Apne Lakshya ko Kaise hasil kare | अपने लक्ष्य को कैसे हासिल करें-अपने को महान् लक्ष्य से जोड़िए

Apne Lakshya ko Kaise hasil kare

Apne Lakshya ko Kaise hasil kare | अपने लक्ष्य को कैसे हासिल करें-अपने को महान् लक्ष्य से जोड़िए 

हम एक ऐसे किशोर/किशोरी अथवा युवक/युवतीकी कल्पना करते हैं जो अत्यन्त दीन, हीन, असमर्थ एवं अक्षम है. यहाँ तक कि वह अपनी किसी भी शारीरिक और मानसिक शक्ति का विकास करने में असमर्थ है. इस युवक/युवती को कोई करोड़पति अथवा कोई अन्य प्रकार सम्मान्य व्यक्ति गोद ले ले, तो वह युवक/युवती उस परिवार का सदस्य बनते ही समाज में मान-सम्मान का अधिकारी बन जाएगा/जाएगी. उसकी गणना बड़े आदमियों में होने लगेगी, वह स्वयं भी अपने को सम्मानित एवं बड़ा आदमी समझने लगेगा/लगेगी. मन्तव्य स्पष्ट है, तुच्छ एवं नगण्य व्यक्ति का अभिन्न रिश्ता यदि किसी बड़े परिवार से हो जाता है तो वह तथाकथित तुच्छ व्यक्ति तुच्छता की केचुल को तत्काल त्याग देता है और बड़ा आदमी बन जाता है. ठीक इसी प्रकार कोई व्यक्ति कितना भी साधारण अथवा सामान्य क्यों न हो, 

परन्तु यदि वह अपने भौतिक जीवन को किसी दिव्य उद्देश्य से सम्बद्ध कर देता है, तो वह व्यक्ति अना यास ही दिव्यता की परिधि में आ जाता है और महिमामण्डित हो जाता है, बाल गंगाधर तिलक, मोहनदास कर्मचन्द गांधी. मदन मोहन मालवीय, जवाहरलाल नेहरू, भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद, सुभाषचन्द्र बोस आदि व्यक्तियों की गणना महान् व्यक्तियों में होती है, क्योंकि उन्होंने अपने जीवन का रिश्ता एक महान लक्ष्य-माँ भारत को स्वतंत्र कराने के लक्ष्य के साथ जोड़ दिया था. रानियाँ और महारानियाँ तो अनगिनत हुईं, पर झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई दिव्यता की अधिकारी बनीं, क्योंकि उन्होंने अपने भौतिक जीवन को भारत माता की स्वतंत्रता की गोद में डाल दिया था. इस शृंखला में महात्मा ईसा, हजरत मुहम्मद, जोन ऑफ आर्क, हैलेन केलर, मदर टेरेसा, मार्टिन लूथर किंग आदि अनेक नाम गिनाए जा सकते हैं. मानव के अभ्युदय को दिव्य उद्देश्य से जोड़ने वाले अनगिनत ज्ञानी, महात्मा, वैज्ञानिक, मनोवैज्ञानिक एवं समाज वैज्ञानिक महापुरुषों की श्रेणी में पहुँच गए. द्वितीय श्रृंखला में हम उन अनेक प्रशासनिक अधिकारियों के नाम भी ले सकते हैं जिन्होंने अपनी सीमाओं में रहते हुए समाज की सेवा के महान उद्देश्य से अपने को जोड़ा और जन मानस के मान-सम्मान के अधिकारी बन गए प्रश्न यह नहीं है कि हम क्या हैं, प्रश्न यह है कि हम क्या बनना चाहते हैं. कोई हमें बेटे के रूप में यदि गोद ले सकता है, तो हम आत्म-समर्पण द्वारा किसी को पिता रूप में गोद क्यों नहीं ले सकते हैं? हम किसी महान उद्देश्य को अपने जीवन का लक्ष्य बना लें और उसके प्रति पूर्णतः समर्पित हो जाएं. इस प्रक्रिया द्वारा उच्च स्तर पर हम दिव्यता को वरण कर सकेंगे और निम्न स्तर पर महानता अथवा श्रेष्ठता को प्राप्त कर सकेंगे आपने जुन युवकों/युवतियों की साक्षात्कार भेंट वार्ताएं पढ़ी होंगी, जो अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल हुए हैं. सबकी उपलब्धियों के पीछे लक्ष्य के प्रति उनकी समर्पण भावना रही है, अपने अध्ययन काल में उनको अर्जुन की तरह सफलता रूपी चिड़िया की आँख ही दिखाई देती रही थी, अब्दुल हमीद और लायक सिंह लाखों सिपाहियों की तरह भारतीय सेना के साधारण सिपाही थे, परन्तु उन्होंने खेमकरन और कारगिल में अपने कर्तव्यों का निर्वाह अद्भुत कौशल, पूर्ण समर्पण और पूरी सामर्थ्य के साथ किया, जिससे वे महान बन गए. 

