Arihant Essay Book in hindi-मूल्य स्तर में वृद्धि : कारण, प्रभाव और निवारण

Arihant Essay Book in hindi

Arihant Essay Book in hindi- मूल्य स्तर में वृद्धि : कारण, प्रभाव और निवारण अथवा मूल्य वृद्धि : कारण और निवारण (यूपीपीसीएस मुख्य परीक्षा, 2014) 

भारतीय रिजर्व बैंक एक तरफ महंगाई पर नियंत्रण कायम हो तो दसरी तरफ अर्थव्यवस्था या बाजार को गतिशीलता लेने के द्वंद्व से जूझ रहा है। ऐसे में कई बिंदुओं का हल खोजने की जरूरत महसूस होती है। जैसे महंगाई क्या है? महंगाई और मुद्रास्फीति में क्या अंतर्सम्बंध है ? तरलता उसे किस तरह से सावित करती हैं ? वर्तमान में महंगाई के असल कारण मांग पण में निहित है या पूर्ति पक्ष में ? भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति की इस सम्बंध में क्या सीमाएं हैं ? 

सामान्य तौर पर महंगाई और मुद्रास्फीति को समानार्थी रूप में स्वीकार किया जाता है। हालांकि इन दोनों में एक तकनीकी अंतर रहता है। दूसरे शब्दों में कहें तो मुद्रास्फीति से हमारा तात्पर्य वही होता है जो महंगाई से है, लेकिन तकनीकी अर्थों में इन दोनों में कुछ भिन्नता रहती है। तकनीकी अर्थों में मुद्रास्फीति, मुद्रा के चलन वेग में परिवर्तन की दर है जबकि महंगाई मुद्रा के मुकाबले वस्तुओं और सेवाओं की कीमत में वृद्धि है। ये दोनों एक दूसरे के पूरक तब हो जाते हैं जब मुद्रा की तरलता के अनुपात (उल्लेखनीय है कि तरलता में वृद्धि मुद्रा के चलन वेग को बढ़ाती है) में पूर्ति की लोच कम होती है। सामान्य अर्थ में किसी अर्थव्यवस्था में एक समयावधि के दौरान वस्तुओं और सेवाओं के सामान्य मूल्य स्तर में होने वाली सतत वृद्धि को मुद्रास्फीति कहते हैं। मूल्य स्तर में वृद्धि के फलस्वरूप मुद्रा क्रय शक्ति कम होती जाती है। 

“सामान्य तौर पर महंगाई और मुद्रास्फीति को समानार्थी रूप में स्वीकार किया जाता है। हालांकि इन दोनों में एक तकनीकी अंतर रहता है |”

महंगाई बढ़ने के कारणों को निम्नलिखित बिंदुओं द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है- 

सामान्य तौर पर यह माना जा रहा है कि भारत में लोगों का बढ़ता हुआ आय स्तर महंगाई को बढ़ाने के लिए उत्तरदायी है। देश में अनाज तथा खाने-पीने की अन्य वस्तुओं की कीमतों में हो रही लगातार वृद्धि के लिए स्वयं देश के उपभोक्ता नागरिक ही जिम्मेदार हैं। खानपान की बदली आदतों तथा नागरिकों की क्रय शक्ति में हुई वृद्धि के कारण कीमतें बढ़ती जा रही हैं। क्रयशक्ति बढ़ने से लोग खाद्य वस्तुओं का अधिक इस्तेमाल करने लगे हैं। अनाजों का समर्थन मूल्य बढ़ने से भी महंगाई बढ़ी है। महंगाई का एक पक्ष तो यह है कि मध्यम वर्ग का आकार लगातार बढ़ रहा है, इसलिए मांग में विविधता और वृद्धि दोनों में ही इजाफा हो रहा है। स्वाभाविक है कि बाजार यांत्रिकी इसके अनुसार अपने लाभ बढ़ाएगी यानी मूल्य बढेंगे। लेकिन यदि पूर्ति पक्ष को ठीक कर लिया जाए तो ऐसी स्थिति नहीं आएगी। 

