मैथिलीशरण गुप्त का राष्ट्रवाद | मैथिलीशरण गुप्त की राष्ट्रीय भावना पर लेख

मैथिलीशरण गुप्त का राष्ट्रवाद

मैथिलीशरण गुप्त का राष्ट्रवाद | मैथिलीशरण गुप्त की राष्ट्रीय भावना पर लेख

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त द्विवेदी (महावीर प्रसाद द्विवेदी) युग के प्रमुख कवि थे। देश की स्वतंत्रता के लिये ‘जुझारू संघर्ष’ लाल बाल तथा पाल की वैचारिक प्रेरणा से प्रारंभ हो गया था। द्विवदा युग विद्रोह का युग था। साहित्य और कला के क्षेत्र में बलिदान, सघष, प्रतिशोध, क्षोभ, आत्मसम्मान, वीरता, साहस, त्याग और नवजागरण का दृश्य इस युग में दिखाई पड़ता है। जब देश गुलाम होता है, तब अतीत का चिंतन परीक्षण और वर्तमान के अनुकूल उसका नवीकरण उभरता है। विदेशी शासन का विरोध और विनाश करने तथा उसका उल्लंघन, प्रतिकार एवं उसके प्रतिकूल आक्रोश प्रकट करने की भावना राष्ट्रीयता का अंग बन जाती है। मैथिलीशरण गुप्त ने अपने युग के अनुकूल कविता का सृजन किया। गुप्त जी की ‘भारत-भारती’ तत्कालीन रचनाकारों के लिये प्रेरणा का स्रोत बनी।

राष्ट्रवादी कवि अपनी जन्मभूमि के प्रति प्रेम का उत्कट भाव रखता है। अपनी राष्ट्रभूमि को ‘पुत्रोऽहं पृथिव्या’ के समान प्रेम करता है। अपनी जन्मभूमि की स्तुति करता है। कोई राष्ट्र पुत्र अपने देश पर गर्व करता है। मैथिलीशरण गुप्तजी ने ‘भारत-भारती’ में भारतवर्ष की श्रेष्ठता की स्पष्ट घोषणा की-

भू-लोक का गौरव, प्रकृति का पुण्य लीला-स्थल कहां?

फैला मनोहर गिरि हिमालय और गंगाजल जहां?

संपूर्ण देशों से अधिक किस देश का उत्कर्ष है?

उसका कि जो ऋषिभूमि है, वह कौन? भारतवर्ष।

अर्थात् भारत-भारतीकार ने हिमालय से घिरे तथा गंगाजल स युक्त ऋषिभूमि से अधिक किसी अन्य देश का उत्कर्ष नहीं माना।
मैथिलीशरण गुप्त ने स्वर्णिम अतीत का चित्रण बड़े ओज के साथ किया है। गुप्तजी ने लिखा है—’यदि किसी जाति का अतीत गौरवपूर्ण हो और वह उस पर अभिमान कर सके तो उसका भविष्य भी गौरवपूर्ण हो सकता है। आत्मविस्मृति ही अवनति का मुख्य कारण है और आत्म-स्मृति ही उन्नति का।’ मैथिलीशरण गुप्त की ‘भारत-भारती’ का अतीत खण्ड संपूर्ण द्विवेदी युगीन काव्य में भारत के अतीत गौरवगान का श्रेष्ठतम अंश है

“वे आर्य ही थे जो कभी अपने लिये जीते न थे।

वे स्वार्थरत हो मोह की मदिरा कभी पीते न थे॥

तथा फैला यहीं से ज्ञान का आलोक सब संसार में।”

गुप्तजी ने ‘भारत-भारती’ में भारतीय सभ्यता के प्रायः सभी विषयों की चर्चा की है।

ध्यातव्य है कि हिन्दी ही नहीं, भारत की अनेक प्रादेशिक भाषाओं में भी वीर काव्य लिखे गये और वीरों का गुणगान किया गया। देश की आजादी के लिए जूझने वाले युद्धवीर या धर्मवीर,
कर्मवीर या दानवीर अथवा दयावीर, सत्य, अहिंसा और शील लिये बलिदान हो जाने वाले वीरों की नाना श्रणियों में यह वीर-पुजाकी भावना व्यक्त हुई। गुप्तजी ने ‘भारत-भारती’ में लिखा है-

“थे भीष्म तुल्य महाबली, अर्जुन समान महारथी

श्री कृष्ण लीलामय हुए थे आप जिनके सारथी।”

गांधी के प्रति गुप्तजी के मन में अटूट श्रद्धा थी। ‘कर्मवीर बनो’ कविता में उन्होंने लिखा है-

“बैठ तुम्हारे साहस रथ में, हम न रुकेंगे अपने पथ में”

राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत कवि देश की वर्तमान दशा पर क्षोभ भी व्यक्त करता है कि उसके देश की दशा बहुत खराब है। गुप्तजी ने भारत-भारती में देश का वर्णन किया है

“उच्छिन्न होकर अर्द्धमृत सा छटपटाता देश है। सब ओर क्रन्दन हो रहा है, क्लेश को भी क्लेश है।

वह वेष-भूषा और भाषा, सब विदेशी है यहां

जातीयता क्या वस्तु है, निज देश कहते हैं किसे?

क्या अर्थ आत्म-त्याग का, वे जानते हैं क्या इसे?

