कृषि में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस : मुद्दे और संभावनाएँ | कृत्रिम बुद्धिमत्ता और कृषि

कृषि में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस

कृषि में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस : मुद्दे और संभावनाएँ | कृत्रिम बुद्धिमत्ता और कृषि

21वीं सदी के विश्व में प्रौद्योगिकी प्रमुख संचालक है। ट्रंक कॉल से लेकर वीडियो कॉल तक, भाप के इंजन से लेकर मेट्रो तक, स्प्रेयर से लेकर ड्रोन तक प्रौद्योगिकी ने विश्वभर में मानव के जीवन में क्रान्ति ला दी है। इसके अतिरिक्त विश्वभर में देशों के औद्योगीकरण में भी प्रौद्योगिकी ने महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की है तथा उनकी अर्थव्यवस्था को महत्त्वपूर्ण ढंग से औपचारिक रूप प्रदान किया है। विश्व आज चौथी औद्योगिक क्रान्ति को अपनाने की तैयारी कर रहा है, जिसका नेतृत्व ऑर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) द्वारा किये जाने की संभावना है। इस मुकाम पर यह स्वाभाविक है कि ए. आई. का लाभ उठाते हुए ऐतिहासिक तौर पर उपेक्षित और कम ध्यान दिए गए क्षेत्र, कृषि का उत्थान किया जाए। 

आज चौथी औद्योगिक क्रान्ति को अपनाने की तैयारी कर रहा है, जिसका नेतृत्व ऑर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) द्वारा किये जाने की संभावना है। 

विश्व खाद्य संगठन के अनुमानों के अनुसार भारत को 2050 तक अपनी बढ़ती आबादी को भोजन संबंधी जरूरतें पूरी करने के लिए कृषि उत्पादन को दोगुना करना होगा। खेतों के विखंडित और उप-विभाजित होने और सामूहिक एवं सहकारिता पूर्ण खेती पर कम ध्यान दिए जाने के कारण खेती योग्य भूमि का विस्तार नहीं किया जा सकता। हमारे समक्ष एकमात्र व्यवहार्य विकल्प यह है कि परिष्कृत प्रौद्योगिकी के जरिए उपलब्ध भूमि की उत्पादकता बढ़ाई जाए। 

खेती की उत्पादकता बढ़ाना कोई सरल कार्य नहीं है, इसके अंतर्गत फसल के बारे में निर्णय करने से लेकर अंतिम पैदावार और कृषि उत्पादों के विपणन तक की गतिविधियाँ समाहित हैं। आमतौर पर जुताई, बुआई, उर्वरकों एवं कीटनाशकों के इस्तेमाल और फसल कटाई जैसी प्रक्रियाओं के बारे में निर्णय करने में हमारे अनेक किसान प्रयोगात्मक जानकारी/परम्परागत ज्ञान पर निर्भर करते हैं। परन्तु, कीट, बीमारी, मानसून आदि व्यापक चुनौतियों से निपटने में यह जानकारी अधिक सशक्त सिद्ध नहीं हुई है, नतीजतन पैदावार कम होती है और किसानों को आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। अतः कृषि उत्पादकता बढ़ाने में किसान को जागरूक बनाने के लिए वैज्ञानिक हस्तक्षेप अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। 