कुछ अर्थशास्त्रियों का मत है कि महंगाई का असल कारण मांग पक्ष में नहीं बल्कि पूर्ति पक्ष में निहित है। मांग के सापेक्ष पूर्ति का बेलोचदार होना, इसके लिए ज्यादा जिम्मेदार है। इसके लिए कई कारण जिम्मेदार माने जा सकते हैं। प्रथमत: कृषि क्षेत्र की लगातार उपेक्षा, जिससे सकल उत्पादन में आनुपातिक कमी आई। द्वितीयतः प्रसंस्करण क्षेत्र में निवेश की कमी के कारण खाद्यान्नों की खराबी जिसका सीधा प्रभाव पूर्ति पर पड़ता है। तीसरा, इन्फ्रास्ट्रक्चर का खराब स्तर जिससे परिवहन तंत्र बाधित होता है फलतः अधिक समय लगता है, मूल्य ह्रास में वृद्धि होती है और लागतें बढ़ जाती हैं। चतुर्थ, जिंसों पर वायदा कारोबार की छूट जिससे सट्टेबाजी और मूल्य वृद्धि को बढ़ावा मिलता है और अंतिम है बाजार शक्तियों का इतना प्रभावी होना कि वे गवर्नेस को चुनौती देते हुए लगातार होर्डिंग को बढ़ावा देने का कार्य करती हैं जो कि अनेक संदर्भो में जमाखोरी और वस्तुओं की कृत्रिम कमी के रूप में परिलक्षित होती है। जिससे मांग के अनुसार पूर्ति सम्भव नहीं हो पाती, फलतः मूल्य बढ़ जाते हैं। 

आर्थिक वृद्धि का सीधा सरोकार ऊर्जा की उपलब्धता और उसकी कीमतों से होता है। ऊर्जा की अनुपलब्धता और उसकी कीमतों में वृद्धि आर्थिक विकास की गति को नकारात्मक रूप से प्रभावित करते हैं, जबकि इसके विपरीत स्थिति आर्थिक विकास के अनुकूल होती है। इधर ऊर्जा कीमतों में लगातार वृद्धि हो रही है, स्वाभाविक तौर पर उसका प्रभाव कीमत वृद्धि के रूप में सामने आना ही है। इसे पेट्रोलियम पदार्थों की बढ़ती हुयी कीमतों के संदर्भ में देखा जा सकता है। कच्चे तेल की बढ़ती हुई अंतर्राष्ट्रीय कीमतें देश में पेट्रोलियम पदार्थों के मूल्यों को बढ़ाती हैं जिससे वस्तुओं और सेवाओं की लागत एवं तद्नुसार मूल्य बढ़ जाते हैं। 

जब निवेशों या अन्य रूपों में विदेशी मुद्रा का आगमन होता है तो वह स्टॉकों के रूप में भारतीय रिजर्व बैंक के पास जमा हो जाता है। इससे भारतीय रिजर्व बैंक पर यह दबाव बढ़ता है कि वह स्टॉकों को तरल मुद्रा में बदले। परिणाम यह होता है कि भारतीय रिजर्व बैंक तरल मुद्रा छापती है जो बैंकिंग तंत्र के जरिए या फिर सरकार द्वारा लिए गये उधार के जरिए बाजार में उतर जाती है। जिससे तरलता में वृद्धि हो जाती है 

और यह तरलता प्रभावी मांग में वृद्धि लाती है जो कीमतों में वृद्धि को प्रेरित करती है। इसका एक पक्ष यह भी है कि जब डॉलर में विदेशी निवेशों की वृद्धि होती है तो रुपये का मूल्य उसके मुकाबले बढ़ने लगता है जिससे निर्यातों पर विपरीत प्रभाव पड़ने लगता है। इस स्थिति में भारतीय रिजर्व बैंक पर यह दबाव डाला जाता है कि वह बाजार से डॉलर खरीदे। इसके बदले उसे रुपया उतारना पड़ता है, जिससे तरलता बढ़ जाती है |

