परमाणु प्रसार निषेध संधि और भारत पर निबंध |Essay on Atomic Expansion-Ban Treaty and India

परमाणु प्रसार निषेध संधि और भारत पर निबंध

परमाणु प्रसार निषेध संधि और भारत (Atomic Expansion-Ban Treaty and India) 

अमरीका आजकल दक्षिण एशियाई देशों के प्रति गहरी रुचि ले रहा है. इसका मुख्य कारण है-दक्षिण एशियाई देशों में परमाणु प्रसार निषेध संधि को प्रभावी बनाना. इसी प्रयास के अन्तर्गत वह भारत के प्रति साम, दाम, दण्ड, भेद सब प्रकार की नीतियाँ अपनाता है और चाहता है कि भारत किसी प्रकार इसमें सम्मिलित होकर उसका पिछलग्गू बन जाय. 

अमरीका कहने को तो यह कहता है कि सबकी समानता में ही विश्व का हित निहित है, परन्तु वह अपने मन की इस ग्रंथि को नहीं निकाल पाते हैं कि ‘हम दुनिया की सबसे बड़ी शक्ति हैं’. महत्त्वपूर्ण यह है कि सोवियत संघ (रूस) के विघटन के बाद अमरीका वस्तुतः एकछत्र राजनीतिक साम्राज्य स्थापित करने का इच्छुक बन गया है. दूसरी ओर भारत अपने स्वतन्त्र अस्तित्व को, अपनी अस्मिता को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए इच्छुक है. उसने उक्त संधि पर हस्ताक्षर करके अमरीका की इच्छापूर्ति करने से साफ इनकार कर दिया है. फलतः उसको अमरीका के कोप का भाजन ही नहीं बनना पड़ा है, बल्कि परमाणु क्लब के सदस्यों की कड़ी आलोचना का भी सामना करना पड़ा है. 

परमाणु प्रसार निषेध संधि : एक परिचय 

परमाणु प्रसार निषेध संधि की रूपरेखा 1 जुलाई, 1968 को लंदन, मास्को तथा वाशिंगटन ने प्रस्तुत की थी. इन महाबली देशों के हस्ताक्षरों के बाद यह संधि 5 मार्च, 1970 को लागू की गई. इस संधि में ग्यारह धाराएँ हैं जिनका सारांश निम्नलिखित प्रकार है 

धारा (1) के अनुसार परमाणु सम्पन्न राष्ट्र (Haves) यह प्रतिज्ञा करते हैं कि वे किसी भी राष्ट्र को परमाणु की आपूर्ति नहीं करेंगे तथा ऐसा आणविक ईंधन भी नहीं देंगे जिससे उन राष्ट्रों को, जो परमाणु सम्पन्न नहीं है, किसी प्रकार से परमाणु शक्ति बनने अथवा उस दिशा में उत्साहित करने में सहायक हों. 

धारा (2) इस संधि में शामिल होने वाले नाभिकीय राष्ट्र यह प्रतिज्ञा करते हैं कि वे परमाणु सम्पन्न राष्ट्रों से किसी प्रकार की ऐसी सहायता प्राप्त नहीं करेंगे जिससे उन्हें परमाणु शक्ति बनने या प्राप्त करने में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सहायता मिलती हो. 

धारा (3) के अनुसार प्रत्येक नाभिकीय राष्ट्र सुरक्षा-व्यवस्था हेतु अन्तर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा अभिकरण (आई.ए.इ.ए.) द्वारा उठाये गये प्रमाणीकरण हेतु कदमों को स्वीकार करेंगे. 

धारा (4) में यह कहा गया है कि हस्ताक्षरकर्ता राष्ट्रों को परमाणु ऊर्जा (शक्ति) को शांतिपूर्ण उपयोगों के लिए विकसित करने हेतु धारा (1) और धारा (3) में भेदभाव किए बिना अधिकार होगा कि वे आपस में परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण विकास हेतु साज सामान, वैज्ञानिक तथा तकनीकी ज्ञान का आदान-प्रदान कर सकेंगे. 

धारा (5) के अनुसार बिना भेदभाव किए, कुछ निश्चित तरीकों तथा उचित अन्तर्राष्ट्रीय पद्धति द्वारा ऐसे राष्ट्रों को जोकि नाभिकीय सदस्य हैं, शांतिपूर्ण विस्फोट के लाभों से अवगत कराया जा सकेगा. 

धारा (6) सदस्य राष्ट्रों को यह अधिकार दिया गया है कि वे परमाणु अस्त्रों पर रोक लगाने हेतु वार्तालाप करेंगे जिससे नाभिकीय का निःशस्त्रीकरण किया जा सके. 

