अवकाश का उपयोग पर निबंध

अवकाश का उपयोग पर निबंध

अवकाश का उपयोग पर निबंध | Avkash ka Upyog par nibandh 

काम ! काम !! काम !!! कोल्हू के बैल की तरह दिन-रात जुटे रहना या पनचक्की के पंखे की तरह घूमते रहना ही वास्तविक जीवन नहीं है। जो व्यक्ति अहर्निश यंत्र की भाँति जूझते रहते हैं, उनकी शक्ति ही क्षीण नहीं होती, उनकी संभावनाओं के द्वार ही बंद नहीं होते, उनकी एकरसता ही उनकी शिराओं को शिथिल नहीं कर देती, वरन् उनका जीवन भी निरानंद हो जाता है। सांसारिक कार्यों में उलझे व्यक्ति का तन-मन इतना रिस जाता है कि वर्ड्सवर्थ ने ठीक ही कहा है- 

The world is too much with us, late and soon, 

Getting and spending we lay waste our powers.

परिवार का दुःसह भार उठाने, जीवनस्तर बढ़ाने और झूठी प्रतिष्ठा पाने के लिए हमें अधिकाधिक अर्थ की आवश्यकता होती है। इस अर्थसंग्रह में हमें एड़ी-चोटी का पसीना एक करना पड़ता है, दिन-रात घड़ी के पेंडुलम की भाँति डोलना पड़ता है, किंतु हमारे पास दो क्षण का अवकाश नहीं कि हम अपनी आत्मा के अनंत सागर में उतरने की चेष्टा करें, जहाँ शक्ति का मल स्रोत छिपा है। हम दो क्षण के लिए उस ओर नहीं झाँकना चाहते, जहाँ अहरह मधु-ज्योत्स्ना छिटकती रहती है, जहाँ मोहक संगीत का स्वर लहराता है। आत्मा के सागर में उतरने, उसके भीतर परमात्मा के दिव्यसंगीत सुनने, मन के दर्पण में झाँकने का अवकाश नहीं रह गया है। अतः, जावन में ईश्वर की खोज कितनी आवश्यक है, उतनी ही व्यस्त जीवन में अवकाश की खोज। 

अवकाश मनुष्य को यांत्रिक दिनचर्या के कारागार से निकालकर उन्मुक्त वायु में विच रित करा देनेवाला दैवी वरदान है। यह ऐसा श्यामल मेघ है. जो हमारे परितषित-परिशष्क जीवन को रसमय बना देता है। अवकाश ऐसा अस्वस्थतरु है, जिसकी छतनार डालियों पर मन की बलबल बेहिचक चहकती है, यह ऐसा सांध्य नीलगगन है, जिसमें मनुष्य कल्पना के रंगीन डैने फड़फड़ाता अवनि और अंबर को एक डोर में बाँधता रहता हैं। 

अवकाश ऐसी मधुबेला है, जिसमें परेच्छा के जुए में जुता रहना नहीं पड़ता, वरन् स्वेच्छा से सब-कुछ किया जाता है। अवकाश की घड़ी में किसी मालिक की बिजली-छड़ी का भय नहीं व्यापता, किसी अधिकारी द्वारा सेवापुस्तिका पर कुछ लिखे जाने के डर की खौफनाक तलवार सर पर लटकती नहीं रहती, वरन् इस घड़ी में हर व्यक्ति अपना प्रभु स्वयं होता है। ये क्षण दूसरों के द्वारा क्रीत या निर्णीत नहीं होते, वरन् अपनी मधुर इच्छा से अनुप्राणित-आंदोलित होते हैं। 

इस प्रकार, यह स्पष्ट है कि जीवन के काँटों में यदि कोई फल है तो अवकाश. जीवन के रेगिस्तान में यदि कोई नखलिस्तान है तो अवकाश। 

अवकाश के कई प्रकार हो सकते हैं। कार्यांतरालवर्ती अवकाश, सप्ताहांत अवकाश तथा दीर्घ अवकाश। स्कूल में पढ़नेवाले छात्रों को दिन की सात घंटियों के बीच चार घटियों के बाद अवकाश रहता है। कॉलेज में कहीं चार घंटियों के पश्चात् चार बीच-बीच में एक-दो घंटियों पर अवकाश रहता है। इसी प्रकार, सचिवालयमा सरकारी कार्यालयों में काम करनेवालों को मध्याह्न में अवकाश रहता है। कारखाना म काम करनेवालों के लिए अपनी पारी (shift) के बीच थोड़ा अवकाश रहता हा सा अवकाश कार्य की एकरसता दर कर नई स्फर्ति देने के लिए आवश्यक होता है। महात्मा गाँधी तो अपने अत्यधिक व्यस्त समय में पाँच मिनट का समय निकाल लेते थे और विश्रास कर ताजा हो जाते थे। 