विकासशील देशों में मूल्य वृद्धि के लिए राजकोषीय नीति को भी काफी हद तक दोषी माना जा सकता है, क्योंकि महंगाई विशुद्ध रूप से मांग और पूर्ति का ही विषय नहीं होती, बल्कि समग्र अर्थव्यवस्था की प्रकृति पर भी निर्भर करती है। यदि किसी राष्ट्र की अर्थव्यवस्था, वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन आय के मुकाबले अधिक कर ले जाती है, तो मूल्य वृद्धि की सम्भावनाएं नहीं रहतीं, लेकिन यदि स्थिति इसके ठीक विपरीत रहती है तो मूल्य वृद्धि होना तय होता है। अर्थव्यवस्था में सार्वजनिक व्यय में भारी वृद्धि से भी मुद्रा के परिचलन में वृद्धि होती है और अनुत्पादक व्ययों के बढ़ने से यह मांग पर दबाव बनाकर मूल्य वृद्धि में परिलक्षित होता है।

मूल्य स्तर में वृद्धि का कारण जिंसों की आपूर्ति व्यवस्था में कमियों से भी जुड़ा है। उदाहरणस्वरूप, सब्जियों की अच्छी फसल के बावजूद सप्लाई साइड (पूर्ति पक्ष) की दिक्कतों की वजह से उपभोक्ताओं तक पहुंचते-पहुंचते यह महंगी हो जाती हैं। कोल्ड चेन, वेयरहाउस और कोल्ड स्टोरेज के निर्माण के लिए निवेश की रफ्तार बेहद धीमी है। निजी सेक्टर इसमें पैसा लगाना चाहता है लेकिन प्रक्रिया इतनी धीमी और जटिल है कि ज्यादातर निवेशक हताश हो जाते हैं। कृषि उत्पादों की मार्केटिंग के लिए ज्यादातर राज्यों के पास अपनी कमेटियां हैं। लिहाजा कृषि उत्पादों के मूल्यों में समानता नहीं आ पाती है। जीएसटी जैसे बड़े सुधार अटके हुए हैं। इससे भी महंगाई के मोर्चे पर काफी राहत मिल सकती थी। इस तरह देखा जाए तो महंगाई अर्थव्यवस्था के स्वाभाविक चक्र के साथ-साथ सरकार की नीतिगत खामियों का भी परिणाम है। 

अर्थव्यवस्था की प्रकृति भी काफी हद तक इसके लिए जिम्मेदार होती है। उदाहरण के तौर पर हमारी अर्थव्यवस्था को बूस्ट करने के लिए बड़े पैमाने पर नकदी और विदेशी निवेशों की जरूरत है। ये दोनों ही पक्ष मुद्रा आपूर्ति (मनी सप्लाई) को बढ़ाने के लिए बाध्य करते हैं। यदि भारतीय रिजर्व बैंक इसे ध्यान में रखते हुए मौद्रिक नीतियों का निर्माण करती है तो मूल्य वृद्धि की सम्भावनाएं प्रबल होंगी और यदि ऐसा नहीं करती है तो अर्थव्यवस्था को नकदी की आपूर्ति बाधित होगी। फलतः अर्थव्यवस्था अथवा बाजार में निराशावादी वातावरण निर्मित | होगा। चंकि दूसरा पक्ष ज्यादा जरूरी होता है, इसलिए भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा नकदी बढ़ाने की कोई भी कोशिश मूल्य वृद्धि के रूप में प्रकट हो जाती है। 

उपर्युक्त कारणों के अतिरिक्त विकासशील अर्थव्यवस्थाओं | में जनसंख्या में तीव्र वृद्धि से मांग का बढ़ना, आयातित वस्तुओं | के मूल्यों में वृद्धि, कृषि या उद्योगों में अपर्याप्त उत्पादन से पूर्ति में कमी, वेतनों-मजदूरी में वृद्धि, उपभोग वस्तुओं के निर्यात का | बढ़ना, अर्थव्यवस्था में व्याप्त काले धन से परिचलन मुद्रा में वृद्धि आदि भी मूल्य स्तरों में वृद्धि के महत्वपूर्ण कारण रहे हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। 