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सारांश यह है कि हम वही बन सकते हैं जिसके प्रति हम समर्पित हैं, उदाहरण के लिए हम किसी बड़ी मशीन में लगने वाली एक ढिबरी को लेते हैं. यदि वह ढिबरी निकल जाए या गिर जाए तो मशीन बन्द हो जाएगी. मशीन बन्द हो जाने पर कितनी हानि हो सकती है, इसकी कल्पना सहज ही की जा सकती है. वह दिबरी यदि किसी वायुयान की हो तो क्या स्थिति हो? उसके निकलते ही वह वायुयान अनेक यात्रियों की मृत्यु का हेतु बन जाएगा. 

हम बाजार से उस ढिबरी को थोड़ा-सा मूल्य देकर ला सकते हैं, परन्तु मशीन में लगते ही उसका मूल्य बढ़ जाता है, क्योंकि उसका लक्ष्य हवाई जहाज़ एवं उसमें यात्रा करने वाले यात्रियों की सुरक्षा के साथ जुड़ जाता है, हवाई जहाज में लगी हुई ढिबरी का मूल्य क्या कोई बता सकता है? अपने कर्तव्य का पालन सम्पूर्ण सामर्थ्य के साथ करने वाली इकाई, चाहे ढिबरी जैसी नगण्य वस्तु हो अथवा एक छोटा-सा सिपाही हो, उसका मूल्य रुपयों में नहीं आंका जा सकता है, उसको तो दिव्यता अथवा महानता का अधिकारी स्वीकार करना ही पड़ता है. निष्कर्ष यह है कि महानता एवं दिव्यता की शर्त केवल इतनी है कि वह अपने कर्तव्यों का सम्पादन सम्पूर्ण कौशल तथा सम्पूर्ण सामर्थ्य से अपने पुरुषार्थ की सीमा तक निरन्तर करता रहे और अपने को लक्ष्य के अनुरूप ही महान अथवा दिव्य समझे. 

उन्नत होना, प्रगति करना और आगे बढ़ना प्रत्येक जीव का अधिकार है और इस अधिकार का पूर्ण उपयोग उसका कर्तव्य होना चाहिए. स्वामी विवेकानन्द का कथन द्रष्टव्य है- “लक्ष्य को ही अपना जीवन कार्य समझो. हर समय उसी का चिन्तन करो, उसी का स्वप्न देखो, उसी के सहारे जीवित रहो, जो अपने लक्ष्य के प्रति पागल हो गया है, उसे ही प्रकाश के दर्शन होते हैं, जो थोड़ा इधर-उधर हाथ मारते हैं, वे कोई लक्ष्य प्राप्त नहीं कर पाते हैं. उनका जोश सोडावाटर के उफान की भाँति शीघ्र ही ठण्डा हो जाता 

अंग्रेज विद्वान् कार्लाइल का कहना हमारा मार्गदर्शक हो सकता है- “अपने जीवन का एक लक्ष्य बनाइए और इसके बाद अपने सम्पूर्ण शारीरिक एवं मानसिक बल से उसमें लग जाइए. लक्ष्य के साथ तदाकार होने पर कीट भंग न्याय के अनुसार आप उतने ही महान बन जाएंगे जितना महान आपका लक्ष्य है. राधा आदिक गँवार अहीरियों का कृष्ण रूप हो जाना इस प्रक्रिया का ज्वलंत उदाहरण है. हिन्दी के कवि देव ने इस तदाकारता का वर्णन करते हुए लिखा है-“राधिका कान्ह को ध्यान धरे तो कान्ह है राधिका के गुन गावै.” 

