनके पैरों में पानी भर आया। उस पार खाँ साहब लाल-लाल आँखें लिए, मूंछे फड़फड़ाते हुए अपनी रायफल ताने खड़े थे। 

“वहीं रुका रह, कमबख्त अभी तुझे अपनी दुनाली से जामुन की तरह टपकाता हूँ। मेरी बगिया में घुसने की हिम्मत कैसे 

हुई?” इसके बाद मियाँ मुनक्का का क्या हुआ होगा, यह बताने की जरूरत है क्या?

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