धारा (7) ऐसी क्षेत्रीय संधियों को जो अपने क्षेत्र में परमाणु अस्त्रों को पूर्णतया समाप्त करने के लिए सदस्य राष्ट्रों द्वारा की जाएँगी, उन पर आपत्ति उठाई जाएगी. 

धारा (8) कोई भी सदस्य राज्य संशोधन प्रस्तुत कर सकेगा, परन्तु इस संशोधन पर विचार तभी होगा, जब एक तिहाई सदस्य राज्य संशोधन की माँग चाहेंगे, संशोधन तभी किया जाएगा जब बहुमत इसके पक्ष में होगा. 

धारा (9) यह संधि विश्व के समस्त राज्यों के लिए खुली रहेगी. संधि की भागीदारी हेतु राष्ट्रीय संसद द्वारा इसकी स्वीकारोक्ति आवश्यक होगी. 

धारा (10) यह धारा प्रत्येक राज्य को इस संधि से अलग रहने की सुविधा प्रदान करती है. इसके लिए राष्ट्र यदि यह समझता हो कि इस संधि से उसके राष्ट्र के उच्चतम हित किसी घटना के कारण खतरे में पड़ गये हैं, तो वह राष्ट्र समस्त सदस्य राष्ट्रों को इसकी सूचना देगा. यह सूचना संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद् को भी देनी होगी. यह सूचना संधि से अलग होने के कम-से-कम 3 माह पूर्व दी जानी चाहिए. संधि के 25 वर्षों पश्चात् एक मीटिंग की जाएगी जिसमें यह तय किया जाएगा कि यह संधि कितने समय तक अथवा अनिश्चितकाल तक चलेगी? 

धारा (11) इस अंतिम धारा में कहा गया है कि संधि की प्रामाणिक भाषाएँ ये होंगी अंग्रेजी, रूसी, फ्रेंच, स्पेनिश तथा चीनी.

संधि के महत्वपूर्ण तथ्य 

संधि की उक्त 11 धाराओं का गम्भीरतापूर्वक अध्ययन करने पर हमारे सामने ये महत्वपूर्ण तथ्य उभरकर आते हैं 

संधि के प्रस्ताव नियोजन अमरीका ने किये हैं और वह उसके पास सर्वाधिक आणविक अस्त्र हैं जिनके बल पर वह विश्व में सर्वोपरि शक्ति बन गया है, और दादागीरी करता रहता है. इस पृष्ठभूमि में हम देखते हैं कि प्रसार की विचारधारा की मनमानी व्याख्या की गई है. इसमें ऊर्ध्वाधर (Vertical) प्रसार को सुरक्षित बनाए रखने और क्षैतिज (Horizontal) प्रसार को प्रतिबन्धित करने की प्रवृत्ति स्पष्ट दिखाई देती है. बड़े देश तो अपने अस्त्रों को सुरक्षित बनाए रखें और छोटे देश आणविक अस्त्रों से दूर-दूर रहें. हमारे कथन का समर्थन संधि का वह भाग करता है, जिसमें विद्यमान परमाणु अस्त्रों को समाप्त करने की कोई चर्चा नहीं की गई है. कहने की आवश्यकता नहीं है कि विद्यमान परमाणु अस्त्रों के कारण ही युद्ध का वातावरण बना है और इन्हीं अस्त्रों के कारण विश्व की सुरक्षा इतने संकट में पड़ गई है. यह संकट इतना गहरा रहा है कि विश्व के छोटे एवं कमजोर देश अपने अस्तित्व के प्रति भी शंकालु हो गये हैं. 

स्पष्ट है कि इस संधि द्वारा विश्व के राष्ट्रों के दो स्पष्ट भागों में बाँटने का प्रयत्न किया गया है—(1) Haves—जिनके पास आणविक अस्त्र हैं तथा (2) Have nots—वे देश जिनके पास आणविक हथियार नहीं हैं. इसी प्रवृत्ति के अनुसार ही विचारधारा यह स्पष्टतः परिलक्षित होती है कि यह देशों के मध्य असमानता की विचारधारा है. कहने की आवश्यकता नहीं है कि विशेष अधिकार एवं अधिकार से वंचित करने की इन दो विचारधाराओं को एक साथ स्वीकार नहीं किया जा सकता है, क्या हम इसके यह अर्थ लगाएँ कि एक विशेष वर्ग के राष्ट्र ही विवेकवान है. अतएव उन्हें आणविक अस्त्र रखने का अधिकार है. विशेष अधिकार के यह विचार कदापि स्वीकार योग्य नहीं हैं. तथाकथित विवेकहीन राष्ट्रों को आणविक हथियार रखने का अधिकार नहीं है और जब तक उनके पास आणविक हथियार नहीं होगे तब तक उन्हें विवेक सम्पन्न नहीं माना जा सकेगा. निरन्तर हीन बने रहने की स्थिति किसी भी स्वाभिमानी राष्ट्र को क्योंकर स्वीकार हो सकेगी ? 

