ऐंटन वॉन ल्यूवेनहॉक की जीवनी | Antonie van Leeuwenhoek biography in hindi

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ऐंटन वॉन ल्यूवेनहॉक की जीवनी | Antonie van Leeuwenhoek biography in hindi

जीवाणु विज्ञान क्षेत्र के महान् अग्रेता ऐण्टन वान लीवेनहोक का जन्म सन् 1632 ई० को हालैण्ड में हुआ था। ऐण्टन अत्यन्त शान्त प्रकृति का छोटा-सा व्यवसायी था। डेल्फर नगर में उनकी छोटी-सी पंसारी की दुकान थी। मगर उनकी रुचि सूक्ष्मदर्शी कांच बनाने में थी। उन दिनों कांच के सर्वोत्तम लैंस अधिकांशतः कमजोर दृष्टि वाले व्यक्ति पढ़ने के लिए उपयोग में लाते थे। 

ऐण्टन वान लीवेनहोक इन लैंसों से सन्तुष्ट नहीं थे। इसका महत्त्वपूर्ण कारण यह था कि उनमें उत्तम लैंस बनाने की क्षमता थी। यद्यपि उनका पूरा दिन रोजी-रोटी कमाने के लिए पंसारी की दुकान पर कट जाता था, किन्तु दुकान बंद करने के बाद घर पहुँचकर, खाना खाने के बाद, वह अपनी मेज पर काम करने बैठ जाते थे। वह कांच के इतने छोटे टुकड़ों को घिसते और पॉलिश करते थे, जो आकार में बड़ी बिन्दी से बड़े नहीं होते थे। 

उन्होंने इस प्रकार के असंख्य लैंस तैयार कर दिए और अभ्यास के माध्यम से कार्य में विशेष योग्यता प्राप्त कर ली। अंत में उन्होंने एक ऐसा लैंस तैयार किया, जो नन्हें भुनगे को डेढ़ सौ गुना बड़ा दिखा सकता था। उन्होंने इस तरह के कई लैंस बना डाले। तत्पश्चात् उन लैंसों के लिए सोने व चांदी के फ्रेम तैयार कराए। कुछ चश्मों में पकड़ने के लिए दस्ते भी लगवा दिए। इनमें वे लैंसो को अपने साथ ले जा सकते थे और उनके माध्यम से अनेक पदार्थों का परीक्षण कर सकते थे। 

इसके बाद उन्हें एक बात और सूझी। उन्होंने एक बढ़िया लैंस को छोटे से चौखटे में जड़ा और उसके नीचे एक दर्पण लगाया। प्रकाश इस दर्पण से परावर्तित होकर उनके ऊपर लैंस में आता था। जिस पदार्थ का वे परीक्षण करना चाहते थे, उसे लैंस तथा दर्पण के मध्य एक साफ कांच की पतरी पर रख देते थे मक्खी की आंख, काली मिर्च का कण, खाल का टुकड़ा आदि । वह आवर्धी कांच अब सूक्ष्मदर्शी बन गया था।

 ऐण्टन वान लीवेनहोक के जन्म से चालीस वर्ष पहले, हालैण्ड के एक अन्य लैंस निर्माता ने दो लैंसों से एक सूक्ष्मदर्शी यंत्र बनाया था। उसकी अपेक्षा इनका सूक्ष्मदर्शी यंत्र उपयोगी और सरल था। 

जब ऐण्टन वान लीवेनहोक को उत्तम सूक्ष्मदर्शी यंत्र बनाने में सफलता मिल गई, तब उनकी रुचि उसके द्वारा विभिन्न वस्तुओं की परीक्षा करने की ओर मुड़ी। आप स्वयं को वैज्ञानिक नहीं समझते थे, मगर उनमें एक अच्छे वैज्ञानिक के सभी गुण विद्यमान थे। उन्होंने बड़ी उत्सुकता एवं धैर्य के साथ अपने आवर्धक कांच के माध्यम से मछली के छिलकों, बालों, मक्खी के पैरों तथा रजकण के नन्हें धब्बों को देखा। इतना ही नहीं, उनकी दृष्टि से कदाचित् ही कोई वस्तु बची हो। उन्होंने प्रत्येक वस्तु के परीक्षण में बड़ी सावधानी बरती। 

उन्होंने मानव के केशों का परीक्षण किया। जब उन्हें यकीन हो गया कि सभी केशों की बनावट एक जैसी है तब उन्होंने उसका चित्र बनाकर उसे ‘मानव का केश’ नाम दिया। 

