पौराणिक कहानियां-अर्जुन और उर्वशी कथा

पौराणिक कहानियां-अर्जुन और उर्वशी कथा

पौराणिक कहानियां-अर्जुन और उर्वशी कथा

धर्म, सदाचार, नीति, न्याय, और सत्य का बोध कराने वाली प्राचीन कथाएं। यह प्राचीन कथा है हमारे जीवन के लिए प्रेरणादायक होती है।

मंगलकारी शाप 

पाण्डव वनवास का जीवन व्यतीत कर रहे थे। भगवान व्यास की प्रेरणा से अर्जुन अपने भाइयों की आज्ञा लेकर तपस्या करने गए। तप करके उन्होंने भगवान शंकर को प्रसन्न किया, आशुतोष ने उन्हें अपना पाशुपतास्त्र प्रदान किया। इसके अनन्तर देवराज इन्द्र अपने रथ में बैठाकर अर्जुन को स्वर्गलोक ले गए। इन्द्र ने तथा अन्य लोकपालों ने भी अपने दिव्यास्त्र अर्जुन को दिए। 

उन दिव्यास्त्रों को लेकर अर्जुन ने देवताओं के शत्रु निवातकवच नामक असुरगणों पर आक्रमण कर दिया। देवता भी उन असुरों पर विजय पाने में असमर्थ रहे थे, उन असुरों के बार-बार आक्रमण से देवता संत्रस्त हो रहे थे। अर्जुन ने युद्ध में असुरों को पराजित कर दिया। उनके गाण्डीव (धनुष) से छूटे बाणों की मार से व्याकुल होकर असुर भाग खड़े हुए और पाताल लोक चले गए। 

असुर-विजयी अर्जुन जब अमरावती लौटे, तब देवताओं ने बड़े उल्लास से उनका स्वागत किया। देवसभा सजाई गई। देवराज इन्द्र अर्जुन को साथ लेकर अपने सिंहासन पर बैठे। गन्धर्वगण वीणा बजाने लगे। स्वर्ग की श्रेष्ठतम अप्सराएं एक-एक करके नृत्य करने लगीं। देवराज किसी भी प्रकार अर्जुन को सन्तुष्ट करना चाहते थे। वह ध्यान से अर्जुन की ओर देख रहे थे कि उनकी अरुचि और आकर्षण का पता लगा सकें। 

अप्सराएं अपनी समस्त कला प्रकट करके देवताओं तथा देवराज के परमप्रिय अतिथि को रिझा लेना चाहती थीं। 

देवप्रतिहारी एक नृत्य समाप्त होने पर दूसरी अप्सरा का नाम लेकर परिचय देती और देवसभा एक नवीन झंकृति से झूम उठती। परन्तु जिस अर्जुन के स्वागत में यह सब हो रहा था, वे मस्तक झुकाए, नेत्र नीचे किए शान्त बैठे थे। स्वर्ग के इस वैभव में उन्हें अपने वल्कल पहने, फूल-मूल खाकर भूमि शयन करने वाले वनवासी भाई स्मरण आ रहे थे। उन्हें तनिक भी आकर्षण नहीं जान पडता था अमरावती में। 

सहसा देवप्रतिहारी ने उर्वशी का नाम लिया। अर्जुन का सिर ऊपर उठा। देवसभा में उपस्थित होकर नृत्य करती उर्वशी को उन्होंने कई बार देखा।

सहस्र लोचन इन्द्र ने यह बात लक्षित कर ली। महोत्सव समाप्त होने पर देवराज ने गन्धर्वराज चित्रसेन को अपने पास बुलाकर कहा-“उर्वशी के पास जाकर मेरी यह आज्ञा सूचित कर दो कि आज रात्रि में वे अर्जुन की सेवा में पधारें। अर्जन हम सबके परम प्रिय हैं। उन्हें आज वे अवश्य प्रसन्न करें।” 

उर्वशी स्वयं अर्जुन पर अनुरक्त हो चुकी थी। चित्रसेन के द्वारा जब उसे देवराज का आदेश मिला, तो उसने उसे बड़ी प्रसन्नता से स्वीकार किया। उस दिन उसने अपने को इतना सजाया जितना वह अधिक-से-अधिक सजा सकती थी। रात्रि में भरपूर शृंगार करके वह अर्जुन के निवास स्थान पर पहुंची। 

अर्जुन उर्वशी को देखते ही शय्या से उठकर खड़े हो गए। दोनों हाथ जोड़कर उन्होंने मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और बोले-“माता! आप इस समय कैसे पधारी? मैं आपकी क्या सेवा करूं?” 