इस संधि में परमाणु सम्पन्न राष्ट्रों के एकमात्र राज्य की व्यवस्था स्वाभाविक रूप से परिलक्षित होती है. इस संधि के प्रमुख प्रावधानों के सारांश रूप में हम कह सकते हैं कि (i) यह भेदभावपूर्ण है तथा (ii) यह असमानता पर आधारित है तथा (iii) एक पक्षीय और अपूर्ण है. अमरीका की प्रतिनिधि सभा में यह कहा गया है कि भारत को सहायता तभी दी जाए जब वह सुनिश्चित कर लिया जाए कि भारत के पास परमाणु आयुद्ध नहीं हैं. इस संदर्भ में यह तथ्य ध्यातव्य है कि सन् 1974 में भारत ने अणु बम का परीक्षण किया था. उसके बाद मई 198 में तीन परीक्षण किए. स्पष्ट है कि भारत परमाणु-शक्ति वाला देश है. उक्त प्रकार के कथन का मन्तव्य स्पष्ट है—भारत कभी भी परमाणु-शक्ति वाला देश न बन सके और रक्षा सम्बन्धी मामलों में सदैव अमरीका का मोहताज बना रहे. इसके साथ यह भी ध्यातव्य है कि भारत बराबर यह कहता रहे कि वह परमाणु शक्ति का प्रयोग शांति के कार्यों में करेगा तथा परमाणु आयुद्धों का प्रसार किसी भी हालत में न हो. भारत की आण्विक क्षमता को नकारना उसका अपमान करना है. प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने स्पष्ट कह दिया है कि अमरीका भले ही हमारी सहायता बन्द कर दे, परन्तु हम अपनी स्वतन्त्रता के साथ समझौता किसी हालत में नहीं करेंगे. 

परमाणु अस्त्र अप्रसार संधि एक विश्वव्यापी समस्या है, परन्तु पाकिस्तान ने यह प्रस्ताव किया है कि दक्षिण एशिया को आणविक अस्त्रविहीन बना दिया जाए और इन पाँच देशों की बैठक आहूत की जाए सोवियत संघ, चीन, भारत, पाकिस्तान, अमरीका. यह बात ऊपर से देखने पर सर्वथा निरीह लगती है, परन्तु इसके पीछे बहुत गहरी चाल है. एक विश्व स्तरीय समस्या को मात्र क्षेत्रीय समस्या बनाने का प्रयास है. अमरीका का इशारा पाकर पाकिस्तान ने जो कुछ किया है, वह कूटनीति के एक सधे हुए खिलाड़ी की तरह किया है. यद्यपि अमरीका के गुप्तचर विभाग ने यह बता दिया है कि पाकिस्तान के पास कम से कम एक ऐसा परमाणु बम है जिसे वह हवाई जहाज से गिरा सकता है, परन्तु फिर भी पाकिस्तान ने अपने पास किसी भी परमाणु बम के होने का खण्डन किया है, और कहा है कि दक्षिण एशिया में परमाणु के प्रसार को रोकने के लिए वह वार्ता करने को तैयार है. इस वार्ता की शर्त यह है कि इसमें भारत के शामिल होने पर ही पाकिस्तान यह बैठक बुलाएगा. अमरीका इस बैठक में भाग लेने के लिए तत्काल तैयार हो गया. पहला कारण तो यह है कि यदि भारत हस्ताक्षर करने से इनकार करता है, तो उसे भारत को सहायता बन्द करने का बहुत ही सशक्त कारण मिल जाएगा. दूसरी बात यह है कि उसे पाकिस्तान को प्रभावित करने का यह एक अतिरिक्त अवसर प्राप्त हो जायेगा, क्योंकि इस समय पाकिस्तान चीन के साथ बहुत घुलमिल गया है. 

अमरीका चाहता है कि पाकिस्तान चीन के साथ ज्यादा निकटता स्थापित न करे. अमरीका पाकिस्तान की रक्षा के मुद्दे को एक बहुत गम्भीर मामला मानता है. अमरीका पृथक्-पृथक मिलने वाले अवसर के हाथ लगते ही पाकिस्तान को 50 लाख डॉलर की सहायता को जीवित कर देगा. पाकिस्तान का निर्माण ही इस लिए हुआ था कि वह भारत के लिए स्थायी सिरदर्द रहे. 

संयुक्त राष्ट्र संघ में अमरीका सर्वाधिक प्रभावशाली देश है. अपनी इस स्थिति का लाभ उठाते हुए वह चाहता है कि परमाणु अप्रसार संधि में अधिक से अधिक संख्या में वे देश शामिल हो जाएँ, जो आणविक शक्ति के विकास में आगे बढ़ गये हैं. 