इस प्रकार इन समस्याओं और चुनौतियों के समाधान के लिए एक स्व-निर्देशित स्वचालित मॉडल आवश्यक है, जो सभी के लाभ के लिए विभिन्न प्रतिभागियों के व्यवहार को समझ सकता है। इतना ही नहीं, ऑर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) परिष्कृत कृषि उत्पादकता की दिशा में समाधानों का हिस्सा है। ए. आई. को सिम्युलेटिड अल्गोरिथमिक कम्प्यूटर मॉडलों के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, जो मानव व्यवहार की नकल करते हैं। यह प्रक्रिया एक रोबोटिक मित्र/संस्थापित अनुप्रयोग की परिकल्पना से आरंभ होती है, जो हमारे किसानों को फसल उगाने के समय, फसल कटाई और उनकी उपज की बिक्री के बारे में मार्गदर्शन करती है तथा हमारे कृषि – विशेषज्ञों को उन समस्याओं के समाधान का पता लगाने से जोड़ती है, जिनका सामना किसानों को सबसे अधिक करना पड़ता है। ऑर्टिफिशियल इंटेलिजेंस नीति निर्माताओं के लिए डिजिटल डेटा के रूप में भी काम करती है, जिससे वे विभिन्न कारगर कार्यक्रमों/ नीतिगत विकल्पों और तत्संबंधी उपायों की खोज कर सकते हैं। इसके अलावा ए. आई. उन नीति प्रतिष्ठानों के लिए एक विवेकशील विकल्प के रूप में काम करती है। जो 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुनी करने की दिशा में श्रम कर रहे हैं। 

वर्ष 2018 में कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के किसान माइक्रोसॉफ्ट और सेमी-एरिड ट्रॉपिक्स संबंधी अंतर्राष्ट्रीय फसल अनुसंधान संस्थान (आई. सी. आर. आई. एस. एटी.) द्वारा ए. आई का इस्तेमाल करते हुए प्रदान किए गए फसल बुआई संबंधी संदेशों पर निर्भर रहे। विश्वभर में ए. आई. ने किसानों, संगठनों और सरकारों को अधिक व्यापक अवसर प्रदान किए हैं। उदाहरण के लिए तंजानिया में, ए आई ने गूगल मुक्त स्रोत के रूप में 98 प्रतिशत शुद्धता के साथ बीमारियों संबंधी डेटा उपलब्ध कराया और खर-पतवारों को निकालने के लिए रोबोट तैनात किए। 

कृषि में विपणन एक महत्त्वपूर्ण घटक है, जो विकास के लाभ किसानों के दहलीज पर पहुँचाता है। यह आमदनी सुरक्षा और ग्रामीण खुशहाली लाने के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। आधुनिक विपणन प्रणाली में दो बुनियादी वस्तुएं अर्थात् ग्रेडिंग और मूल्य पूर्वानुमान, खेती की आय के संचालन में महत्त्वपूर्ण हैं, जो कृषि आय की खुशहाली तक पहुँचाती हैं। उगाई गई फसलों को खेत के स्तर पर और बाजार के चित्रों के आधार पर स्वचालित गुणवत्ता विश्लेषण के जरिए (एआई के नेतृत्व में पक्षपात रहित) भौतिक मानदंडों (फलों और मेवों के मामले में रासायनिक संघटन) के अनुसार श्रेणीबद्ध करने की आवश्यकता पड़ती है। इससे दो तरह से मदद मिलती है। पहला यह है कि सही मानदंड की जानकारी होने से किसान अपने उत्पाद के मानदंड ई-नैम, ई-ग्राएमएस और अन्य ऑनलाइन प्लेटफॉर्मों पर अपलोड कर सकते हैं। और इस तरह विपणन की लागत, बर्बादी और बिचौलिए के दुष्प्रभाव में महत्त्वपूर्ण कमी ला सकते हैं। दूसरे, इससे फसल के स्थान से दूर बैठे व्यक्ति की खरीद फरोख की प्रक्रिया शुरू करने में मदद मिलती है। इसके अलावा उत्पादकों द्वारा लाभकारी मूल्य हासिल करने के लिए बाजार मूल्य का पूर्वानुमान महत्त्वपूर्ण होता है। 