उर्वशी तो अर्जुन के सम्बोधन से ही भौचक्की रह गई। उसने स्पष्ट बतलाया कि वह स्वयं उन पर आसक्त है और देवराज का भी उसे आदेश मिला है। उसने प्रार्थना की कि अर्जुन उसे स्वीकार करें। लेकिन अर्जुन ने स्थिर भाव से कहा “आप मुझसे ऐसी अनुचित बात फिर न कहें। आप ही कुरुकुल की जननी हैं, यह बात मैंने ऋषियों से सुन रखी थी। आज देवसभा में जब प्रतिहारी ने आपका नाम लिया, तब मुझे आपका दर्शन करने की इच्छा हुई। मैंने अपने कुल की माता समझकर अनेक बार आपके सुन्दर चरणों के दर्शन किए। लगता है कि इसी से देवराज को मेरे सम्बन्ध में कुछ भ्रम हो गया।” 

उर्वशी ने समझाया-“पार्थ! यह धरा नहीं है, स्वर्ग है। हम अप्सराएं न किसी की माता हैं, न बहन, न पत्नी ही। स्वर्ग में आया हुआ प्रत्येक प्राणी अपने पुण्य के अनुसार हमारा उपभोग कर सकता है। तुम मेरी प्रार्थना स्वीकार कर लो।” 

रात्रि का एकान्त समय था और पर्याप्त श्रृंगार किए स्वर्ग की सर्वश्रेष्ठ सुन्दरी प्रार्थना कर रही थी, किन्तु धर्मज्ञ अर्जुन के चित्त को कामदेव स्पर्श भी नहीं कर सका। उन्होंने उसी प्रकार हाथ जोड़कर प्रार्थना की-“जिस प्रकार कुन्ती मेरी माता हैं, जिस प्रकार माद्री मेरी माता हैं, जिस प्रकार इन्द्राणी शचीदेवी मेरी माता हैं, उसी प्रकार आपको भी मैं अपनी माता समझता हूं। आप मुझे अपना पुत्र मानकर मुझ पर अनुग्रह करें।” 

उर्वशी की ऐसी उपेक्षा तो कभी किसी ऋषि ने भी नहीं की थी। उसे इसमें अपने सौन्दर्य का अपमान प्रतीत हुआ। उस कामातुर ने क्रोध में आकर शाप दिया-“तुमने नपुंसक के समान मेरी प्रार्थना स्वीकार नहीं की, इसलिए हिजड़े बनकर स्त्रियों के बीच नाचते-गाते हुए तुम्हें एक वर्ष रहना पड़ेगा।” 

शाप देकर उर्वशी चली गई। अर्जुन भी उसे शाप देने में समर्थ थे और उन्हें अन्यायपूर्वक शाप दिया गया था, किन्तु उन्होंने उर्वशी को जाते समय भी मस्तक झुकाकर प्रणाम ही किया। 

प्रात:काल देवराज को सब बातें ज्ञात हुईं। अर्जुन के संयम पर प्रसन्न होकर वे बोले-“धनंजय! धर्म का पालन करने वाले पर कभी विपत्ति नहीं आती। यदि कोई विपत्ति आती भी है तो वह उसका मंगल ही करती है। उर्वशी का शाप तुम्हारे लिए एक मानव वर्ष तक ही रहेगा और शाप के कारण वनवास के अन्तिम अज्ञातवास वाले एक वर्ष के समय में तुम्हें कोई पहचान नहीं सकेगा। तुम्हारे लिए यह शाप उस समय वरदान ही सिद्ध होगा।” 

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Mythology – Arjuna and Urvashi Katha

Ancient stories providing religion, morality, policy, justice, and realization of truth. This ancient story is inspiring for our lives.