उन्हीं दिनों इंग्लैण्ड के प्रसिद्ध वैज्ञानिकों के एक समूह ने ‘रायल सोसायटी’ नामक एक क्लब की स्थापना की। उस क्लब के उल्लेखनीय सदस्य थे- रसायन वैज्ञानिक रॉबर्ट बॉयल, आविष्कार राबर्ट हुक तथा महान् वैज्ञानिक आइजक न्यूटन। ऐण्टन वान के डेल्फ्ट नगर का एक व्यक्ति उस रॉयल सोसायटी का सम्मानीय सदस्य था। वह उनके मित्रों में था। उसने ऐण्टन वान के साथ पत्र-व्यवहार करे। 

डेल्फ्ट के अधिकांश लोग ऐण्टन वान लीवेनहोक को सनकी समझते थे। इसलिए ऐण्टन वान अलग-अलग रहना ही पसंद करते थे। मित्र की सलाह उन्हें ठीक लगी। उन्होंने अंग्रेज वैज्ञानिकों को जो पहला पत्र लिखा, उसका शीर्षक था-

 श्री लीवेनहोक द्वारा आविष्कृत एक सूक्ष्मदर्शी की सहायता से खाल, मांस आदि पर फफूंदी, मधुमक्खी के डंक आदि के कुछ प्रेक्षणों का एक नमूना।’

 इंग्लैण्ड की सोसाइटी के वैज्ञानिकों ने उनके पत्र में रुचि दिखाई, परिणाम स्वरूप उनकी तरफ से ऐण्टन वान को उत्तर मिला, जिसमें लिखा था- 

“जब आप नई खोज करें, तो हमें उनकी सूचना भेजे।” 

आगामी पचास वर्षों तक उन्हें इस हालैण्ड वासी ऐण्टन वान से सैकड़ों रोचक पत्र प्राप्त हुए। 

ऐण्टन वान लीवेनहोक के जीवन का सबसे महत्त्वपूर्ण दिन वह था, जब उन्होंने वर्षा के पानी की बूंद अपने सूक्ष्मदर्शी की कांच की पतरी पर रखी। उन्हें इस बात का तनिक भी बोध नहीं था कि वे मानव जाति के सम्पूर्ण इतिहास में, सबसे महत्त्वपूर्ण उद्घाटन करने वाले हैं। उन्होंने वर्षा की उस बूंद में दर्जनों नन्हें जानवर तैरते और बिलबिलाते हुए देखे। उनके सम्बन्ध में ऐण्टन वान ने लिखा है 

“वे जीव इतने छोटे होते हैं कि रेत के एक मोटे दाने पर लाखों रखे जा सकते हैं।” 

ऐण्टन वान लीवेनहोक डेल्फ्ट के पहले ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने पहली बार उन नन्हें जीवों को देखा, जिन्हें हम जीवाणुओं की संज्ञा देते हैं। उनकी यह खोज एक दिन पूर्णरूप से चिकित्सा विज्ञान की दिशा को परिवर्तित करने वाली थी। यह इस बात को संभव बनाने वाली थी कि वैज्ञानिक और चिकित्सक जीवाणुओं से उत्पन्न होने वाले रोगों को पहचानें, उनका उपचार करें और उन रोगों को रोकने का प्रयास करें। 

ऐण्टन वान लीवेनहोक के लिए शीघ्रता से इस परिणाम पर पहुँच जाना बहुत आसान था कि ये जीवाणु आसमान से वर्षा के जल के साथ गिरे हैं। मगर सच्चा वैज्ञानिक तो प्रमाण की दुनिया में जीता है।

ऐण्टन वान लीवेनहोक ने एक बर्तन को बहुत सावधानी से साफ किया। फिर उसमें वर्षा का जल इकट्ठा कर, इसे अपने सूक्ष्मदर्शी की सहायता से देखा। उसमें उन्हें एक भी जीवाणु नहीं मिला। मगर जब उस वर्षा के जल में कुछ दिन तक धूल गिरती रही, तो उसमें उन्हें हजारों ‘नन्हें जीवाणु’ मिले। लेकिन इससे भी ऐण्टन वान सन्तुष्ट नहीं हुए। उन्होंने तालाबों, झीलों, नदियों, और जहां कहीं भी पानी मिला, वहीं से लेकर उसकी परीक्षा की।