उल्लेखनीय है कि द्विवेदी युग की उग्र राजनीतिक चेतना के कारण जो प्रचण्ड देश भक्ति, राष्ट्रीयता और जन्मभूमि प्रेम जागा उसकी उत्तेजना ने देशभक्तों की बलिदानी-वृत्ति को तीव्र किया। सभी तत्कालीन कवियों ने देश के लिये बलिदान हो जाने की प्रवृत्ति का काव्य रचा। मैथिलीशरण गुप्त ने कर्मवीरता को अपना उद्देश्य इस प्रकार दिखाया था

“कर्म है अपना जीवन प्राण, कर्म पर हो जाओ बलिदान”

जागरण और अभियान के गीतों ने जन्मभूमि, मातृभूमि, पितृभूमि या देश के क्रूर और अन्यायी शासक के विरुद्ध जनमानस को तैयार किया। मैथिलीशरण गुप्त की कविता में राष्ट्रीय जागरण का ओजस्वी स्वर दिखायी पड़ता है। ‘स्वदेश संगीत’ में गुप्त जी ने लिखा है-

“धरती हिलकर नींद भगा दे

वज्रनाद से व्योम जगा दे दैव,

और कुछ लाग लगा दे।”

‘भारत-भारती’ तो राष्ट्रीय जागरण की मूल आधार बन गयी थी। इसमें गुप्तजी कहते हैं-

“हे भाइयों, सोये बहुत अब तो उठो जागो, अहो।

देखो जरा अपनी दशा आलस्य को त्यागो, अहो।”

गौरतलब है कि गुप्त जी ऐतिहासिक तथा पौराणिक पात्रों के माध्यम से आज के युग की भावनाओं को भी वाणी देने में समर्थ हैं। विदेशी शक्ति से देश की रक्षा के लिए ‘साकेत’ के रामकृत संकल्प हैं-

“पुण्य भूमि पर पाप कभी हम सह न सकेंगे

पीड़क पापी यहां और अब रह न सकेंगे।”

स्मरण करना चाहिए कि राष्ट्रीय भावना के विकास में ‘जन्मना जाति सिद्धांत’ बाधक था। गुप्त जी यह भली-भांति जानते थे कि जाति की बेड़ियां तोड़े बिना गुलामी की बेड़िया नहीं टूटेंगी। इसीलिये ‘अनघ’ काव्य में गुप्तजी ने लिखा है-

“इसका भी निर्णय हो जाए,

नहीं अछूत मनुज क्या हाय करे अशुचिता

सबकी दूर, उनसे घृणा करें सो क्रूर।”

अछतों के मंदिर-प्रवेश के प्रश्न को भी ‘सिद्धराज’ नामक कविता में उठाया-

“मंदिर का द्वार जो खुलेगा सबके लिये होगी

तभी मेरी वहाँ विश्वंभर भावना।”

गप्तजी ने धार्मिक एकता को राष्ट्रीय भावना के विकास में सहयोगी समझा। धार्मिक एकता बहुधर्मी राष्ट्र की प्राणवायु होती है। इसी उद्देश्य से उन्होंने ‘काबा और कर्बला’ तथा ‘गुरुकुल’ नामक दो काव्य संग्रहों की रचना द्वारा इस्लाम धर्म और सिक्ख धर्म के प्रति श्रद्धा व्यक्त की। राष्ट्रीयता और विश्व प्रेम में धर्म बाधक नहीं है, बल्कि धर्म का उद्देश्य विश्व-बन्धुत्व भावना बढ़ाने का होना चाहिए।

“किन्तु हमारा लक्ष्य एक अम्बर भू-सागर

एक नगर-सा बने विश्व, हम उसके नागर।”

सारतः यह कहना तर्कसंगत होगा कि मैथिलीशरण गुप्त का राष्ट्रवाद केवल शुद्ध हृदय द्वारा प्रेरित राष्ट्रवाद नहीं था, वरन् प्रबुद्ध राष्ट्रवाद था। यद्यपि इस दौर में क्रांतिकारी राष्ट्रवादी भी थे, किन्तु गुप्तजी के ऊपर उनका प्रभाव नगण्य था। गप्तजी अहिंसा के प्रबल समर्थक थे। इसीलिये उनकी रचना का तेवर आक्रामक नहीं था। ‘भारत-भारती’ नामक रचना द्विवेदी युग की ही नहीं, बल्कि समूचे (भारतीय वाङ्मय के लिये) राष्ट्रवादी रुझान के लिये प्रेरणास्रोत रही। गुप्तजी को विदेशी शासन के शोषण, देश के सांस्कृतिक पतन का अपार कष्ट है। किन्तु इसके लिये वह विवेक सम्मत सोच की बात करते हैं

“हम कौन थे, क्या हो गये हैं और क्या होंगे अभी

आओ विचारें आज मिलकर ये समस्याएं सभी।”

अर्थात् भूत के आधार पर वर्तमान का निर्धारण करने तथा एक सुंदर भविष्य की रूपरेखा बनाने का परामर्श देते हैं।

राष्ट्रीय भावना तथा राष्ट्रीय चेतना का प्रसार उनके जीवन का उद्देश्य बन गया था। जीवन के पचास वर्ष सृजन कार्य में निरंतर कार्यरत रहने के पीछे देश की स्वतंत्रता, देश की प्रगति और विकास के देखे हुए स्वप्न थे, जो कि गुप्तजी के सामने ही पूर्ण हुए और इस महान राष्ट्रकवि के इस देश-कार्य को पूर्णत्व प्राप्त हुआ। अंततः कवि राष्ट्र के विकास के लिये ‘कर्म’ करने का संदेश देता है।

“जिस युग में हम हुए वही तो अपने लिये बड़ा है,

अहा हमारे आगे कितना कर्मक्षेत्र पड़ा है।”

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