अस्पृश्यता पर निबंध-asprishyata par nibandh

अस्पृश्यता पर निबंध

अस्पृश्यता पर निबंध-untouchability par nibandh

अस्पृश्यता पर निबंध– अस्पृश्यों-अछूतों को भले ही स्वामी दयानंद ने ‘महाशय’ जैसे महिमाशाली शब्द से संबोधित किया, महात्मा गाँधी ने भले ही इन्हें ‘हरिजन’ जैसा पतितपावन नाम दिया, किंतु क्या वे सचमुच महाशयों की मंडली में आ सके, सवर्णों की सभाओं में सम्मानित हो सके? अछूतों की दारुण दशा से दयार्द्र होकर भले ही राष्ट्रपिता ने उनके लिए मुक्ति का द्वार खोला, राष्ट्रपिता के पदचिह्नों के पक्के अनुयायी आचार्य विनोबा भावे ने उन्हें अपनी बलिष्ठ बाँहों का सहारा भी दिया, सरकार ने 1955 ई० में अस्पृश्यता-उन्मूलन-अधिनियम पारित कर उनके ऊपर कानून की छतरी भी तान दी, ताकि वे विरोधों की हिमवृष्टि का सामना सुगमतापूर्वक कर सकें, किंतु क्या समता पर आधृत प्रजातंत्रीय प्रणालीवाले हमारे देश के तन पर पड़ी अस्पृश्यता की काली लकीरें मिट सकीं? क्या अछत भारतीय समाज में दूध-पानी की तरह मिल सके?

क्या भारतीय समाज ने इन्हें अपने में पचा लिया-इन्हें आत्मसात् कर लिया? क्या रोटी-बेटी के व्यवहार में आज सवर्ण और असवर्ण समस्तरीय हो गए हैं? समस्तरीय होने का अवकाश उन्हें कानून और राज्य भले ही दे, पर समाज तो नहीं दे रहा है। यही कारण है कि कानून और राज्यसत्ता को विवश होकर असवर्णो, अल्पसंख्यकों एवं आदिवासियों के निमित्त चनाव सरकारी सेवा, शिक्षण आदि में आरक्षण की व्यवस्था करनी पड़ रही है। 

अस्पृश्यता के कारण चाहे जो भी हों-प्रजातीय हों, धार्मिक हों या सामाजिक प्रथाएँ हों, जैसा कि एच० हट्टन ने अपनी पुस्तक ‘भारतवर्ष में जाति’ में लिखा है, “The Origin of the position of exterior castes is partly racial, partly religious and partly a matter of social custom.”—किंतु है यह बड़ा घृणित और जघन्य। इस अस्पृश्यता ने भारतवर्ष की लगभग आधी आबादी को नरक के जिस खौलते कड़ाह में अब तक पकाया है, उसकी कल्पना से ही रोमांच हो उठता है। इस देश के तथाकथित ऊँचे वर्णों ने इन अछूतों को इतनी यमयातनाएँ दी हैं कि सुनकर पत्थर का कठोर कलेजा भी सहसा पिघल सकता है। 

कहीं इन अड़तों के लिए वे मार्ग वर्जित थे, जिनपर ऊँची जातियों के लोग चल सकते थे। इन अच्छतों के गले घंटियाँ बाँध दी जाती थीं। जहाँ तक घंटियों की आवाज जाती थी, वहाँ तक अपवित्र समझा जाता था। उन्हें सार्वजनिक जलाशयों का उपयोग नहीं करने दिया जाता था। यदि ये किसी कुएँ की जगत पर चढ़ जाते, तो कुआँ अशद्ध हो जाता था। पूजा-प्रायश्चित्त के पश्चात् उस कुएँ का जल पेय माना जाता था। मंदिरों का द्वार इनके लिए निषिद्ध था। जिन दीनदयालु पतितपावन अशरणशरण भगवान ने शबरी के जूठे बेर खाए थे, जिन्होंने कोल-भीलों को गले लगाया था, उन्हीं के द्वार इनके लिए वर्जित थे।