आणविक बमविहीन देशों को अपने प्रभाव में लेने वाली अमरीका की नीति का पहला शिकार हुआ दक्षिण अफ्रीका. जैसे ही दक्षिण अफ्रीका के तत्कालीन विदेश मंत्री पिक बोथा ने इस आशय की घोषणा की कि वह संधि पर हस्ताक्षर करने को तैयार हैं और अपने आणविक संस्थानों का अन्तर्राष्ट्रीय निरीक्षण भी कराने को तैयार हैं, वैसे अमरीका ने दक्षिण अफ्रीका पर लगे प्रतिबंधों को ढीला करके उसकी पीठ थपथपा दी. उसके बाद की कथा तो समस्त विश्व जानता है. 

दक्षिण एशिया में भारत और पाकिस्तान अमरीका की सूची में हैं. पाकिस्तान भारत को ढाल बनाकर बराबर एक ही बात कहता है कि यदि भारत हस्ताक्षर कर देगा तो हम भी हस्ताक्षर कर देंगे. इस प्रकार के कथन के कारण है. साथ ही उसने अमरीका के कोप से बचने के लिए पाँच देशों की कॉन्फ्रेंस का सुझाव भी दे दिया. 

एक समय ऐसा था जब यह ख्याल किया जाता था कि अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आई.एम.एफ.) के दबाव में भारत को संधि पर हस्ताक्षर करने के लिए विवश किया जा सकता है, परन्तु पूर्व प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिंह राव ने दृढ़तापूर्वक घोषणा कर दी कि भारत इस संधि पर हस्ताक्षर नहीं करेगा. 

हमारी समझ में नहीं आता है कि भारत पर इतना दबाव क्यों है. विश्व शांति को असली खतरा तो आणविक शक्ति सम्पन्न अमरीका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस तथा चीन से है. भारत ने तो सन् 1974 में पोखरन में परमाणु परीक्षण किया था और पिछले 25 वर्षों में नाभिकीय अस्त्र-शस्त्र नहीं बनाए. भारत नाभिकीय परमाणु के पूर्ण समापन की बात बराबर कहता रहा है और वह आज भी इस पर कायम है. भारत दो मुँही नीति का समर्थक नहीं हो सकता है कि कुछ देश तो एक काम करें और अन्य देश उनके मुखापेक्षी बने रहें. 

भारत परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम में आगे बढ़ गया है. उसके समस्त प्रयास शांतिपूर्ण उपयोग के लिए हैं. साथ ही नाभिकीय शक्ति के निर्माण का विकल्प वह खुला रखना चाहता है. पाकिस्तान और चीन सदश शत्रओं से घिरा रहने वाला भारत यदि आणविक अस्त्रविहीन राष्ट्र बनने को तैयार हो जाता है, तो वह राष्ट्रीय अस्मिता की आत्महत्या का अभूतपूर्व उदाहरण ही प्रस्तुत करेगा, संयुक्त राष्ट्र संघ के बाहर और भीतर भारत परमाणु निःशस्त्रीकरण के सम्बन्धी अपने दृष्टिकोण को कई बार स्पष्ट कर चुका है और इस संदर्भ में वह आंशिक परमाणु परीक्षण निषेध संधि पर सन् 1963 में ही हस्ताक्षर कर चुका है. परमाणु प्रसार निषेध संधि पर भारत कदापि हस्ताक्षर नहीं करना चाहता है, क्योंकि ऐसा करना रक्षा एवं विकास सम्बन्धी मसलों पर भारत द्वारा आत्मसमर्पण ही कहा जाएगा. पिछले 25 वर्षों में अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितियों में कोई ऐसा बदलाव नहीं आया है जिसके संदर्भ में भारत अपने निर्णय पर पुनर्विचार की बात सोच सके. स्थिति बिल्कुल स्पष्ट है. जब तक किसी भी राष्ट्र के पास थोड़े से भी परमाणु अस्त्र रहेंगे, तब तक विश्वशांति का खतरा रहेगा और छोटे राष्ट्र संत्रास में जीने को विवश बने रहेंगे. अतः इस संदर्भ में एक ही समाधान हो सकता है कि समस्त परमाणु/नाभिकीय अस्त्र समाप्त कर दिए जाएँ. भारत दूध का जला है. वह छाछ भी फूंक-फूंक कर पीना चाहेगा. उस पर दो बार पाकिस्तान तथा एक बार चीन विधिवत् आक्रमण कर चुके हैं. शीतयुद्ध की स्थिति तो स्थायी बन गई है. 

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