साध्य के प्रति पूर्ण निष्ठा एवं लगन रखने वाला व्यक्ति साधन भी जुटा लेता है अथवा साधन उसको स्वयं उपलब्ध हो जाते हैं, इसी को लक्ष्य करके कहा जाता है- जो स्वयं | अपनी सहायता करता है, उसकी सहायता करने को परमात्मा विवश हो जाता है, यहाँ परमात्मा का अर्थ समाज समझिए. 

लक्ष्य की उच्चता अथवा श्रेष्ठता के साथ उसकी गुणवत्ता का अधिक महत्व होता है. यदि आपका लक्ष्य दिव्य है तो उसके साथ दिव्यता का सम्बन्ध आद्योपान्त बना रहेगा. भले ही आप निर्धारित ऊँचाई तक न पहुँच पाएं, परन्तु आप जहाँ तक भी पहुँच सकेंगे, वहाँ आप दिव्यता द्वारा मण्डित होंगे तथा आपके लक्ष्य की गुणवत्ता अक्षुण्ण बनी रहेगी.जोल होव्स का कथन सर्वथा सटीक एवं यथार्थ है कि “Aim at the sun, and you may not reach it, but your arrow will fly far higher than, if aimed at an object on a level with yourself.” अर्थात् सूर्य पर संधान करो, हो सकता है आपका तीर सूर्य तक न पहुँच सके, परन्तु इतना अवश्य है कि तुम्हारे स्तर पर स्थित लक्ष्य की अपेक्षा वह कहीं अधिक ऊँचाई तक उड़कर पहुँच जाएगा. 

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लक्ष्य को हासिल करने के सरल तरीके 

अपनी नजर हमेशा लक्ष्य पर रखें

इसे हासिल करने का प्लान बनाएँ.

रोजाना उठने के बाद पहले इसे पढ़ें

जहाँ खड़े हो वहीं से कदम बढ़ाएं..

आरामतलबी व अपनी प्रशंसा से दूर रहें,

लक्ष्य प्राप्त करने योग्य होना चाहिए.

बाधाओं का डटकर सामना करे,

समय-समय पर अपनी बढ़ोत्तरी की जाँच करें. 

‘सफलता के लिए अपनी आँखें अपने लक्ष्य पर जमाए रखें…. 

अपनी क्षमताओं पर ध्यान दें, निर्धनता और असफलताओं पर नहीं 

लक्ष्य को जाँच-परखें – क्या आपका लक्ष्य साफ-सुथरा है? 

आप उसे हासिल कर सकते हैं?

कितने समय में उसे हासिल कर पाएंगे? 

क्या आपको इससे ख्याति मिलेगी?

क्या यह आपके दूसरे लक्ष्यों के अनुकूल है?

इससे आपको सेहत व मन की शांति मिलेगी. 

क्या इससे आपके परिवार की जीविका चल सकेगी?

क्या इसमें और कामयाबी पाने के अवसर 

जीवन के रास्तों पर चलते हुए अपनी आँखें अपने लक्ष्य पर जमाए रखें. आम पर ध्यान दें, गुठली पर नहीं. -अज्ञात

लक्ष्य भेद के पहले आपको लक्ष्य बनाना चाहिए. -एक कहावत

छोटे लक्ष्य न बनाएँ उनमें इंसान के दिलों में जोश भरने वाला जादू नहीं होता … बड़े लक्ष्य बनाएँ, पूरी आशा के साथ ऊँचाई की ओर बढ़े और काम करें. -डेनियल एच बर्नहम

अपने सामने एक ही लक्ष्य रखना चाहिए. उसे पाने तक दूसरी बात की ओर ध्यान नहीं देना चाहिए. रात-दिन, सपने तक में उसी की धुन रहे; तभी उसमें सफलता मिलती है. -विवेकानन्द 

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