जिन भगवान ने मोची और ब्राह्मण दोनों को एक प्रकार से बनाया, जब दोनों उसकी अपनी संतानें हैं, उन्हीं में एक-दूसरे पर रोक हो, बिलकुल विचित्र बात है। अछूतों के लिए विद्यालयों में अध्ययन की व्यवस्था नहीं थी। उनके घर गाँव से बाहर होते थे। यदि वे किसी चौकी से सट जाएँ, तो चौकी धुलवानी पड़ती थी, यदि उनसे बरतन छू जाएँ, तो बरतनों को आग में शुद्ध करना पड़ता था। इतना ही नहीं, यदि उनकी परछाईं ब्राह्मणों पर पड़ जाती, तो पातक लगता था, उसका प्रायश्चित्त करना पड़ता था।

एक-दो साल पहले मध्यप्रदेश में तीन अछूतों के सीनों पर गोलियाँ इसलिए दाग दी गईं कि उन्होंने नीच होकर भी राजपूतों की तरह मूछों पर ताव दे रखा था। आंध्र में एक हरिजन लड़के पर बरतन की चोरी का आरोप लगाकर उसे एक वृक्ष से बाँधकर जीते-जी जला दिया गया। आज भी उनका दमन और शोषण समाप्त हो गया हो, उनके प्रति घृणा और उपेक्षा का संचित कोष रिक्त हो गया हो-ऐसी बात नहीं है। 

महात्मा गाँधी ने कहा था कि अस्पृश्यता हमारे राष्ट्र का अभिशाप है। यह हिंदू-जाति का कलंक है। यह हिंदुत्व में घुसी हुई सडाँध है। इससे हिंदू-धर्म ऐसे ही चौपट हो रहा है, जैसे संखिया से दूध । जहाँ अस्पृश्यता की भावना आ गई, मानवता वहाँ से विदा हो जाती है। कोई व्यक्ति मानवता का दंभ भी करे और अस्पृश्यता भी कायम रखना चाहे, तो वह ढोंगी है। अस्पृश्यता ऐसी विसूचिका है, जो राष्ट्र को शक्तिहीन करती जा रही है। यह ऐसी अपस्मार की व्याधि है, जो हमारा पिंड नहीं छोड़ रही है। 

सारे जीवों की सृष्टि करनेवाला एक ही परमात्मा है। वैज्ञानिक अनुसंधान भी यह सिद्ध करते हैं कि तात्त्विक दृष्टि से ब्राह्मण और भंगी के रक्त में कोई अंतर नहीं है। 

अपने को सर्वोच्च सिद्ध करने तथा दूसरों को दासानदास बनाने के षडयंत्र ने ही असहाय मानवों को अस्पृश्य घोषित किया है। पाखंड ने इसे धार्मिक आवरण देकर शोषण का सस्पृश्य घोषित किया है वासानुदास बनाने के षड़यंत्र 

अतः, यदि हमारे राष्ट्र की लगभग आधी जनसंख्या की जिंदगी पीडा की अछोर कहानी हो, आँसू की उमड़ती घनघटा हो, तो देश के जीवन में आनंद का वसंत कभी नहीं उतर सकता। इसके लिए कानून भी बहुत कारगर नहीं हो सकता, उनकी आर्थिक दशा सुधारने से भी लाभ नहीं हो सकता, उनके लिए आरक्षण और वृत्तियों से भी बहुत दूर तक समाधान नहीं हो सकता। अस्पृश्यता की जड़ उखाड़ने के लिए हमें जाति-प्रथा के मूल पर ही कुठाराघात करना पड़ेगा, ऊँच-नीचवाली भ्रांति का उच्छेद करना होगा, रूढ़ियों की कब्र खोदनी होगी, लोगों के मन से संकीर्णता दूर करनी होगी तथा मानसिक वातायन सब ओर खोल देना पड़ेगा।

देश में कुछ हरिजन रहें और कुछ अन्य जन, ऐसा नहीं होना चाहिए। अस्पृश्यता का नामो-निशान मिटाने के लिए या तो सभी को हरिजन बनना पड़ेगा या सभी को ब्राह्मण। भारतवर्ष के सभी मनष्य भारतीय हैं-उनकी एक ही जाति, एक ही वर्ण, एक ही धर्म है। धर्म तो जीवन-धारण का पर्याय है-सम्मिलित जीवन जीने का सार है; उसे हिंदू, मुस्लिम, ईसाई और सिख के कठघरे में बाँधना ठीक नहीं। 

अस्पश्यता भारतीय समाज पर युगों से घिरी महामारी है, घोर अभिशाप की डरावनी छाया है। इसका मूलोच्छेद जितना शीघ्र हो सके, उतना ही शीघ्र भारत के भाग नवीन सूर्योदय होगा, इसमें संदेह नहीं।

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