मूल्य पूर्वानुमान और कृषि जिन्सों के प्रवाह को सुचारू रूप प्रदान करने में अन्य महत्त्वपूर्ण घटक आपूर्ति श्रृंखला प्रबंधन हैं। यह एआई सहायता प्राप्त सॉफ्टवेयर द्वारा उपलब्ध कराई गई अधिशेष वस्तुओं (व्यस्त मौसम के दौरान) के आमेलन में मूलभूत बदलाव लाती है। एआई सॉफ्टवेयर बाजार में प्रतिभागियों के बीच (वस्तु के पिछले और अगले सम्पर्कों के जरिए) वस्तुओं के आदान-प्रदान का सतर्कतापूर्वक प्रबंधन करता है। यह विभिन्न बाजारों (ई-नैम और एग्री सेंसस डेटा) के आँकडों और खुदरा मांग कार्यक्रम का इस्तेमाल करता है और प्रत्येक फसल के बारे में बुआई/निर्णय करने से पहले खास समय पर समनुरूप आँकड़े उपलब्ध कराता है। 

आधुनिक कृषि पद्धतियों के अंतर्गत मृदा और जल गंभीर खतरे का सामना कर रहे हैं। इनमें अकार्बनिक रसायन शामिल हैं, जो फसल उत्पादकता पर दुष्प्रभाव डालते हैं। इससे संसाधनों के सक्षम उपयोग और दीर्घावधि में प्रौद्योगिकी अपनाने में रुकावट आती है, जिसकी परिणति पैदावार में कमी और खाद्य सुरक्षा के प्रति गंभीर खतरे के रूप में सामने आ सकती है। मृदा और जल के लाभों का पता लगाने में एआई का सर्वाधिक उपयुक्त प्रकार रीएक्टिव एआई है, जहाँ यह बुनियादी तौर पर आस-पास की स्थितियों की धारणा पर काम करता है। इस प्रकार मृदा और जल के स्वास्थ्य संबंधी किसी भी विचलन को आसानी से पहचान लिया जाता है ताकि भूमि की उर्वरता और जल की गुणवत्ता सुनिश्चित की जा सके। इसके अतिरिक्त एआई के नेतृत्व वाले पहचान और गहन शिक्षण वाले मॉडल उपग्रह से प्राप्त एकीकृत डेटा संकेत का इस्तेमाल कर सकते हैं और स्थानीय खेती चित्र के साथ उसकी तुलना कर सकते हैं, जिससे मृदा के स्वास्थ्य का पता लगाने और मृदा का स्वास्थ्य बहाल करने के लिए तत्काल कार्य योजना प्रस्तावित करने में मदद मिलती है। 

करीब 89 प्रतिशत निष्कर्षित भूजल का इस्तेमाल खेती के लिए अक्षम ढंग से किया जाता है, जिससे जल उपयोग और इसके प्रबंधन की गंभीर समस्या पैदा होती है। इस स्थिति से भारत विशद्ध जल आयातक के रूप में उभरा है, जिससे भविष्य में जल उपलब्धता और मानसून की अनिश्चितता का खतरा बढ़ गया है। अमेरिका और चीन की तुलना में भारत अनाज (खाद्य सुरक्षा में प्रमुख घटक) की पैदावार बढ़ाने के संदर्भ में संसाधनों का उपयोग करने की दृष्टि से अक्षम स्थिति में है। भारत में जमीन रासायनिक अवशेषों का भंडारण बनती जा रही है, जिससे एक तरफ मृदा स्वास्थ्य में गंभीर असंतुलन पैदा होता है और दूसरी तरफ विभिन्न फसलों और क्षेत्रों के बीच पैदावार में अंतराल आता है। ऐसे में यह महत्त्वपूर्ण है कि आगे आने वाली पीढ़ियों को भोजन प्रदान करन कालए मृदा का स्वास्थ्य बनाए रखने में ए. आई. का लाभ उठाया जाए। नीति आयोग ने हाल ही में आशंका व्यक्त की थी कि देश को अगले दशकों में गंभीर जल संकट का सामना करना पड़ सकता है क्योंकि 70 प्रतिशत जल विषाक्त हो चुका है। इसे देखते हुए संसाधन उपयोग की युक्तिसंगत पद्धतियों के विकल्प की तत्काल आवश्यकता महसूस होती है। ।