साप्ताहिक अवकाश पाँच-छह दिनों के यांत्रिक जीवन से विराम पाने के लिए दिया जाता है। स्कूल, कॉलेज, सरकारी कार्यालय में हर रविवार को छुट्टी रहती है। दुकानदारों के लिए सप्ताह के किसी एक दिन दूकानबंदी आवश्यक होती है। कारखाना, डाक-तार, रेल आदि विभागों में काम करनेवालों को सप्ताह में एक दिन की छुट्टी रहती है। सात दिनों में एक दिन अपने मनबहलाव-मनोरंजन का दिन होता है। उस दिन कार्यालय, दकान या स्कूल-कॉलेज में भागने को शीघ्रता नहीं रहती, असिद्ध भोजन जल्दी-जल्दी गटककर दौडने की जरूरत नहीं रहती, वही दैनंदिन काम नहीं करना पड़ता. वरन वह तो इतमीनान का दिन होता है। बाकी दिन पत्नी, दोस्त-मित्रों से घड़ीभर चैन से बात करने का समय नहीं मिलता। छह दिन तो सोए बच्चों की केवल लंबाई देखनी पडती है। इस दिन इतना समय तो है कि दो घड़ी बच्चों के साथ घुलमिलकर बात की जाए। घर के पास ही इतना सुंदर पार्क है, जहाँ शाम को रंगीन फव्वारे का इंद्रधनुष लहराता रहता है, किंतु समय कहाँ है कि उसे देखा जाए ! खैर, इस दिन तो दो घड़ी वहाँ बैठा जा सकता है, बगल में छोटी-सी खूबसूरत बगिया रंग-बिरंगे फूलों की डोलची लिए गंध का उपहार देने को व्याकुल है। इस दिन समय है कि जी-भर उसकी भीनी गंध से मन-प्राणों को मुअत्तर कर लिया जाए। 

कुछ दुकानदार इस अवकाश के दिन नियम की अवहेलना करते हैं। वे सोचते हैं कि इस दिन तो और दुकानें बंद रहेंगी, अतः दुकान खोलकर नहीं, तो आधे पल्ले की खुली आड़ से ही जरूरतमंद ग्राहकों की वे जेबें कतरेंगे और अच्छा मुनाफा कमा लेंगे। किंतु, कुछ पैसों के लिए अवकाश के इस स्वर्णसुयोग की हत्या करना कतई उचित नहीं। विदेशों में छुट्टी रोकने के लिए बड़ी-से-बड़ी रकम देने पर भी काम हराम माना जाता है। 

अब रही प्रलंब अवकाश की बात। स्कूल, कॉलेज तथा कचहरियों में अवकाश रविवार के अतिरिक्त लगभग तीन महीने का होता है। इनमें ग्रीष्म के लगभग दो महीने, पज़ा के बीस-पचीस दिन, होली तथा बड़ा दिन के लगभग पाँच-छह दिन अवकाश रहते हैं। 

ऐसे अवकाशों में छात्रों को पर्याप्त समय मिलता है। विशेषतः, उन्हें दीर्घ अवकाशों को केवल मनोरंजन-मनोविनोद में नष्ट नहीं कर देना चाहिए। गर्मी की छुट्टी हुई, तो बस चांडाल-चौकड़ी जम गई। ताश-शतरंज या व्यर्थ की गपबाजी में इन लंबी छुट्टियों का बहुमूल्य समय नष्ट करना उचित नहीं। उन्हें इस बीच पढ़ाए गए पाठों की आवृत्ति करनी चाहिए, उसे माँजते रहना चाहिए, ताकि वे अपने वर्ग में सर्वाधिक अंक प्राप्त कर सकें। ऐसी छुट्टियों में उन्हें समाजसेवा, ग्रामसुधार, निरक्षरता-निराकरण, प्रौढ़ शिक्षा आदि अनेक प्रकार के कामों में भी थोड़ा समय देना चाहिए। स्वास्थ्य-सुधार के लिए भी स्थान-परिवर्तन किया जा सकता है। इन लंबी छुट्टियों में ही देश-दर्शन किया जा सकता है। शिक्षा का अर्थ किताबी कीड़ा बनना नहीं है, वरन् उन्हें समय निकालकर प्रकृति के खुले पृष्ठों का निरीक्षण करना चाहिए। महाकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने मृगशाला की दीवारों को तोड़कर प्रकृति की उन्मुक्त गोद में विचरण करना मानसिक विकास के लिए आवश्यक माना है। 

‘शिक्षकों-प्राध्यापकों के लिए भी आवश्यक है कि इस अवकाश की अवधि को वे साधना एवं चिंतन में लगा दें, अपने ज्ञानक्षितिज का विस्तार करें, ताकि स्कूल या कॉलेज खुलने के पश्चात् वे ज्ञान की नई ज्योति अपने छात्रसमुदाय में वितरित कर सकें, अगतिशील समाज को नया मार्गदर्शन दे सकें। विधिवेत्ताओं के लिए भी आवश्यक है कि वे इस अवधि में किसी गुत्थी को सुलझाने की चेष्टा करें तथा विधिक्षेत्र में नवीन सुधार के द्वार खोलने का प्रयत्न करें। देश-विदेश के जीवन का अध्ययन कर आत्ममूल्यांकन कर स्वयं को अध्ययन-स्तर पर लाने का प्रयत्न करना अध्यापकों प्राध्यापकों के लिए भी उतना ही आवश्यक है, जितना विधिवृत्तिवालों के लिए। 

इस प्रकार, यदि हम अपना, अपने समाज, देश या विश्व का कल्याण एवं औन्नत्य चाहते हैं, तो इसके लिए आवश्यक है कि हम अवकाश का महत्त्व समझकर उसका समुचित उपयोग करें। 

A poor life this, if full of care,

We have no time to stand and stare. 

-W. H. DAVIES, Leisure 

 

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