बाबर-सयाबानी युद्ध |Babar-Sayabani War History in hindi

Babar-Sayabani War History in hindi

बाबर-सयाबानी युद्ध (Babar-Sayabani War) 1500-15 

भारत में मुग़ल साम्राज्य का संस्थापक बाबर का जन्म 14 फरवरी, 1483 ई० को फरगना घाटी के अन्दीजान नामक स्थान पर हुआ था। इस इलाके को समरकंद के समीप का इलाका माना जाता है। बाबर ने फरगना घाटी के सम्बन्ध में खुद विवरण दिया है कि ‘यहां जाड़े की ऋतु में ही खुजन्द और समरकंद से ही यहां प्रवेश किया जा सकता है।’ 

बाबर की अभी किशोरावस्था थी कि उसके पिता का निधन हो गया। उसके चचा ने उसके फरगना रियासत पर अधिकार कर उसे निर्वासित जीवन जीने को विवश कर दिया। बाबर महत्वाकांक्षी था-उसने अपने पिता के जमाने के वफादारों तथा किसानों को जोड़ा और अपनी सेना बना ली। उसने अपने खानदानी लोगों से जंग करने के बजाय नए क्षेत्र विजित करने का अभियान बनाया। अपने बहादुर सैनिकों की सहायता से उसने शीघ्र ही समरकन्द जीत लिया। 

समरकन्द एक बड़ा राज्य था। बाबर वहां का बादशाह बन चुका था। उसके बाद उसने अदीजान और फरगना जीतने के लिए फौजकशी की। उसके हमले की खबर पाते ही अन्दीजान पर कब्जा जमाए बैठे लोग भाग खड़े हुए। 

बाबर उस समय केवल 17 वर्ष का था जबकि उसकी योद्धा शक्ति का डंका दूर-दूर तक बज उठा था। 

सन् 1500 में अनेक सरदारों ने एकत्र होकर बुखारा के शासक सयाबानी को सहायता प्रदान कर दी। उस समय बुखारा, समरकन्द के इलाके में उजबेक सरदारों का जोर था। उजबेक सरदार जोहरा बेगी आगा नामक महिला को अत्यन्त सम्मान देते थे। कुछ उजबेक सरदारों ने जोहरा बेगी आगा को बाबर के आक्रमण का भय दिखाकर उसकी ओर से सयाबानी के समर्थन का एलान करवा दिया। इस तरह बुखारा के शासक सयाबानी का पक्ष, समस्त उजबेक सरदारों को अपने पाले में आने से अत्यन्त मजबूत हो गया। 

सयाबानी ने बढ़कर समरकन्द पर आक्रमण किया 

Babar-Sayabani War History in hindi

1500-1501 ई० में बाबर फरगना में था, सयाबानी ने उसके समरकन्द आने का इन्तजार किए बगैर अपनी सेना बुखारा से समरकन्द की ओर कूच कर दी। उसने बुखारा से समरकन्द के बीच पड़ने वाले सभी इलाकों में मिर्जाओं की रियासतों 

पर जमकर कत्ले आम किया, लूट-पाट की। (ऐसा इसलिए क्योंकि बाबर खुद मिर्जा वंश का था और सयाबानी मिर्जाओं को जीतकर बाबर को अपनी शक्ति दिखाना चाहता था।) 

बाबर ने सयाबानी के उत्पात का समाचार पाते ही फौरन फरगना से समरकन्द के लिए कूच किया। उसकी सारी सेना समरकन्द में ही थी-साथ में केवल कुछ सुरक्षा टुकड़ी थी। पर उस टुकड़ी के सारे सैनिक वीर योद्धा थे और बाबर पर जान कुर्बान करने का जज्बा रखते थे। 

मुट्ठी भर सैनिकों के होने से बाबर घबराया नहीं, ना ही उसने सयाबानी को सेना को टक्कर देने से अपने आपको रोका ही।

समरकन्द पहुंचने से पहले ही ‘सरायपुल’ नामक स्थान पर बाबर, सयाबानी की सेना पर टूट पड़ा। उसने बड़ी बहादुरी के साथ सायाबानी की सेना को गाजर-मूली की तरह काट डाला। 

लेकिन, उस समय तक सयाबानी समरकन्द तक जा पहुंचा था। उसने समरकन्द फतह कर ली थी। समरकन्द पर सयाबानी का कब्जा हो गया है, इस समाचार को जानते ही बाबर के विश्वस्त साथियों में से भी कुछ ने उसका रास्ते में साथ छोड़ दिया। बाबर इस घटना से भी न घबराया। 

कुछ समय बाद ही वह समरकन्द पहुंच गया। उसके पास 70-80 ही विश्वस्त साथी थे। इसके बाद की घटना विश्व इतिहास में अपने ढंग से अनोखी है। 70 80 सैनिकों के बल पर सयाबानी के हजारों सैनिकों से युक्त, जीते हुए समरकन्द पर विजय पाना ख्वाब जैसी बात थी। पर उस ख्वाब को बाबर ने अपने शेर जैसे हौसले से सच कर दिखाया। वह समरकन्द के आम शहदियों के रूप में समरकन्द के बाजारों में घूमा। उसने इस बात को जाना कि समरकन्दवासी सयाबानी की हुकूमत को पसन्द नहीं करते, उसकी ही हुकूमत को याद करते हैं। 

समरकन्दवासियों के इस विश्वास के सहारे बाबर, एक रात किले की दीवार के पार्श्व में मानव शृंखला (पिरामिड) बना किले के ऊपर चढ़ गया। फिर एक-एक करके उसके 70-80 साथी भी ऊपर चढ़ गए। किले में अन्दर पड़ी सयाबानी सेना पर रात्रि-धावा बोलकर बाबर ने भयानक मार काट मचा दी। किले का द्वार खोल दिया गया। समरकन्द में हर तरफ शोर मचा दिया गया कि ‘बाबर लौट आया है।’ सयाबानी की सेना से बाबर उस समय भी युद्ध कर रहा था जबकि सुबह का उजाला फैल चुका था। भोर का उजाला फूटते ही समरकन्द की जनता लाठी-डंडे, ईंट पत्थर लिए किले की ओर दौड़ पड़ी। सयाबानी के सैनिकों पर धावा बोल दिया। समरकन्द की जनता ने सयाबानी के सैनिकों को पागल कुत्तों की तरह दौड़ा-दौड़ा कर मारा। इस तरह बाबर एक बार फिर समरकन्द का बादशाह बन गया था। सयाबानी की सारी सेना मारी जा चुकी थी।

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