निर्णायक प्रौद्योगिकी प्रदान करते हुए खेती की क्षमता बहाल करने में कृषि स्टार्टअप्स की भूमिका महत्त्वपूर्ण हो गई है। इन्टेलो लैब्स, अइबोनो, थरिथी रोबोटिक्स और सेटशोर जैसे कुछ ए. आई. स्टार्टअप्स उपज के पूर्वानुमान, उपज में स्थिरता लाने, मृदा विश्लेषण । और भावी फसल के आर्थिक मूल्य का पूर्वानुमान व्यक्त करने में ए. आई. का सफलतापूर्वक इस्तेमाल कर रहे हैं। इसके अलावा ए. आई. के नेतृत्व वाले नवाचार और स्टार्टअप्स पर बल देने और उन्हें प्रोत्साहित करने से रोजगार के अवसरों में महत्त्वपूर्ण इजाफा किया जा सकता है। 

भारत में प्रौद्योगिकी एक लंबा रास्ता तय कर चुकी है और 1.3 अरब लोगों के जीवन और आकांक्षाओं को प्रभावित कर चुकी है। प्रौद्योगिकी से अनेक लोगों के जीवन में सुधार आया है और अधिक पैदावार देने वाली किस्मों से लेकर अल्गोरिथम व्यापार रणनीतियों/ मॉडलों तक खेती के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति हुई है। 

कृषि के डिजिटलीकरण का मार्ग प्रशस्त वर्तमान सरकार द्वारा हुआ है। हालांकि डिजिटलीकरण की स्थिति संबंधी औद्योगिक सर्वेक्षणों में भारत का रैंक अभी बहुत नीचे है। डिजिटल इंडिया कार्यक्रम के जरिए भारत में डिजिटलीकरण का ओएफसी के जरिए गाँवों तक पहुँचना खेती में एआई तकनीकों का लाभ उठाने की दिशा में एक अनिवार्य घटक है। एक अध्ययन से पता चला है कि डिजिटल खेती और कनेक्टिड खेती सेवाओं से 2020 तक 7 करोड़ भारतीय किसानों को जोड़ा जा सकेगा, जिससे किसानों की आय में 9 अरब अमेरिकी डॉलर का इजाफा होगा। 

भारत में प्रौद्योगिकी एक लंबा रास्ता तय कर चुकी है और 1.3 अरब लोगों के जीवन और आकांक्षाओं को प्रभावित कर चुकी है। प्रौद्योगिकी से अनेक लोगों के जीवन में सुधार आया है और अधिक पैदावार देने वाली किस्मों से लेकर अल्गोरिथम व्यापार रणनीतियों/मॉडलों तक खेती के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति हुई है। परन्तु पैदावार में अंतराल और आपूर्ति के क्षेत्र में सुधारों की दृष्टि से यह क्षेत्र अभी भी अविकसित बना हुआ है। इस क्षेत्र में बाजार और मूल्य पहुँच कायम करने के लिए आपूर्ति की बाधाएँ दूर करना आवश्यक है। मांग और आपूर्ति स्थितियों का मूल्यांकन, फसल प्रतिस्पर्धा और क्षेत्रीय फसल आयोजना जैसे उपाय ए. आई. की मदद से आसानी से किए जा सकते हैं। खेती के क्षेत्र में स्टार्टअप्स उभर रहे हैं और उनके द्वारा विकसित की जा रही प्रौद्योगिकी वैश्विक मानदंडों के अनुरूप हैं। अंततः खेती में सभी प्रतिभागियों को ए. आई. के भावी लाभ पहुँचाने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों के बीच नीतिगत समन्वय को बढ़ावा देना अत्यंत अनिवार्य है।

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