Bewitching curse

The Pandavas were leading a life of exile. With the inspiration of Lord Vyas, Arjuna went to austerities after taking orders from his brothers. He pleased Lord Shankar by meditating, Ashutosh gave him his Pashupatastra. Apart from this, Devraj Indra sat in his chariot and took Arjuna to heaven. Indra and other ombudsmen also gave their divisions to Arjuna.

Arjuna attacked those demons called Nivatakavach, the enemy of the gods, taking those divinities. The gods were also unable to conquer those asuras, the gods were being disturbed by the repeated attacks of those asuras. Arjuna defeated the Asuras in battle. Disturbed by the hitting of the arrows left by his Gandiv (bow), the demons fled and went to Hades.

When the Asura-victorious Arjuna returned to Amravati, the gods welcomed him with great gaiety. Devasha was decorated. Devraj Indra took Arjuna with him and sat on his throne. Gandhargan started playing Veena. The best nymphs of heaven started dancing one by one. Devraj somehow wanted to satisfy Arjuna. He was carefully looking at Arjuna to find his disinterest and charm.

The Apsaras wanted to reveal all their art and lure the deity and the beloved guest of Devaraja.

At the end of a dance, Devapratihari introduces the name of the second nymph and Devasabha rises with a new frown. But the Arjuna, in whose welcome this was happening, bowed his head, sat down with his eyes down. In this splendor of heaven, he remembered his forest dwellers wearing their flowers, eating flowers and roots and sleeping in the land. He did not know even a little attraction in Amravati.

Suddenly Devapratihari took the name of Urvashi. Arjun’s head lifted up. He saw Urvashi dancing several times while attending the Devsabha.

Sahasra Lochan Indra targeted this. At the end of the festival, Devaraja called Gandharvaraj Chitrasen to himself and said- “Please go to Urvashi and inform me that tonight she should come to Arjuna’s service. Arjan is dear to all of us. She must please him today.” “

Urvashi herself was enamored with Arjuna. When he received the order of Devaraja by Chitrasen, he accepted him with great pleasure. That day she decorated herself as much as she could. At night, she reached Arjuna’s place of residence with plenty of dressing.

Arjun saw Urvashi and got up from the bed and stood up. He bowed with folded hands and bowed and said – “Mother! How did you come this time? What should I serve you?”

Urvashi was aghast at Arjuna’s address. He clearly told that he himself is enamored with her and he got orders from Devaraj too. He prayed that Arjuna accept him. But Arjuna said in a steady manner, “Don’t say such an inappropriate thing to me again. You are the mother of Kurukul, I heard this from the sages. When Pratihari took your name in Devsabha today, I wish to see you It happened. I considered my mother to be the mother of my family, and saw your beautiful feet many times. It seems that this caused Devraj some confusion about my relationship. “

Urvashi explained- “Parth! It is not earth, it is heaven. We are nymphs neither mother, sister, nor wife. Every creature in heaven can consume us according to his virtue. You accept my prayer Do it. “

Night was the lonely time and the best beauty in heaven was praying enough, but the goddess could not even touch Kamadeva on the mind of Arjuna. He prayed with folded hands, “Just as Kunti is my mother, as Madri is my mother, as Indrani Shachidevi is my mother, similarly I consider you my mother. You should consider me as your son and please me.” . “

Never even a sage had neglected Urvashi. He felt insulted by his beauty in it. That lustful cursed in anger – “You did not accept my prayer like an eunuch, so you have to live a year dancing and singing among women as eunuchs.”

Urvashi left after cursing. Arjuna was also able to curse him and he was cursed unjustly, but he bowed with obeisance while going to Urvashi.

Devraj got to know all things in the morning. Delighted at Arjuna’s restraint, he said- “Dhananjaya! There will never be any misfortune on the follower of Dharma. Even if any calamity comes, it does its Mars. Urvashi’s curse will remain for you for one human year and curse Because of the last exile of exile, no one will recognize you in the time of one year. This curse will be a boon for you at that time. “

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