आर्यभट की जीवनी | Aryabhatta biography in hindi

आर्यभट की जीवनी

आर्यभट की जीवनी | Aryabhatta biography in hindi

विश्व प्रसिद्ध गणितज्ञ और खगोलशास्त्री आर्यभट्ट का जन्म सन् 476 ई० में केरल में हुआ था। नालंदा विश्वविद्यालय में उन्होंने अपनी शिक्षा ग्रहण की। नालंदा विश्वविद्यालय उस समय भारत के मुख्य शिक्षा केन्द्रों में से एक था। उन्होंने अपनी शिक्षा पूरी करने के पश्चात् ‘आर्यभटिया’ नामक ग्रन्थ की रचना की। इस ग्रन्थ को अपने समय का महान ग्रन्थ माना जाता था। उस समय के गुप्त साम्राज्य के बुद्धगुप्त ने इस ग्रन्थ को एक महान् ग्रन्थ के रूप में अपनाया तथा आर्यभट्ट को नालंदा विश्वविद्यालय का प्रमुख नियुक्त किया।

आर्यभट्ट के जन्म के लगभग 500 वर्ष बाद कुसमपुरा नामक स्थान पर एक वेधशाला का शिलान्यास किया तथा वहीं पर खगोल विज्ञान के संस्थान का शिलान्यास किया गया। यह सब कार्य आर्यभट्ट की जन्म शताब्दी मनाने के लिए किए गए। 

भट्ट की आयु जब 23 वर्ष थी तो उन्होंने श्लोकों तथा मन्त्र की ध्वनि के बीच अपने महान् ग्रन्थ आर्यभटिया का प्रथम शब्द लिखना प्रारम्भ किया था। यह कार्य उन्होंने 2 मार्च, सन् 499 में बारह बजे दोपहर को आरम्भ किया था। आज भी इस ग्रन्थ की गिनती महान् ग्रन्थों में की जाती है। 

आर्यभट्ट पहले खगोलशास्त्री थे जिन्होंने यह बताया कि पृथ्वी गोल है तथा अपने अक्ष पर घूमती है। अपने अक्ष पर घूमने के कारण ही रात व दिन होते हैं। उन्होंने अपने अध्ययनों के द्वारा यह निष्कर्ष निकाला कि चन्द्रमा का रंग काला होता है तथा सूर्य के प्रकाश के कारण चमकता है। हिन्दू धर्मशास्त्रों में तब तक मान्यता थी कि राहु व केतु जब सूर्य तथा चन्द्रमा को जकड़ लेते हैं तो सूर्य तथा चन्द्र ग्रहण पड़ता है। आर्यभट्ट ने इस मान्यता का खण्डन किया तथा बताया कि सूर्य व चन्द्र ग्रहण पृथ्वी और चन्द्रमा की परछाइयों के कारण होते हैं। 

उन्होंने पृथ्वी को ब्रह्मांड का केन्द्र माना, परन्तु उनकी यह धारणा बाद में गलत सिद्ध हुई। आर्य भट्ट ने यूनानी बादशाह होलमी की भाति, कुछ ग्रहों की गलत गति का विवरण दिया लेकिन उनका तरीका टोलमी से बेहतर था। 

आर्यभट्ट केवल खगोल विज्ञानी ही नहीं थे, बल्कि वह जाने-माने गणितज्ञ भी थे। खगोल विज्ञान की तरह गणित में भी उनके द्वारा दिया गया योगदान महत्त्वपूर्ण है। सर्वप्रथम भट्ट ने पाई के मान को 3.1416 बताया तथा साथ ही यह भी कहा कि यह मान लगभग ठीक है, मगर पूर्णरूपेण ठीक नहीं है। 

वे पहले गणितज्ञ थे जिन्होंने कुछ तालिकाएं बनाईं जो बाद में Sines तालिकाओं के नाम से पुकारी गईं। भट्ट ने समीकरण Ax -By = C का समाधान निकाला जिसके लिए सारी दुनिया भट्ट का लोहा मानती है। उन्होंने बड़ी संख्याओं को शब्दों में लिखने का तरीका भी बताया। उनके ग्रन्थ आर्यभटिया में गणित व ज्योतिष विज्ञान की गणनाओं के अनेक पहलुओं पर प्रकाश डाला गया है। 

ज्यामिति, मेन्सुरेशन, वर्गमूल, घनमूल और विभिन्न श्रेणियों के विषयों पर इस ग्रन्थ में जानकारी दी गई है। उन्होंने दूसरे ग्रन्थ की रचना वृद्धावस्था में की, जिसका नाम ‘आर्यभट्ट सिद्धान्त’ रखा गया है। यह पाठ्य-पुस्तक ज्योतिष विज्ञान की गणनाओं को करने वाली है। आज भी आर्यभट्ट द्वारा दिए गए आंकड़े पंचांग तैयार करने में प्रयोग होते हैं। उनके इन्हीं योगदानों के कारण भारत द्वारा प्रथम बार छोड़े गए उपग्रह का नाम ‘आर्यभट्ट’ रखा गया। 

आज लगभग 2400 वर्ष बीत जाने पर भी आर्यभट्ट का नाम सारी दुनिया में बड़े आदर के साथ लिया जाता है। भारत का प्रथम उपग्रह ‘आर्यभट्ट’ सन् 1973 ई० में रूस से अंतरिक्ष में छोड़ा गया था। 385 कि०ग्रा० भार के उपग्रह की आयु केवल 6 महीने थी, मगर यह अपनी कक्षा में मार्च सन् 1981 तक भ्रमण करता रहा। इस महान् खगोल शास्त्री व गणितज्ञ की मृत्यु सन् 550 ई० में हुई।। 

ऐसे महान् गणितज्ञ और महान् खगोलवेत्ता को आने वाली सदियां भी नहीं भुला सकेंगी। 

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