कीमत स्तर में वृद्धि बाजार में आशावादी वातावरण बनाए रखने के लिए जरूरी है, लेकिन यह समाज के निचले तबके के साथ-साथ मध्यम वर्ग को प्रभावित करती है। अर्थात- मटा स्फीति समाज में धन तथा आय का अन्यायपूर्ण वितरण करती है, स्थिर आय वाले व्यक्तियों के समक्ष अनेक आर्थिक कठिनाइया उत्पन्न कर देती हैं। यह एक प्रकार का अनिवार्य या अनैच्छिक करारोपण है, जो गरीबों की आय से एक निश्चित हिस्से को अमीरों की ओर हस्तांतरित कर देता है, इससे नैतिक पतन की स्थिति पैदा होती है, उद्यमी वर्ग की बचतों को करने की शक्ति तथा इच्छा में कमी हो जाने से अर्थव्यवस्था में पूंजी का निःसंचय कम हो जाता है, सामान्य से अधिक लाभ होने के कारण सट्टेबाजी जैसी अनुचित क्रियाओं का जन्म होता है। हालांकि अभिवृद्धि की अवस्था आर्थिक क्रियाओं तथा रोजगार के स्तर को ऊपर उठाने में सहायक सिद्ध होती है, लेकिन कुछ समय के पश्चात यही अभिवृद्धि घातक सिद्ध होती है। 

“कीमत स्तर में वृद्धि बाजार में आशावादी वातावरण बनाए रखने के लिए जरूरी है, लेकिन यह समाज के निचले तबके के साथ-साथ मध्यम वर्ग को प्रभावित करती है।” 

कुल मिलाकर मूल्य स्तर में वृद्धि किसी एक कारक की देन नहीं है, बल्कि वह बहुत से कारणों का परिणाम हो सकती है। इसलिए उसकी प्रकृति एकलरेखीय न होकर बहुआयामी होती है, जिसे सीमित दृष्टिकोण के तहत नहीं देखना चाहिए। 

महंगाई एक विकट समस्या है। इसके निवारण के लिए जहां पूंजी के बहिर्गमन को रोका जाना आवश्यक है, वहीं बचत को प्रोत्साहन दिया जाना आवश्यक है। महंगाई को नियंत्रित करने के लिए यह भी आवश्यक है कि देश से जमाखोरी एवं कालाबाजारी का सफाया किया जाए। आपदा प्रबंधन के ठोस उपाय कर एवं कृषि की प्रकृति पर निर्भरता को कम करके भी महंगाई पर नियंत्रण किया जा सकता है। 

भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा मुद्रा स्फीति या मूल्य स्तर में वृद्धि को रोकने या कम करने के लिए साख नियंत्रण उपायों (बैंक दर/रेपो दर नकद आरक्षित अनपात और सांविधिक तरलता अनुपात में वृद्धि तथा खुले बाजार की क्रियाओं द्वारा) का प्रयोग किया जाता है जिनसे तरलता या चलनिधि कम होती है तथापि अर्थव्यवस्था में उत्पादन स्तर में वृद्धि हेतु निवेशों के लिए बाजार ऋणों की उपलब्धता को बनाए रखने का द्वंद्व भी होता है। वस्तुतः विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में मुद्रास्फीति के उच्च स्तर को कम करने हेतु अनुत्पादक सार्वजनिक व्ययों को कम करने, संतुलित राजकोषीय नीति अपनाने, आर्थिक अपराधों एवं काले धन के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई आदि जहां सरकार की ओर से उठाए जाने वाले प्रमुख कदम हो सकते हैं, वहीं इस संदर्भ में पूर्ति पक्ष को सबल बनाने की भी नितांत आवश्यकता है, जिसमें दीर्घकालीन संदर्भ में कृषि एवं उद्योगों के उत्पादन में वृद्धि के अतिरिक्त आवश्यकता पड़ने पर निर्यातों पर रोक एवं तत्काल आयातों की अनुमति देना भी तात्कालिक उपायों के रूप में प्रयुक्त हो सकते हैं। 

वस्तुतः एक अच्छी लोकतांत्रिक व्यवस्था उसे माना जाता है, जिसमें गरीब की भी गुजर-बसर आसानी से हो सके। ऐसे में एक जीवंत लोकतंत्र के लिए यह आवश्यक है कि सरकार, जनता को महंगाई से निजात दिलाए । यदि ऐसा नहीं होता है, तो लोकतंत्र की सार्थकता पर प्रश्नचिन्ह लग सकता है। 

Click here -HINDI NIBANDH FOR UPSC  

वर्तमान विषयों पर हिंदी में निबंध

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा.

fifteen − thirteen =