अंत में ऐण्टन वान लीवेनहोक इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि जीवाणु हमारे चारों ओर हवा में हैं। वे धूल के कणों के साथ नीचे उतर आते हैं।

एक दिन की बात है, ऐण्टन वान ने अपनी अंगुली में छेद करके, उत्सुकता पूर्वक उनमें से निकले रक्त की बूंद को देखा। ऐण्टन वान पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने रक्त की लाल-कणिकाओं को पहली बार देखा। ये नन्हीं कोशिकाएं रक्त में तैरती रहती हैं और रक्त को लाल रंग प्रदान करती हैं।

 तत्पश्चात, ऐण्टन वान ने अपने दांतों का मैल उतारकर उसका परीक्षण किया, तो उसमें जीवाणु पाए गए। उसके बाद उन्होंने एक रोचक प्रयोग किया। उन्होंने बहुत गरम कॉफी पी और फिर परीक्षण करके पाया कि उनके दांतों के कुछ जीवाणु मर गए हैं। इस बात का यह पहला प्रमाण था कि जीवाणु गरमी से मर जाते हैं। इस तरह स्वच्छता की उस विधि का आरम्भ हुआ, जिसे आधुनिकयुग में ‘निर्जीवाणु करण’ की संज्ञा दी गई है। 

एक दिन ऐण्टन वान लीवेनहोक ने एक नन्हीं मछली की पूंछ को आवर्धक कांच के नीचे रखा। तब उन्होंने उन नन्हीं रक्त वाहिकाओं को देखा, जो रक्त में धमनियों से शिराओं में पहुँचाती है। ये रक्त वाहिकाएं इतनी पतली होती हैं कि उन्हें कोशिकाएं कहते हैं। केश का अर्थ है-बाल ! विलियम हार्वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे थे कि धमनियों 

के माध्यम से रक्त हृदय से दूर जाता है और शिराओं के द्वारा हृदय में लौटता है। वे यह नहीं जान पाए थे कि रक्त धमनियों से शिराओं में कैसे पहुँचता है? लीवेनहोक ने उनके लिए इस प्रश्न का उत्तर खोज लिया था। 

इस तरह वर्ष पर वर्ष बीतते गए। ऐण्टन वान इंग्लैण्ड की रायल सोसाइटी को पत्र लिखते रहे। जब उनके पत्र इंग्लैण्ड पहुँचते, तो रायल सोसाइटी के वैज्ञानिक उनके प्रयोगों को दोहराने का प्रयास करते। 

सन् 1680 ई० तक रायल सोसाइटी के वैज्ञानिक ऐण्टन वान लीवेनहोक से इतने प्रभावित हो गए कि उन्होंने उन्हें अपनी विशिष्ट सोसाइटी का सम्मानीय सदस्य बना लिया। 

जैसे-जैसे ऐण्टन वान अपने अनुसंधानों के लिए प्रसिद्ध होते जा रहे थे, वैसे-वैसे उनकी चिन्ता बढ़ती जा रही थी क्योंकि उनके पास रूस के जार महान् पीटर और इंग्लैण्ड की रानी के समान प्रतिष्ठित अतिथि जाने लगे थे, सभी उनके सूक्ष्मदर्शी में से देखना चाहते थे, किन्तु वे चाहते थे कि ऐसी छेड़छाड़ से दूर रहें, ताकि अपना काम शान्तिपूर्वक करते रहे। 

अस्सी वर्ष की आयु में ऐण्टन वान लीवेनहोक ने एक महत्त्वपूर्ण प्रयोग किया। डेल्फ्ट नगर की नहरों में पायी जाने वाली शक्तियों पर उन्होंने अध्ययन आरम्भ किया था। उन्होंने एक शुक्ति को गिलास के जल में कई दिनों तक रखा। उन्हें यह देखकर बहुत आश्चर्य हुआ कि जलवासी जीवाणु उसे खाए जा रहे हैं। इस तरह ऐण्टन वान ने विश्व को दिखाया कि जीवाणु अपने से बहुत बड़े आकार के जन्तुओं को नष्ट कर सकते हैं और कुछ जीवाणु अवांछित कूड़े-कर्कट को नष्ट करने के लिए उपयोगी भी हो सकते हैं। 

जीवन भर जीवाणु विज्ञान के क्षेत्र में शोध करने वाले महान् वैज्ञानिक ऐण्टन वान लीवेनहोक की सन् 1723 ई० में मृत्यु हो गई। उस समय वे 91 वर्ष के थे।

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